मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

अचानक से यह अपने-अपने धर्म, धर्मग्रंथों मे लिखी बातों तथा धार्मिक रीति-रिवाजों में वैज्ञानिकता खोजने-बताने का प्रचलन क्यों बढ़ रहा है ???


.
.
.

मेरे 'विज्ञान-प्रेमी' मित्रों,


एक नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान गया होगा आपका भी शायद... वह यह है कि अपने अपने धर्म में वैज्ञानिकता ढूंढी जा रही है... और फिर पा ली गई इस 'तथाकथित वैज्ञानिकता' का पूरे जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है प्रचार के हर माध्यम द्वारा... अंतर्जाल पर तो यह शोर कुछ ज्यादा ही है...


जानवर काटने के अपने तरीके में जानवर को कम कष्ट होने से लेकर चोटी, मूँछ और दाढ़ी तक... बाल रखने, सर घुटाने, टोपी पहनने या कुछ खास किस्म के कपड़ों को पहनने में...मुर्दे को जलाने या दफनाने में... नदियों में सामूहिक तौर पर नहाने या न नहाने में... नदियों के ऊपर पुल से सिक्के फेंकने में... हाथ धोने व बर्तन धोने के तरीकों में... तमाम तरह के उपवास या भूखा रहने के तरीकों में... तमाम त्यौहारों-पर्वों में... तमाम उपासना के तरीको-कर्मकांडों में... माँस खाने में और न खाने में भी... विवाह की सही उम्र में... औरतों को पर्दे-घूंघट-आंचल में रखने/ घर के भीतर बन्द रखने... ढूँढ ढूँढ कर 'वैज्ञानिकता' खोजी जा रही है...


हजारों हजार साल पहले लिखी गई धार्मिक पुस्तकों में लिखी अस्पष्ट सी, प्राचीन व अब अप्रयुक्त भाषाओं में लिखी बातों का तत्कालीन संदर्भों से परे जाकर मनचाहा अर्थ निकाला जा रहा है, मनमानी व्याख्या की जा रही है...और इसी बहाने यह बताया-जताया जा रहा है कि देखो धर्म कितनी वैज्ञानिकता रखता है... जेनेटिक्स, चिकित्सा शास्त्र, गणित, अंतरिक्ष शास्त्र, खगोल विज्ञान, भौतिकी आदि आदि सभी आधुनिक विज्ञानों की उपलब्धियों को हजारों साल पहले ही पाया हुआ बताया जा रहा है...


क्यों हो रहा है ऐसा...

क्यों किया जा रहा है ऐसा...

सोचिये कभी...


एक कारण जो सीधा-साफ दिखाई देता है वह यह है कि हमारी नई पीढ़ी सवाल करने लगी है... ऐसा करने को कह तो रहे हो, पर वजह क्या है इसकी ?... क्या वह फायदा होगा जो धर्म बताता है ?... क्या प्रमाण है इसका ?... हम तो ऐसा कर रहे हैं पर जो नहीं कर रहे, उनका क्या, वह भी तो हमसे बेहतर जीवन जी रहे हैं ?... हम उन सब बातों में कैसे यकीन करें जो केवल किताबी हैं ?... क्या कोई ऐसा है जिसने अपनी आंखों से यह अनुभव लिये हैं ?...


इस तरह के तमाम सवाल करने लगी है हमारी नई पीढ़ी... अब 'धर्म' जो कि केवल अंध श्रद्धा और आस्था पर निर्भर है आज तक... उसके पास जवाब नहीं है इनमें से अधिकतर सवालों का... यह बार बार धर्म के वैज्ञानिकता से परिपूर्ण होने का जो शोर मचाया जा रहा है... वह इन सवालों का जवाब दिये बिना बहस को दूसरी ओर मोड़ने की कोशिश ज्यादा लगती है... यथास्थितिवाद को पोषित करती, दिन-ब-दिन अपनी प्रासंगिकता खोती 'धर्म' नाम की इस रूढ़ अवधारणा के द्वारा...


मैं इस दौर को एक बड़े अवसर के तौर पर भी देखता हूँ... अब समय आ गया है कि खास तौर पर 'धर्म' के मामले में हम अपनी नई पीढ़ी को कूपमंडूक-अनपढ़-रूढ़िवादी धर्मगुरूओं तथा उनके द्वारा की जा रही उल-जलूल व्याख्याओं के भरोसे न छोड़ते हुऐ पाठ्य क्रम में मानव के सभ्य होने से लेकर धर्म की अवधारणा के उदय होने तक का इतिहास, धर्म का फैलाव, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, धर्म के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभाव आदि विषयों को शामिल करें... ताकि हमारी नई पीढ़ी खिंची हुई लकीर पीटते हुऐ आगे बढ़ने की बजाय खुली आंखों और जागृत दिमाग के साथ आगे बढ़े...


मैंने तो अपनी कह दी...


अब आप बताइये क्या सोचते हैं इस पर ?...




आभार!







...

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया. कम मैंने यहाँ ( http://hamarianjuman.blogspot.com/2010/10/scientific-logic.html ) एक कमेन्ट किया था, देखिये जीशान भाई ने उसका क्या जवाब दिया है. मजेदार.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर समाज में जीवन को सुन्दर और खुशहाल बनाने के लिये, दैहिक और आर्थिक आपदाओं से निपटने के लिये आचरण के नियम बनाये गये थे। उनका पालन करवाने के लिये धर्म आदि से जोडकर, थोडा भय भी पैदा किया गया था। हालांकि उस स्थिति, समय और स्थान के लिहाज से जरुर इन सबके वैज्ञानिक कारण रहे होंगें।
    परन्तु जरुरी नहीं कि वे सभी नियम आज के परिवेश में उतने ही कारगर हों।

    मुझे तो लगता है कि ऐसा वही लोग कर रहे हैं, जिन्हें अपने कार्यों पर खुद विश्वास नही है और वे ऐसे कारण खोज-खोज कर और तरोड-मरोड कर अपने मन-माफिक व्याख्या निकाल कर, जनमत की सहमति पाकर अपने विचारों को पुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

    प्रणाम स्वीकार करें

    उत्तर देंहटाएं
  3. कम से कम ऐसे प्रयासों से यह तो पुष्ट हो रहा है कि विज्ञान और वैज्ञानिकता मानवता का मुकुट है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरा मानना है कि जब जो धर्म अस्तित्व में आया, उसके प्रवर्तकों ने 'अपनी तात्कालिक समझ' के अनुसार उसे 'व्यवहारिक और समझदारी भरा', आप चाहें तो अपनी सुविधा के अनुसार इसे वैज्ञानिक भी मान सकते हैं, जबकि यह सत्य है कि उस समय वैज्ञानिकता जैसी कोई चीज थी ही नहीं, बनाया। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, वैसे वैसे वे नियम और कायदे कानून अप्रासंगिक होते गये। चूँकि अब इन सब चीजों पर सवाल उठाए जाने लगे हैं, तो उन कायदे कानूनों के पालनकर्ता उन्हें अपनी पीढ़ी से जबरदस्ती मनवाने के लिए उन्हें तार्किक सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे हैं। सीधी सी बात है कि इसके पीछे उनके अपने तमाम तरह के डर हैं, जो उनसे यह सब काम जबरन करवा रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मुझे लगता है की आज ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है जो भगवान और धर्म में जिस भी रूप में विश्वास तो करते है पर उसके आडम्बरो को नहीं मानते है और एक तार्किक सुविधा जनक जीवन जीने में विश्वास करते है | लेकिन समस्या ये है की लोग धर्म और भगवान में भरोसा करने के बाद भी उसके आडम्बर नहीं मानेगे तो फिर कुछ लोगों की दुकान कैसे चलेगी लोगों को अपने हिसाब से कैसे चलाएंगे अपना उल्लू कैसे सीधा करेंगे तो फिर सारी अतार्किक बातो का भी तर्क निकला जा रहा है | पर मै इस बात से भी सहमत हु की कुछ चीजे हमारी परम्परा में ऐसी है जिनका कुछ मतलब तो था और सभी उसको माने इसके लिए उसे जान बुझ कर धर्म से जोड़ दिया गया था पर बीच के लोगों की अज्ञानता के कारण उसमे और अंधविश्वास जुड़ते चले गये और अर्थ का अनर्थ हो गया | जैसे सूर्य ग्रहण में सूर्य को ना देखना | भले पुराने लोगों का नजरिया वैज्ञानिक ना रहा हो पर वो उससे होने वाले नुकसान से परचित थे | पर ये बात हर आडम्बर पर लागु नहीं होती है |

    उत्तर देंहटाएं
  6. यह सही है कि लोग क्यो धर्म शास्त्रों के कथन को विज्ञान से प्रमाणित करना चाह्ते है?

    विवेकशील व्यक्ति को चाहिए,धर्म शास्त्रों में आज जो समझ नहिं आता, जरूरी नहिं अंध्विश्वास ही हो,और जरूरी भी नहिं वही मायने हो जो व्याख्या हम कर रहे है। मात्र इसीकारण समग्र धर्म शास्त्रों को अनावश्यक मान छोड देने की जगह, अबोध हिस्से को निरपेक्ष भाव से छोडते हुए, मानव उपयोगी गुणग्राहकता अपनानी चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अल्लाह सबसे बड़ा साइंसदान है उसी ने साइंस बनाया, बिना ऊसकी मरजि के पत्ता भी नहीँ हिल सकता।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सारे साइंस की जड़ कुरआन शरीफ मेँ है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. जब जैसा जमाना होता है तब वैसी बातें पेश की जाती हैं, सच टिक जाता है झूठ अधिक चल नहीं पाता, जहां तक मुझे पता चला है कुरआन को विज्ञान की किताब नहीं कहा जाता है लेकिन इसमें विज्ञान भी है यह साबित होता है, आजकल मैं निम्‍न पुस्‍तक का अध्‍ययण कर रहा हूं, लाजवाब किताब है, किसी और धर्म की विज्ञान विषय पर आनलाइन पुस्‍तक हो तो मुझे बताईयेगा

    कुरआन ओर विज्ञान'
    http://www.scribd.com/doc/35089527/Quran-Aur-Vigyan-hindi-book-Zakir-Nayak

    book: Quran aur Vigyan

    subject: विज्ञान अंतरिक्ष, प्रकृति, जल, भू, समुद्र, वनस्‍पति, जीव, चिकित्‍सा शरीर-रचना, भ्रुण, सार्वजनिक

    उत्तर देंहटाएं
  10. सच से मत भागो, अल्लाह पर ईमान लाओ नमाज कायम करो, देखो दुनिया बदल जायेगी ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. घर में सब सानंद हैं न ?? आपके पुनरागमन से ख़ुशी हुई !
    नयी पीढ़ी के बारे में आपके विचारों से सहमत हूँ ...कम से कम हम उन्हें तो गुमराह न करें ! काश हम धर्म का अर्थ समझ सकें !

    उत्तर देंहटाएं
  12. Bahut hi accha lekh. Lagta hai ki logo ka dharm ke nams se vishwash khatm hota ja raha hai.

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुख सुविधाओं की अंधी दौड में नष्‍ट होते पर्यावरण , सभ्‍यता और संस्‍कृति को देखते हुए तो कभी कभी प्राचीनता को आत्‍मसात करने का अवश्‍य जी चाहता है.. पर मैं आपकी बातें भी स्‍वीकार करती हूं ...
    'धर्म' के मामले में हम अपनी नई पीढ़ी को कूपमंडूक-अनपढ़-रूढ़िवादी धर्मगुरूओं तथा उनके द्वारा की जा रही उल-जलूल व्याख्याओं के भरोसे न छोड़ते हुऐ पाठ्य क्रम में मानव के सभ्य होने से लेकर धर्म की अवधारणा के उदय होने तक का इतिहास, धर्म का फैलाव, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, धर्म के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभाव आदि विषयों को शामिल करें... ताकि हमारी नई पीढ़ी खिंची हुई लकीर पीटते हुऐ आगे बढ़ने की बजाय खुली आंखों और जागृत दिमाग के साथ आगे बढ़े...
    काश ऐसा संभव हो पाता !!

    उत्तर देंहटाएं
  14. प्रवीण शाह जी ,
    कल की आपकी पोस्ट आपके 'अजर अमर मित्रों' को संबोधित थी सो नश्वर जीव होने के नाते उस पर कमेन्ट करना उचित नहीं लगा :)

    आज आपने 'विज्ञान-प्रेमी' मित्रों को पोस्ट डेडीकेट की है तो इसमें से 'प्रेमी'मित्रों वाला टुकड़ा पकड़ कर आपकी पोस्ट पढ़ डाली है ! मुद्दे पर आपकी शिकायत जायज़ लगी हमें !

    घर में सबके सानंद होनें के बारे में सतीश भाई की चिंता दूर कीजियेगा ! बिटिया का नाम क्या रखा है बताना मत भूलिएगा !

    उत्तर देंहटाएं
  15. बेहतरीन पोस्ट और बेहतरीन सोच ...
    आपने वो सवाल उठाया जो ९९ % लोगों के लिए उठाना मुश्किल है ... वजह है धर्म का डर और बदलाव का डर ...
    धर्म हमेशा से ही प्रगति के पथ पर काँटा रहा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  16. .
    .
    .
    @ अली सैय्यद साहब व आदरणीय सतीश सक्सेना जी,

    घर में सब कुशल से हैं, बिटिया का नाम यहाँ बता दिया है मैंने, आपके आशीष की कामना करता हूँ नन्ही जान के लिये...

    आभार!


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. कोई भी धर्म सद्कर्म में कभी भी बाधक नहीं बना है ..समस्या तब आती है जब धर्म को व्यवसायिकता का चोला पहनाने वालों के पीछे लोग भेड़ चाल चलने लगतें हैं...असल धर्म तो मानव जीवन को संतुलित और हर प्रकार से सुखमय बनाने का दूसरा नाम है लेकिन दुर्भाग्य से आज लोग धर्म की व्याख्या अपने-अपने जरूरत के हिसाब से करने लगे हैं...जबकि इसका आधार समूचे मानवता के कल्याण की सोच में है

    उत्तर देंहटाएं
  18. दोनों ही नाम बेहद खूबसूरत हैं ! हमारा स्नेह /आशीष हमेशा उसके साथ रहेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  19. वैसे तो मैं ब्लॉगिंग में धर्म, राजनीति पर पोस्ट, टिप्पणियाँ नहीं देता। लेकिन अब मन कर रहा कि अपने धर्म पर वैज्ञानिकता संबंधित एक पुरानी ड्राफ़्ट कर रखी पोस्ट को सामने ला ऐसी कुछ धृष्टता कर ही लूँ :-)

    उत्तर देंहटाएं
  20. सीधी सी बात है ... अब धर्म के अपने पैर तो होते नहीं है ... अब तक अन्धविश्वास पर टिका था ... पर अब जब लोग सवाल खड़ा करने लगे हैं, तो उसे अचानक विज्ञान की बैसाखी की ज़रूरत आन पड़ी है ...

    उत्तर देंहटाएं
  21. मैं आपके विचारों से सहमत हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  22. प्रवीण शाह जी!
    ओशो कहते हैं कि जब कोई राष्ट्र पास्ट टेंस या भूतकाल में बातें करने लगता है तो समझना चाहिये कि उसका विकास रुक गया है. विज्ञान कभी नहीं कहता कि न्यूटन ने ऐसा कहा था, या एवोगैड्रो की यह अवधारणा थी.. डल्टन से लेकर नील्स बोर तक और न्यूटन से आइंस्टीन तक सब आज भी प्रेज़ेंट टेंस में है… जो भी यह दावा करते हैं कि ऐसा तो हमने पहले कर दिखाया है, वे आज कहाँ छिपे बैठे हैं… बस पास्ट का बिगुल बजाकर भविष्य को अंधेरे में धकेले जाओ..

    उत्तर देंहटाएं
  23. अचानक मुझे ध्यान में आया है कि मेरे ब्लॉग में भी बहुत सी वैज्ञानिकता भरी पड़ी है।
    कई जगह इतनी गूढ़ है कि सन 2136 की कुछ खोजें उसमें अभी ही छिपी हुई हैं। आवश्यकता बस किसी ज्ञानी की है जो समझ सके और समझा सके!
    उदाहरण: मेरे ब्लॉग के लेखों में ई मात्रा की संख्या उतनी ही है जितनी my foot और bull shit में ... अब अधिक लिखूँगा तो आप के नाराज़ होने का भय है। :)

    उत्तर देंहटाएं
  24. बहुत बढ़िया और विचारणीय पोस्ट लिखी है। यदि ऐसा हो सके तो सभी को लाभ होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  25. जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ...
    धर्म भगवान के होने को मानता है। भगवान का हो्ना काफ़ी कठिन है, या कहिए कि जो परिभाषा भगवान की है वैसी शक्ति तो मुझे कहीं नजर नहीं आती। जो कुछ भी है वह काफ़ी क्रूर है। उसे प्रकृति या फ़िर केवल रैन्डम मानकर चलना ही बेहतर लगता है। किसी क्रूर शक्ति की मारे भय के पूजा करना विचित्र लगता है।
    किन्तु जिस समाज, संस्कृति, धर्म में हम बड़े हुए हैं उससे मोह के चलते, जो भी मेरा है वही सबसे बेहतर है का विचार आना स्वाभाविक है। यही भावना तो मेरा देश, मेरा प्रदेश के पीछे भी काम करती है। आज के जमाने मे सबसे बेहतर होना है तो उसे वैज्ञानिक भी होना होगा सो मेरा धर्म ही सबसे अधिक वैज्ञानिक सोच वाला है,कहना पड़ता है। my daddy strongest की तर्ज पर!
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  26. साइना को मेरा हार्दिक आशीर्वाद तथा ढेर सारा स्नेह दें प्रवीण भाई ! ईश्वर उसे इस जग की बुराइयों से बचाए ऐसी कामना है !

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!