सोमवार, 9 अगस्त 2010

आध्यात्म, चमत्कार, फेथ हीलिंग, मानसिक तरंगें और होमियोपैथी भी...क्या इनमें से कुछ भी मानव की समझ से परे होना चाहिये ???


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मेरे 'जानकार' मित्रों,

आज यह सवाल करने को प्रेरित किया आदरणीय सतीश सक्सेना जी की इस पोस्ट... पर आई इन दो टिप्पणियों ने...

१- इंसान अपने अनुभव से ही सीखता है जैसे जैसे आध्यात्म और विज्ञान की जानकारी बढ़ेगी...इनसानों को यह एहसास होने लगेगा कि वह जितना जानता है वह मात्र नाम मात्र ही है...

२- मानव जीवन से सम्बंधित ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जहाँ साइंस कुछ नहीं कह पाता, शब्दकोष में रहस्यमय शब्द अच्छा भला सम्मान पाता रहा है !
फेथ हीलिंग,मानसिक शक्तियों और तरंगों के जरिये रोग मुक्त होना एवं स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे भारतीय योगियों का जीवनी शक्ति पर विजय के सैकड़ों उदाहरण उपलब्ध हैं उन्हें नकार तो नहीं सकते !
इस लेख का उद्देश्य चमत्कार को बढ़ावा देना नहीं है मगर आप " कुछ तो है " पर मनन जारी रखें ...यही प्रयत्न मात्र है !





सोचने पर मजबूर करती हैं यह टिप्पणियाँ...



सोचिये !



क्या हमारी आज तक की समझ 'नाम-मात्र' की ही है...

क्या मानव की समझ के परे भी 'कुछ तो है' ही...

इस से बड़ा सवाल यह है कि क्या कुछ भी मानव की समझ से परे होना चाहिये...

यह तो माना जा सकता है कि मानव जाति के आज तक अर्जित ज्ञान की मदद से हम कुछ बातों को आज समझ नहीं सकते...

परंतु क्या यह भी माना जाये कि 'कुछ ऐसा' हमेशा रहेगा जिसे हम 'कभी भी' समझ ही नहीं पायेंगे...

यदि सचमुच ऐसी 'कुछ' चीजें हैं इस दुनिया में... तो क्या यह मानव जाति की हार नहीं...

बड़ा भयावह भी तो होगा यह... भविष्य की चुनौतियों के लिये... हम क्या मुकाबला करेंगे 'उस' का 'जिसे' समझने की सामर्थ्य तक हमारी नस्ल में नही...




नहीं, नहीं, नहीं !!!

मैं यह कतई नहीं मान सकता

कि मानव की सोच से परे भी 'कुछ' है

अथवा 'कुछ' होना ही चाहिये ।





अपनी आप बताइये...





आभार!






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12 टिप्‍पणियां:

  1. जी मैं समझा नहीं ? क्या लिखा है ऊपर लाल नीली और गुलाबी स्याही से ?

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  2. दुनिया में बहुत कुछ मानव के लिए अज्ञात है, लेकिन अज्ञेय कुछ भी नहीं।

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  3. मनुष्य का स्वभाव ही है चमत्कार की खोज -इन सर्च आफ मिरैकुलस.....अब अमरता को ही ले लीजिये -वह अमृत कलश को ढूंढता ही फिरता रहा है मगर विकल्प भी ढूंढें हुए है -साहित्य में अमरता ,वंश परम्परा में अमरता ,लोकजीवन में नेक कामों से अमरता ,,,
    हाँ मनुष्य ने सब कुछ उद्घाटित कर लिया यह कहना जल्दीबाजी होगी ....

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  4. बिलकुल बहुत कुछ ऐसा है जिसे अभी तक सांइस खोज नही पाई। यहांम तक कि हमारे योगिओं दुआरा स्थापित बहुत कुछ श्क्तियों के बारे मे। शायद बहुत कुछ ऐसा है जो ेआदमी अभी तक नही जानता। मै तो इस बात को मानती हूँ।

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  5. @ भाई प्रवीण शाह ,
    जितना मुझे अंदाज़ा है मानव की अथक खोज के बावजूद अभी तक विज्ञान सब कुछ नहीं जान पाया है , दुनियां के सुदूर क्षेत्रों में ऐसे सैकड़ों प्रश्न है जिनका जवाब साइंस नहीं दे पाता है ! विश्व में " कुछ तो है " को मानने वाले अल्प संख्यक न होकर बहुसंख्यक हैं, भले ही उसके बारे में विज्ञान कुछ भी कहे मगर उसे जानने का प्रयत्न करना भी तो विज्ञान का मूलभूत नियम ही है !
    आप उसे जानने की कोशिश ही न करें ... उसे बिना खोजे ही नकार दें तो फिर मानव चेतना का औचित्य ही क्या है खोज तो हमारी सतत प्रक्रिया है सो उसे जारी रखने का ही निवेदन है !

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  6. यदि हम मान बैठे कि हम सब जानते हैं तो वह हमारा बौद्धिक अन्त होगा।

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  7. पोस्ट अच्छी है . मेरी पोस्ट भी देखिये और कृतार्थ कीजिये मुझे भी और स्वयं को भी .

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  8. सब कुछ जाना गया है , इसका विवरण हमारे शास्त्रों में है । जिस रास्ते से जानने का प्रयास की बात कही जा रही है वह विस्तृत मार्ग नहीं है ।

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    @ दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi जी,

    सर, बहुत बहुत धन्यवाद आपका !

    "दुनिया में बहुत कुछ मानव के लिए अज्ञात है, लेकिन अज्ञेय कुछ भी नहीं।"

    यही मैं कहना चाह रहा हूँ यहाँ पर, कि, हो सकता है किसी तथाकथित चमत्कार, घटना या कारनामे के कारण के बारे में आज हमें पता नहीं... परंतु यह मान कर चलना गलत है कि मनुष्य कभी भी उस घटना के कारण को नहीं समझ पायेगा...

    यानी मनुष्य के लिये 'अज्ञेय' कुछ भी नही...

    अब हो क्या रहा है कि तमाम लोग तमाम अतार्किक, अवैज्ञानिक और हास्यास्पद चीजों से अद्भुत चमत्कार या परिवर्तन होने का दावा करते हैं... और इस का कारण पूछे जाने पर उसे पुरातन ज्ञान बताते हुऐ आज के मनुष्य की समझ से परे बताया जाता है... इसी प्रवृत्ति पर चोट करना चाहता हूँ मैं...

    आभार!


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  10. "अब हो क्या रहा है कि तमाम लोग तमाम अतार्किक, अवैज्ञानिक और हास्यास्पद चीजों से अद्भुत चमत्कार या परिवर्तन होने का दावा करते हैं... और इस का कारण पूछे जाने पर उसे पुरातन ज्ञान बताते हुऐ आज के मनुष्य की समझ से परे बताया जाता है... इसी प्रवृत्ति पर चोट करना चाहता हूँ मैं..."

    आप जानना चाहते हैं या चोट करना ?
    एक सीमित दायरे की सोच रखते हुए अज्ञात तक नहीं पहुंचा जा सकता । इतना भर सोचिए आपकी अपनी संस्कृति में आध्यात्म एक बिखरा हुआ ज्ञान है । उसकी ओर अगर ध्यान देंगे तो सब जाना जा सकता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. .
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    @ डॉ० महेश सिन्हा,

    आप कह रहे हैं कि " इतना भर सोचिये कि आपकी अपनी संस्कृति में आध्यात्म एक बिखरा हुआ ज्ञान है। "

    सर, कृपया अन्यथा न लें, परंतु समेटेगा कौन इस ज्ञान को... कौन निचोड़ निकालेगा इसका... आज जो भी आध्यात्म के गुण गाते हैं... क्या उनके पास जवाब है किसी भी सवाल का ?... सवाल पूछने पर केवल शब्दजाल बुना जाता है... या फिर यही कहा जाता है कि यह विषय गूढ़ है... और हम साधारण मानवों की सोच-समझ से परे भी... इसी प्रवृत्ति पर चोट करने की बात कह रहा हूँ मैं... यकीन जानिये न मेरी सोच सीमित है न दायरा ही... बस आग्रह यही रहता है कि सवालों को Tackle करते समय दिया गया तर्क Linear भी हो व Direct भी... घुमा फिरा कर मुद्दे से हटा न जाये...

    आभार!


    ...

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  12. आध्यात्म के सही ज्ञाता अपने के ज्यादा प्रचारित नहीं करते। शायद आप सहमत नहीं हो मेरे कथन से लेकिन यह कहा गया है की जब व्यक्ति पूर्ण रूप से तैयार होता है तो गुरु स्वयम उस तक पहुँच जाता है ।
    इस देश में कई स्थल हैं जहां व्यक्ति अगर सवेदनशील है तो कई अनुभव प्राप्त कर सकता है ।

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