रविवार, 26 सितंबर 2010

राजशाहियाँ आज भी हम पर राज करती हैं...क्या केवल कहने भर के लोकतंत्र-गणतंत्र हैं हम ???



.
.
.

मेरे 'लोकतांत्रिक' मित्रों,


इस सूची पर जरा नजर डालिये...


फारूख अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला
प्रकाश सिंह बादल-सुखबीर सिंह बादल
विजया राजे सिंधिया-वसुंधरा राजे सिंधिया
राजेश पाइलट-सचिन पाइलट
शीला दीक्षित-संदीप दीक्षित
माधव राव सिंधिया-ज्योतिरादित्य सिंधिया
प्रफुल्ल पटेल-पूर्णा पटेल
जीतेन्द्र प्रसाद-जितिन प्रसाद
मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव
बाल ठाकरे-राज ठाकरे
करूणानिधि-स्टालिन
कल्याण सिंह-राजबीर सिंह
बीजू पटनायक-नवीन पटनायक
जगजीवन राम-मीरा कुमार
सुनील दत्त-प्रिया दत्त
प्रमोद महाजन-पूनम महाजन
शरद पवार-अजित पवार-सुप्रिया सुले
शंकरराव चव्हाण-अशोक चव्हाण
देवीलाल-ओमप्रकाश चौटाला
चरण सिंह-अजीत सिंह-जयन्त चौधरी
नेहरू-इन्दिरा-राजीव-राहुल गाँधी



सबसे नया नाम जोड़ा है जन-नेता लालू प्रसाद यादव जी ने अपने २० वर्षीय पुत्र तेजस्वी यादव की अपने उत्तराधिकारी के रूप में ताजपोशी करके...


यह तो केवल झाँकी है...बहुत से नाम मैं इस वक्त याद नहीं कर पा रहा...और इस सूची में अनेकों नाम आप लोग भी जोड़ सकते हैं...


कमोबेश ऐसा ही हाल हमारे साथ-साथ आजाद हुऐ भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों का है... नेपाल के कोईराला, बांग्लादेश के जिया व मुजीब, लंका के बंडारानायके-कुमारतुंगा, पाकिस्तान के भुट्टो व शरीफ घराने भी एक तरह के राजवंश से बन गये हैं।


कारण क्या है इस सब का ?



*** आजादी से पहले यह सारा भारतीय उपमहाद्वीप अंग्रेजी शासन के अंतर्गत विभिन्न रियासत-रजवाड़ों-राज्यों-जागीरो-निजामों में बंटा था... कहीं ऐसा तो नहीं कि हजारों सालों तक वंशानुगत शासकों के आधीन रहने के कारण हमारे सामूहिक मानस (Collective Psyche) में यह बात बहुत गहरे पैठ गई है कि शासक का बेटा शासक ही होना चाहिये व ऐसा होना ही बेहतर भी होता है ?


*** या फिर यह कि इन शासकवंशों ने कोई पोलिटिकल स्पेस छोड़ा ही नहीं है अन्यों को आगे आने के लिये ??


*** सबसे भयावह निष्कर्ष यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह लोकतंत्र-गणतंत्र का राग एक धोखा है...राजशाहियाँ अभी भी चल रही हैं...राजघराने ऊपर से भले ही एक दूसरे के विरोधी दिखते हैं, पर अंदरखाने यह एक दूसरे की संतति-'बाबा लोग' के हितों को पोषित करते हैं ???




मुझे तो यह तीनों ही कारण सही लगते हैं...



अपनी राय आप बताइये !!!



आभार!









....





11 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं तो 'काले' को 'काला' ही कहूँगा और 'सफेद' को 'सफेद',आप भले ही मुझे कुछ भी कहो . . ."
    ----मै भी...
    लिस्ट तो बहुत लम्बी होगी...याद करने की भी इच्छा नहीं है --कभी-कभी सोचती हूँ-अगली पीढ़ी को ऐसा तो नहीं लगता होगा कि खैरात मे मिला है ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. हम सच्ची लोकतांत्रिक प्रणाली में नहीं है इस बात को साबित करने के लिए यह एकमात्र तर्क नहीं है ! क्या इस सूची से बाहर के लोग भी देश की जनता के सच्चे प्रतिनिधि हैं ? मसलन गरीबी रेखा के नीचे की जनता और गरीबी रेखा के नीचे के सांसद ?
    राजनेताओं के अलावा नौकरशाहों के बारे में क्या ख्याल है ? आलेख की मूल भावना पर हमारी हां जानिये !

    उत्तर देंहटाएं
  3. जब भगवान भी भावी नेताओं को उनके ही धर जन्म लेने के लिये भेज रहा है, आप क्या कीजियेगा?

    उत्तर देंहटाएं
  4. अगर कोई नेता पुत्र नेता बनता है तो मुझे तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है. देश के हर नागरिक की तरह उसे भी हक है. आपत्ति केवल इस बात को लेकर है, कि वह बिना किसी योग्यता को दिखाए, बिना अपने कौशल को साबित किये, सीधे ऊँचे पद तक पहुँच जाता है. जबकि उससे भी काबिल लोग कहीं दूर पड़े रहते हैं. इसलिए मेरे हिसाब से परेशानी सिस्टम की है, उसे ठीक करने की ज़रूरत है. और आज के माहौल को देख तो लगता है कि यह नामुमकिन है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. लेख कि मूल भावना से सहमत कि भारत में सच्चा लोकतंत्र अभी स्थापित नहीं हो पाया है. आपके दिए तीनों कारण मुझे सही लगते हैं.

    मुझे समझ नहीं आटा हर छोटी से छोटी बात पर हो हल्ला करने वाला हमारा मीडिया तब क्यों नहीं बोलता जब सोनिया गाँधी कि बेटी को नई दिल्ली में एक कोठी दे दी जाती है और वो उस पर लाखों सरकारी रुपये खर्च करके सुधार करती है. मुझे कभी समझ नहीं आया कि राजीव और सोनिया कि बिटिया होने के अलावा एक नागरिक के रूप में उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया है कि उसे ये सब सुविधाएँ मिलती हैं और कोई कुछ नहीं बोलता. ये आम जनता कि राजे रजवाडो पर विश्वास करने कि मानसिकता को दर्शाती है.

    प्रत्येक राजनेतिक पार्टी में बड़े नेता अपने पुत्रों या पुत्रियों को अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ऊपर ले आते हैं. उनका आगे बढना छोटे कार्यकर्ताओं के आगे आने का रास्ता अवरुद्ध कर देता है.


    मैने देखा है कि परिवारवाद को आगे बढ़ने में ये बड़े नेता एक दुसरे का सहयोग करते हैं क्योंकि सभी पार्टियों में कहीं ना कहीं इनके अपने ही लोग होते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप की तीनो बाते ही सही है पर जितनी गलती इन नेताओ की है उससे ज्यादा खुद को उनकी प्रजा मानने वाली लोगों की मानसिकता से है | नेता का बेटा नेता बने कोई बुराई नहीं है जब बाकि बेटा बेटी अपने माँ बाप का "पेशा" अपनाते है तो फिर ये छुट नेता के बेटा बेटी को भी है पर जनता किस आधार पर उनको चुन लेती है | हलवाई का बेटा मिठाई ठीक ना बनाये तो उसको हम खाना छोड़ देते है पर नेता की संताने कुछ करे ना करे हम उनको वोट देना नहीं छोड़ते है | जब तक लोग प्रजा बनना नहीं छोड़ेंगे वो राजा बनना भी नहीं छोड़ेंगे | एक बार किसी नेता के बेटा को हराईये फिर देखिये परम्परा अपने आप टूटेगी |

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप भारत की बात कर रहे हैं, अमेरिका के बारे में क्या ख्याल है? इंग्लैण्ड के? फ्रांस के? जर्मनी के? जापान? स्वीडन?

    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_political_families

    दुनिया में कोई लोकतंत्र ऐसा नहीं है जहाँ परिवारवाद और भाई-भतीजावाद न हो. लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है पर सारी दुनिया यही सच है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. मैं इसको गलत नहीं मानता .. सिर्फ राजनीति ही नहीं आप अन्य सभी क्षेत्रों पर नजर डालिए ....कमोबेश यही स्थिति हर क्षेत्र में दिखेगी ...
    -
    -
    डाक्टर का बेटा डाक्टर, फौजी का बेटा फौजी, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, सुनार का बेटा सुनार ...... और ऐसा हो भी क्यूँ न ? आखिर संतान जन्म के साथ ही अपने माँ-बाप के गुण धर्म स्वतः ग्रहण करता जाता है.
    -
    -
    हर क्षेत्र की अपनी विशेषताएं होती हैं .. बारीकियां होती हैं .. ऐसे वातावरण में पले-बढे बच्चे अन्य बच्चे की तुलना में प्रायः आगे होते हैं या हम कह सकते हैं कि उन्हें एडवांटेज रहता है.
    -
    -
    लेकिन स्थिति समय के साथ बदली भी है ..सामान्य घरों के बच्चे भी निरंतर आगे आ रहे हैं.... और यह प्रतिशत आगे बढ़ता ही जाएगा

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपके विचारों से मैं सहमत हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  10. मैं शाहनवाज़ भाई ओर प्रकाश गोविन्द जी की बात से सहमत हूँ

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!