मंगलवार, 14 सितंबर 2010

कहीं मैं ' बड़ा आदमी ' तो नहीं बन गया हूँ ?



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मेरे 'छोटे' मित्रों,



आज बस कुछ ऐसे ही...

दिल में आये कुछ...

बेतरतीब से खयाल...





आजकल

महसूस करता हूँ

मैं अक्सर

कि

गली के मुहाने की

वह चाय की दुकान

और उस पर पड़ी

वह चरमराती बैंचें

अब नहीं खींचती मुझे

अपनी ओर बारंबार



कतरा के बच निकलने की

करता हूँ कोशिशें

मैं अपने बचपन के

यार दोस्तों से




अटपटी लगने लगी हैं

उनकी बातें मुझे

बेहूदा लगते हैं

उनके अट्टहास अब

सीने से लगाते हैं

मेरे दोस्त जब मुझे

मेरी चिंता होती है

सलवटें न पड़ जायें

मेरी सभ्य पोशाक पर




साथ बैठते समय

देखता रहता हूँ

मैं कनखियों से

रहता है अजीब सा डर

मेरे दिलो-दिमाग में

'सर्किल' का कोई मुझे

यहाँ बैठा देख न ले




क्या मैं सचमुच का

'बड़ा आदमी' तो

नहीं हो गया हूँ ?







आभार!




...

21 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े बड़ों कि बड़ी है बातें ..!

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  2. मनपसंद विचार हैं आपके ! अक्सर आत्मावलोकन से राहत आँखें खुलती रहती हैं !
    :-)

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  3. वाह जी वाह , बड़े लोगो की बड़ी बात ! कविता भी लिखते है तो "बड़े " अंदाज में ! वैसे शाह जी , ये आपको किसने कहा था की पहले आप "छोटे आदमी" थे ? :)

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  4. कविता से तो लग रहा है कि आप बड़े हो गए है। अच्‍छी कविता के लिए बधाई।

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  5. बड़ा आदमी होना बहुत खतरनाक होता है दूसरों के लिये तथा पीड़ादायक होता है अपने अन्दर के आदमी के लिए…
    मैं तो छोटा ही रहना चाहता हूं… आप भी छोटे ही रहिए…
    छोटे रहने से कई प्रकार की सहूलियतें हैं… आप ठहाका लगाकर चौराहे पर हँस सकते हैं, पान की दुकान पर खड़े होकर किसी "बड़े" की शाब्दिक ऐसी-तैसी कर सकते हैं… आदि-आदि-आदि-आदि

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  6. बहुत खूब, भगवान को कोसने पर दाल न गली तो कविताई सुरु ॥

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  7. इतना छोटापन ? ना देखा ना सुना ! होना भी नहीं चाहिए !

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  8. सही कहा जिस कंचे से खेलते सारा बचपन गुजरा वही "बड़ा आदमी" बनाते ही गन्दा खेल हो जाता है | अपनों से भी बात करते समय औपचारिकता निभाते है पर क्या करे हम सभी ही बड़ा आदमी ही बनना चाहते है |

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  9. उम्र बढ़ने के साथ विचारों में सोच में परिवर्तन आते हैं ...
    बहुत बढ़िया रचना अभिव्यक्ति...
    बधाई .

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  10. इसे पढकर तो लगता है की बड़ा बनना बंद करना पड़ेगा :-)

    सचमुच बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति रचना,

    ये रचना तो हम सभी के ऐसे क्षणों में मन में आये हुए विचारों को व्यक्त कर रही है

    आभार

    महक

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  11. परिस्थितियों पर भावनात्मक चोट।

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  12. वड्डे वड्डे लोग वड्डी वड्डी बातें....
    इन्ने सारे वड्डे लोग ..!!!
    :)

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  13. सारे लक्षण तो उसी बीमारी के लगते हैं जो आप बता रहे हैं.. खैर ऐसे रोग पालना जरूरी हैं वहाँ जिन्दा रहने के लिए.. :P

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  14. सर जी प्रणाम!! लग तो रहा है...याद रखना मगर!!





    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

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  15. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, हिंदी ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  16. अच्छी पंक्तिया ........

    मेरे ब्लॉग कि संभवतया अंतिम पोस्ट, अपनी राय जरुर दे :-
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html
    कृपया विजेट पोल में अपनी राय अवश्य दे ...
    .

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  17. एक कहानी लिखने का मन हो आया -शीर्षक ,समयांतर !

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  18. बडे होनें का दिखावा,और छोटे लगने का भय,नहिं बना सकता हमें बडा।
    बडा आदमी निर्भयता और कोमलता का समन्वय होता है।

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  19. बड़े आदमी को हमारा प्रणाम :)

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