गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

अंग्रेजी अपनाओ खुशहाली पाओ ! अंग्रेजी जिंदाबाद ! बच्चों के भविष्य के लिये यही कहना होगा सबको ! इस मामले में एक सी सोच है नारायणमूर्ति और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद की !!!


.
.
.

मेरे 'बहुभाषी' मित्रों,

दो अलग अलग खबरें हैं परंतु उनसे निकल कर आ रहा संदेश एक सा है...

इन्फोसिस के संस्थापकों में से एक व भारतीय आई टी इन्डस्ट्री के शीर्ष पुरूष एन आर नारायणमूर्ति यहाँ पर ... कहते हैं :-

"I think all state governments must make an attempt to say we will allow as many English medium schools as required because if you do not do so, then the children will not be able to move from one state to another." Job opportunities available to children who go to English medium schools generally are seen to be of a higher quality and is a reality whether one likes it or not, he said.


और ठीक उनकी ही तरह उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े गाँव में अंग्रेजी देवी के मंदिर का निर्माण करने वाले दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद कहते हैं:-

Prasad said that the temple is being built to popularise English among Dalits, who form a sizeable number in not just the village but also in the area, so that they can move ahead in their lives.

"This temple would help encourage them to learn the language which has become essential for one's growth as in 20 years' time, no decent job would be available without its knowledge," Prasad said.



हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के हित साधन के नाम पर गाल बजाना तो बहुत होता है मेरे देश में... परंतु इन भाषाओं को रोजगार से जोड़ने की, आधुनिक ज्ञान से जोड़ने की, कोई ईमानदार कोशिश आज तक तो नहीं हुई... ऐसी हालत में यह दोनों लोग एक कड़वी हकीकत को ही जुबान दे रहे हैं...


मैं तो सहमत हूँ उनसे...


आपको क्या कहना है ?


आभार!




...







सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

'इक्कू मोटे' की याद में... जिसका इस देश पर पूरा उतना ही हक है जितना मेरा या आपका !... (एक रीठेल)



.
.
.

मेरे 'हकदार' मित्रों,

बड़ी अजीब-अजीब सी बातें हो रही हैं आजकल... कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं पूरी की पूरी कौम पर... ' मालिक ' और ' किरायेदार ' का...

अब क्या कहा जाये सिरफिरों को... मुझे बरबस याद आया अपने बचपन का दोस्त... जिसके ऊपर एक बार एक अकविता सी पोस्ट लिखी थी... उसी पोस्ट को दोबारा ठेल रहा हूँ...

और हाँ ' इक्कू ' यह जरूर दोहराना चाहूँगा कि ठीक मेरी ही तरह तुम मालिक हो किरायेदार नहीं...



तेरी दुकान पर नहीं आऊंगा दोबारा ' इक्कू '...




बहुत सालों बाद इस बार गया, अपने पुराने शहर...
रक्षाबंधन पर हर साल पानी बरसता है मेरे शहर में...
थोड़ी देर ही सही,पर परंपरा निभाई बादलों ने इस बार भी...
सुबह थोड़ी देर बरसा, फिर खुल गया आसमान...
और इसी के साथ उड़ने लगीं खूब सारी रंग बिरंगी पतंगें...
पतंग उड़ाते बच्चों को देख जाग गई सब पुरानी यादें...


तभी अनायास याद आ गया अपना ' इक्कू मोटा '...
घर से निकला आज मिल कर आउंगा उसकी दुकान पर...


हाँ, पूरा नाम है उसका, मोहम्मद इकराम कुरैशी़...
साथ साथ पड़ते थे हम शहर के सरकारी स्कूल में...
उतना मोटा तो नहीं था,पर हम सब में तगड़ा था...
उसी की वजह से बड़े रौब से चलते थे हम सब...
जब ' इक्कू मोटा ' साथ होता,पिटते कम,पीटते ज्यादा...
पढ़ाई में तो ज्यादा मन नहीं ही लगता था उसका...
मगर उसके जैसा खिलाड़ी,नहीं देखा मैंने आज तक...


खेल कोई भी हो,उस्ताद था वो सभी खेलों का...
कंचे खेलता जीत ले जाता हम सबके सारे कंचे...
क्रिकेट में बाउन्ड्री के पचासों गज बाहर गिरते उसके शॉट...
फुटबाल तो मानो चिपक जाती थी पैर से ' इक्कू ' के...
मेरी याद्दाश्त में कैरम में भी नहीं कोई जीत पाया उससे...


पर इन सबसे बढ़कर उसकी पतंगबाजी याद है मुझे...
इधर इक्कू मोटे की पतंग उड़ी तो लोग उतार लेते थे अपनी...
मांझे,सद्दी और पतंग से मानो एकाकार हो जाता था वो...
चील सा झपट्टा मारती उसकी पतंग,जब तक कुछ समझ आये...
' वो काट्टा 'चिल्लाते हुए नाच रहा होता हमारा ' इक्कू मोटा '...
उसकी पतंग उड़ने के थोड़ी देर बाद साफ हो जाता आसमान...
' है कोई और 'चुनौती देती उड़ती रहती सिर्फ उसी की पतंग...


भीड़ से बचता बचाता जब पहुंचा उस की दुकान पर...
काउंटर पर बैठा मछली साफ कर तौल रहा था वो...
' अबे साले इक्कू ' की जगह बोला " कैसे हो इकराम भाई "...
' स्साले पॉन्डी तेरी तो 'की जगह वो बोला " कैसे हो साहब "...
" साहब होंउगा दूसरों का, तुम्हारे साथ तो खेला हूँ मैं "...
" अरे नहीं,फिर भी आपकी इज्जत का लिहाज रखना होता है "...


मैंने मिलाने को हाथ बढ़ाया काउंटर के उस पार...
कलाई थमा दी उसने,बोला " हाथ गंदे हो जायेंगे आपके "...
" आज राखी के दिन भी पतंग नहीं उड़ाओगे ? " पूछा मैंने...
" अब हमारे दिन कहां? बेटा गया है आज उड़ाने ", बोला वो...


शुगर बढ़ी रहती है इन्सुलिन से भी काबू नहीं,बतलाया उसने...
थोड़ी देर कुछ इधर उधर की बातें की,फिर चाय पिलाई मुझे...



" अच्छा भाई चलता हूँ फिर आउंगा कभी " बोलकर विदा ली मैंने...
मेरी स्मृतियों के आइने में कहीं कुछ चटख गया उस रोज...


अब दोबारा कभी नहीं जाउंगा, मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर...
मैं अपनी यादों के ' इक्कू मोटे ' को, रखना चाहता हूँ जस का तस...







आभार!







...




शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

मेरे मन की मौज !... अब तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ ?


.
.
.

मेरे 'मनमौजी' मित्रों,

आज का यह संवाद उनके लिये है जिन्हें कुछ ज्यादा ही जोर की मिर्ची लगी है शायद...


न जाने क्यों आज एक गीत, और वह भी गोविंदा द्वारा अभिनीत कुछ बदलाव कर गुनगुनाने का मन कर रहा है...

गाना कुछ इस तरह का है...

" मैं तो भेल पूरी खा रहा था...
बाजा बजा रहा था...

तेरी नानी मरी तो मैं क्या करूँ..."

मेरा बदलाव कुछ इस तरह से है:-

" मैं तो तुम्हारी अलग-अलग बातों में...
मौजूद विरोधाभास दिखा रहा था...
जो मजाक ही के लायक है, उसका...
मजाक ही तो उड़ा रहा था...

तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ ?"

सामान्य मसाले पड़ी किसी चीज को खाने पर यदि आपके अगाड़ी-पिछाड़ी दोनो तरफ जोरों से मिर्ची लग जाती हो...

तो कृपया यह जरूर देखें कि...

***

गलत जगह पर गलत मंत्रों के जाप से...
पुराने दिव्य मंत्रों के गलत उच्चारण से...
किसी मंत्र को १००१ के बजाय १००२ बार जाप करने से...
आपकी राशि के करीब शनि के ऊपर केतु के चढ़ जाने से, जिसकी शुक्र से मित्रता व गुरू से वैर है...
अपने हाथों की ऊंगलियों की राशि रत्न लगी अंगूठियों को अदल-बदल पहनने से...
जिसकी शान्ति करनी है उसे जगाने व जिसे जगाना है उसे शान्त करने से...


अक्सर मुँह पर छाले हो जाते हैं!...


और...


***

अज्ञान के छंटने पर दुकानदारी बन्द होने के डर से...
मंत्र जाप करते समय गलत आसन लगाने से...
बैठे-बैठे कुछ प्राचीन भाषाओं में लिखे उलजलूल विचारों की जुगाली करने से...
आपकी राशि के ऊपर शनि की तिरछी और मंगल की गोल गोल चाल से...
बोविस स्केल पर आसन स्थल की ऊर्जा १९७८९ यूनिट से कम आ जाने से...
खुद के अगले पल का पता न होते हुऐ भी दूसरों का भविष्य बताने के दबाव से...


अक्सर पिछवाड़े पर छाले या बबासीर जैसा मर्ज हो जाता है!...



कहीं आपके साथ ऐसा ही तो नहीं हो गया ?





आभार!



...





डिस्क्लेमर:- विनम्र अनुरोध है कि कृपया किसी भी स्थिति में मेरे इस आलेख को इस पोस्ट से जोड़ कर न देखें, जो किसी भी हालत में इस पोस्ट से कोई संबंध नहीं रखती थी।





...










गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

आदरणीय संगीता पुरी जी को धन्यवाद... इसी बहाने ब्लॉग मैनर्स पर कुछ सवाल भी... हम लुट नहीं सकते यार !


.
.
.

मेरे 'मौलिक' मित्रों,

आज सुबह सुबह अपने ब्लॉग के लेटेस्ट कमेंट दिखाने वाले ब्लॉगर विजेट पर आदरणीय संगीता पुरी जी का यह कमेंट देखा:-

क्‍या यह रचना आपकी है .. मैने नए चिट्ठों का स्‍वागत करते वक्‍त एक ब्‍लॉग में इस रचना को अभी अभी देखा है !!

तो तुरंत भाग कर उस नये ब्लॉग PRABHAKAR KANDYA पर पहुंचा और वहाँ यह टीप आया...


_________________________________________________________________________________



प्रिय प्रभाकर कान्ड्य,

मुझे पता नहीं कि अपने इस ब्लॉग पर आप अपनी स्वयं की लिखी रचनायें लगाते हो या अपने द्वारा जगह-जगह पढ़ी गई अपनी पसंदीदा रचनाओं को प्रस्तुत मात्र करते हो...

परंतु आज जो अतुकांत कविता आपने लगाई है... मुझे उस का रचयिता होने का श्रेय हासिल है... यह रचना सबसे पहले २७ अगस्त २००९ को मेरे ब्लॉग पर यहाँ छपी, २०१० को डॉटर्स डे के दिन मुझ द्वारा इसे दोबारा री पोस्ट भी किया गया... यह भी बता दूँ कि मैंने इसे २७ अगस्त २००९ की सुबह ही लिखा था ।

आप को इस रचना को छापते समय मुझे श्रेय देना चाहिये था व मेरी पोस्ट का लिंक भी देना चाहिये था... यह सामान्य ब्लॉग शिष्टाचार है... यदि नया होने के कारण आप यह सब नहीं जानते हैं, तो अभी भी देर नहीं हुई है... आप अपनी भूल सुधार सकते हैं।

आभार!


___________________________________________________________________________________


मेरी ओर से मामला यहीं खत्म...

पर कुछ बातें जो इस से निकली उन पर चर्चा करूँगा...

१- सबसे पहले तो सलाम आदरणीय संगीता पुरी जी की सजग नजरों को...मैंने जब पहली बार यह रचना २७ अगस्त २००९ को लगाई थी तो उन्होंने टिप्पणी भी दी थी, शायद यह सब उन्हें याद रहा और उन्होंने मुझे सूचित किया... शायद संगीता जी के सबसे नियमित आलोचकों में मेरी गिनती होती है... परंतु आलोचना को दिल से न ले वह नियमित तौर पर मेरे ब्लॉग पर आ उत्साह वर्धन भी करती हैं...अपनी बात भी कहती है मेरी भी सुनती हैं... एक अनुकरणीय ब्लॉगर हैं वे...उनको नमन...

२- लेटेस्ट कमेंट वाला यह ब्लॉगर विजेट न होता तो हो सकता है कि संगीता जी की टिप्पणी पर मेरी नजर ही नहीं पड़ती... बड़े काम का विजेट है यह...आप ने नहीं लगाया तो लगा ही लीजिये...

३- इत्तेफाक तो देखिये आज की पोस्ट मेरी १०० वीं पोस्ट है... और यह वाकया... यह कोई शुभ संकेत तो नहीं { ;) }... पर मैं लुटा नहीं, मेरी सब पोस्टें कॉपी-लेफ्ट हैं... जो चाहे लिंक या श्रेय दे कर जहाँ चाहे इस्तेमाल कर सकता है... हम लुट नहीं सकते यार !!!


आभार!






...

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

चलो भाई आत्मा-आत्मा खेलते हैं आज : एक आध्यात्मिक जुगाली... ( A Spoof )


.
.
.

मेरे 'आत्मीय' मित्रों ,

सबसे पहले तो यह चेता दूँ कि यह पोस्ट एक हल्का-फुल्का मजाक है, गंभीरता की उम्मीद रखने वाले सम्मानित पाठक इसे न ही पढ़ें तो उनकी 'आत्मा' के लिये अच्छा रहेगा... वैसे तो किसी को भी इस पोस्ट से बुरा नहीं लगना चाहिये परंतु यदि लग रहा है तो यह मानिये कि पूर्व के 'संचित कर्मों' के परिणाम स्वरूप इस जीवन में खुलकर हंसना आपकी 'आत्मा' के नसीब में नहीं है... वैसे यदि किसी को बुरा लगता भी है तो मेरी 'आत्मा' पर कोई बोझ नहीं है इसका...(आत्मा हो तब न बोझ उठायेगी...:-))

डिस्क्लेमर निबट गया, अब आते हैं पोस्ट पर... बीते दिनों 'आत्मा' पर चल रही ब्लॉगीय बहस में बहुतों ने बहुत कुछ कहा... जो-जो कहा गया, उसे पढ़ कर मेरे भौतिकवादी-खुराफाती दिमाग में जो सवाल-विचार उठे, वही आपके सामने हाजिर हैं।

यहाँ नीचे नीले रंग से वह बातें हैं जो किसी ब्लॉगर ने एक बार में ही या एकाधिक अवसरों पर आत्मा के बारे में कही हैं व ठीक उन बातों के नीचे है उन बातों की आध्यात्मिक जुगाली करने के बाद मेरे मन-मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते सवाल/विचार...

विभिन्न ब्लॉगर बंधुओं द्वारा कही गई इन बातों को उनके मूल रूप में आप यहाँ और यहाँ पर देख सकते हैं।

चलिये शुरू किया जाये...

***
"अनेकानेक जन्म लेने के साथ कभी कभी आत्मा भी बोझ तले दब जाती है । ओवर-बर्डएंड हो जाती है । जिसके कारण मनुष्य के वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी सी उलझने हो जाती हैं।"

"मृत्यु के पश्चात जब न दिमाग जिन्दा रहता है और न ही उसकी कोई कोशिका। फिर उसमें कोई स्मृतियाँ भी संचित नहीं हो सकतीं। न कोई आत्मा होती है, न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ।"


जब न कोई आत्मा होती है न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ तो ओवर बर्डन्ड क्या होता है... वह क्या है जिसके कारण वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी उलझनें हो जाती हैं।


***
"विज्ञान की मानें तो आत्मा का क्षय होता है। जैसे किसी के जीवन में कोई घटना जो उसके मस्तिष्क पर बहुत प्रभाव डालती है और व्यक्ति को गहें दुःख का अनुभव कराती है , वो आत्मा के क्षय का कारण बनती है।"
"किन्हीं घटनाओं और निरंतर असफलताओं के चलते , अवसाद से ग्रसित मनुष्य की आत्मा का बड़े अनुपात में क्षय होता है , जिसके कारण इनके अन्दर प्रायः suicide करने की टेंडेंसी आ जाती है।"


विज्ञान ने कब और कहाँ ऐसा कह दिया, और यह दुखों और असफलताओं से यह जो क्षय होता है क्या आत्महत्या करने से उसकी पूर्ति हो जाती है?


***
"कोई भी पैदायशी नास्तिक नहीं होता। कुछ घटनाएं व्यक्ति को इतना निराश करती हैं , की वह इश्वर में भी विश्वास खो बैठता है। यह भी आत्मा के क्षय का एक उदाहरण है।"

पैदायशी आस्तिक होते हैं क्या ?


***
"अगले जनम में कौन क्या बनेगा वो मनुष्य इसी जनम में खुद तय कर लेता है.उदहारण के लिए - (अ)जो लोग पर्यावरण प्रदूषित करते हैं वातावरण शुद्ध नहीं रखते उन्हें अगले जन्म में सूअर बन कर गंदगी साफ़ करनी पड़ती है."

पर्यावरण प्रदूषित करने वाले इतने सारे और सूअर इतने कम...बहुत नाइंसाफी है रे... और उन देशों का क्या जहाँ धर्म के कारण सूअर पलने ही नहीं दिये जाते... सूअर क्या-क्या करता है कि अगले जन्म में फिर से आदमी बन जाये?


***
"धर्म पुस्तक के पांचवें सफे की तीसरी कंडिका के पच्चीसवें पैराग्राफ में लिखा है की संसार में कुल 249.88932749283767620X10^762 आत्माएं हैं. जिसे इसमें यकीन न हो वह गलत सिद्ध करके दिखा दे."

एकदम सही बात भाई मुझे तो यकीन है...जिसे न हो वह दोबारा से गिनती कर ले!


***
"चार्वाक दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो पुनर जन्म को नहीं मानता।

इसके अनुसार--

यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

अर्थात इसी जन्म में हम सुख-दुःख को जी लेते हैं। सभी पाप और पुन्य कर्मों का फल भी यहीं इसी जीवन में मिल जाता है। इसीलिए मृत्यु के समय कुछ भी बकाया नहीं रहता।

अतः

नया जीवन --नयी स्मृतियाँ-- नया अनुभव--नया चिंतन ।"


कमेंट नीचे मिलेगा...

***
"यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

इस श्लोक का अर्थ है :: जब तक जीवो तब तक सुख के साथ जीवो ...ऋण लेकर भी दूध-घी का सेवन करना पड़े तो कीजिए ।"


अत:
नया जीवन-- नय़ा कर्जा-- नया घी-- सुख ही सुख

***

"आपने इतनी आत्माए आती कहा से ये प्रश्न किया है तो वेदों पुरानो व कथाओ के अनुसार मनुष्य जरुरी नहीं है की मरने के बाद पुनह मनुष्य योनी में पैदा हो और कीड़े मकोड़े भी जरुरी नहीं है की वापस कीड़े मकोड़े बनकर पैदा हो ! अतः हो सकता है की कीड़े मकोड़े पशु पंछियों की संख्या घट रही हो और मनुष्यों की संख्या बाद रही है!"

यानी की ह्युमन पोपुलेशन एक्सप्लोजन का मूल कारण तो मलेरिया-मच्छर नियंत्रण जैसे कार्यक्रम व Insecticide/Pesticide का अधिक इस्तेमाल है...और हम परिवार नियोजन कार्यक्रम की असफलता को वजह मान बैठे हैं।


***

"मनुष्य का अगला जन्म इस पर निर्भर होता है की पूर्व जन्म में मरते वक्त उस का अंतिम मनोभाव क्या था .क्यों की मरने पर सही गलत आदि निर्णय की छमता ( तार्किक शक्ति ) समाप्त हो जाती है और वह अंतिम समय के मनो भाव पर स्थिर हो जाता है और उसी के अनुसार अगला जन्म लेता है .वहा पर वो पूर्व जन्म का अच्छा और बुरा दोनों का फल प्राप्त करेगा .
भारत मुनि ब्रह्म ज्ञानी थे पर जीवन के अंतिम समय उन हो ने अपनी माँ के बिछुड़ा हुआ एक मृग का बच्चा पाल लिया और मोह ग्रस्त हो कर मरते समय उस में ही उन का चित्त था और अगला जन्म उन्हें मृग के रूप में मिला"


समझे भाई...जानवर तो पालो...पर चित्त न लगाओ उस से...जिंदगी का क्या भरोसा...कहीं आपने चित्त लगाया हुआ है और समय पूरा हो गया... फिर अगले जनम भौं भौं !!!





***
"प्रक्रिया के दौरान एक महिला ने बताया की वह पूर्व जन्म में पुरुष थी। इसका कोई प्रमाण मिल सकता है ? सच क्या है ? गीता में एक स्थान पर बताया गया है , की विभिन्न जन्मों में योनियाँ तो बदल सकती है , मनुष्य से पक्षी और पशु बन सकते हैं, लेकिन लिंग नहीं बदलता। फिर उस महिला की बात की सत्यता क्या है ? क्या ये उसके मन की कोई दमित भावना नहीं ? या अवचेतन मन का कोई विचार ?"
"इसका गीता में उल्लेख है की मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त उसका लिंग परिवर्तित नहीं होता। जो स्त्री है , वो स्त्री ही रहेगी।"


किस तरह की आत्मा को मच्छर योनि में जन्म लेना पड़ता है? और मादा मच्छर आदमी का खून व नर मच्छर फूलों का रस ही क्यों चूसते हैं... मच्छर ऐसे कौन से कर्म कर सकती है कि अगली योनि महिला की मिले?

***
"इसलिए वेदांत के अनुसार केवल जीवधारियों में ही नहीं अपितु निर्जीवों में भी आत्मा है।
आत्मा और जीव समानार्थी शब्द नहीं हैं। मोक्ष की आवश्यकता जीव को है, आत्मा को नहीं। आत्मा का अपना कोई गुण-दोष-धर्म-जाति-लिंग नहीं होता। यह पहले जीव और फिर शरीर से संयुक्त होकर गुण-दोष युक्त हो जाता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव क्रमशः आगामी जन्मों में मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। । बुरे कर्म करने वाले निम्नतर जैविक प्रजातियों में, फिर निर्जीव पदार्थ में परिवर्तित होते रहते हैं।"


अब तो गजब कन्फ्यूजन हो गया है भाई...मकान के सामने यह रेत का ढेर एक ही आत्मा है या जितने कण उतनी आत्मायें?

***
"मेरा मानना है कि-
जिस प्रकार सूरज जीवन का आधार है , फिर भी प्रत्येक प्राणी के लिए अलग-अलग सूरज नहीं है ,ठीक उसी प्रकार एक आत्मा अर्थात शक्ति पुंजभी सभी प्राणियों में समान रूप में वास करती है
अर्थात जन्म से पहले भी सूरज था और मृत्यु के बाद भी सूरज है"


अब ठीक है... यह आलेख पढ़ कर अपनी आत्मा पर बोझ न लीजियेगा...मेरी आत्मा पर फ्री फंड में बोझ बढ़ जायेगा।






आभार आपका,

आत्मीयता से अपना कीमती समय इस आलेख को पढ़ खराब करने के लिये!









...




मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

अचानक से यह अपने-अपने धर्म, धर्मग्रंथों मे लिखी बातों तथा धार्मिक रीति-रिवाजों में वैज्ञानिकता खोजने-बताने का प्रचलन क्यों बढ़ रहा है ???


.
.
.

मेरे 'विज्ञान-प्रेमी' मित्रों,


एक नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान गया होगा आपका भी शायद... वह यह है कि अपने अपने धर्म में वैज्ञानिकता ढूंढी जा रही है... और फिर पा ली गई इस 'तथाकथित वैज्ञानिकता' का पूरे जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है प्रचार के हर माध्यम द्वारा... अंतर्जाल पर तो यह शोर कुछ ज्यादा ही है...


जानवर काटने के अपने तरीके में जानवर को कम कष्ट होने से लेकर चोटी, मूँछ और दाढ़ी तक... बाल रखने, सर घुटाने, टोपी पहनने या कुछ खास किस्म के कपड़ों को पहनने में...मुर्दे को जलाने या दफनाने में... नदियों में सामूहिक तौर पर नहाने या न नहाने में... नदियों के ऊपर पुल से सिक्के फेंकने में... हाथ धोने व बर्तन धोने के तरीकों में... तमाम तरह के उपवास या भूखा रहने के तरीकों में... तमाम त्यौहारों-पर्वों में... तमाम उपासना के तरीको-कर्मकांडों में... माँस खाने में और न खाने में भी... विवाह की सही उम्र में... औरतों को पर्दे-घूंघट-आंचल में रखने/ घर के भीतर बन्द रखने... ढूँढ ढूँढ कर 'वैज्ञानिकता' खोजी जा रही है...


हजारों हजार साल पहले लिखी गई धार्मिक पुस्तकों में लिखी अस्पष्ट सी, प्राचीन व अब अप्रयुक्त भाषाओं में लिखी बातों का तत्कालीन संदर्भों से परे जाकर मनचाहा अर्थ निकाला जा रहा है, मनमानी व्याख्या की जा रही है...और इसी बहाने यह बताया-जताया जा रहा है कि देखो धर्म कितनी वैज्ञानिकता रखता है... जेनेटिक्स, चिकित्सा शास्त्र, गणित, अंतरिक्ष शास्त्र, खगोल विज्ञान, भौतिकी आदि आदि सभी आधुनिक विज्ञानों की उपलब्धियों को हजारों साल पहले ही पाया हुआ बताया जा रहा है...


क्यों हो रहा है ऐसा...

क्यों किया जा रहा है ऐसा...

सोचिये कभी...


एक कारण जो सीधा-साफ दिखाई देता है वह यह है कि हमारी नई पीढ़ी सवाल करने लगी है... ऐसा करने को कह तो रहे हो, पर वजह क्या है इसकी ?... क्या वह फायदा होगा जो धर्म बताता है ?... क्या प्रमाण है इसका ?... हम तो ऐसा कर रहे हैं पर जो नहीं कर रहे, उनका क्या, वह भी तो हमसे बेहतर जीवन जी रहे हैं ?... हम उन सब बातों में कैसे यकीन करें जो केवल किताबी हैं ?... क्या कोई ऐसा है जिसने अपनी आंखों से यह अनुभव लिये हैं ?...


इस तरह के तमाम सवाल करने लगी है हमारी नई पीढ़ी... अब 'धर्म' जो कि केवल अंध श्रद्धा और आस्था पर निर्भर है आज तक... उसके पास जवाब नहीं है इनमें से अधिकतर सवालों का... यह बार बार धर्म के वैज्ञानिकता से परिपूर्ण होने का जो शोर मचाया जा रहा है... वह इन सवालों का जवाब दिये बिना बहस को दूसरी ओर मोड़ने की कोशिश ज्यादा लगती है... यथास्थितिवाद को पोषित करती, दिन-ब-दिन अपनी प्रासंगिकता खोती 'धर्म' नाम की इस रूढ़ अवधारणा के द्वारा...


मैं इस दौर को एक बड़े अवसर के तौर पर भी देखता हूँ... अब समय आ गया है कि खास तौर पर 'धर्म' के मामले में हम अपनी नई पीढ़ी को कूपमंडूक-अनपढ़-रूढ़िवादी धर्मगुरूओं तथा उनके द्वारा की जा रही उल-जलूल व्याख्याओं के भरोसे न छोड़ते हुऐ पाठ्य क्रम में मानव के सभ्य होने से लेकर धर्म की अवधारणा के उदय होने तक का इतिहास, धर्म का फैलाव, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, धर्म के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभाव आदि विषयों को शामिल करें... ताकि हमारी नई पीढ़ी खिंची हुई लकीर पीटते हुऐ आगे बढ़ने की बजाय खुली आंखों और जागृत दिमाग के साथ आगे बढ़े...


मैंने तो अपनी कह दी...


अब आप बताइये क्या सोचते हैं इस पर ?...




आभार!







...

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

रूह या आत्मा ... What is this???... क्या हम महज एक नश्वर शरीर मात्र हैं ?...या कुछ ऐसा भी है जो शरीर से हटकर है?



.
.
.

मेरे 'अजर-अमर' मित्रों,

विषय दुरूह है और विवादास्पद भी...

सबसे पहले तो यही फैसला कर लेते हैं कि कौन कहाँ खड़ा है...

आगे और कुछ लिखने के पहले आपसे यह जानना चाहूँगा कि:-

*** आज के समय मौजूद साक्ष्य व आज का हमारा ज्ञान भी Abiogenesis or abiotic synthesis of organic molecules & subsequent development of life... यानी प्राचीन पृथ्वी पर निर्जीव से एक कोशीय जीवन की उत्पत्ति... की ओर ईशारा करता है...

*** यह प्रिमिटिव एक कोशीय जीवन समय के बीतने के साथ-साथ जटिल होता गया और परिणाम स्वरूप आज दिखाई देने वाला प्राणी व वनस्पति जगत विकसित हुआ जिसे Organic Evolution कहते हैं।

*** इस सबके विपरीत अधिकतर धर्म यह मानते हैं कि उनके उपास्य 'ईश्वर' ने सारी दुनिया एक साथ ही बना दी... जिसमें सारे जीव व पादप आदि भी शामिल हैं... सारे जीवित प्राणी जैसे आज हैं सृष्टि के आरंभ में भी वैसे ही थे... तथा मानव अन्य प्राणियों से अलग स्थान रखता है।

*** यद्मपि गाय व सूअर से निकाले गये इन्सुलिन का मानव शरीर के भीतर भी वही कार्य करना...घोड़े तथा अन्य प्राणियों के अंदर विष को इंजेक्ट कर बनाये गये प्रतिविष का मानव को बचाने में प्रयोग होना... Recombinant DNA तकनीक से बनाई वैक्सीन व दवाइयों का मानव में प्रभावी होना... जीन मैपिंग... क्रोमोसोम की संरचना...आदि आदि अनेकों ऐसे अकाट्य सबूत हैं जो यह बताते हैं कि मानव जीवन भी जैविक विकास का ही परिणाम है...वह भी एक प्राणी ही है जिसका दिमाग अन्य सभी जन्तुओं से ज्यादा विकसित है।

तो फिर ऐसा क्यों है कि मानव जीवन की समाप्ति पर हम आत्मा या रूह जैसी कल्पना पर भरोसा करते हैं... जो कभी मृत्यु का वरण नहीं करती... या तो यहीं घूमती रहती है... या फिर चुपचाप इंतजार करती है 'उस' के फैसले का... या फिर 'उस' ही में समा जाती है... दोबारा फिर कभी न आने के लिये...




आभार!







...

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

एक सूचना : कुछ समय तक अनियमित रहूँगा मैं !............

.
.
.

मेरे 'नियमित' मित्रों,


आज मात्र एक सूचना ही दूँगा...

यह तो पहले कई बार बता ही चुका हूँ कि एक बिटिया है मेरी पाँच साल की...गई २ अक्टूबर को सुबह उसका साथ निबाहने के लिये एक और प्यारी फूल सी बिटिया उतरी है मेरे आंगन में...सब कुछ ठीक से हुआ... प्रसूता व नवजात दोनों स्वस्थ हैं...और मैं व परिवार के अन्य सभी, आनंद मग्न...

इसी के चलते अगले तकरीबन एक माह तक ब्लॉगिंग में अनियमित रहूँगा...टिपियाना थोड़ा मुश्किल होगा...मोबाइल के जरिये हलचल को भांपता तो रहूँगा ही...

इस दौरान आप एक काम करिये...कोई प्यारा सा अनूठा नाम सुझाइये तो, जरा...अपनी इस नन्ही सी बिटिया के लिये...




आभार!






...