बुधवार, 8 सितंबर 2010

कुछ ' शब्द ' जो तैरेंगे फिजाओं में ... एक सपना देखिये आप भी ! ... क्योंकि फैसला अब आने ही वाला है...



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मेरे 'शब्द-शिल्पी' मित्रों,

" समाज... कारसेवक... अल्लाह... मंदिर... भाईचारा... चुनौती... आस्था... प्रार्थना... खुदाई... हिन्दू... मूर्ति... दुआ... रामशिला... जन्म... बाबर... मर्यादा पुरुषोत्तम... पूजा... गुलामी... खून बहना... रघुवंश... मीर बाकी... अशान्ति... चुनावी... प्रजावत्सल... अमन... परमहंस... रिसीवर... पूर्व नियोजित... प्राचीन... तनाव... शर्म... कयामत... विकल्प... सेक्युलर... पुरातत्व... राम... दोगलापन... पुनर्निमाण... समझौता... लापरवाही... दर्शन... उत्तरदायित्व... सलामत... परिषद... पुलिसकर्मी... सर्वधर्म समभाव... प्रभु... अल्पसंख्यक... १९४९... कमेटी... पौराणिकता... कट्टर पंथी... अदालत... वैदिक... सांम्प्रदायिक शक्तियाँ... हिफाजत... मालिक... जंगलराज... कारसेवा... रक्षा... राष्ट्रवाद... मजबूर... उत्खनन... हक... घर... धर्म... षड़यंत्र... भव्य... सैनिक... ढांचा... वामपंथ... मेरे राम... नमाज... मुम्बई... आराधना... रक्तरंजित... अमीर... उजड़ना... यथास्थिति... मुगल सम्राट... ललकार... पांच छह दिसंबर १९९२... दहशत... आयोग... निरपेक्ष... मुसलमान... विश्वास... आततायी... संकल्प... कानूनराज... गौरव... हथियारबंद... वोट की राजनीति... संविधान... हदीस... न्याय... मिलीभगत... भारत... लोकतंत्र... भीड़... आक्रांता... उन्माद... एक्शन... शान्ति... अपील... संघर्ष... इतिहास... देश... नमाज... दक्षिणपंथी... इतिहास... कमेटी... ध्वस्त... अयोध्या... बहुसंख्यक... विवाद... दर्शन... एकता... मस्जिद... प्रशासन... सुरक्षा... ट्रस्ट... फैसला... मुश्किल घड़ी... संपत्ति... चौबीस सितंबर... कायरता... गरीब..."


यही वह कुछ शब्द हैं... जो बार बार तैरेंगे फिजाओं में अगले पंद्रह दिन... फैसला जो आने वाला है, २४ सितंबर को... बस कहने या लिखने वाले के चयन व क्रम से निर्धारित होगा कि प्रभाव क्या पड़ेगा उनका...


बातें तो कई हो रही हैं... पर अभी तक...

मुझे इंतजार है दोनों पक्षों के यह कहने का...

कि,

" फैसला जो भी आये, हमें वह स्वीकार-शिरोधार्य होगा... मन, वचन और कर्म से..."


सोचिये, हमारा देश... एक लोकतंत्र... दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने-कहलाने का हमारा अभिमान... खुद का बनाया-अपनाया हमारा कानून... हमारी खुद की न्यायपालिका... उस न्यायपालिका के सामने रखा गया एक विवादित प्रश्न... देर से ही सही, पर आखिरकार आया फैसले का समय... और उस समय में अगर मैं... मुल्क का अदना सा नागरिक... यदि यह अपेक्षा रख रहा हूँ... तो क्या कुछ गलत है इसमें ?


एक सपना देखा है कस्बा वाले रवीश जी ने...


वे कहते हैं...


" विवादित क्षेत्र पर चौबीस सितंबर को फैसला आ जाएगा। बस चिन्ता हुई कि देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है। डर भी लगा कि कौन सा सिरफिरा कहां क्या कर देगा। किस मंच से कौन किसको ललकार देगा। फिर भरोसा हुआ कि ऐसी मुश्किल घड़ी पचासों बार इस मुल्क के इतिहास में आईं हैं। कुछ नहीं होगा। इतना तो भरोसा है। यही फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शान्त करने का साहस और रास्ता दिखा देगा। उम्मीद है चौबीस सितंबर की दोपहर आने वाला फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर देगा। जिनको हिन्दुस्तान में यकीन है उन्हें ये सपना देखना ही चाहिए। "


मित्रों, मुझे तो अपने वतन हिन्दूस्तान पर दुनिया की हर चीज से बढ़कर यकीन है...


इसीलिये यह सपना देख रहा हूँ मैं भी...


क्या आपको मेरे इस यकीन पर यकीन है ?



बताइये जरूर...



आभार!


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24 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पोस्ट

    मेरे मित्र ,
    मुझे आपके यकीन पर यकीन है

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    @ Gourav Agrawal,

    शुक्रिया मित्र, सुखद तो है ही...आश्वस्त भी करता है...आपका यह यकीन...
    आभार!


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  3. " फैसला जो भी आये, हमें वह स्वीकार-शिरोधार्य होगा... मन, वचन और कर्म से..."


    अगर सचमुच ऐसा हो तो इससे बढ़िया बात क्या हो सकती है ,लेकिन अनुभव यह कहता है की फैसला जिस भी पक्ष में आएगा,दूसरा पक्ष उससे असहमत होकर सुप्रीम कोर्ट में चला जाएगा ,फिर आपको कई साल बाद ऐसी ही एक पोस्ट और लिखनी पड़ेगी सुप्रीम कोर्ट का इस पर फैसला आने से पहले ,हाँ वह इस पर आखिरी पोस्ट हो सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसला देने के बाद तो शायद कोई विकल्प नहीं होगा किसी भी पक्ष के पास

    महक

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  4. भविष्य देखना इतना आसान है क्या ?
    मैं तो फेल हूँ !

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    प्रिय महक,

    आप सही कह रहे हैं...परंतु इस फैसले के बाद अपील (यदि कोई हो) उसे समयबद्ध तरीके से शीघ्र निपटनी चाहिये... यह दायित्व हमारी सरकार व न्यायपालिका दोनों का है... और उसके बाद उस फैसले को लागू करवा पाने का हौसला और संकल्प भी दिखाना होगा...

    आखिर कब तक टाले जा सकते हैं अहम् फैसले... कब तक भावनाओं के दोहन की खुली छूट दी जाती रहेगी ?


    ...

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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    देव,

    भविष्य देखने को नहीं कह रहा मैं...
    मेरा सवाल सीधा-सादा है...

    " जिनको हिन्दुस्तान में यकीन है उन्हें ये सपना देखना ही चाहिए। "

    मैं तो देख रहा हूँ यह सपना... क्या आप भी तैयार हैं इसे देखने को ?


    ...

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  7. काश यह विवाद यहीं ख़त्म हो जाये ! शुभकामनायें !

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  8. @आदरणीय एवं प्रिय प्रवीण जी ,

    अगर समय मिले तो यहाँ भी पधारें


    http://blog-parliament.blogspot.com/2010/09/blog-post_08.html?showComment=1284007472274_AIe9_BHiLwCLFI7ttnyiDp0kT00_0Iz9U9KlVMSoxebQ-byWrjys41x7Y9GqLUEEFm-qBYk57-Wu1gQGFYNRGWjqTQ3YGMsHQRsVDiUJtEcmHwNptC6AoVTkF0h-u-d1Zf9DrBi2VQKMzPeo2SPXMZQuWQ6A6zaWCuUTUMuL1n6cyUgN6JD67PaTS2IGhKeHTXS25RQipSsDkRZa6L9DBYvy_t01PjZ8wNLNrQgNNAVQ-5zYvzeNuHmki2hsUY9geR3PSsEl8hpap_TgKmSYHbF8ejJhRuRa-_HZWWsbNdGZIx4O93Sp8_L_3lda5r7piC-JxM1R6YzK6rpCvUeUYDDHvrHvR5La3RdARVAuaJ3PuB2j52hvqo7DIEDdzmTpFSNvCuDEe002wc7ksUWwHFdPKfRc9VfSW3wX9koW-q6lmNR-qcA3f3IAHRy8yw1I2RG5htneJOsfNlYY3n4ZRvaBLaiQHcMCdkuZK5HFDVV9pn9anCb07QamJtfEZCMbeGAEcymAMRXW78HKI342RkRRLh8Nl7eegGWpfnTPg9Vnpj387D1wn1EGbdvT7BuaPx6KR4zMVHNiZDRhWVCZOWiBm-NRwke3is34281FF74GLQPFrKAcwI_VZSUxVQppOrVAmjq_RxvwbsKwZjlQHlPzT96OE2Bus6yORRMJiGKFc8azRmP1q9qj9jjV_7cAVJvPICA-MOwKaWdIO0pAvKgDQM1myWga0jEFkKYFicirYI-J26_Hcc3umj4Sj5zzFM6iJwxZJTunmOm_yZnyIawMZmgdg3AD7K5T_BmcqIlCcPKOJoz8JwZbWG-pXgbrgnUtXLFwt-WgUmbxVmcU-yrKSaCUE1WgyAU7_CNY-hPsD31bAgAjeNUe2qzRi-zaez6oq9kjsOZs#c6444777287182387830

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  9. इतनी गंद घुल चुकी है फिजाओं में कि शायद कुछ और नफरत कुछ और कत्लो गारत कुछ और...

    कम होती इंसानियत !

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  10. एक तरफ की भीड़ कहती है यह खुदा का घर है

    दूसरी तरफ की भीड़ कहती है यहाँ भगवान पैदा हुए थे इसलिए भगवान का घर है

    ऊपर बैठा वो पता नहीं उदास है या मुस्कुरा रहा है ?

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  11. डरते आये है ....
    डरते रहेंगे........

    कितने साल निकल गए गिडगिडाते हुवे ......
    और
    अब फिर गिडगिडाएंगे

    ............
    हिन्दुस्तान में हिंदुओं के नसीब में येही लिखा है..........

    अपने लेख के शुरू में लिखे नीले शब्दों में ये शब्द भी शामिल कर लीजिए ..

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  12. काश खतम हो जाये ये विवाद..

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  13. यकीन करने को तो जी चाहता है, पर इस देश में लखैरों की जमात बहुत ज्यादा है....
    ………….
    गणेशोत्सव: क्या आप तैयार हैं?

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  14. कल सुबह NDTV पर कमाल खान कह रहे थे की सब कुछ शांत है फैसला आने दीजिये कुछ नहीं होगा | मन खुश हुआ चलो सब ठीक है पर दोपहर तक ये विश्वास टूट गया जब एक ब्लॉग पर इसके लिए कैपेनिग की तैयारी देखी अभी एक तरफ के लोगों ने शुरू की है जल्द ही दूसरी तरफ के लोग भी शुरू कर देंगे | आज के अपरिपक्त लोगों के बीच जो भी फैसला आएगा दुसरे को नामंजूर होगा मामला फिर ऊपरी अदालत में जायेगा | निश्चिन्त रहे यही सही है फिर साठ सालो तक मामला लटका रहने दे तब तक ना हम होंगे ना आप | फैसला तभी हो जब दोनों पक्ष फैसला मानने लायक परिपक्त हो जाये वैसे जिस दिन ये हो जायेगा उस दिन किसी अदालती फैसले का कोई मायने भी नहीं होगा | आज मैंने भी अपनी पोस्ट इसी परलगाई है |

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  15. आपका अंदाज़ भी लाज़वाब है...
    सपने देखने में हमें भी यक़ीन है...

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  16. bure logo ka bura samay shuru ho chuka hai

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  17. @--मित्रों, मुझे तो अपने वतन हिन्दूस्तान पर दुनिया की हर चीज से बढ़कर यकीन है...


    इसीलिये यह सपना देख रहा हूँ मैं भी...


    Praveen ji,

    It's our common dream ! A beautiful dream indeed.

    ..

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  18. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  19. आपको एक खबर देनी थी, लेकिन ईमेल पता ही नहीं मिला :-(
    सम्पर्क करें

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  20. प्रवीण जी ,

    बहुत उम्दा बात कही है ...वैसे तो हर हिन्दुस्तानी का कर्तव्य है कि फैसले को मानें ...हम भी इस विवाद के खत्म होने का सपनह देख रहे हैं ...

    आपने अपनी पोस्ट में ५ दिसंबर १९९२ का ज़िक्र किया है ...घटना तो ६ दिसंबर को हुई थी न ...

    मेरे ब्लॉग पर आपका आना मेरे लिए सुखद अनुभव था ...शुक्रिया

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. सपना तो मैं देखता हूं। जो कुछ बन पड़ता है करता हूं। सपना देखना तो हर भारतीय को चाहिए। हो सके तो ईमानदार पहल भी। मगर कोई इसे नहीं मानेगा। मंदिर बना तो मुस्लमान नहीं मानेंगे मस्जिद की बात हुई तो हिंदु नहीं मानेंगे। विश्व हिंदु परिषद ने कम कम साफ कह तो दिया कि ये आस्था का सवाल है। दूसरा पक्ष कहता है कि जो फैसला आए वो सबको मानना चाहिए।

    मगर सच सुनिए.....
    मंदिर का फैसला आया तो दूसरा पक्ष मान जाएंगा। पर गद्दारों की फौज बहुत बड़ी है। ये पाकिस्तानी हरामजादों और नमकहराम बांग्लादेशी घुसपैठिओं के सहारे उत्पात मचाते रहेंगे।

    इसके अलावा एक पोस्ट पर एक महाश्य पहले ही लिख चुके हैं कि अगर मस्जिद के लिए फैसला नहीं हुआ तो वो मान लेंगे कि जैसे इस देश में हजारों मुसलमान कत्ल हुए मस्जिद टुटे तो एक औऱ सही। यानि अदालती फैसले को मानने की बात इस पक्ष की तरफ से सिर्फ उपरी है।

    देश में आज अपने को सनातन धर्मी कहना ही सबसे बड़ा गुनाह है। एक पार्टी उसे भगवा आतंकी कहती है तो दूसरी उसकी भावनाओं को दुहता है।

    देश का मुस्लमान युवा भी आगे रहना चाहता है। पर उसे बार-बार कुरान का हवाला देकर गुमराह किया जाता रहता है। वो ज्यादतर पार्टियों के महज एक वोट बैंक है। औऱ वो इससे निकलता भी नहीं नजर आता।

    यानि आने वाले समय में देश की ताकत युवाओं को सियासत फिर से बांटेगी।

    इसी पर मेरी भी पोस्ट है....

    देश की ताकत यानि की देश को बदलने वाली

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