गुरुवार, 30 सितंबर 2010

क्या है 'धर्म' ?


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मेरे 'धर्मपरायण' मित्रों,



क्या है धर्म ?


क्या है धर्म ??


क्या है धर्म ???


क्या है धर्म ????


कुछ और कहने की जरूरत है क्या मुझे ?


बड़े ही खुशकिस्मत हैं वह सब, जो धर्म की यह व्याख्या करते हैं !!!





आभार!





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बुधवार, 29 सितंबर 2010

ये सर्वहारा के लिये संघर्ष करते योद्धा हैं या भारत के दुश्मनों के साथ मिले हुए गद्दार ?... पाठक तू निर्णय कर इसका !!!



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मेरे 'देशभक्त' मित्रों,

लंबी चौड़ी कोई बात नहीं आज... क्रोधित हूँ मैं...

यह बयान देखिये...


"We appeal to the Indian masses to respect the Kashmiris demand for an independent country," the spokesperson told HT on Friday. He said for the last three months, Kashmiris have been fighting their war for independence sans guns or support from any terrorist groups."

"The Abdullahs -- Sheikh, Farooq and Omar Abdullah--have failed to win the Kashmiris hearts in the last 65 years," he said, strongly justifying repeal of the Special Forces Arms Act, and appealing to end killing of the young 'freedom fighters.'

"No country has succeeded in suppressing the voices of nationalist forces with guns," he said from an undisclosed location , adding, the valley is described at international forums as either India or Pakistan occupied Kashmir"
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यह सब कोई पागल अलगाववादी कश्मीरी/इस्लामी जेहादी नहीं कह रहा है... न ही यह बयान किसी पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञ का है...

यह कहना है नक्सलियों के सर्वोच्च नेताओं मे एक कोटेश्वर राव उर्फ 'किशन जी' का...

अब आप ही बताओ...

ये सर्वहारा के लिये संघर्ष करते योद्धा हैं...

या भारत के दुश्मनों के साथ मिले हुए गद्दार ?...

कहाँ हो नक्सलियों के विरूद्ध कारवाई को शोषित-गरीबों का दमन बताती, अखबारों और पत्रिकाओं के पेज काला करती रूदालियों...

क्या कहना है तुम्हारा भी इस बयान पर...

मुझे क्यों लग रहा है कि कुछ लोगों को सांप सूंघ सा गया है!


यह खबर है
यहाँ पर...
और
यहाँ पर भी...




आभार!





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रविवार, 26 सितंबर 2010

राजशाहियाँ आज भी हम पर राज करती हैं...क्या केवल कहने भर के लोकतंत्र-गणतंत्र हैं हम ???



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मेरे 'लोकतांत्रिक' मित्रों,


इस सूची पर जरा नजर डालिये...


फारूख अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला
प्रकाश सिंह बादल-सुखबीर सिंह बादल
विजया राजे सिंधिया-वसुंधरा राजे सिंधिया
राजेश पाइलट-सचिन पाइलट
शीला दीक्षित-संदीप दीक्षित
माधव राव सिंधिया-ज्योतिरादित्य सिंधिया
प्रफुल्ल पटेल-पूर्णा पटेल
जीतेन्द्र प्रसाद-जितिन प्रसाद
मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव
बाल ठाकरे-राज ठाकरे
करूणानिधि-स्टालिन
कल्याण सिंह-राजबीर सिंह
बीजू पटनायक-नवीन पटनायक
जगजीवन राम-मीरा कुमार
सुनील दत्त-प्रिया दत्त
प्रमोद महाजन-पूनम महाजन
शरद पवार-अजित पवार-सुप्रिया सुले
शंकरराव चव्हाण-अशोक चव्हाण
देवीलाल-ओमप्रकाश चौटाला
चरण सिंह-अजीत सिंह-जयन्त चौधरी
नेहरू-इन्दिरा-राजीव-राहुल गाँधी



सबसे नया नाम जोड़ा है जन-नेता लालू प्रसाद यादव जी ने अपने २० वर्षीय पुत्र तेजस्वी यादव की अपने उत्तराधिकारी के रूप में ताजपोशी करके...


यह तो केवल झाँकी है...बहुत से नाम मैं इस वक्त याद नहीं कर पा रहा...और इस सूची में अनेकों नाम आप लोग भी जोड़ सकते हैं...


कमोबेश ऐसा ही हाल हमारे साथ-साथ आजाद हुऐ भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों का है... नेपाल के कोईराला, बांग्लादेश के जिया व मुजीब, लंका के बंडारानायके-कुमारतुंगा, पाकिस्तान के भुट्टो व शरीफ घराने भी एक तरह के राजवंश से बन गये हैं।


कारण क्या है इस सब का ?



*** आजादी से पहले यह सारा भारतीय उपमहाद्वीप अंग्रेजी शासन के अंतर्गत विभिन्न रियासत-रजवाड़ों-राज्यों-जागीरो-निजामों में बंटा था... कहीं ऐसा तो नहीं कि हजारों सालों तक वंशानुगत शासकों के आधीन रहने के कारण हमारे सामूहिक मानस (Collective Psyche) में यह बात बहुत गहरे पैठ गई है कि शासक का बेटा शासक ही होना चाहिये व ऐसा होना ही बेहतर भी होता है ?


*** या फिर यह कि इन शासकवंशों ने कोई पोलिटिकल स्पेस छोड़ा ही नहीं है अन्यों को आगे आने के लिये ??


*** सबसे भयावह निष्कर्ष यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह लोकतंत्र-गणतंत्र का राग एक धोखा है...राजशाहियाँ अभी भी चल रही हैं...राजघराने ऊपर से भले ही एक दूसरे के विरोधी दिखते हैं, पर अंदरखाने यह एक दूसरे की संतति-'बाबा लोग' के हितों को पोषित करते हैं ???




मुझे तो यह तीनों ही कारण सही लगते हैं...



अपनी राय आप बताइये !!!



आभार!









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मेरी छोटी सी बिटिया ने कर डाला एक बहुत बड़ा सवाल... जवाब मैं तो नहीं दे सकता... (बिटिया-दिवस पर विशेष-री-ठेल)




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मेरे मेरी ही तरह 'बिटिया के बाप' मित्रों,

न जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियां होती हैं... जो काम की चक्की में पिसने के कारण हम अपने बच्चों को दे नहीं पाते...

क्या करें बच्चे ?

देखिये मेरी बिटिया ने यह कैसा सवाल कर दिया मुझसे...




मंदी के इस भयावह दौर में
टारगेट पूरे करने और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में
रोजाना रात नौ बजे घर पहुंचता हूँ मैं
नहीं मिली एक महीने से कोई छुट्टी
इतवार या त्यौहार की भी नहीं


रोजाना सुबह स्कूल जाने से पहले
कह कर जाती है मेरी बिटिया
पापा जरूर अपने बॉस को कहना
जल्दी घर जाना है आज मुझे


आप आफिस से जल्दी आओगे
तो पहले हन दोनों चलेंगे कालोनी के पार्क
खूब खेलूंगी जहां मैं आपके साथ
फिर आप मैं और मम्मी जायेंगे बाजार
मैं तो ढेर सारी आइसक्रीम खाउंगी
रात का खाना खायेंगे घर से बाहर

इस तरह खूब मजा करेंगे हम लोग

रोज उसे प्रॉमिस करके निकलता हूं घर से
पिस जाता हूँ काम की चक्की में फिर से
थका हारा पहुंचता हूँ वही रात नौ बजे
सोने की तैयारी कर रही होती है मेरी बेटी
बहुत गुस्सा दिखाती है बड़ा मुंह फुलाती है
पापा आज मैं आप से एकदम कुट्टा हूं


उसे मनाता हूं सुलाता हूं खुद भी सोता हूं
उसके बचपन की खुशियों को रोजाना खोता हूं


आज एक बार फिर देर से पहुंचा मैं घर
बिल्कुल नाराज नहीं हुई वो न मुंह फुलाया
मेरी पीठ पर चढ़ी बांहौं में लपेटा मुझको
बार बार चूमा मेरे सिर, गर्दन और चेहरे को

फिर फुसफुसाते हुए कान में किया वो सवाल...

पापा क्या आपके बॉस को इतना भी नहीं पता?

कि घर में सोना आपका इंतजार करती है


नि:शब्द निरुत्तर हूँ मैं

समझाने या दुलारने की हिम्मत नहीं मुझमें

काश.....

सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...



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क्या जवाब दूँ मैं उसे ?





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शनिवार, 25 सितंबर 2010

काहे को भूखा मारते हो अपने ही प्यारे बच्चों को... मेरे माई-बाप...हम सबके पालनहार ?

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मेरे 'व्रती-उपवासी' मित्रों,

यह पोस्ट वैसे लिखी थी जन्माष्टमी को...पर छाप आज रहा हूँ... उस समय उपवासों का सीजन जो चल रहा था... अत: दिल को गवारा नहीं किया इसे उस समय छापना...

बचपन से घर में देखता हूँ कि साल के दो खास दिन फलाहार-व्रत रखा जाता है... शिवरात्रि व जन्माष्टमी के दिन... अन्न नहीं बनता उस दिन चूल्हे पर... अब हम सब भाई बहिन इन दोनों दिन सुबह से ही माँ को परेशान करना शुरू कर देते थे... भूख भी पता नहीं कुछ ज्यादा ही लगती थी उस दिन... नतीजा हर थोड़ी थोड़ी देर में माँ कभी मखाने की खीर, कभी चौलाई के लड्डू, कभी फ्रूट चाट, कभी कोटू के आटे-आलू की पकौड़ी और कभी दूध हमारे सामने परोसती रहती थी... फिर भी शाम होते होते भूख से बेहाल हो जाते थे हम लोग... रात बारह बजने तक का इंतजार तो पिता भी नहीं करते आज तक... उनका तर्क है कि सूरज ढलते ही जन्म हो गया होगा... इसलिये पूजा करो, आरती करो और फलाहार लाओ...


अब बड़ा हो गया हूँ, काम पर जाना पड़ता है...मैं तो सभी कुछ खाते रहता हूँ दिन भर... परंतु घर में श्रीमती जी अन्न नहीं बनाती आज भी...


अब इस बार घर पर ही था... दिन भर बचपन की तरह ही थोड़ी थोड़ी देर में कुछ-कुछ मेरे सामने पेश किया जाता रहा... पर प्रॉपर खाने की बात तो कुछ और ही है...


तभी मैंने सोचा कि मात्र सिख धर्म को छोड़कर बाकी सभी धर्म व्रत-उपवास की बहुत महत्ता बताते हैं...


अब यह 'ऊपर वाला' जो है...कहा जाता है कि उस ही ने दुनिया बनाई...वही पालनहार भी है...वही सही मायने में हमारा माता-पिता दोनों है...


मैं आज खुद एक बच्ची का बाप हूँ... यकीन जानिये जिस दिन मेरी बेटी किसी वजह से खाना नहीं खाती है, उस दिन मुझे भी अपना खाना बेस्वाद लगता है...


तो वह ऊपर वाला पालनहार-कृपानिधान-सर्वशक्तिमान क्यों कर चाहता है कि उसकी औलादें भूखी रह रह कर उसके प्रति अपने समर्पण व वफादारी को साबित करें...?


क्यों वह हमारे भूखे रहने से हम पर प्रसन्न होता है...?


कैसा माई-बाप है वह ?



मुझे तो समझ नहीं आता यह सब...


आपको आता हो तो हम सबको समझाईये...


समझायेंगे न !...


प्लीज....






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पाठकों की जानकारी के लिये...सिख धर्म किसी भी तरह के उपवास को सही नहीं मानता...



ਬਰਤ ਨੇਮ ਸੰਜਮ ਮਹਿ ਰਹਤਾ ਤਿਨ ਕਾ ਆਢੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥

बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥

Baraṯ nem sanjam mėh rahṯā ṯin kā ādẖ na pā▫i▫ā.

Fasting, daily rituals, and austere self-discipline - those who keep the practice of these, are rewarded with less than a shell.



यह जानकारी यहाँ से... ली गई है।




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ईश्वर और धर्म को एक संशयवादी परंतु तार्किक दॄष्टिकोण से समझने का प्रयास करती इस लेखमाला के अब तक के आलेख हैं, समय मिले तो देखिये :-



चित, पट और अंटा तीनों उसी का ???

वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...

सोमवार, 20 सितंबर 2010

तेरी काली सूरत.... आक्क थू !!! कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों का सच ... क्या इसे सुर्खियां देगा मीडिया ?...



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मेरे 'गोरे-गोरे' मित्रों,

बहुत सवाल उठाये जाते हैं अक्सर कि कश्मीर में पत्थर फेंकने वाले कौन लोग हैं, हमारा तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया, जिसे कई बार अपनी कोहनी और घुटने के बीच का फर्क (यह अंग्रेजी के मुहावरे का मुझ द्वारा किया सभ्य रूपांतरण है) तक समझ नहीं आता... पत्थर फेंकने वाले इन निरपराध, सताये हुऐ, अहिंसक और गुमराह (???) गिरोहों के ऊपर सीआरपीएफ व कश्मीर पुलिस द्वारा की जा रही तथाकथित ज्यादतियों के वर्णन से अपने अखबार व मैगजीन रंगे रहता है...यह सब दरकिनार करते हुऐ कि खबरों की रिपोर्टिंग में दोनों पक्षों की सुनी जानी चाहिये... तथा अपने राष्ट्र-हित का भी होश होना चाहिये...

ऐसे ही समय में मेरी नजर पढ़ी एक ऐसे लेख पर... जिसमें लिखी कुछ बातों को सुर्खियाँ मिलनी चाहिये थी... पर कभी नहीं मिलेंगी... Because our mainstream media has lost the capability to differentiate the arse from elbow... तो मुझे लगा कि आप तक तो पहुंचा ही दूँ यह बातें...

पूरा लेख आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं...

मैं उन अंशों को उद्धृत करूँगा जिनको मेरी नजर में सुर्खियाँ मिलनी चाहिये थीं... पर न मिली हैं... न मिलेंगी...



"An officer of the local police, a Kashmiri Muslim, tells me how stone-throwers often try to goad CRPF men to violence by mocking their religion and colour. One goes, “Gai teri mata hai, hum usko khata hai (the cow’s your mother, we eat her).” Another taunt is split between two groups. One group shouts, “Teri kali soorat…” The other responds, “yak thuuuu!” (Your black face…and a collective spit)."




कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि किस तरह पत्थर फेंकने वाले गिरोह सीआरपीएफ के जवानों को उनके धर्म व रंग के बारे में चिढ़ा कर हिंसा को उकसाते हैं...

गिरोह दो भागों में बंट जाता है... एक हिस्सा चिल्लाता है..." तेरी काली सूरत"... तो बाकी कहते हैं... "आक्क थू !!!"

एक और नारा है..." गाय तेरी माता है, हम उसको खाता है।"



और पढ़िये...




"Many young stone-throwers on the frontlines do not appear like Islamic radicals. They dress well, like music, cellphones and girlfriends are often discussed. Do they do what they do because they believe or does, as the police often allege, money play a part?

“We earned Rs 200 to Rs 300 as daily wage labourers,” says one of a group of masked young stone throwers. “Now we get between Rs 1,000 to Rs 1,500.” Who pays them? “The separatists,” one offers. In a quiet, two-room home with open drains outside, 20-year-old street icon, Owais Ahmed ‘Mandela’, freely admits to receiving money. Where does it come from? He shrugs."



यानी पत्थरबाजों को अलगाववादी एक दिन के काम (???) का १००० से १५०० रूपया तक देते हैं...जबकि पहले वह २००-३०० रूपया रोज कमाते थे...हाड़-तोड़ मजदूरी करके... यह और कोई नहीं, पत्थरबाजों का नेता खुले आम मान रहा है...



अब आप ही बताइये पत्थरबाजी रूके तो कैसे ?

और कब हमारे मीडिया को अकल आयेगी ।



आभार!




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समय मिले तो यह भी पढ़िये...
भारत के लिये समस्या नहीं है कश्मीर...





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शनिवार, 18 सितंबर 2010

जात से ऊपर उठें कैसे...हमारे तो मुर्दे भी जात-पात मानते हैं अभी तक !!!




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मेरे 'जाति-तोड़क' मित्रों,

जात की जड़ें वाकई गहरी हैं...यह साबित हुआ तमिलनाडु की इस घटना से जिसमें ऊंची जातियों ने सार्वजनिक सड़क पर कंटीले तारों की बाड़ लगाकर दलितों को उस रास्ते जाने से रोक दिया...क्योंकि उनका कब्रिस्तान रास्ते में पड़ता था... व उनके विचार में दलितों के आवागमन से मृत पुरखों की पवित्रता प्रदूषित होती है...

इस खबर को आप अंग्रेजी में चित्र सहित यहाँ पर... देख सकते हैं ।

खबर इस प्रकार है...

‘Untouchability fence’ in TN pulled down
K A Shaji | TNN
Dharapuram: Acting swiftly against a glaring instance of untouchability in western Tamil Nadu, revenue and police officials on Wednesday directed caste Hindus of N Kumarapalayam village, near Dharapuram in Tirupur district, to remove two fences they had erected to prevent dalits from using public roads.
About 150 families of caste Hindus erected barbed wire ‘‘untouchability fences’’ on Friday to prevent over 50 dalit families living in the Aandikattu Thottam village from entering two roads maintained by Nanjiyampalayam village panchayat. The reason given by the caste Hindus was that the roads passed through the graveyards of their forefathers and the frequent movement of dalits may ‘‘pollute their sanctity.’’
Despite a police crackdown, untouchability is still practiced in several parts of Tamil Nadu. In a shocking incident over two years ago in Uthapuram village in southern Tamil Nadu, caste Hindus erected not just a wire fence but a concrete wall around a dalit colony to prevent them from entering their area. However, the wall was demolished by the district administration.
The fences erected on Friday forced the Dalit families to take a detour of 3km to reach the nearest ration shop, school and market.


जाति को तोड़ने के लिये अभी काफी काम करना बाकी है...

पर क्या धर्म (???) के पुनरूत्थान के इस दौर मे आपको यह संभव लगता है ?...

आप क्या सोचते हैं इस बारे में ?


आभार!




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मंगलवार, 14 सितंबर 2010

कहीं मैं ' बड़ा आदमी ' तो नहीं बन गया हूँ ?



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मेरे 'छोटे' मित्रों,



आज बस कुछ ऐसे ही...

दिल में आये कुछ...

बेतरतीब से खयाल...





आजकल

महसूस करता हूँ

मैं अक्सर

कि

गली के मुहाने की

वह चाय की दुकान

और उस पर पड़ी

वह चरमराती बैंचें

अब नहीं खींचती मुझे

अपनी ओर बारंबार



कतरा के बच निकलने की

करता हूँ कोशिशें

मैं अपने बचपन के

यार दोस्तों से




अटपटी लगने लगी हैं

उनकी बातें मुझे

बेहूदा लगते हैं

उनके अट्टहास अब

सीने से लगाते हैं

मेरे दोस्त जब मुझे

मेरी चिंता होती है

सलवटें न पड़ जायें

मेरी सभ्य पोशाक पर




साथ बैठते समय

देखता रहता हूँ

मैं कनखियों से

रहता है अजीब सा डर

मेरे दिलो-दिमाग में

'सर्किल' का कोई मुझे

यहाँ बैठा देख न ले




क्या मैं सचमुच का

'बड़ा आदमी' तो

नहीं हो गया हूँ ?







आभार!




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बुधवार, 8 सितंबर 2010

कुछ ' शब्द ' जो तैरेंगे फिजाओं में ... एक सपना देखिये आप भी ! ... क्योंकि फैसला अब आने ही वाला है...



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मेरे 'शब्द-शिल्पी' मित्रों,

" समाज... कारसेवक... अल्लाह... मंदिर... भाईचारा... चुनौती... आस्था... प्रार्थना... खुदाई... हिन्दू... मूर्ति... दुआ... रामशिला... जन्म... बाबर... मर्यादा पुरुषोत्तम... पूजा... गुलामी... खून बहना... रघुवंश... मीर बाकी... अशान्ति... चुनावी... प्रजावत्सल... अमन... परमहंस... रिसीवर... पूर्व नियोजित... प्राचीन... तनाव... शर्म... कयामत... विकल्प... सेक्युलर... पुरातत्व... राम... दोगलापन... पुनर्निमाण... समझौता... लापरवाही... दर्शन... उत्तरदायित्व... सलामत... परिषद... पुलिसकर्मी... सर्वधर्म समभाव... प्रभु... अल्पसंख्यक... १९४९... कमेटी... पौराणिकता... कट्टर पंथी... अदालत... वैदिक... सांम्प्रदायिक शक्तियाँ... हिफाजत... मालिक... जंगलराज... कारसेवा... रक्षा... राष्ट्रवाद... मजबूर... उत्खनन... हक... घर... धर्म... षड़यंत्र... भव्य... सैनिक... ढांचा... वामपंथ... मेरे राम... नमाज... मुम्बई... आराधना... रक्तरंजित... अमीर... उजड़ना... यथास्थिति... मुगल सम्राट... ललकार... पांच छह दिसंबर १९९२... दहशत... आयोग... निरपेक्ष... मुसलमान... विश्वास... आततायी... संकल्प... कानूनराज... गौरव... हथियारबंद... वोट की राजनीति... संविधान... हदीस... न्याय... मिलीभगत... भारत... लोकतंत्र... भीड़... आक्रांता... उन्माद... एक्शन... शान्ति... अपील... संघर्ष... इतिहास... देश... नमाज... दक्षिणपंथी... इतिहास... कमेटी... ध्वस्त... अयोध्या... बहुसंख्यक... विवाद... दर्शन... एकता... मस्जिद... प्रशासन... सुरक्षा... ट्रस्ट... फैसला... मुश्किल घड़ी... संपत्ति... चौबीस सितंबर... कायरता... गरीब..."


यही वह कुछ शब्द हैं... जो बार बार तैरेंगे फिजाओं में अगले पंद्रह दिन... फैसला जो आने वाला है, २४ सितंबर को... बस कहने या लिखने वाले के चयन व क्रम से निर्धारित होगा कि प्रभाव क्या पड़ेगा उनका...


बातें तो कई हो रही हैं... पर अभी तक...

मुझे इंतजार है दोनों पक्षों के यह कहने का...

कि,

" फैसला जो भी आये, हमें वह स्वीकार-शिरोधार्य होगा... मन, वचन और कर्म से..."


सोचिये, हमारा देश... एक लोकतंत्र... दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने-कहलाने का हमारा अभिमान... खुद का बनाया-अपनाया हमारा कानून... हमारी खुद की न्यायपालिका... उस न्यायपालिका के सामने रखा गया एक विवादित प्रश्न... देर से ही सही, पर आखिरकार आया फैसले का समय... और उस समय में अगर मैं... मुल्क का अदना सा नागरिक... यदि यह अपेक्षा रख रहा हूँ... तो क्या कुछ गलत है इसमें ?


एक सपना देखा है कस्बा वाले रवीश जी ने...


वे कहते हैं...


" विवादित क्षेत्र पर चौबीस सितंबर को फैसला आ जाएगा। बस चिन्ता हुई कि देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है। डर भी लगा कि कौन सा सिरफिरा कहां क्या कर देगा। किस मंच से कौन किसको ललकार देगा। फिर भरोसा हुआ कि ऐसी मुश्किल घड़ी पचासों बार इस मुल्क के इतिहास में आईं हैं। कुछ नहीं होगा। इतना तो भरोसा है। यही फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शान्त करने का साहस और रास्ता दिखा देगा। उम्मीद है चौबीस सितंबर की दोपहर आने वाला फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर देगा। जिनको हिन्दुस्तान में यकीन है उन्हें ये सपना देखना ही चाहिए। "


मित्रों, मुझे तो अपने वतन हिन्दूस्तान पर दुनिया की हर चीज से बढ़कर यकीन है...


इसीलिये यह सपना देख रहा हूँ मैं भी...


क्या आपको मेरे इस यकीन पर यकीन है ?



बताइये जरूर...



आभार!


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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सत्यम शिवम सुन्दरम्... कहते तो हैं हम लोग...पर 'सत्य' ही सबसे ज्यादा उपेक्षित क्यों है हमारे समाज में...और कौन है उसका जिम्मेदार?


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मेरे 'सत्य-साधक' मित्रों,


" हमें आज़ाद हुए 62 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। क्या 'उन' का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ? क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’उन‘ की नहीं थी ? क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’उन‘ के मत्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः 'उन' के ही सिर पर है। "


कौन हैं 'यह लोग'... और क्यों किया उन्होंने यह अपराध... कौन मांगेगा उन से हिसाब...इन्हीं सब प्रश्नों को बड़ी शिद्दत से उठाते हैं दॄष्टिकोण अपने आलेख में ...पढ़िये, चिंतन-मनन कीजिये, और बताइये आप क्या सोचते हैं...



पूरी पोस्ट आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं




आभार!





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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

देखो कौन कह रहा है आज कि, किसी ' ऊपर वाले ' ने नहीं बनाई यह दुनिया...यह तो खुद ही बनती और खत्म होती रहती है !!!


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मेरे 'आध्यात्मिक-धार्मिक' मित्रों,

लंबी चौड़ी प्रस्तावना में काहे को टाइम खोटी किया जाये...

सीधे मतलब की बात पर आते हैं...

जब जब बात होती है 'ऊपर वाले' की... तो यह कहा जाता है कि पृथ्वी है, सूर्य है, जीवन है और मानवों जैसी बुद्धिमान नस्ल है...दिन होते हैं, रात होती हैं, मौसम बीतते हैं,साल गुजरते हैं... और यह सब सबूत है इस बात का कि दुनिया को बनाने-चलाने वाला कोई है जरूर...


आज आप पढ़िये स्टीफन हॉकिंग के विचार क्या हैं इस बारे में...


प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा है कि ईश्वर ने यह यूनिवर्स नहीं रचा है बल्कि यह फ़िज़िक्स के नियमों का नतीजा है।


हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'ग्रैंड डिजाइन' में कहा है कि गुरुत्वाकर्षण जैसे कई नियम हैं। ब्रह्मांड कुछ नहीं से खुद को बना सकता है और बनाएगा। स्वत: स्फूर्त सृजन की वजह से ब्रह्मांड है और हम हैं।

हॉकिंग ने 1968 में आई अपनी किताब 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' में कहा ब्रह्मांड के बनने में ईश्वर की भूमिका से इंकार नहीं किया था।

'डेली टेलीग्राफ' की एक रिपोर्ट के मुताबिक हॉकिंग ने कहा कि टचपेपर को रोशन करने और ब्रह्मांड के आगाज़ के लिए ईश्वर का आह्वान करना जरूरी नहीं है।


हिन्दी में यह खबर आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं।

आगे वे कहते हैं कि

In his latest book, he said the 1992 discovery of a planet orbiting another star other than the Sun helped deconstruct the view of the father of physics Isaac Newton that the universe could not have arisen out of chaos but was created by God.

"That makes the coincidences of our planetary conditions -- the single Sun, the lucky combination of Earth-Sun distance and solar mass, far less remarkable, and far less compelling evidence that the Earth was carefully designed just to please us human beings," he writes.


यानी १९९२ में एक गृह की खोज जो सूर्य की तरह के ही एक तारे के चक्कर लगा रहा है, सर आइजक न्यूटन के इस विचार कि 'बृह्मान्ड Chaos (अव्यवस्था) से स्वत: नहीं बन सकता, इसे ईश्वर ने बनाया' को गलत साबित करता है।

वह यह भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल की अनुरूपता--अकेला सूर्य, सूर्य के द्रव्यमान तथा पृथ्वी से सूर्य की दूरी का भाग्यशाली संयोग...अब उतना अनूठा-विलक्षण-असाधारण नहीं माना जाना चाहिये...तथा अब यह इस बात का अकाट्य सबूत नहीं रहा कि पृथ्वी को विचार पूर्वक आकार दिया गया...मनुष्य की जाति को प्रसन्न (और ईश भक्ति मे मग्न ???) रखने के लिये...


लिंक तो अनेकों हैं पर अंग्रेजी में इस पूरी खबर को आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं...

Guardian, UK...

Economic Times, India...

Times Of India, India.




आभार!





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बरसी !



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मेरे 'कहानीकार' मित्रों,

कहानी कहना तो मुझे आता नहीं... कहानी यह है भी नहीं... प्रयत्न मात्र कर रहा हूँ अपनी ओर से...पता नहीं ठीक से कह भी पाऊँगा या नहीं...

हमारे ही शहर में, हमारे ही मोहल्ले में रहता है वह परिवार... बचपन से ही कभी-कभी आना जाना होता है उस घर में...

बहुत साहसी थीं वो... भरी जवानी में ही पति साथ छोड़ चल दिये दूसरे लोक को...दो छोटे बच्चे छोड़ कर गोद में... बेटी दो साल की थी और बेटा सात महीने का... साथ में केवल बूढ़ी सास...

न जाने कहाँ से उन्होंने साहस जुटाया...परिवार की संचित पूंजी को बैंकों के फिक्स डिपाजिटों में डाला...केवल ब्याज खर्च करती रही...मकान के दो हिस्से किराये पर लगा दिये...अपने हर शौक-अपनी हर इच्छा का गला घोटा...और किसी तरह वो अपने सब मकसदों मे कामयाब हो गईं...किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ा...समाज की नजर में उस बड़े खानदान की मर्यादा भी रह गई...और दोनों बच्चों को अच्छी तालीम भी मिल गई...

एक अच्छा घर देख बिटिया ब्याह दी उन्होंने...बहुत सुखी है वह ससुराल में...बेटे ने तालीम का सही इस्तेमाल किया...सरकारी नौकरी ज्वाइन की...तरक्की करते करते बड़ा अफसर है वह आज...बहू स्थानीय डिग्री कालेज में टीचर थी...आज प्रिंसिपल हैं...

उनका बेटा मुझसे तकरीबन १६-१७ साल बड़ा रहा होगा...जब छोटा था मैं तो खेलते-कूदते अक्सर हो आता था उस घर में...बहुत ममतामई लगती थीं वे...जैसे-जैसे समय बीता, मैं बड़ा होता गया और पड़ोस के घरों में बेवजह जाना भी खत्म सा हो गया...

समय बीतता गया...नौकरी-रोजगार के चक्कर में बाहर निकल गये सभी...अब घर के त्यौहारों व समारोहों मे ही जाना हो पाता है अपने शहर...

५-६ साल पहले जब घर गया तो यों ही मन किया मोहल्ले में सभी से मिलने का...उनके घर भी पहुंचा... बेटे-बहू के व्यवहार से ऐसा लगा कि मेरे आने से वे उत्साहित नहीं थे...पर मैं तो उनसे ही मिलने गया था...अंदर कमरे में हैं...बताया बहू ने...मैंने कहा " चलिये कोई बात नहीं मैं भीतर ही जाकर मिल आता हूँ "..." अरे नहीं मैं बुला लाता हूँ अभी " बोला बेटा...बाहर आयी वे...मेरे लिये उस आत्मविश्वासी,संघर्षों से तपी, त्यागमूर्ति महिला को उस हाल में देखना एकदम अप्रत्याशित था...अपनी ही मात्र छाया सी बन कर रह गई थीं वो..." क्या बात बीमार हैं क्या ? " पूछा मैंने... " अरे वही बीपी और शुगर की बीमारी " बोला बहू ने...इलाज के बारे में पूछने पर बेटा-बहू एक स्वर में बोले " यह बीमारियाँ ठीक होती हैं क्या ? "... होमियोपैथी इलाज ले लेती हैं कभी-कभी, फायदा बताती हैं, बताया गया मुझको...उन्होंने मुझे बताया आंखों से अब बहुत कम दिखता है...मैंने एक दो डॉक्टरों के नाम सुझाये...पर बेटे-बहू के प्रत्युत्तर से मुझे स्पष्ट हो गया के वे लोग कुछ भी करने वाले नहीं...जबकि अब उनके बेटे-बहू के पास किसी प्रकार की कोई कमी अब न थी...बड़े ही उदास मन से आया मैं अपने घर उस दिन...

शायद तीन साल पहले माँ से बात करते समय माँ ने बताया कि अब उनकी आँखों की रोशनी जा चुकी है पूरी तरह...दोनों अनियंत्रित बीमारियों के कारण बुरे हाल में हैं वे...और घर के कोने के कमरे में गठरी सी बनी पड़ी रहती हैं...बेटे-बहू के लिये बिना तन्खवाह के चौबीसों घंटे के चौकीदार से अधिक कुछ नहीं रहीं अब वे...उस दिन खाना नहीं खा पाया मैं...

फिर एक दिन वह निकल पड़ी वो उसी अनंत यात्रा पर...जहाँ हर किसी को जाना होता है एक दिन...किसी के भी मरने पर लोग दुखी होते हैं...पर यकीन जानिये मुझे राहत मिली उस दिन...लगा कष्ट दूर हुए उनके...अब तर गई वे...

अब इस बार गरमी की छुट्टी में घर गया...बैठा था आंगन में कि आवाज सुनाई दी...उनका बेटा था सामने..." माँ की बरसी है, 'गुरू जी' भी आने वाले हैं आना जरूर, बड़ा प्रोग्राम है "...सूचित किया उसने...श्रीमती भी उसी दिन कहीं से सुन कर आई कि उनकी बहू शेखी बघार रही थी कि हम लोग बरसी में इतना खर्च करने वाले हैं...जितने में कइयों की तो शादियां निपट जाती हैं...

मेरा मन तो नहीं था...पर उस दिन पिता जी ने सुबह से ही आगाह कर दिया...आज तुझे और बहू को जाना है बरसी में...और ऐसे मामलों में उनकी बात नहीं टाल सकता मैं...

खैर पहुंचा मैं, पत्नी को साथ लिये...घर के सामने के इंटर कालेज के मैदान में बहुत बड़ा पंडाल लगा था...बेटा-बहू दोनों पंडाल के द्वार पर खड़े स्वागत को तत्पर...ऐसा लग रहा था कि आधा शहर यहीं मौजूद है..." 'गुरू जी' के प्रवचन-कीर्तन का कार्यक्रम चल रहा है...बस पंद्रह मिनट में समाप्त हो जायेगा...फिर उसके बाद खाना शुरू " सूचित किया बेटे ने...एकाध भक्त टाइप के लोगों ने मुझसे भी 'गुरू जी' को शीश नवा आशीर्वाद लेने और संकीर्तन में शामिल होने को कहा...पर मेरा फंडा है लाईफ का...'गुरू जी' टाइप लोगों से मैं हमेशा तीस गज दूर ही रहता हूँ...इसलिये मैंने पूरी विनम्रता से मुस्कुरा कर जिस जगह मैं बैठा था वहीं पर अपने कंफर्टेबल होने की बात कह उनको टाला...

माईक से अनाउन्स हुआ " 'गुरू जी' का प्रवचन अभी-अभी खत्म हुआ, आप सभी से अनुरोध है कि भोजन ग्रहण करने का कष्ट करें "...हलचल हुई जन समुदाय में...

और फिर अचानक वह हुआ जिसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है...ऐसा आंधी तूफान मेरे शहर ने कभी नहीं देखा था...टैन्ट उड़ गया, खाना परोसने के बर्तन उड़ गये, मेज कुर्सियाँ उलट-पुलट हो गयीं...हर तरफ़ धूल का गुबार...कुछ देर को तो यह लगा मानो शाम हो गई...हर कोई इस डर में कि मेरे ऊपर कोई चीज गिर न जाये, बेतरतीब भागा नजदीक के मकानों की ओर... ऐसा चलता रहा पूरे पंद्रह मिनट तक... फिर शुरू हुई ओलों की वह बारिश...ओले भी सामान्य नहीं...बड़े-बड़े...सिर पर लगें तो सर फूट जाये...आयोजकों में जो किसी तरह स्थल पर रूके हुऐ थे...उन्होंने भी मैदान छोड़ दिया...और वे भी भाग लिये...

पूरे आधे घंटे बाद जब यह थमा और ओलों की जगह बारिश ने ली...तो देखा गया कि खिलाने के लिये कुछ सही नहीं बच पाया है...पहले खाने में धूल मिट्टी घुसी...फिर रहा सहा काम ओलों व बारिश ने तमाम कर दिया...

यों तो किसी के किसी भी आयोजन में ऐसा विघ्न पड़ने पर किसी को खुश नहीं होना चाहिये...पर उस दिन एक अजीब सा संतोष हुआ मुझे यह सब देखकर...

मुझे लगा कि उस माँ ने... जिसे उस ही के बेटे ने बुढ़ापे में असहाय, नेत्रहीन गठरी सा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया था...उसके इलाज के अपने दायित्व से मुँह मोड़कर...दुनिया को दिखाने के लिये अपने उसी कृत्घ्न बेटे द्वारा की गई अपनी 'बरसी' को अस्वीकार कर दिया था...


क्या मेरा ऐसा मानना सही है ?


आप बताइये अब !



आभार!





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एक अनुरोध: अपने घर के बुजुर्गों का ख्याल रखें, उनके इलाज की चिन्ता भी वैसे ही करें जैसे आप अपने बच्चों की करते हैं, यह कभी न भूलिये कि जो कुछ भी आज हम हैं, उन्हीं की वजह से हैं।