सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

'इक्कू मोटे' की याद में... जिसका इस देश पर पूरा उतना ही हक है जितना मेरा या आपका !... (एक रीठेल)



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मेरे 'हकदार' मित्रों,

बड़ी अजीब-अजीब सी बातें हो रही हैं आजकल... कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं पूरी की पूरी कौम पर... ' मालिक ' और ' किरायेदार ' का...

अब क्या कहा जाये सिरफिरों को... मुझे बरबस याद आया अपने बचपन का दोस्त... जिसके ऊपर एक बार एक अकविता सी पोस्ट लिखी थी... उसी पोस्ट को दोबारा ठेल रहा हूँ...

और हाँ ' इक्कू ' यह जरूर दोहराना चाहूँगा कि ठीक मेरी ही तरह तुम मालिक हो किरायेदार नहीं...



तेरी दुकान पर नहीं आऊंगा दोबारा ' इक्कू '...




बहुत सालों बाद इस बार गया, अपने पुराने शहर...
रक्षाबंधन पर हर साल पानी बरसता है मेरे शहर में...
थोड़ी देर ही सही,पर परंपरा निभाई बादलों ने इस बार भी...
सुबह थोड़ी देर बरसा, फिर खुल गया आसमान...
और इसी के साथ उड़ने लगीं खूब सारी रंग बिरंगी पतंगें...
पतंग उड़ाते बच्चों को देख जाग गई सब पुरानी यादें...


तभी अनायास याद आ गया अपना ' इक्कू मोटा '...
घर से निकला आज मिल कर आउंगा उसकी दुकान पर...


हाँ, पूरा नाम है उसका, मोहम्मद इकराम कुरैशी़...
साथ साथ पड़ते थे हम शहर के सरकारी स्कूल में...
उतना मोटा तो नहीं था,पर हम सब में तगड़ा था...
उसी की वजह से बड़े रौब से चलते थे हम सब...
जब ' इक्कू मोटा ' साथ होता,पिटते कम,पीटते ज्यादा...
पढ़ाई में तो ज्यादा मन नहीं ही लगता था उसका...
मगर उसके जैसा खिलाड़ी,नहीं देखा मैंने आज तक...


खेल कोई भी हो,उस्ताद था वो सभी खेलों का...
कंचे खेलता जीत ले जाता हम सबके सारे कंचे...
क्रिकेट में बाउन्ड्री के पचासों गज बाहर गिरते उसके शॉट...
फुटबाल तो मानो चिपक जाती थी पैर से ' इक्कू ' के...
मेरी याद्दाश्त में कैरम में भी नहीं कोई जीत पाया उससे...


पर इन सबसे बढ़कर उसकी पतंगबाजी याद है मुझे...
इधर इक्कू मोटे की पतंग उड़ी तो लोग उतार लेते थे अपनी...
मांझे,सद्दी और पतंग से मानो एकाकार हो जाता था वो...
चील सा झपट्टा मारती उसकी पतंग,जब तक कुछ समझ आये...
' वो काट्टा 'चिल्लाते हुए नाच रहा होता हमारा ' इक्कू मोटा '...
उसकी पतंग उड़ने के थोड़ी देर बाद साफ हो जाता आसमान...
' है कोई और 'चुनौती देती उड़ती रहती सिर्फ उसी की पतंग...


भीड़ से बचता बचाता जब पहुंचा उस की दुकान पर...
काउंटर पर बैठा मछली साफ कर तौल रहा था वो...
' अबे साले इक्कू ' की जगह बोला " कैसे हो इकराम भाई "...
' स्साले पॉन्डी तेरी तो 'की जगह वो बोला " कैसे हो साहब "...
" साहब होंउगा दूसरों का, तुम्हारे साथ तो खेला हूँ मैं "...
" अरे नहीं,फिर भी आपकी इज्जत का लिहाज रखना होता है "...


मैंने मिलाने को हाथ बढ़ाया काउंटर के उस पार...
कलाई थमा दी उसने,बोला " हाथ गंदे हो जायेंगे आपके "...
" आज राखी के दिन भी पतंग नहीं उड़ाओगे ? " पूछा मैंने...
" अब हमारे दिन कहां? बेटा गया है आज उड़ाने ", बोला वो...


शुगर बढ़ी रहती है इन्सुलिन से भी काबू नहीं,बतलाया उसने...
थोड़ी देर कुछ इधर उधर की बातें की,फिर चाय पिलाई मुझे...



" अच्छा भाई चलता हूँ फिर आउंगा कभी " बोलकर विदा ली मैंने...
मेरी स्मृतियों के आइने में कहीं कुछ चटख गया उस रोज...


अब दोबारा कभी नहीं जाउंगा, मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर...
मैं अपनी यादों के ' इक्कू मोटे ' को, रखना चाहता हूँ जस का तस...







आभार!







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6 टिप्‍पणियां:

  1. 6.5/10

    पठनीय पोस्ट
    इंसानी रिश्तों की थाह खोजती बेहतरीन गद्य-कविता.
    ऐसे रिश्तों से बहुत लोगों को दो-चार होना पड़ता है. जैसे मेरे बचपन का हीरो 18 साल बाद जब मिला तो वो डग्गामार प्राईवेट जीप एक कस्बे में चलाता था. इस रचना को अभी दुरुस्त होना बाकी है इसमें और कसाव लाईये.

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  2. उस्ताद जी ने कंजूसी की है मै १०\१० देती हु | कविता की समझ तो नहीं है सारे नंबर सन्देश को देती हु जिस लिए कविता लिखी गई है |

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  3. उस्ताद जी को दुबारा पढना चाहिए ! मैं अंशुमाला जी से सहमत हूँ प्रवीण भाई !
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  4. बहुत ही सुन्दर कविता है, दो बार पढ़ने योग्य।

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  5. बहुत दुःख हुआ जनाब. एक अदद धड़कता दिल हम भी रखते हैं. यकीन मानिए यह रचना जितनी अच्छी आपको लगी उससे चौगुना ज्यादा अच्छी मुझे लगी. लेकिन अपने मनोभावों को कलमबद्ध करना कला है. आप कथा-सार पर जा रहे हैं लेकिन शिल्प पर ध्यान नहीं दे रहे ........अफसोस है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. .
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    उस्ताद जी,

    आपके दिये अंक व आपके द्वारा किया आकलन भी, दोनों शिरोधार्य हैं मुझे...

    आपका मार्गदर्शन मिलता रहे... यही कामना है।


    ...

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