गुरुवार, 19 अगस्त 2010

क्या ईमानदारी व नैतिकता महज दो शब्द हैं और व्यवहारिकता ही आज का मूलमंत्र है ???


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मेरे 'व्यवहारिक' मित्रों,

बहुत दुखी है मन आजकल...

कुछ दिन पहले एक पुराने मित्र से मुलाकात हुई... साथ बैठे हम लोग... वह जब ग्रेजुऐशन कर रहा था तभी उसका विवाह हो गया था... जबकि अपन ने विवाह किया ३३ वर्ष की पकी उम्र में...

अपने विद्मार्थी जीवन में उस मित्र की विद्वता चमत्कृत करती थी मुझे... साथ ही हर हाल में ईमानदार व नैतिक बने रहने का उस का निश्चय भी मुझे उस की ओर खींचता था... स्नातक होने के बाद हम दोनों के रास्ते बदल गये... एक सरकारी विभाग में ऊँचा अधिकारी है वह आज ...

खाने-पीने का दौर चला... एक दूसरे के साथ पुरानी यादें ताजा की हमने... हंसे बहुत... अपनी मुद्दतों पुरानी बेवकूफियों पर... सब कुछ ठीकठाक, सुखमय और सुन्दर चल रहा था... अचानक मुझे याद आया कि पूछ ही लेना चाहिये परिवार के बारे में भी... मैंने पहले तो बताया कि ८ साल पहले शादी की, बिटिया ५ साल की है और यूकेजी में पढ़ती है... फिर उस से पूछा उसके तीन बच्चों के बारे में... दो बेटियाँ और एक बेटा था उस का...

मुझ द्वारा यह सवाल पूछते ही कुछ असहज सा हो गया वह... " बड़ी बिटिया का एडमिशन डेंटल कालेज में कराया दो साल पहले "... बताया उसने... कंपिटिशन से वह निकल नहीं पाई... डोनेशन देकर एडमिशन कराया... कुल मिला कर पौने तीन लाख सालाना का खर्च आता है उसे पढ़ाने पर...

यह सब बताते हुऐ मैंने देखा कि उस का चेहरा बुझ सा गया था... हो सकता है कि मेरा भ्रम हो... परंतु मुझे उसकी आंखों के कोने में नमी सी भी दिखाई दी... मैं उठा और उसका हाथ दबाया... " क्या हुआ, सब कुछ ठीकठाक तो है न, मेरी जान "... फीकी हंसी हंसा वो... " अब मैं तेरा वो पहले वाला यार नहीं रहा मेरे दोस्त "... मानो सूचित सा किया उसने...

आगे जो कुछ उसने बताया उसका लब्बोलुबाब यह था कि काफी लम्बे समय तक अपनी ईमानदारी, नैतिकता व सिद्धान्तों को साधे रहा वह... परंतु लाडली बेटी ने जब दूसरी बार कम्पिटिशन में नाकामयाबी पाने पर उसे ताना दिया कि... " आपके डिपार्टमेंन्ट में आपके आधीनस्थ अन्य कर्मचारी तो अपने दो-दो बच्चों को डोनेशन कॉलेज से मेडिकल और ईंजीनियरिंग करवा रहे हैं... और एक आप हो... आपके सिद्धान्त व ईमानदारी हमारे किस काम की ?... इसे ओढ़ें या बिछायें? "

एक गहरी सांस ले, निस्तेज चेहरे के साथ वह बोला ... " अब मैं भी प्रैक्टिकल हो गया हूँ... क्या करूँ बच्चों को दुखी नहीं देख पाया मैं "

गहरे पशोपेश में पड़ गया हूँ मैं...

इसी लिये उछाला है यह आज का सवाल...


क्या ईमानदारी व नैतिकता महज दो शब्द हैं और व्यवहारिकता ही आज का मूलमंत्र है ???


अब आप भी यहाँ यह न कहियेगा DR. ANWER JAMAL कि इस प्रश्न का उत्तर धार्मिकता में है... क्योंकि लगभग सारे के सारे प्रैक्टिकल लोगों को धार्मिकता से ओतप्रोत पाया है मैंने... इतना कि ज्यादा कमाई वाली कुर्सी के लिये भी 'ऊपरवाले' से खुलेआम याचना, उसके सामने नाक रगड़ते हैं वे...



आभार!



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16 टिप्‍पणियां:

  1. mujhe nahin lagtaa sab kae yahaan aesa hota haen jo bhi abhibhavak donation dae kar bachcho kae liyae aasan shiksha kaa rasta kholtey haen wo khud apane bachcho ko anaetiktaa ki pehli seeddhi par chahdhatey haen

    aur kahin kahin abhibhavko kae apne sapane hotey haen jiko wo bachcho par thoptey haen

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  2. व्यावहारिकता याने भ्र्स्टाचार !!
    बडा मार्मिक संस्मरण " एक और ईमानदार की मौत"
    कलेजा तो छलनी हो गया होगा बेटी की बात सुनकर ।

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  3. व्यवहारिकता को ईमानदारी और नैतिकता पर हावी होना तो नहीं चाहिए ...लेकिन आज यही नजारा आम है ...
    मगर यह सच है कि नैतिकता का कोई विकल्प नहीं है ...
    ईमानदारी और नैतिकता आध्यात्म का विषय है ...धर्म का नहीं ..!

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  4. आपकी बात में दम है। शायद यही कारण है कि 'समझदार' लोग बहती हवा के साथ हो लेते हैं?

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  5. दिल को चीर गया आपका ये लेख. अफ़सोस की बात है कि ये तालाब जिसे हम भारत या हिंदुस्तान कहते है आज इतना गन्दा हो गया है ये इतना सड़ गया है कि इसमें अब चारो और मगरमच्छ ही नज़र आते है और कोई साफ़ मछली चाहे भी तो यहाँ साफ़ नहीं रह सकती.

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  6. इसका एक इंटप्रटेशन ये भी हुआ कि ईमानदारी और नैतिकता बचपन और व्यवहारिकता पचपन(प्रौढता) के लिये तय हैं !

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  7. आप तो खुद उत्तर भी देने लग जाते हैं .. :) देखिये ईमानदारी एक शाश्वत मूल्य की चीज है -कोई भी ईमानदार नहीं बचेगा तब भी ईमानदारी तो रहेगी -जैसी की अभी भी उसकी चर्चा अस्तित्व में है ....
    अगर थोडा अकादमीय गंभीरता इसमें जोड़ दें तो ईमानदारी एक सापेक्षिक स्थिति है ..और इस लिहाज से अब कोई ईमानदार नहीं है बस ईमानदारी ही ईमानदारी से ईमानदार बनी हुयी है ...
    क्या समझे ?

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  8. नहिं इमानदारी और नैतिकता मात्र दो शब्द नहिं,कमज़ोर था आपका मित्र, मोह के वशीभूत जिंदगी ही हार बैठा। दुखद!!

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  9. यह परिस्थितियाँ कब किसे कितना तोड़ दें, कहना कठिन है। परिस्थितिजन्य या स्वभावजन्य, कुछ तो अन्तर है। क्षोभ तो है आपके मित्र में।

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  10. क्या ईमानदारी व नैतिकता महज दो शब्द हैं और व्यवहारिकता ही आज का मूलमंत्र है ???

    कहना तो नहीं चाहिए लेकिन आजकल ज़्यादातर महकमों में यही सत्य है ,

    वैसे यहाँ पर एक बात ये भी देखनी पड़ेगी की अगर उनकी बेटी उस exam को clear करने में कामयाब हो जाती तो उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती
    जब वो पहली बार असफल हुई थी तभी उन्हें सचेत हो जाना चाहिए था की उसकी असफलता का कारण क्या था ,आखिर उनकी पुत्री से कमी कहाँ रही ?
    कमी दो ही हो सकती हैं -
    या तो बेटी की उस विषय में उतनी रूचि नहीं थी और हो सकता है परिवार ने उस पर दबाव डाला हो उस विषय को लेने के लिए या फिर बेटी ने पूरी मेहनत और अधूरी तैयारी के साथ वो exam दिया

    अगर इन चीज़ों पर विचार किया गया होता तो वर्तमान परिस्तिथि शायद उत्पन्न ना होती


    महक

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  11. आपके लेख को पढ़कर मुझे अपनी बिटिया की याद आ गई। उसने हमें इस डोनेशन दें या न दें और देने या न देने पर जो अपराध भाव उपजता उससे बचा लिया। १२वीं में बहुत अच्छे अंक पाने पर भी डोमेसाइल न होने व अन्तिम समय बदले गए नियमों के कारण जब केवल डोनेशन देना ही रास्ता बचा था तो उसने स्वयं ही मना कर दिया। आज भी जब मुझे अपने पति की नौकरी के कारण घुमन्तु जीवन जीने, बच्चियों के लिए एक डोमिसाइल तक न जुटा सकने का दुख होता है तो वह मुझे यह कहकर उबार लेती है कि मेडिकल पढ़कर भी रिसर्च ही करती। किन्तु कितने युवा ३० पार करके भी पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च करते हुए २० -२२ हज़ार कमाकर दिनरात काम करके संतुष्ट रहेंगे?
    महक जी की बात से सहमत नहीं हूँ। हमारे देश में मेडिकल आदि में बहुत और अधिक सीटों की आवश्यकता है, न कि बच्चों को दोष देने की।
    घुघूती बासूती

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  12. ज़िन्दगी में ऐसे कई इम्तहान की घड़ियां आती हैं। उसी से तो पार पाना है। ऐसे माता पिता बच्चों को क्या शिक्षा दे पाएंगे।

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  13. जनाब , आज की दुनिया में प्रक्टिकल होना ज्यादा अच्छा है व्यवहारिकता को ईमानदारी और नैतिकता पर हावी होना तो नहीं चाहिए लेकिन ये आज की दुनिया का एक बड़ा सच है ...................... अच्छा लेख

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  14. ये समाज का आईना है। मैं घूघूती बासूती जी की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि सीटों की संख्या में काफी इजाफा होना चाहिए। आखिर महज 20-50 अंक से पीछे रह जाने वाले बच्चे कम होनहार नहीं होते।
    मैने बारहवीं के इग्जाम के बाद एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना चाहा..पिताजी के दोस्त औऱ उस कॉलेज के प्रिसिंपत जानते थे पिताजी की ईमानदारी के बारे में ...तो उनसे कहा नहीं गया कि बैकडोर से हो जाएगा..जबकि मैने पिताजी को बताया था। न पिताजी बोले..न प्रिसिंपस साहब से बोला गया...तो ये नियती है कि हम अपने मां बाप को भी समझे....इसमें उस बच्ची की भी गलती है..

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  15. aapka ye lekh man ko dravit kar gaya. main to aapke un mitra ke baare me soch rahi hun,jinko majburi ke chalte apni imaandari ko taak par rakh dena pada aisa karte samya apni antratma se unhe
    kitna ladana pada hoga. ye anumaan sahaj hi lagaya ja sakta hai.
    par kyon maa-baap hi bachchon ke baare me soche?
    kya bachchon ka farz nahi bantaki vo bhi ape abhibhavak ki paristhiti ko samjhen,unhe aise kaam ke liyebadhy na kren jo unke astitv ko
    hi samapt kar de.
    poonam

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  16. @गहरे पशोपेश में पड़ गया हूँ मैं....

    @प्रवीण ji

    गहरे पशोपेश में पड़ गया हूँ मैं भी

    ये लेख प्रभावशाली है और कडुआ सच बता रहा है

    इस लेख को पढ़ें शायद कोई हल मिल जाये
    सस्ती सी पाठशाला

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