शनिवार, 18 सितंबर 2010

जात से ऊपर उठें कैसे...हमारे तो मुर्दे भी जात-पात मानते हैं अभी तक !!!




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मेरे 'जाति-तोड़क' मित्रों,

जात की जड़ें वाकई गहरी हैं...यह साबित हुआ तमिलनाडु की इस घटना से जिसमें ऊंची जातियों ने सार्वजनिक सड़क पर कंटीले तारों की बाड़ लगाकर दलितों को उस रास्ते जाने से रोक दिया...क्योंकि उनका कब्रिस्तान रास्ते में पड़ता था... व उनके विचार में दलितों के आवागमन से मृत पुरखों की पवित्रता प्रदूषित होती है...

इस खबर को आप अंग्रेजी में चित्र सहित यहाँ पर... देख सकते हैं ।

खबर इस प्रकार है...

‘Untouchability fence’ in TN pulled down
K A Shaji | TNN
Dharapuram: Acting swiftly against a glaring instance of untouchability in western Tamil Nadu, revenue and police officials on Wednesday directed caste Hindus of N Kumarapalayam village, near Dharapuram in Tirupur district, to remove two fences they had erected to prevent dalits from using public roads.
About 150 families of caste Hindus erected barbed wire ‘‘untouchability fences’’ on Friday to prevent over 50 dalit families living in the Aandikattu Thottam village from entering two roads maintained by Nanjiyampalayam village panchayat. The reason given by the caste Hindus was that the roads passed through the graveyards of their forefathers and the frequent movement of dalits may ‘‘pollute their sanctity.’’
Despite a police crackdown, untouchability is still practiced in several parts of Tamil Nadu. In a shocking incident over two years ago in Uthapuram village in southern Tamil Nadu, caste Hindus erected not just a wire fence but a concrete wall around a dalit colony to prevent them from entering their area. However, the wall was demolished by the district administration.
The fences erected on Friday forced the Dalit families to take a detour of 3km to reach the nearest ration shop, school and market.


जाति को तोड़ने के लिये अभी काफी काम करना बाकी है...

पर क्या धर्म (???) के पुनरूत्थान के इस दौर मे आपको यह संभव लगता है ?...

आप क्या सोचते हैं इस बारे में ?


आभार!




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36 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक ये देश जाति- धर्म की भावना से ऊपर उठ कर नहीं सोचेगा तब तक इस देश की हालत में सुधार संभव नहीं लगता .... बढ़िया लेख

    इसे भी पढ़े :-
    (आप क्या चाहते है - गोल्ड मेडल या ज्ञान ?)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html

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  2. यही तो हमारे देश कि प्रगति में एक रोड़ा है ...पर मुझे नहीं लगता ये हम खतम कर पाएंगे ....

    बहुत अच्छी पोस्ट ..बधाई

    __________
    इसे भी पढ़े :- मजदूर
    http://coralsapphire.blogspot.com/2010/09/blog-post_17.html

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  3. मानवता से बड़ा धर्म कोई नहीं , मानवता से बड़ी जाति कोई नहीं
    मुझे आजतक इस तरह की हरकतों [जैसे यहाँ कंटीले तारों की बाड़ लगाने ] के पीछे लोजिक समझ में नहीं आया
    मुझे लगता है की हम चाहे जातिवाद ना ख़त्म कर पायें पर बढ़ने तो नहीं देंगे और किसी एक को भी सुधार पाए तो ये देश के विकास में योगदान ही होगा
    इसके लिए जरूरी है इतिहास की सही जानकारी और पूरा रेफरेंस, शुरुआत यहीं से होनी चाहिए

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  4. अगर ऐसा कोई धर्म है जिसमें मानवता का स्थान दूसरे नंबर पर है तो ऐसे धर्म को त्याग देना ही उचित होगा
    ऐसे लोग जो किसी धर्म के नाम पर सिर्फ जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं तो उन्हें त्याग देना ही उचित होगा

    {शबरी भीलन के जूठे बेर खाने वाले श्री राम की जय बोलो }

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  5. इन खबरों से लगता ही नहीं है की हम आज तक कबीलाई मानसिकता से उबर पाए हैं -बहुत दुर्भाग्यपूर्ण !

    उत्तर देंहटाएं
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    @ मित्र गौरव,

    लो...

    " शबरी के जूठे बेर खाने वाले श्री राम की जय "

    पर मात्र इतना कह कर हम दायित्व मुक्त नहीं हो जाते...

    राम से शंबूक वध क्यों करवाया गया...

    हमारे राम कैसे होने चाहिये...

    और क्यों आज भी कोई शंबूक बलिदान दिवस मनाने को बाध्य हो जाता है... ?

    इन सब सवालों के जवाब हम मिलकर तलाश लें तो जात-पात और असमानता दोनों खत्म हो जायेगी...

    समस्या के मूल पर प्रहार करो मित्र...कम से कम मेरा तो यही प्रयास रहता है।

    आभार!

    ...

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  7. ऐसी मानसिकता इस देश का दुर्भाग्य है !

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  8. @@" शबरी के जूठे बेर खाने वाले श्री राम की जय "
    ना ना ... मैं दायित्व मुक्त नहीं हो रहा हूँ, लगता है आप तो मुझे बस "नारा लगाओ" वाले लोगों में से एक समझते हैं :) ऐसा नहीं है मित्र

    आपने तो केवल अंतिम लाइन पर ध्यान दिया है
    ये सन्देश तो उन जाति वादी विद्वानों(?) के लिए था


    अभी दिए गए लिंक नहीं पढ़े हैं , पढ़ कर फिर बात करते हैं

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  9. जाति व्यवस्था टूट तो रही है पर टूटने की रफ्तार इतनी धीमी है कि पता ही नहीं चलती!सामाजिक बदलाव ऐसे ही होते हैं ! आपकी अपेक्षा जैसे नियोजित बदलाव की सम्भावनायें ज़रा कम ही हैं !

    इसे देर सबेर विलुप्त होना ही है पर भय ये है कि इसकी जगह समूहीकरण का कोई और भयानक चेहरा ना सामने आ जाये !

    वैसे मैं सोच रहा हूँ कि किसी टिप्पणीकार नें "जाति ना पूछो साधु की" बोलकर साधुओं को आगे खडा क्यों नही किया ? मेरा मतलब साधुओं की एक नई जाति की स्थापना :)

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  10. यु पी में सर नेम लगाना अनिवार्य नहीं है सो मुझे तो १२ वि तक अपने ही कई सहपाठियों और मित्रो की जाती पता ही नहीं थी और न ही मैंने कभी इस पर ध्यान दिया था जाती के बारे में मेरा ध्यान तब गया जब हमारे विद्यापीठ के एक ऊँची जाती के प्रोफ़ेसर ने मुझसे मेरा नाम पूछा मैंने बता दिया फिर कहा की पूरा नाम बताये मैंने फिर बात दिया क्योकि मै अपना सरनेम तब अपने नाम में नहीं लगाती थी और इस वजह से वो मेरी जाती नहीं पता लगा पा रहे थे | तीसरी बार जब उन्होंने फिर कहा की आपका पूरा नाम यही है तब अचानक से मेरा ध्यान गया इस तरफ और क्लास के पहले दिन ही मैंने उनसे गुस्से में पूछा की सर क्या आप मेरा सर नेम जानना चाह रहे है तो सीधे पूछिये | तब से मेरा ध्यान लोगो की जाती पर जाने लगा और मैंने कई बार महसूस किया की ऊँची जाती के मेरे ही मित्रो और सहपाठियों में अपनी ऊँची जाती का होने का अभिमान था अकड थी और नीची जाती के कुछ मित्रो में ऊँची जाती के प्रति बैर भाव था साथ ही वो हर बात में ये महसूस करते थे की उनको दबाया जा रहा है जबकि ऐसा नहीं होता था और ये सब कुछ उनके मन में बचपन से ही था | कुछ घर में दिए जा रहे संस्कार और कुछ इस तरह समाज द्वारा किया जा रहा व्यवहार सभी के मन में सभी के लिए एक ग्रंथि बना देता है | ये हमारे और आपके प्रयास से नहीं जा सकता है यह लोगो की निजी सोच है ज्यादा से ज्यादा हम खुद को इन बातो से दूर रख सकते है |

    जो सरकार जाती का विरोध करती है वही सरकार हर सरकारी फार्म में जाती (सरनेम ) का कॉलम बनाती है कोई पूछे उससे की इसकी क्या जरुरत है यदि कोई आरक्षण के अंतर्गत आता है तो उसे सिर्फ अपनी जाती लिखने से तो फायदा होगा नहीं उसे सर्टिफिकेट देना होता है तो जाती के कॉलम का मतलब ही क्या है |

    उत्तर देंहटाएं
  11. सीता-परित्याग और शंबूक-वध की घटनायें पूर्णतः असत्य हैं

    संपूर्ण रामकथा महर्षि वेदव्यास ने भी महाभारत के वनपर्व के रामोपाख्यान पर्व में लिखी है. ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, कूर्म पुराण, वाराह पुराण, लिंग पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, नरसिंह पुराण में भी रामकथा का वर्णन है, लेकिन सीता-परित्याग एवं शंबूक वध का कहीं उल्लेख तक नहीं किया गया है. वस्तुतः सीता-परित्याग की प्रामाणिकता है ही नहीं.


    ना ना .. मैं नहीं कह रहा

    http://bksinha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html

    [ और मैं इसे एक सोच मानता हूँ , एक दृष्टिकोण .... बस ]
    ये अंतिम तर्क नहीं है , मैं बस ये कहना चाहता हूँ की धर्मांध व्यक्ति को धर्म का सही डोज देकर ही सुधारा जा सकता है

    मैं जैसे ही राम और शबरी की बात करता हूँ आपको "शंबूक-वध" याद आता है , स्त्री आन्दोलनकारियों को "सीता का परित्याग" याद आता है [मुझे शबरी के बेर और एक पत्नी व्रत याद आता है ]
    अपने आईडीयल को आप किस इमेज के साथ याद करते हैं उससे फर्क पड़ता है , राम के मूल चरित्र को देखा जाये तो ये घटनाएं सच में या तो जमती हुए नहीं लगती , या इनपर शोध होना बाकी है ये एहसास होता है मैंने कईं बार ऐसा महसूस किया है और लोगों को बदलते हुए भी देखा है , वो धर्म के रास्ते पर आँखों पर पट्टी बंद कर चलते हैं , उनका इलाज नास्तिक विज्ञान , या मानवता वाले विचार नहीं कर सकते .... जैसी हो बीमारी वैसा हो इलाज [ये बात अनुभव से कह रहा हूँ ]
    कहीं चर्चा अपने विषय से भटक तो नहीं रही??? [मैंने अभी अपने विचार व्यक्त नहीं किये हैं ]

    उत्तर देंहटाएं
  12. आर्थिक विकास के दौर में जाति प्रथा धीरे-धीरे टूट रही है, खत्म हो रही है… लेकिन शहरी इलाकों में ही, ग्रामीण इलाकों में हालत बहुत खराब है… शायद अर्थव्यवस्था के उस तरफ़ भी पैर पसारने से स्थिति में कुछ सुधार आ सके…

    और जो लोग जाति प्रथा से तंग आकर हिन्दू धर्म त्याग कर ईसाई बने हैं उनकी स्थिति में भी कोई खास फ़र्क नहीं आया है… तथाकथित प्रगति्शील ईसाई समाज में भी दलित ईसाईयों(?) के लिए सब कुछ "अलग" करके रखा हुआ है…

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  13. संभवतया राम के नाम का इस्तेमाल नेता अपने वोटों , मठाधीश अपने नोटों के लिए करते आये हैं इससे इमेज ऐसी हो गयी है
    विज्ञानी बुद्धि वाले लोग, जाति वादी, जेंडर वादी
    लोग सिर्फ वे घटनाएं दिमाग में रखते हैं जो दुर्भावना फैलाती है [ये समानता है अलग अलग वर्ग के लोगों में , अद्भुद नहीं है ??]

    मित्र ,
    अगर मेरे विचारों में कुछ भी मूर्खता पूर्ण नजर आये तो अवश्य खुल कर बताएं
    मैं सदैव आपका आभारी रहूँगा

    उत्तर देंहटाएं
  14. [सुधार]
    धर्मांध व्यक्ति को ""उसी धर्म का सही डोज"" देकर ही सुधारा जा सकता है, जैसी बीमारी वैसा इलाज

    उत्तर देंहटाएं
  15. जाति व्यवस्था और धर्मांधता को दूर करने के प्रयास वस्तूत इमानदारी से नहिं किये जाते। जो कोई भी इसके खिलाफ़ बोलते है वे भी अपने पूर्वग्रहों में विचारधाराओं को पुष्ट करनें के स्वार्थ से विरोध करते नज़र आते है। जाति का खांचा मिटा कर लोगों को अपने नये खांचे में लेना चाहते है। यही दुर्भाग्य है,जाति व्यवस्था के समूल नष्ट न हो पाने का।

    उत्तर देंहटाएं
  16. गौरव जी से पूर्ण सहमत,
    "धर्मांध व्यक्ति को ""उसी धर्म का सही डोज"" देकर ही सुधारा जा सकता है, जैसी बीमारी वैसा इलाज"
    क्योंकि हर धर्म में अभी भी शुद्ध एवं गुणकारी औषधि उपलब्ध है।
    पर नास्तिकों को उनका ही डोज कैसे दिया जाय?

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  17. @सुज्ञ जी
    1871 की जनगणना और उसके परिणाम की पूरी जानकारी में हल छिपा हो सकता है [ नए नवेले जाति वादियों के लिए] , यानी कुल मिला कर बात यही बन रही है की इतिहास की सही जानकारी हमें हर कीचड से बाहर निकाल लाएगी.... रही बात विज्ञान की [अर्थात नास्तिकों की :))] तो जब भारत का इतिहास खुल कर सामने आएगा तो आज का विज्ञान सूरज के सामने जलते 100 वाट के बल्ब जैसे लगेगा और महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन की बात सच हो जाएगी

    Science without religion is lame, religion without science is blind.
    Albert Einstein, "Science, Philosophy and Religion: a Symposium", 1941
    US (German-born) physicist (1879 - 1955)

    मेरा मानना है धर्म के बिना भी वही हाल होना है जो धर्म को समझे बिना हो रहा है, हम दो बेवकूफियां कर रहें हैं उस नीव पर चल रहे हैं जो विदेशियों ने डाली है ऊपर से अपने धर्म की समझ या तो बिलकुल नहीं है या अधकचरा हालत में है , एक बात और कोई सा भी धर्म अगर मानवता के साथ कंबाइंड कर दिया जाये तो सही दिशा मिल जाएगी ]

    उत्तर देंहटाएं
  18. ये किसने कह दिया की नास्तिक लोग धर्म में विश्वास नहीं करते है | मेरे लिए धर्म और भगवान में आस्था दो अलग चीज है मै इस बात पर गर्व करती हु की मै हिन्दू हु क्योकि मेरा धर्म मुझे इस बात की आजादी देता है की मै भगवान में विश्वास करू या ना करू मेरे धर्म में भगवान के साकार निराकार रूप में मानने और नास्तिक तीनो को ना केवल जगह दी गई है बल्कि बराबर मान कर तीन धाराओ के रूप में स्वीकार क्या गया है | मै अपने धर्म के बारे में यही जानती हु मैंने किसी वेद पुराण को नहीं पढ़ा है संभव हो तो मुझे बता दे की मै सही हु या गलत ताकि ये निश्चित करसकू की मुझे अपने धर्म पर गर्व करना चाहिए की नहीं | पर हा मै कभी भी धर्मान्ध नहीं बनूँगी मेरे लिए पहले मानवता होगी फिर देश फिर मेरा परिवार उसके बाद मेरे अपने फिर कही धर्म का नंबर शायद आ जाये | जाती के नाम पर भेद भाव कैसे होता है उसक नमूना यही पर देखा जा सकता है जो आप की धारा के साथ नहीं चल रहा है उसे"बेवकूफियां" कह कर उनको हिन् दिखाने का प्रयास किया जा रहा है खुद को विद्वान् होने का प्रमाण और अभिमान दिखाया जा रहा है | इसी तरह ऊँची जातियों के लोग छोटी जाती के लोगो को तुच्छ नजरो से देखते है और अपने से कमतर मानते है | इसी तरह ऊँची जाती के लोग धर्म का इस्तेमाल खुद को बड़ा दिखाने के लिए करते है और सुविधानुसार उसकी बातो को मानते है नकारते है और अपने हिसाब से परिभाषित करते है |

    उत्तर देंहटाएं
  19. नास्तिकता को किसी भी धर्म में जगह नहिं दी गई है। यह बात अलग है कि नास्तिकता के अस्तित्व को
    (होने को) स्वीकार किया गया है। केवल ईश्वर को न मानना ही नास्तिकता नहिं है।
    आस्तिकता का अर्थ है, अस्तित्व को स्वीकार करना।
    ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करन।
    आत्मा(चेतन) के अस्तित्व को स्वीकार करन।
    प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकार करना।
    इस प्रकार किसी एक या दो, या फ़िर तीनों को स्वीकार करना आस्तिकता है। और यही सभी दर्शनों में है।
    फ़िर कैसे कोई धर्म में आस्थावान रहते हुए नास्तिक हो सकता है।

    उत्तर देंहटाएं
  20. अंशुमाला जी ,
    मैं आज अपने आप को काफी प्रतिष्ठित महसूस कर रहा हूँ [ये व्यंग्य है, स्वयं मुझ पर ] मेरी छोटी सी बात का इतना तगड़ा विरोध

    अब ये मॉडर्न शब्दकोष है [टेम्परेरी वाला ] कोई यह भी तो कह सकता है की वैज्ञानिक का मतलब नास्तिक क्यों है ??
    आप खुद सर्वे करेंगी तो यही पाएंगी

    एक बात और मैंने किसी विशेष धर्म पर बात टिकाने की भी कोशिश तो नहीं की थी [जैसा आप कर रहीं हैं ] , न ही यहाँ चर्चा निराकार, साकार की हो रही है , मैंने नास्तिकता और धर्म में अविश्वास को उतना मजबूती से नहीं जोड़ा है जितना आप समझ रही है

    एक तो मैं बेवकूफ शब्द के साथ "हम" शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, ताकि किसी को बुरा ना लगे और उस पर से ये कहर ... हे इश्वर
    अब आपने बात को छेड़ दिया है तो बता देता हूँ मैं बेवकूफ आपको या मुझे या प्रवीण जी या यहाँ मौजूद किसी को नहीं उन लोगों को बोल रहा हूँ जिन पर ये पोस्ट बनी है . अब अगर आप उनके लिए भी मानवाधिकार आयोग खोलना चाहती हैं तो आपका स्वागत है जी .....जो मानवता की धारा [कथित तौर पर मेरी धारा] के साथ ना चले उसी आप क्यों सर पर बैठना चाहती हैं मेरी समझ के बाहर है

    चर्चा किस तरह दिशा खोती यह तो यहाँ पर यकीनन देखा जा सकता है इसी तरह पहले भी आप जैसे विद्वान लोग ही इन लोगों की ढाल बने बैठे थे आज भी बैठे हैं उन्हें पता ही नहीं किस विषय पर इतनी जोर से चिल्ला रहे होते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  21. अंशुमाला जी ,
    मैं आज अपने आप को काफी प्रतिष्ठित महसूस कर रहा हूँ [ये व्यंग्य है, स्वयं मुझ पर ] मेरी छोटी सी बात का इतना तगड़ा विरोध

    अब ये मॉडर्न शब्दकोष है [टेम्परेरी वाला ] कोई यह भी तो कह सकता है की वैज्ञानिक का मतलब नास्तिक क्यों है ??
    आप खुद सर्वे करेंगी तो यही पाएंगी

    एक बात और मैंने किसी विशेष धर्म पर बात टिकाने की भी कोशिश तो नहीं की थी [जैसा आप कर रहीं हैं ] , न ही यहाँ चर्चा निराकार, साकार की हो रही है , मैंने नास्तिकता और धर्म में अविश्वास को उतना मजबूती से नहीं जोड़ा है जितना आप समझ रही है

    एक तो मैं बेवकूफ शब्द के साथ "हम" शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, ताकि किसी को बुरा ना लगे और उस पर से ये कहर ... हे इश्वर
    अब आपने बात को छेड़ दिया है तो बता देता हूँ मैं बेवकूफ आपको या मुझे या प्रवीण जी या यहाँ मौजूद किसी को नहीं उन लोगों को बोल रहा हूँ जिन पर ये पोस्ट बनी है . अब अगर आप उनके लिए भी मानवाधिकार आयोग खोलना चाहती हैं तो आपका स्वागत है जी .....जो मानवता की धारा [कथित तौर पर मेरी धारा] के साथ ना चले उसी आप क्यों सर पर बैठना चाहती हैं मेरी समझ के बाहर है

    चर्चा किस तरह दिशा खोती यह तो यहाँ पर यकीनन देखा जा सकता है इसी तरह पहले भी आप जैसे विद्वान लोग ही इन लोगों की ढाल बने बैठे थे आज भी बैठे हैं उन्हें पता ही नहीं किस विषय पर इतनी जोर से चिल्ला रहे होते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  22. आपका यह यक्ष प्रश्न...
    क्या धर्म के पुनरुत्थान के दौर में यह संभव लगता है?
    ...ही काफ़ी कुछ कह रहा है....

    उत्तर देंहटाएं
  23. बड़ा मुश्किल है जाति से किसी उस भारतीय को उबार पाना जो इसे अपनी शेखी बघारने के काम लाता हो

    उत्तर देंहटाएं
  24. मेरे टिप्पणी की अंतिम लाइने पढ़िए मै विषय से भटकी नहीं हु | मुझे दो शब्दों से चिढ होती है जब हम किसी को विद्वान् या बेवकूफ कहते है | हर किसी के सोचने का अपना तरीका होता है हम किसी को भी बेवकूफ कैसे कह सकते है और हर किसी को बिना उसे ठीक से जाने विद्वान् कह देना ये दर्शाता है की आप उसकी खिल्ली उड़ा रहे है | खैर जाने दे |

    आपकी बात को यहाँ मै इस लिए जोड़ रही थी की किस तरह आप राम से जुडी किसी बात को आपने सुविधानुसार माना और किसी बात को मानने से इंकार कर दिया उसी तरह जाती पाती को मानने वाले भी इसी तरह धर्म की परिभाषा आपने पक्ष में करते है और जो बाते उनके पक्ष में ना हो उसे मानने से इंकार कर देते है | मैंने पढ़ा है की पहले जाती का आधार उसका कर्म होता है यानी जो जैसा कर्म करेगा वो उस जाती का होगा पर बाद में जन्म के आधार पर हो गया | मुझे लगता है की कुछ विद्वान् जनों ने जिनके सुपुत्रों के कर्म उस लायक नहीं थे की वो किसी भी ढंग की जाती में रह सके मतलब की ढंग का काम कर सके उन्होंने ही धर्म को आपने हिसाब से मोड़ दिया क्योकि वो ही विद्वान् थे और धर्म के जानकार थे | ताकि उनके सुपुत्रों का बिना किसी कर्म किये भी भला हो सके |

    उत्तर देंहटाएं
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    @ अली सैय्यद साहब,

    देर-सवेर जाति व्यवस्था को विलुप्त तो होना ही है... सहमत हूँ आपसे... परंतु जो उत्प्रेरण इस बदलाव को मिलना चाहिये था वह नहीं मिल पा रहा... किसी भी और दौर के मुकाबले आज जातियां दूने जोर-शोर से लामबंद हो रही हैं... दुखद है यह...और दुर्भाग्यपूर्ण भी... देश के लिये...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  26. कोई बात नहीं मैं किसी ऐसे विशेष शब्द की तलाश करूँगा बेवकूफी करने वाले को बेवकूफ कहे बिना उसे बेवकूफ कह दे

    विद्वान शब्द की चुभन उफ्फ्फ
    आपके इस पेराग्राफ में विषय को समझे बिना आपने कितनी बारे मुझे कथित विद्वान या बेवकूफ साबित करने या उनसे मिलाने की कोशिश की है आप बेहतर जानती हैं
    @ बेवकूफियां" कह कर उनको हिन् दिखाने का प्रयास किया जा रहा है खुद को विद्वान् होने का प्रमाण और अभिमान दिखाया जा रहा है | इसी तरह ऊँची जातियों के लोग छोटी जाती के लोगो को तुच्छ नजरो से देखते है और अपने से कमतर मानते है | इसी तरह ऊँची जाती के लोग धर्म का इस्तेमाल खुद को बड़ा दिखाने के लिए करते है और सुविधानुसार उसकी बातो को मानते है नकारते है और अपने हिसाब से परिभाषित करते है |


    @आपकी बात को यहाँ मै इस लिए जोड़ रही थी की किस तरह आप राम से जुडी किसी बात को आपने सुविधानुसार माना और किसी बात को मानने से इंकार कर दिया उसी तरह जाती पाती को मानने वाले भी इसी तरह धर्म की परिभाषा आपने पक्ष में करते है

    फिर से उसी समानता को साबित करने की नाकाम कोशिश की है .. जहां तक राम की बात है मैंने बार बार कहा है ये मेरे विचार नहीं हैं लेकिन एक दृष्टिकोण यह भी हो सकता है [या तो आपने पढ़ा नहीं या शायद ध्यान नहीं दिया ] अगर इसे आपने इसे मेरी सुविधा समझ लिया है , तो मैं चाहूँगा ये सुविधा सब उठायें , इससे भला हो जायेगा इस देश का ....जो घटना इतनी जगहों [ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, कूर्म पुराण, वाराह पुराण, लिंग पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, नरसिंह पुराण में] पर नहीं है आप उसे तूल क्यों देना चाहते हैं ???? सिर्फ इतना ही बता दें , कहीं आप ही तो ये जाती वाद का झंडा उठाने में अनजाने में मदद गार तो नहीं हो रही हैं {मैंने "अनजाने में" शब्द का प्रयोग किया है }

    अच्चा शायद ये बात हो की आपने राम के सीता का परित्याग न करने की बात को ह्हजम न किया हो शायद

    @ मैंने पढ़ा है की पहले जाती का आधार उसका कर्म होता है यानी जो जैसा कर्म करेगा वो उस जाती का होगा पर बाद में जन्म के आधार पर हो गया

    ये बात सुन सुन कर मै बोर हो गया हूँ क्योंकि ये सिर्फ मुझे या आपको समझ में आती है , कोशिश कीजिये किसी धर्मांध को समझ में आये तो मुझे बताइयेगा
    यहाँ सोल्यूशन आपके हमारे लिए नहीं , "बेवकूफों" ओह सोरी "भटके हुए भक्तों" के लिए निकला जा रहा है

    आपको क्या लगता है या मुझे क्या लगता है इससे देश सुधरता होता तो सुधर जाता , उनको क्या लगता है ये जानना ज्यादा जरूरी है बजाय इसके की आप सिर्फ विद्वान और बेवकूफ की शब्दावली का पोस्ट मार्टम करते रहें

    उत्तर देंहटाएं
  27. .
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    .
    @ मित्र गौरव और सुज्ञ जी,

    हमारे बीच मत भिन्नता है यहाँ पर...आप लोग मानते हैं कि यदि सही धर्म(आपके विचार से) को धारण किया जाये तो जातिवाद खत्म हो सकता है।

    वहीं केवल मैं ही नहीं, अनेकों अन्य भी यह मानते हैं कि धर्म ताकत देता है यथास्थिति व असमानता के बने रहने के हिमायतदारों को...

    अब जब बात उठी ही है तो शबरी प्रसंग में मुझे कोई विशेष बात नहीं दिखती... उस युग कें प्रचलन के कारण शबरी मात्र राम के साक्षात उसके घर तक आ जाने से श्रद्धा-भक्ति-कृतज्ञता से अभिभूत है... होश खो बैठी है... केवल मीठे बेर ही राम खायें इसलिये चख कर उन्हें राम को दे रही है... यह कुछ कुछ ऐसा ही है जैसा हमारे एक अघोषित युवराज कर रहे हैं आजकल... रात बिताते-साथ खाते हैं दलित घरों में... और देश की आस कहलाते है... जबकि यह उस युग में भी महज एक सिम्बोलिज्म था और आज भी है ।

    आज के राम को अगर शबरी से मिलने जाना है तो फलों के बाजार जाना होगा और मीठे बेरों का बाजार भाव भी देना होगा... कम से कम इतना परिवर्तन तो हुआ ही है... राहत है!


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  28. .
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    @ अंशुमाला जी,

    सबसे पहले तो यह कहूंगा कि आप ने मेरी पोस्ट के मूल भाव को समझा, तथा आप इस मुद्दे पर मेरे साथ हैं... आभार आपका !

    "तब से मेरा ध्यान लोगो की जाती पर जाने लगा और मैंने कई बार महसूस किया की ऊँची जाती के मेरे ही मित्रो और सहपाठियों में अपनी ऊँची जाती का होने का अभिमान था अकड थी और नीची जाती के कुछ मित्रो में ऊँची जाती के प्रति बैर भाव था साथ ही वो हर बात में ये महसूस करते थे की उनको दबाया जा रहा है जबकि ऐसा नहीं होता था और ये सब कुछ उनके मन में बचपन से ही था | कुछ घर में दिए जा रहे संस्कार और कुछ इस तरह समाज द्वारा किया जा रहा व्यवहार सभी के मन में सभी के लिए एक ग्रंथि बना देता है |"

    यह एक अहम आब्जर्वेशन है आपका...

    मैं तो अक्सर देखता हूँ कि अगड़ी जाति के कुछ लोग किसी भी मामले में यदि पराजित अनुभव कर रहे हों और प्रतिद्वन्दी निचली जाति का हो तो जातिगत अभिमान के चलते जाति आधारित गालियों पर तक उतर जाते हैं... ठीक वैसे ही दलित या पिछड़ी जातियों के कुछ लोग भी हर बात को जाति के चश्मे से ही देखते हैं, हर समय अपने साथ अन्याय ही होता देखते हैं और हर समय आक्रामक रूख लिये होते हैं... हद तो तब होती है जब किसी मामले में उनकी लापरवाही, अकर्मणयता या भ्रष्ट आचरण को यदि इंगित किया जाता है तो वह इसके उत्तर में भी अपनी जाति का सहारा लेते हैं... कई तो खुले आम स्वीकारते हैं कि मैंने गलत काम तो किया है परंतु शिकवा रहता है कि मुझे टारगेट केवल मेरी जाति के कारण किया जा रहा है...अगर मैं किसी और जाति का होता तो सब चलने दिया जाता... सरकारी विभागों में तो सभी जातियों के जाति आधारित समूह बन गये हैं... जो समूह के सदस्यों को सामाजिक प्रश्रय देते हैं...उनका हित देखते हैं... हर सही-गलत काम पर...

    इस तरह से जाति और मजबूती भी पा रही है।


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. @प्रवीण जी

    @अनेकों अन्य भी यह मानते हैं कि धर्म ताकत देता है यथास्थिति व असमानता के बने रहने के हिमायतदारों को...

    कुल मिला कर यही ना की धर्म को हटा देना चाहिए या ऐसा ही कुछ ... आपका नजरिया सही भी हो सकता है पर आधुनिक विज्ञान उतना भरोसेमंद नहीं है , वो तो खुद मन को छूट देने पर तुला है
    आप ही बताएं कोई एक सेंटर पॉइंट तो चुनना पड़ेगा . मैं बस इतना चाहता हूँ की किसी नए सेण्टर पॉइंट के स्थान पर पुराने [अर्थात धर्म ] को ही ठीक कर लिया जाये तो कैसा रहे ??

    @अब जब बात उठी ही है तो शबरी प्रसंग में मुझे कोई विशेष बात नहीं दिखती.

    आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, ये घटना किसी के नजरिये से प्रभावी नहीं भी हो सकती और किसी का मन इस घटना को सुनने से बदल भी सकता है
    एक उदाहरण: गांधी ने सच बोलने का प्रण लिया था जिससे वो इतने प्रसिद्द हुए .....वो हरीशचंद्र पर आधारित सिर्फ एक नाटक की देन था, ये बात तो नहीं होगी ना की गांधी को हरीशचंद्र के बारे में पहले पता नहीं था या वहां और लोग नहीं थे वो भी सुधरे हो जरूरी नहीं है, उनके लिए नाटक प्रभावी नहीं था


    @यह कुछ कुछ ऐसा ही है जैसा हमारे एक अघोषित युवराज कर रहे हैं आजकल...

    ये बात मैं पहले भी यहाँ पर कह चुका हूँ इन शब्दों में
    " .....संभवतया राम के नाम का इस्तेमाल नेता अपने वोटों , मठाधीश अपने नोटों के लिए करते आये हैं इससे इमेज ऐसी हो गयी है ..... "
    अब आप ही सोचिये इस नाम में कितनी शक्ति है की आज भी लोग इसका फायदा उठा रहे हैं तो हम भी क्यों न उठायें , ये तो सच है की लोग कनवेंस हो जाते हैं , कनवेंस करने वाले में वो बात होती है


    चलिए एक बात बताता हूँ ,
    एक जासूसी सीरियल आता था ब्योमकेश बक्षी .. इसकी एक कड़ी में किसी ख़ास रत्न को चुरा लेने के बाद चोर का पता होने पर भी उस रत्न का पता सालों तक नहीं चल पा रहा था .. अंत में ब्योमकेश बक्षी उस चोर की धार्मिक अंधश्रद्धा या श्रद्दा पर चोट करते हैं और उससे कहते हैं की ये रत्न उसके लिए शुभ नहीं रहा है आदि आदि ...एक छोटे से लेक्चर से चोर इतना प्रभावित होता है की वो तुरंत सारी बात बता देता है जो सालों से अन सुलझी गुत्थी थी


    @हमारे बीच मत भिन्नता है यहाँ पर...आप लोग मानते हैं कि यदि सही धर्म(आपके विचार से) को धारण किया जाये तो जातिवाद खत्म हो सकता है।

    मेरी नजरों में ये तो इलाज की अलग अलग पद्दतिया है मान लेते हैं हमारी आयुर्वेद है और आपकी एलोपेथी है , किसी को होम्योपेथी हो सकती है

    [सच में उन लोगों को बेहेवियर थेरेपी की जरूरत है ]

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  30. jab tulsi ki mala ram ram ki jagah kasiram japa jayaga tab to murde bhee bagawat kar dage------
    aap jaise hi log kattarwad kai prarek hote hai----

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  31. @Poorviya जी

    आप किन लोगों की बात कर रहें हैं ?? कृपया मार्गदर्शन करें

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  32. सटीक मुद्दा उठाया है...सच है मुर्दों के लिए शमशान और क़ब्रिस्तान तक जातियों में बंटे देखे जाते हैं.

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  33. जैसे कुछ विद्वानों का मत है, बदलाव धीरे धीरे आ रहा है वह भी प्रमुखतया शहरी क्षेत्रों में. शिक्षा और आर्थिक विकास की गति बढानी होगी.

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  34. मानवता से बड़ा धर्म कोई नहीं , मानवता से बड़ी जाति कोई नहीं
    अगर ऐसा कोई धर्म है जिसमें मानवता का स्थान दूसरे नंबर पर है तो ऐसे धर्म को त्याग देना ही उचित होगा
    ऐसे लोग जो किसी धर्म के नाम पर सिर्फ जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं तो उन्हें त्याग देना ही उचित होगा


    गौरव जी के उपरोक्त कमेंट्स से सहमत हूँ ,मेरी भी इस विषय पर यही राय समझी जाये

    महक

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