बुधवार, 25 अगस्त 2010

'चित्त' तो 'उस' की है ही...'पट' भी 'उसी' की है... और 'अंटा' भी हे प्रभु तेरा ही है...तुझे नमन !!!


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मेरे 'सिक्का उछालने वाले' मित्रों,


बहुत पहले यह लेखमाला शुरू की थी... बीच में गाड़ी पटरी से उतर कर किसी और दिशा में चल पड़ी... आज अचानक यह याद आया कि कुछ छूट गया सा है...यह भी जरूरी है...


आज एक बार फिर से बात करते हैं उस सर्वशक्तिमान-अजन्मे-अविनाशी-अनदेखे-अन्जाने-सर्वव्यापी-परमपिता की...
एक तर्क जो अकसर 'उस' का अस्तित्व वाकई में होने के पक्ष में 'ज्ञानी जन' देते हैं... वह उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होता है... लगभग सभी के पास एक कहानी होती है...जिसका कथ्य कमोबेश एक सा ही होता है... वह शख्स किसी ऐसी दुर्घटना से साक्षात्कार कर चुका होता है जिसमें सुरक्षित बचने की संभावनायें उसके अनुसार शून्य थीं... फिर भी 'उस' की कृपा से वह शख्स बच गया...'ज्ञानी जनों' की नजर में यह सबसे बड़ा सबूत है 'उस'के होने का !


आइये एक-दो उदाहरणों से समझते हैं कि क्या वाकई ऐसा है...


मान लीजिये एक एयरक्राफ्ट को लैंड करते समय दिक्कत हो गई...




अब नतीजे होंगे तीन...

***
हमारे 'ज्ञानी जन' बिना किसी खरोच के साफ-साफ बच निकले...

यह तो 'उस' की कृपा है...

यानी चित्त तो 'उस' की है ही...


***
मंगलौर जैसा हादसा हुआ और सब-कुछ, हर-कोई खत्म हो गया...

यह पायलट की और ऐयरट्रैफिक कंट्रोलर की गलती थी... वैसे भी 'उस' ने इन सब बेचारों को दुनिया में बस इतने ही समय के लिये भेजा था...समय पूरा हुआ तो बुला लिया!

'पट' भी 'उसी' की है...


***
'ज्ञानी जन' बच तो गये... पर एक टांग काटनी पड़ी...और एक आंख भी गई...

'उस' का लाख-लाख शुक्र है... कम से कम एक आंख देखने को और एक टांग थोड़ा बहुत चलने को तो छोड़ दी!

और 'अंटा' भी हे प्रभु तेरा ही है...तुझे नमन !!!




अब देखिये

दूसरे 'ज्ञानी जन' के इकलौते होनहार ने एक नौकरी के लिये इम्तहान दिया...


फिर नतीजे होंगे तीन...


***

'इकलौता होनहार' कामयाब हो गया

यह तो 'उस' की कृपा है...

यानी चित्त तो 'उस' की है ही...


***

'इकलौता होनहार' कामयाब नहीं हो पाया...

ऐन इम्तहान के समय बेचारे की तबीयत नासाज थी... वैसे भी आजकल सिफारिश का जमाना है...

'पट' भी 'उसी' की है...


***

पूरा इम्तहान ही कैंसिल हो गया...

यह सब 'उस' की 'माया' है... जरूर 'उस' ने मेरे 'इकलौते होनहार' के लिये कुछ अलग और अनूठा सोच रखा होगा!

और 'अंटा' भी हे प्रभु तेरा ही है...तुझे नमन !!!



इसलिये मित्रों,

पूरी ताकत से सिक्का उछालिये...

और जाप करिये इस मंत्र का...

पूरी आस्था के साथ...



'चित्त' तो 'तेरी' है ही...'पट' भी है 'तेरी'... और 'अंटा' भी हे प्रभु तेरा ही है...तुझे नमन !!!








ईश्वर और धर्म को एक संशयवादी परंतु तार्किक दॄष्टिकोण से समझने का प्रयास करती इस लेखमाला के अब तक के आलेख हैं, समय मिले तो देखिये :-



वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...







आभार!

24 टिप्‍पणियां:

  1. ...क्रिकेट मैच के दरम्यान एक्सपर्ट कमेंटेटर से पूछा गया कि उनके नज़रिये से मैच का क्या नतीज़ा निकलेगा ? उनका कहना था कि मेरे ख्याल से या तो ये मैच इंडिया जीत जायेगा या फिर श्रीलंका भी जीत सकता है वर्ना ये मैच ड्रा हो जायेगा :)

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  2. Bhaiya aap sarw shaktiman hain par muze to astha kee jarurat hai.

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  3. @ अली साहब,

    शुक्रिया आपका,
    मुझे लग रहा था कि कहीँ खाता ही न खुल पाये आज... ;)


    ...

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    @ आशा जोगलेकर जी,

    आपके आने का आभार,

    वाकई आस्था का ही प्रश्न है यहाँ पर... मेरी आस्था है तर्क व तथ्य आधारित निष्कर्षोँ पर...

    और मेरा यकीन है कि मैँ किसी सर्वशक्तिमान का खिलौना तो हरगिज नहीँ...


    ...

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    :: हंसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है।

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  6. हास्यफुहार जी ने बिल्कुल खरी बात कही कि " हंसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है।"....सो, बैठे हँस रहे हैं :)

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  7. चित्‍त , पट और अंटे से तो हमारे प्रभु भी नहीं बचते .. जब उनका अवतार पृथ्‍वी पर होता है .. उनके राजतिलक की तैयार हो रही है यानि 'चित' उनकी .. पर वनवास हो जाता है यानि 'पट' भी उनका .. पर इतने पर भी पूरा नहीं होता .. सीता जी का हरण होने के बाद रावण से लडाई लडनी पडती है .. इस तरह 'अंटा' भी झेलने को वे विवश होते है !!

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  8. बहुत सटीक बात कही है ...मन को बहलाने के लिए यह बात ज़रूरी है ..जो होता है उसकी ही कृपा से होता है ..:)

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  9. प्रवीण भाई !
    खाता न खुलने का अंदाजा था फिर भी पंगे जरूर लेना था हा...हा...हा...हा.....
    भगवान् से भी पंगा... और कोई काम नहीं है क्या ?
    अद्वितीय !

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  10. अली सा से दोस्ती मधुर रखना ...आड़े वक्त काम आते रहेंगे !
    :-)

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  11. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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  12. सटीक बात कही है एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइ

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  13. .
    आस्तिक हूँ मैं। जिसने जीवन दान दिया , उसका आभार तो सदैव मानूंगी।

    आज-तक इश्वर से जो भी माँगा , सब कुछ मिला, इसलिए उनमें विश्वास निरंतर बढ़ रहा है। परीक्षा में गणपति और सरस्वती का नाम लेकर शुरू किया, तो प्रथम ही रही सर्वदा। [ God helps those who help themselves.]

    एक बार अपने ननिहाल फैजाबाद जा रही थी। लखनऊ , कैसरबाघ स्टेशन पर बस मिस हो गयी , अगली बस में चढ़े, खुद को कोस रहे थे कि क्यूँ देर कि हमने। खैर आधे घंटे के अंतर से यह बस भी चल पड़ी। अभी दो किलोमीटर ही चले होंगे कि पहली वाली बस रास्ते में खड़ी मिली, जो दुर्घटना-ग्रस्त हो चुकी थी और उसमें सवार सभी यात्री मृत अथवा घायल थे। बस में से खून कि नदी बह रही थी।

    इश्वर कि कृपा से मेरी और मेरी मम्मी कि जान बच गयी। अब समझ आया कि वह बस क्यूँ छूटी थी। यह घटना १९९९ कि है ।

    जीवन तो बेशकीमती होता है , उसका ज्ञान और अज्ञान से क्या लेना देना?

    फिर भी मूढमति दिव्या तो यही कहेगी--

    " जान बची तो सब-कुछ पाए , अनमोल रिश्तों ने उसे गले लगाए "

    हे इश्वर आपकी जय हो, जैसे मेरी रक्षा कि, सभी कि करना।

    चित भी आपकी।
    पट भी आपकी।
    चौड़ाई भी आपकी।
    गोलाई भी आपकी।

    हे इश्वर ये जीवन भी आपका । जब चाहे ले लेना, लेकिन कुछ वर्ष और जी लेने दो।
    .

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  14. ईश्वर को इन्हीं भांति भांति की व्यक्तिगत आस्थाओं ने / अतार्किकताओं ने / संकुल उद्घोषणाओं ने आज तक बलवान किया है ! यही मानिए कि व्यक्ति ऐसा करता आया है तो यह व्यक्ति की विवशता भी होगी ! नहीं निकल सकता इस जाल से | नीत्शे की घोषणा में ईश्वर कब का मर गया था , पर ज़रा पाश्चात्य समाज पर ही दृष्टि डालें तो पायेंगे कि ईश्वर कितना तकनीकी मजबूती के साथ हाजिर हुआ है ! अंततः व्यक्ति एक 'थिंकिंग एनीमल' ही है , मानवोचित तार्किकता त्याज्य हो जाती है इस अवस्था में ! बाकी आगे का काम ओझा-सोखा-मौलवी-पण्डे-पादरी बखूबी देख लेते हैं ! विराट नाटकीयता ! देखता हूँ चैनल-हाजिरी करते आशाराम बापू को तो लगता है कि लूट का काम ईश्वर की मौन/मूक सहमति और सम्मोहन की दिव्य बेहोशी में गजब का फलता फूलता है | छद्म भाव-समाधि में ईश्वर के नाम पर गजब की अश्रु-धारा बहाई जाती है ! पब्लिक बौद्धिकता लोप के साथ डूबने को आतुर !

    आस्तिक हो फिर भी ईश्वर से यही कहता हूँ कि धार्मिक भ्रष्टाचार और संकुचित सोच का वितान नष्ट-भ्रष्ट हो , यदि ईश्वर ऐसा नहीं कर सकता तो बकौल गुप्त जी कहना चाहूँगा - 'तब मैं निरीश्वर हूँ , ईश्वर क्षमा करे !' हाँ 'चित' और 'पट' में 'सोच'
    की अकर्मण्यता है , इसीलिये घटनाओं की पुनरावृत्तियाँ और ईश्वर की आवृत्तियाँ खूब मिलेंगी आपको ! आभार !

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  15. अंटे के साथ
    ईश्‍वर ने छेड़ने के लिए
    छोड़ रखे हैं आप जैसे
    टंटे
    क्‍योंकि ईश्‍वर घबराता नहीं है
    वो हो या न हो
    पर होता जगराता वहीं है
    इसलिए आप भी जागो
    मन को भी जगाओ
    टिप्‍पणी खुद भी लो
    और देकर भी आओ।

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  16. मैं आपके ब्लॉग पर वाया भटिंडा अरे नहीं नॉएडा आया हूँ. सतीश जी का लेख पढ़ा. वो आपकी इस पोस्ट के बारे में ही है. बहुत बढ़िया लिखा है. पढ़कर मजा आया. अब मैं अब सीधे ही आया करूँगा.

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  17. तब क्या होगा जब हवा में उछाला गया सिक्का कोई चील ले उड़े!?

    पंगे ऐसे ही लिए जाते हैं :-)
    हा हा

    बी एस पाबला

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  18. कहा जाता है की एक आम आदमी अपने जीवन के २५ साल सपने देखने में बिताता है और बाकि के २५ साल उसे टूटते हुए देखने में बिताता है सोचिये की २५ साल तक अपने देखे सपनो को टूटता देख कर भी वो जीता चला जाता है | अब ऐसे में जीने की ताकत कहा से आती है निश्चित रूप से भगवान के भरोषे नहीं तो जीना मुहाल न हो जाता | भगवान न हो तो अपनी कमजोरियों अपनी हार अपनी कामचोरी का ठीकरा किस पर फोड़ेंगे | यही उनकी श्रद्धा है जब दुसरे उन पर जुल्म करे पाप करे तो कहा जाता है भगवान से डरो पर जब खुद की बारी आती है तो भगवान का सारा डर चला जाता है | मुझे तो लगता है की कही ना कही भगवान पर भरोषा मानव को कमजोर बना देता है जब उसे अपनी मर्जी का नहीं मिलता तो थक कर उसे भगवान की मर्जी बता कर बैठ जाता है | जबकि उस पर विश्वास न करने वालाहर हार के बाद अपनी गलती खोजता है उसे दूर करता है और फिर से उसे पाने की कोशिश में लग जाता है | वैसे श्रद्धा तर्कों से बदलने वाली नहीं है वो तो एक आम आदमी के जीने का सहारा है कम से कम वो सहारा तो मत छिनिये |

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  19. आपकी कहानी से ही मिलती जुलती एक कहानी भी मेरे पास है एक बार तीन युवक जो आई ए एस की परीक्षा देने वाले थे तो एक बाबा के पास गये बोला की बताये बाबा हमारा क्या होगा बाबा ने तीनो को अपनी एक उँगली दिखाई और कहा जाओ जब तीनो चले गये तो चेले ने पूछा की बाबा इसका क्या मतलब है तो बाबाने कहा की बेटा यदि तीनो पास हुए या तीनो फेल हुए तो कहूँगा की मैंने तो पहले ही एक उँगली उठा कर कहा था की तुम तीनो एक समान हो यदि उनमे से कोई एक फेल हुआ तो कहूँगा की मैंने तो पहले ही एक उँगली उठा कर कहा था की तुम में से कोई एक फेल हो जायेगा और यदि कोई एक पास हुआ तो भी वही बात |

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  20. यह ऐसा विषय है जिस पर राय देने के लिए बहुतेरे विद्वान हैं...टिप्पणियों की कमी नहीं होगी.

    जहाँ आस्था नहीं है वहाँ ईश्वर नहीं है। जहाँ आस्था है वहाँ तर्क के लिए कोई स्थान नहीं है। समझदार, समझदारी से तथा मूर्ख, मूर्खता से ईश्वर को मानते हैं। कुछ चालाक ऐसे भी होते हैं जो नास्तिकों की सभा में ईश्वर विरोधी भाषण देकर विजेता की मुद्रा में घर आते हैं तो लम्बी सांस लेकर कहते हैं..हे प्रभु..! आज आपने मेरी इज्जत रख दी !

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  21. प्रवीण, मुझे लगता है कि आपने आज की पोस्ट बहुत हल्के में लिखी है इसलिए ज्यादातर पाठकों को यह चुटकुलेबाजी जैसा कुछ लग रहा है.
    मेरी समझ में तो जड़बुद्धि आस्थावान होने से तो आप जैसा संशयवादी होना ही अधिक बेहतर है.
    ईश्वर के होने-न-होने सम्बंधित प्रश्नों को बुद्ध यही कहकर उड़ा दिया करते थे कि जिस भोजन को कभी चखकर नहीं देखा उसके बारे में कैसे कहें कि वह अच्छा है या बुरा. वैसे भी, ईश्वर के होने को मान लेने पर ज्यादा समस्याएँ पैदा होती हैं.
    हम लोग बहुधा यही मानकर चलते हैं कि ईश्वर को नहीं मानने वाला या उसपर संदेह करनेवाला व्यक्ति पापी या दुराचारी होता है, ऐसा सोचना वास्तविकता से कोसों दूर है.

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  22. मनुष्य ईश्वर का विधाता है/जैसे आँख प्रकाश की माता है/जागो रचो एक नया ईश्वर/अपने प्रश्नों का ठीक ठीक उत्तर/जागता इंसान ही अपना त्राता है/मनुष्य ईश्वर का विधाता है|

    मनुष्य अपने लिए बहुत कुछ गढ़ता है। समूचे संसार में फैले मिथक उसकी उन्नत मेधा के प्रमाण हैं। अगर मिथकों के पीछे छिपे कारण भी माने जाँय तो क्या आवश्यकता थी सीधे कहने के बजाय संझा भाषा में कहने की?
    मिथकों का सिरमौर है - ईश्वर की कल्पना। क्या कारण हैं कि मनुष्य मिथकों के बिना रह नहीं पाता?
    सुबह सुबह यह पोस्ट पढ़ने के बाद कुछ खयाल से आए सो रख रहा हूँ।

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  23. सतीश जी के ब्लॉग पर इस पोस्ट के बारे में पड़ा था तभी इस तक पहंचने का मन बना लिया था...अनेकों व्यवधानों के चलते आज पहुँच पाया हूँ...इश्वर है या नहीं ये बहस का विषय हो सकता है...हमेशा जैसा सोचा वैसा ही होता चला जाये , या फिर अनिष्ट न हो जाये इस डर से अधिकतर इश्वर का स्मरण किया जाता है, इश्वर को बिना डरे शायद ही कोई स्मरण करता हो...चित भी उसकी पट भी उसकी और अंटा भी उसी का वाली सोच हमारे मन में बसे डर के ही कारण है...
    नीरज

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