मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सत्यम शिवम सुन्दरम्... कहते तो हैं हम लोग...पर 'सत्य' ही सबसे ज्यादा उपेक्षित क्यों है हमारे समाज में...और कौन है उसका जिम्मेदार?


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मेरे 'सत्य-साधक' मित्रों,


" हमें आज़ाद हुए 62 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। क्या 'उन' का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ? क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’उन‘ की नहीं थी ? क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’उन‘ के मत्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः 'उन' के ही सिर पर है। "


कौन हैं 'यह लोग'... और क्यों किया उन्होंने यह अपराध... कौन मांगेगा उन से हिसाब...इन्हीं सब प्रश्नों को बड़ी शिद्दत से उठाते हैं दॄष्टिकोण अपने आलेख में ...पढ़िये, चिंतन-मनन कीजिये, और बताइये आप क्या सोचते हैं...



पूरी पोस्ट आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं




आभार!





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12 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीन जी आप हमेशा अच्छी पोस्टों के लिंक उपलब्ध करते हैं इसके लिए धन्यवाद. वर्तमान पोस्ट को मैं पढ़ चुका हूँ . बढ़िया दृष्टिकोण है जो वास्तव में चिंतन मनन चाहता है. शायद इस वजह से ही पोस्ट पर टिप्पणी नहीं कर पाया था.

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  2. असल में मैं १२ वर्षों तक सरकारी स्कूल में पढ़ा फिर पिछले ७-८ वर्षो से शिक्षा विभाग के प्रशासन से किसी ना किसी रूप में जुड़ा हूँ. वर्तमान पीढ़ी के शिक्षकों के दोनों रूपों को करीब से देखा है तो कहीं ना कहीं शिक्षकों के प्रति मेरी दृष्टि पूर्वाग्रह ग्रसित है. उससे मुक्त हो जाऊ तो लेख पर टिप्पणी करूँगा या अपनी खुद की कोई पोस्ट लिख मारूँगा

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  3. रोज झूठ बोलते और अन्यों को धोखा देते हुए सत्य को ढूंढ तो रहे हैं...कम से खुद को ईमानदार कहना तो शुरू कर ही दिया है....
    आपके बेहतरीन लेखों में से एक ...अच्छा लगा प्रवीण भाई !
    शुभकामनायें !

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  4. क्या 'उन' का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ?
    ये 'उन' के स्थान पर 'साइंटिस्ट' है ना या 'शिक्षक' ही है ?? :))

    क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’उन‘ की नहीं थी ?
    धर्म की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर भी दिया जाये तो कौनसी सत्ता स्थापित करें जिससे उजाला हो जाये , क्या ऐसी कोई सत्ता अभी मौजूद है ??
    कृपया यह भी बताएं की शिक्षक को सत्य [वैज्ञानिक या अ वैज्ञानिक ] कहाँ से ढूंढना चाहिए ? [वो वाला सत्य जिससे बाद में मुकरना न पड़े ]

    क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’उन‘ के मत्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ?
    वो[शिक्षक ] बेचारे जिस शिक्षा पद्दति से पढ़ कर बाहर आये हैं क्या वो भारतीय है, जहां २५ साल तक सिर्फ शिक्षा को ठीक ढंग से जीवन में उतारा जाता था ??
    क्या एक ही एजेंसी को इतना जयादा दोषी बनाना उचित है [ या सिर्फ "मैंने कुछ नहीं किया" वाली भारतीय परंपरा है ]

    क्या आप कभी शिक्षक रहे हैं या अभी हैं ??
    क्या ये भी संभव नहीं की इश्वर नामक सत्ता केवल मानव में "कोई तेरे कर्मों का हिसाब रखता है " वाले मनोवैज्ञानिक हितकारी भय के लिए किया हो , जिससे फायदा तो होता ही होगा

    अंत में एक ही प्रश्न सत्य की जांच करेगा कौन वैज्ञानिक तो खुद कन्फ्यूज हैं , ये बेचारे शिक्षक की टांग क्यों खीची जा रही है ??

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  5. till the time those who fight for justice/truth are not felicitated by this society nothing can be done

    we go my masses and we blame not ourselfs but others for our peril

    and by the way
    ishwar satya haen satya hi shiv haen shiv hi sunder haen

    chhod diyaa yaa reh gayaa !!

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  6. किसी भी प्रपंच का प्रथम शिकार सत्य ही होता है।

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  7. prvin ji aapka drshn thik he lekin fir bhi sty sundr to hota hi he naa . akhtar khan akela kota rajsthan

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  8. धन्यवाद इस पोस्ट तक ले जाने का.

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