शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

सबको सन्मति दे भगवान !


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मेरे अजन्मे-अनदेखे-अविनाशी-अनजाने-सर्वव्यापी-परमपिता,


पिछले कुछ दिनों से चल रहा धर्मयुद्ध देखा तो मुझे याद आये बापू...

और उनका प्रिय यह भजन भी...


रघुपति राघव राजा राम
पतित-पावन सीता राम
ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान


मेरे आदरणीय प्रकाश गोविन्द जी ने तो यहाँ पर 'तुझ' को वार्न कर ही दिया है यह कह कर:-



इतने वर्षों से ये भगवान् और अल्लाह बचते घूम रहे हैं ,,,, जिस दिन भी मिल गए दोनों को एक-एक चपत लगाकर एक अँधेरी कोठरी में बंद कर दूंगा और बाहर से ताला मार दूंगा .....


उनको चेतावनी देता आऊंगा या तो अपने एजेंट्स को सही करो या ये दुनिया दुबारा ठीक से बनाओ... वरना यहीं सड़ो अन्दर कोठरी में !





अब मैं भी कहता हूँ:-

'तुझ' से...

अगर वाकई 'हो' तो...

बन्द कराओ यह सब...

पर 'तुम' तो हो ही नहीं... मेरे विचार से...


इस लिये चलता रहेगा यह 'धर्मयुद्ध'... मुझ जैसों को बहुत आनंदित करता है यह... कॉमेडी और ट्रेजेडी दोनों साथ-साथ... साथ में अज्ञान, कुतर्क, अंध श्रद्धा और अंध विश्वास का तड़का साथ में... दूसरे के घर से कूड़ा बटोर अपने दरवाजे पर नुमाईश करने का यह खेल...


जितना यह खेला जायेगा... उतना ही मजबूत होगा मेरा यह यकीन... कि 'तुम' हकीकत में कुछ भी नहीं... बस कुछ अक्लमंद 'मंद अक्लो' के खाने-कमाने का जरिया मात्र हो!




हा हा हा हा !






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17 टिप्‍पणियां:

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  2. प्रकाश जी की मनोकामना पूर्ण हो , इसी में हम सबकी भलाई है .... उन अक्लमंद 'मंद अक्लों ' की भी ...!

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  3. हा हा हा .. प्रकाश गोविंद जी को तो अब नहीं मिलेंगे ईश्‍वर या अल्‍लाह !!
    अब मैं भी कहता हूँ:-

    'तुझ' से...

    अगर वाकई 'हो' तो...

    बन्द कराओ यह सब...


    सोंचने को मजबूर करती है ये पंक्तियां .. क्‍यूंकि सबकुछ चल ही रहा है !!

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. मज़ा आ गया यह लेख पढ़ कर ....वाकई इन्हें तभी खोलना जब यह अपने चेलों को ठीक कर लें ! एक ताला प्रवीण शाह मेरी तरफ से भी लगायें ! कैसे समझाया जाए भगवान् के चेलों को कि श्रद्धा नितांत व्यक्तिगत होनी चाहिए ! अपनी सेवा पूजा तपस्या दूसरों पर तो न थोपो !
    आप लोग जाओ स्वर्ग में हमारा क्या है......"हमें नरक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला" ...हार्दिक शुभकामनाएँ

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  6. ईश्वर के उजाले [ प्रकाश गोविन्द ] नें अंधेरों में कैद करने की धमकी दी भी तो किसे ! मैंने तो सुना है कि वो अंधेरों की वज़ह से ही ज्यादा और ज्यादा पावरफुल हुआ करता है :)

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  7. ऐसे धर्मान्ध लोगों को एक ताला मेरी ओर से भी लगाया जाए

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  8. आज से करीब दस साल पहले मेरे एक मित्र इस भजन में थोडा फेर बदल करके गाते थे कहते थे की यदि ये भजन ऐसा होता और उसको ऊपर वाला पुरा कर देता तो दुनिया की आधी से ज्यादा परेशानी ही हाल हो जाती |

    रघुपति राघव राजा राम
    पतित-पावन सीता राम
    ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम
    सबको सम्पति दे भगवान

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  9. ये अज्ञान, अंध श्रद्धा और अंध-विश्वास का तड़का सदैव जारी रहेगा! इसका कारण भी है- ये जितने भी अंध-विश्वास अथवा अंध श्रद्धा के केंद्र हैं ,,,ये दरअसल छोटी-बड़ी मंडियां हैं! ऐसी मंडियां जिससे सीधे तौर पर बहुत बड़ा तबका लाभान्वित होता है - इसमें पंडित, नेता, पुलिस, दुकानदार, अराजक तत्व! ये खेल उनके हित में है!
    तो यह खेल तो चलता रहेगा....
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    बस सवाल इत्ता सा है कि इन सयानों की कूप-बस्ती में हम जाहिल कैसे और कब तक सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं!
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    सतीश सक्सेना जी की बात पसंद आई!
    इन सयानों ने शंख और घंटा बजा के, माईक पे चिल्ला-चिल्लाकर, गुफाओं में- पहाड़ों पे जाकर, मजारों पे चादर चढ़ाकर, दुसरे के मजहब की ऐसी-तैसी करके ,,,,, इतना पुण्य और सबाब कम लिया है कि इनकी सीट तो स्वर्ग में आरक्षित है!
    मुझे तो टेलिस्कोप से देखने पर भी अपना कोई ऐसा कृत्य नजर नहीं आता जिसकी बदौलत स्वर्ग में एप्लीकेशन दी जा सके! तो ठीक है जी वो रहें अपने नगाड़े और ढोल के साथ स्वर्ग में ! हम नरक में अपनी बंसी के साथ भले!

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  10. वैसे अब यहाँ कोई प्रकाश गोविन्द महाशय को कानून की धमकी नहीं देगा? क्योंकि ईश्वर / अल्लाह के खिलाफ जो खुलेआम थप्पड़ मारने जैसी घटिया बात लिख रहा है वह तुम्हारे स्वयं के समुदाय का है. हालाँकि एक ही कम्प्लेंट में अन्दर होने तथा पुरे भारत के लोगो के द्वारा जूते खाने जैसा वक्तव्य यह महाशय दे रहे हैं.

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  11. @ MLA
    प्यार से परमपिता परमात्मा को बहुत कुछ बुरा भला कहा जाता रहा है और इसे अपमानजनक कभी नहीं माना जाता, ईश्वर और अल्लाह पूज्यनीय हैं और इन्हें हर घर में सम्मान दिया जाता है ऐसे घरों में प्रकाश गोविन्द और प्रवीण शाह के घर शामिल हैं !

    यह लेख एक व्यंग्य है, उन मूर्ख उपासकों पर, जो पूजा का अर्थ ही नहीं जानते और अपने धर्म को अच्छा और दूसरे को घटिया बताते हैं ! ऐसी मानसिकता हमारे देश का बरसों से नुक्सान करती आयी है जिसमें इन पंडों मौलवियों का कुछ बुरा नहीं हुआ बल्कि हमारे मासूम बच्चों का बुरा होता रहा है !

    परमपिता परमात्मा से लड़ वही पाते हैं जो उन्हें सबसे अधिक प्यार करते हैं ...मैं उनके सबसे प्रिय उपासकों में से एक हूँ और कभी मंदिर पूजा करने हेतु नहीं गया हमेशा ऐसे ही लड़ता रहा हूँ इसका अर्थ यह नहीं कि उनका अपमान किया गया है ! यह तो अपनी अपनी समझ और भावना है !

    जाकी रही भावना जैसी ,
    प्रभु मूरत देखि तिन तैसी !

    आपको वहां पत्थर नज़र आते हैं और हमें फल मिलता है !ठीक इसी प्रकार अल्लाह और इसा मसीह का भी हम सम्मान करते हैं और वह भी दिल से ! देखिये जाकर ,तमाम हिन्दू चर्च और मस्जिद के आगे सर झुकाते मिलेंगे है!

    यह हमारा धर्म सिखाता है कि सब आस्थाओं का आदर करना है ! अपमान करना हमारे खून में ही नहीं हैं कुछ लोग इस प्यार और अपनापन को धर्मभीरुता या कुछ और नाम दे सकते हैं !

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  12. कहीं भगवान होगा तभी तो सन्मति देगा ना?

    प्रणाम

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  13. बिलकुल नया नाम देख रहा हूँ -- "एम एल ए" ! रातों रात अवतरित हुआ है ! किसी बात को सही तरह से समझने के लिए भी स्वस्थ मस्तिष्क का होना जरूरी होता है!
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    जिसके पास सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की चाभी हो उसको कोई ताले में क्या रखेगा? ये ताला था महज अज्ञानता, पाखण्ड और धर्मान्धता पर ! जो जर्रे-जर्रे में काबिज हो .... जिसकी मर्जी के बिना एक पत्ता ना हिले ,,,, उसकी मर्जी के बिना की-बोर्ड पर मेरी उँगलियाँ हिलीं कैसे ??? उसके और मेरे बीच में आपको दरोगा नियुक्त किया किसने ??
    [चपत शब्द एक ऐसा शब्द है जो अपनापन लिए हुए है! चपत कोई दुश्मन नहीं लगाता! दुश्मन लगाता है - झापड़, कंटाप, थप्पड़, चाटा, घूँसा इत्यादि-इत्यादि! चपत तो वो होती है जो आपकी मा ने या पिता ने आपको बचपन में किसी बात को समझाने के लिए लगाई होगी]
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    आप हाई स्कूल में तब अलग किताब थी, इंटर में थे तब अलग, स्नातक में अलग किताब! क्या नयी किताब आने से पुराने का महत्त्व ख़त्म हो गया ??? जुदा प्रश्नों के लिए हमें नयी किताब पढनी ही पढ़ती है! आज के सामजिक सवाल भी नए हैं लेकिन आप जिद किये बैठे हैं हजारों साल पहले लिखी किताब की बदौलत ही सारे सवाल हल करके मानेंगे! गीता-रामायण-कुरआन-हदीस-बाईबल-गुरुग्रंथ पढो ... किसने मना किया है ... लेकिन मेरे भाई दुनिया उसके आगे भी है! हर पुरानी-ठहरी हुयी चीज जर्जर और कमजोर हो जाती है ...सड़न पैदा करती है! पुरानी इमारत भी समय-समय पर रख-रखाव-बदलाव और रंग-रोशन मांगती है!
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    अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद उससे होगा क्या ? सिर्फ किसी एक पक्ष के अहंकार को ही तो बल मिलेगा! क्यों नहीं हम कहते कि वहां मंदिर तो बने लेकिन शिक्षा का मंदिर (स्कूल-कालेज) या सेवा का मंदिर (वृद्धाश्रम, अनाथालय, विधवा आश्रम, चिकित्सालय) अथवा मैत्री मंदिर (पुस्तकालय, सामुदायिक केंद्र, सुन्दर सा पार्क) बने ! ऐसे जगह जहाँ सभी धर्म के लोग लाभान्वित हों!

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  14. प्रवीण जी !
    सुनिए मेरी भी ...आपकी चर्चा है
    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/08/blog-post_07.html

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  15. मनुष्य समाज का जो क़बीला ,जो जाति जो धर्म सत्ता में आ जाता है वह समाज की श्रेष्ठता के पैमाने अपनी श्रेष्ठता के आधार पर ही बना देता है [यह श्रेष्ठता होती भी है या नहीं यह अलग प्रश्न है] यानी सत्ता आये हुए की शक्ती ही व्यवस्था और कानून हो जाया करती है,


    सशंकित होना क्या जायज़ नहीं कि क्या वास्तव में आज ऐसा हो रहा है !!

    गर हो रहा है तो मुखर विरोध होना चाहिए.

    शमा ए हरम हो या दिया सोमनाथ का
    http://saajha-sarokaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

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