शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

बरसी !



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मेरे 'कहानीकार' मित्रों,

कहानी कहना तो मुझे आता नहीं... कहानी यह है भी नहीं... प्रयत्न मात्र कर रहा हूँ अपनी ओर से...पता नहीं ठीक से कह भी पाऊँगा या नहीं...

हमारे ही शहर में, हमारे ही मोहल्ले में रहता है वह परिवार... बचपन से ही कभी-कभी आना जाना होता है उस घर में...

बहुत साहसी थीं वो... भरी जवानी में ही पति साथ छोड़ चल दिये दूसरे लोक को...दो छोटे बच्चे छोड़ कर गोद में... बेटी दो साल की थी और बेटा सात महीने का... साथ में केवल बूढ़ी सास...

न जाने कहाँ से उन्होंने साहस जुटाया...परिवार की संचित पूंजी को बैंकों के फिक्स डिपाजिटों में डाला...केवल ब्याज खर्च करती रही...मकान के दो हिस्से किराये पर लगा दिये...अपने हर शौक-अपनी हर इच्छा का गला घोटा...और किसी तरह वो अपने सब मकसदों मे कामयाब हो गईं...किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ा...समाज की नजर में उस बड़े खानदान की मर्यादा भी रह गई...और दोनों बच्चों को अच्छी तालीम भी मिल गई...

एक अच्छा घर देख बिटिया ब्याह दी उन्होंने...बहुत सुखी है वह ससुराल में...बेटे ने तालीम का सही इस्तेमाल किया...सरकारी नौकरी ज्वाइन की...तरक्की करते करते बड़ा अफसर है वह आज...बहू स्थानीय डिग्री कालेज में टीचर थी...आज प्रिंसिपल हैं...

उनका बेटा मुझसे तकरीबन १६-१७ साल बड़ा रहा होगा...जब छोटा था मैं तो खेलते-कूदते अक्सर हो आता था उस घर में...बहुत ममतामई लगती थीं वे...जैसे-जैसे समय बीता, मैं बड़ा होता गया और पड़ोस के घरों में बेवजह जाना भी खत्म सा हो गया...

समय बीतता गया...नौकरी-रोजगार के चक्कर में बाहर निकल गये सभी...अब घर के त्यौहारों व समारोहों मे ही जाना हो पाता है अपने शहर...

५-६ साल पहले जब घर गया तो यों ही मन किया मोहल्ले में सभी से मिलने का...उनके घर भी पहुंचा... बेटे-बहू के व्यवहार से ऐसा लगा कि मेरे आने से वे उत्साहित नहीं थे...पर मैं तो उनसे ही मिलने गया था...अंदर कमरे में हैं...बताया बहू ने...मैंने कहा " चलिये कोई बात नहीं मैं भीतर ही जाकर मिल आता हूँ "..." अरे नहीं मैं बुला लाता हूँ अभी " बोला बेटा...बाहर आयी वे...मेरे लिये उस आत्मविश्वासी,संघर्षों से तपी, त्यागमूर्ति महिला को उस हाल में देखना एकदम अप्रत्याशित था...अपनी ही मात्र छाया सी बन कर रह गई थीं वो..." क्या बात बीमार हैं क्या ? " पूछा मैंने... " अरे वही बीपी और शुगर की बीमारी " बोला बहू ने...इलाज के बारे में पूछने पर बेटा-बहू एक स्वर में बोले " यह बीमारियाँ ठीक होती हैं क्या ? "... होमियोपैथी इलाज ले लेती हैं कभी-कभी, फायदा बताती हैं, बताया गया मुझको...उन्होंने मुझे बताया आंखों से अब बहुत कम दिखता है...मैंने एक दो डॉक्टरों के नाम सुझाये...पर बेटे-बहू के प्रत्युत्तर से मुझे स्पष्ट हो गया के वे लोग कुछ भी करने वाले नहीं...जबकि अब उनके बेटे-बहू के पास किसी प्रकार की कोई कमी अब न थी...बड़े ही उदास मन से आया मैं अपने घर उस दिन...

शायद तीन साल पहले माँ से बात करते समय माँ ने बताया कि अब उनकी आँखों की रोशनी जा चुकी है पूरी तरह...दोनों अनियंत्रित बीमारियों के कारण बुरे हाल में हैं वे...और घर के कोने के कमरे में गठरी सी बनी पड़ी रहती हैं...बेटे-बहू के लिये बिना तन्खवाह के चौबीसों घंटे के चौकीदार से अधिक कुछ नहीं रहीं अब वे...उस दिन खाना नहीं खा पाया मैं...

फिर एक दिन वह निकल पड़ी वो उसी अनंत यात्रा पर...जहाँ हर किसी को जाना होता है एक दिन...किसी के भी मरने पर लोग दुखी होते हैं...पर यकीन जानिये मुझे राहत मिली उस दिन...लगा कष्ट दूर हुए उनके...अब तर गई वे...

अब इस बार गरमी की छुट्टी में घर गया...बैठा था आंगन में कि आवाज सुनाई दी...उनका बेटा था सामने..." माँ की बरसी है, 'गुरू जी' भी आने वाले हैं आना जरूर, बड़ा प्रोग्राम है "...सूचित किया उसने...श्रीमती भी उसी दिन कहीं से सुन कर आई कि उनकी बहू शेखी बघार रही थी कि हम लोग बरसी में इतना खर्च करने वाले हैं...जितने में कइयों की तो शादियां निपट जाती हैं...

मेरा मन तो नहीं था...पर उस दिन पिता जी ने सुबह से ही आगाह कर दिया...आज तुझे और बहू को जाना है बरसी में...और ऐसे मामलों में उनकी बात नहीं टाल सकता मैं...

खैर पहुंचा मैं, पत्नी को साथ लिये...घर के सामने के इंटर कालेज के मैदान में बहुत बड़ा पंडाल लगा था...बेटा-बहू दोनों पंडाल के द्वार पर खड़े स्वागत को तत्पर...ऐसा लग रहा था कि आधा शहर यहीं मौजूद है..." 'गुरू जी' के प्रवचन-कीर्तन का कार्यक्रम चल रहा है...बस पंद्रह मिनट में समाप्त हो जायेगा...फिर उसके बाद खाना शुरू " सूचित किया बेटे ने...एकाध भक्त टाइप के लोगों ने मुझसे भी 'गुरू जी' को शीश नवा आशीर्वाद लेने और संकीर्तन में शामिल होने को कहा...पर मेरा फंडा है लाईफ का...'गुरू जी' टाइप लोगों से मैं हमेशा तीस गज दूर ही रहता हूँ...इसलिये मैंने पूरी विनम्रता से मुस्कुरा कर जिस जगह मैं बैठा था वहीं पर अपने कंफर्टेबल होने की बात कह उनको टाला...

माईक से अनाउन्स हुआ " 'गुरू जी' का प्रवचन अभी-अभी खत्म हुआ, आप सभी से अनुरोध है कि भोजन ग्रहण करने का कष्ट करें "...हलचल हुई जन समुदाय में...

और फिर अचानक वह हुआ जिसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है...ऐसा आंधी तूफान मेरे शहर ने कभी नहीं देखा था...टैन्ट उड़ गया, खाना परोसने के बर्तन उड़ गये, मेज कुर्सियाँ उलट-पुलट हो गयीं...हर तरफ़ धूल का गुबार...कुछ देर को तो यह लगा मानो शाम हो गई...हर कोई इस डर में कि मेरे ऊपर कोई चीज गिर न जाये, बेतरतीब भागा नजदीक के मकानों की ओर... ऐसा चलता रहा पूरे पंद्रह मिनट तक... फिर शुरू हुई ओलों की वह बारिश...ओले भी सामान्य नहीं...बड़े-बड़े...सिर पर लगें तो सर फूट जाये...आयोजकों में जो किसी तरह स्थल पर रूके हुऐ थे...उन्होंने भी मैदान छोड़ दिया...और वे भी भाग लिये...

पूरे आधे घंटे बाद जब यह थमा और ओलों की जगह बारिश ने ली...तो देखा गया कि खिलाने के लिये कुछ सही नहीं बच पाया है...पहले खाने में धूल मिट्टी घुसी...फिर रहा सहा काम ओलों व बारिश ने तमाम कर दिया...

यों तो किसी के किसी भी आयोजन में ऐसा विघ्न पड़ने पर किसी को खुश नहीं होना चाहिये...पर उस दिन एक अजीब सा संतोष हुआ मुझे यह सब देखकर...

मुझे लगा कि उस माँ ने... जिसे उस ही के बेटे ने बुढ़ापे में असहाय, नेत्रहीन गठरी सा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया था...उसके इलाज के अपने दायित्व से मुँह मोड़कर...दुनिया को दिखाने के लिये अपने उसी कृत्घ्न बेटे द्वारा की गई अपनी 'बरसी' को अस्वीकार कर दिया था...


क्या मेरा ऐसा मानना सही है ?


आप बताइये अब !



आभार!





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एक अनुरोध: अपने घर के बुजुर्गों का ख्याल रखें, उनके इलाज की चिन्ता भी वैसे ही करें जैसे आप अपने बच्चों की करते हैं, यह कभी न भूलिये कि जो कुछ भी आज हम हैं, उन्हीं की वजह से हैं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे किस्से (कहानी नहीं ) बहुत घटते देखे हैं/देख रहे हैं अपने आस- पास ...
    मुझे भी ख़ुशी हुई ...ईश्वर मुझे माफ़ करे !

    मकान तलाशने की प्रक्रिया में यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर के घर अतिवृद्ध चलने फिरने से लाचार माँ को गैलिरी में अपने साजो सामान के साथ सोते पाया ...पूछताछ करने पर पता चला कि उनका पेट ठीक नहीं रहता ...जबकि घर में दो बेडरूम में अटेच्ड लैट बाथ थे..बाद में पतिदेव ने समझाया कि कई बार घर के बुजुर्ग जिद करके ऐसे स्थान चुनते हैं कि उन्हें लोंग आते -जाते नजर आते रहें..ये भी एक पहलू है ऐसी वारदातों (!)का ...मगर मेरा मन तो इतना ख़राब हुआ कि सही कीमत पर मिलने पर भी मैंने उस मकान को रिजेक्ट कर दिया ....

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  2. मां से मुक्त हो मुक्ति दिवस सेलीब्रेट कर रहे थे वे !

    सेलीब्रेशन...मां के पुण्य स्मरण के कांधों पर चढ समाज में खुद को स्थापित करनें का यत्न कुदरत को ज़रुर असहज लगा होगा !

    हम तो यूं भी कुदरत के शैदाई हैं !

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  3. मैं तो सोच रहा था की वह हरामजादा टेंट के गिरने से मर गया होता तो धरती का एक बोझ घट जाता प्रवीण भाई !आज आपके साथ खड़ा पा रहा हूँ अपने आपको !
    सादर

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    @ हास्यफुहार जी,

    आभार!

    @ वाणी जी,

    अच्छा किया जो आपने उन प्रोफेसर साहब का मकान रिजेक्ट कर दिया...हम सब लोग इसी तरह इस तरह के लोगों को रिजेक्ट करते रहे तो हो सकता है कि उनमें से कुछ को सद् मति मिल जाये।

    @ अली सैय्यद साहब,

    हम तो कुदरत के ही शैदई हैं...किसी और के बिल्कुल नहीं...कुदरत के ही ऊपर मेरी अगली पोस्ट शीघ्र ही आपके सामने होगी।


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    @ आदरणीय सतीश सक्सेना जी,

    हरामजादा !... यकीन जानिये जब मैं पोस्ट लिख रहा था तो अंतिम पैराग्राफ में उस बेटे को डिस्क्राईब करने के लिये बार-बार यही शब्द आ जा रहा था दिमाग में...यह और बात है कि आनलाइन शब्दकोष से मैं कृत्घ्न ढूंढ पाने में कामयाब रहा...

    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    यह न्याय है या नहीं...न्याय होता भी है या नहीं...यही सवाल थे मन में...इसी लिये लिखी यह पोस्ट...अनुत्तरित ही रहते हैं अक्सर यह सवालात...


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  6. मुझे लगा कि उस माँ ने... जिसे उस ही के बेटे ने बुढ़ापे में असहाय, नेत्रहीन गठरी सा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया था...उसके इलाज के अपने दायित्व से मुँह मोड़कर...दुनिया को दिखाने के लिये अपने उसी कृत्घ्न बेटे द्वारा की गई अपनी 'बरसी' को अस्वीकार कर दिया था...


    क्या मेरा ऐसा मानना सही है ?


    आपका मानना बिलकुल सही है ,सच में अंदर तक द्रवित और व्यथित कर देती हैं ऐसी गाथाएं लेकिन सवाल यही रह जाता है की आखिर किया क्या जाए ??

    कम से कम अब मृत्युपर्यंत ही सही ,ईश्वर उस महान और पीड़ित माँ की आत्मा को शान्ति प्रदान करे


    :( :( :( :(


    महक

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  7. कितने ही किस्से देखे हैं ऐसे और आगे भी देखते चलेंगे..अफसोस होता है.

    करनी का फल इसी दुनिया में मिलता है..माँ तो खैर कभी बच्चों की किसी कृत्य के बाद भी इस तरह अस्वीकार नहीं करती..अभी तो जब उनकी औलादें उनसे यही व्यवहार करेंगी तब सही जबाब मिलेगा उन्हें..मगर तब पछताने के सिवाय क्या!!


    अच्छी लगी लेखनी.

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