बुधवार, 21 जुलाई 2010

यह हिन्दी ब्लॉगिंग ब ब्लॉगरों के तार्किकता बोध का 'दिव्य' लिटमस टेस्ट है !!!



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मेरे 'टिप्पणीकार' मित्रों,

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पोस्ट लेखक जो कहना चाहता है, कोई पाठक-टिप्पणीकार उसी कथ्य को पोस्ट लेखक से बेहतर और सधे हुऐ तरीके से कह जाता है...

मेरी पिछली पोस्ट पर आई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी की यह टिप्पणी एक अच्छा उदाहरण है इसका...



अमरेन्द्र कहते हैं...




प्रवीण जी क्या कहा जाय !
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स्वाभिमान किसपर किया जाय ? , हममें इसके भी विवेक का लोप हो गया है .. आर्यभट्ट अच्छे थे , हमारे गौरव हैं , पर क्या हम आज आर्यभट्ट की शैली ही अपलाई करें , बांस की पोंगी से ही खगोल शास्त्र देखें , ... नया समय आया है तो नयी तकनीक भी चलेगी , इसमें प्राचीन की दुहाई क्यों ? .. देख रहा हूँ ब्लोगवुद में अल्पज्ञों के प्रलाप को .. इस 'दिव्य'-लिटमस-टेस्ट ने हिन्दी ब्लोगिंग और ब्लागरों के तार्किकता बोध को परिभाषित कर दिया है , इनकी फ्री में मिले वेव-पन्नों की ऐसी की तैसी करने की अद्भुत प्रतिभा का !, इनकी बीहड़ छाती-ठोंकू अज्ञानता का ! ... इनके मत से चला जाय तो ओझा लोगों को मेडिकल साइंस पढ़ाने को दे देना चाहिए , ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के आधार पर सीमा रक्षा करनी चाहिए .. 'अमेरिकी मंदी' का कारण भी चाणक्य के अर्थ-शास्त्र में ढूढना चाहिए , न मिले तो भी आँख मूँद कर बाबा रामदेव की शरण ले लेनी चाहिए .... धन्य है यह भारत व्याकुलता ! .......... ये पढ़े लिखे डाक्टर हैं या डाक्टर के नाम पर कलंक जो अथारिटी के साथ अज्ञानता फैलाने का ब्लागीय धंधा खोले/खोली हुए/हुई हैं ! .. कुछ तो कान पर कलम चढ़ाए 'साठे पर पाठे' बने चीख चीख कर फेचकुर फेंक रहे हैं कि देखो हम किसी की अंध-पक्ष-धर्मिता में इस हद तक भी बौद्धिक रूप से अविवेकी होने का माद्दा रखते हैं ! देखकर लगता है रसिया-वृत्ति ,नासमझी ,,,,,,,, आदि चीजें उम्र के किसी भी मुकाम पर की जा सकती हैं !.. अफ़सोस होता है !
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हम आपके साथ हैं !








कहाँ चल दिये मेरे हुजूर ?

बताइये तो सही...



आप किसके साथ हैं ?








प्रिय
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी को आभार सहित।






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23 टिप्‍पणियां:

  1. टिपिकल अमरेन्द्र स्टाइल खरी खरी ! सहमत !

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  2. हम भी आपके साथ हैं (स्वयं को ब्रह्मांड में अकेला ना समझें)

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  3. हम उनकी टिप्‍पणी की हर बात को खारिज करते हैं। हम भारतीयों में इतनी हीन-भावना भर गयी है कि हम अपना कुछ भी अच्‍छा नहीं मानते। जब अमेरिका करे तब तो मानेंगे? लेकिन सब के अपने विचार है, हमें सब की सुननी भी चाहिए। एक दिन आएगा जब चाणक्‍य की अर्थ व्‍यवस्‍था से दुनिया चलेगी और भारत के दर्शन से ही पूरी दुनिया।

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  4. दिव्या जी ने एक प्रश्न उठाया है कि हमें अपने अतीत पर गर्व होना चाहिये कि नहीं? हमारी उपलब्धियाँ भले ही शतप्रतिशत इस युग में अनुकरणीय न हो पर क्या यह आश्चर्य नहीं कि एक बाँस से इतनी सूक्ष्म खगोलीय गणना की गयी थीं।
    हम अभिभूत हैं पश्चिम से, हम अभिभूत हैं उनकी विचारधारा से, हम अभिभूत हैं उनके नकारात्मक कॉलोनियल प्रयासों से जिन्होने हमें हमारी उपलब्धियों पर गर्व करना तो दूर वरन उन पर हँसना सिखा दिया।
    लिटमस टेस्ट उन उपलब्धियों को देखना हो जो उस समय किसी और देश में संभव ही न थीं।
    यदि आर्थिक मंदी का हल चाणक्य का अर्थशास्त्र नहीं दे सकता तो आज की आर्थिक मंदी भी आधुनिक अर्थशास्त्रियों के मुँह पर जोरदार झन्नाटा हुआ तमाचा है। संभवतः अर्थशास्त्र के नियमों के पालन से उससे बचा जा सकता था।
    चरक और सुश्रुत पर अभिमान न करने का औरों का व्यक्तिगत कारण हो सकता है पर निसन्देह दोनो ही चिकित्सा के क्षेत्र के पुरोधा व पितामह हैं। हर चिकित्सालय में उनकी मूर्ति होनी चाहिये।
    आर्यभट्ट का लोहा पश्चिमी भी मान चुके हैं। हमारे ज्ञानचक्षु अपने आकाओं के साथ तो खुल जायें।

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  5. oh !
    bakvaas karne ka ye bhi ek tareeka hai....

    nai jaankaari mili

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  6. @ प्रवीण पाण्डेय जी
    हमने कब कहा की अतीत पर गर्व नहीं होना चाहिए , पर किस बात पर होना चाहिए , यह ज्यादा बड़ा मसला है , नहीं तो हम संस्कृत पढ़ाने की जगह ज्योतिषि-विश्वविद्यालय बनाते फिरेंगे ![ ध्यातव्य है बीजेपी सरकार में मुरली म. जोशी इसी के पैरोकार थे ! उदाहरण हैं !] 'मास्टर्स इन झाडफूंक' बांटते फिरेंगे ! 'वेल क्वालीफाइड इन पुंसवन ऑर गर्भाधान' बांटते फिरेंगे ! यह गौरव-बोध के नाम पर भारत-व्याकुलता नहीं तो और क्या है !

    किसी समय बांस की पोंगी कामगार थी , कब इनकार किया इससे मैंने , पर आज हम अपने वर्तमान की सीमा को अतीत में जाकर छाती फुलाने से रिप्लेस तो नहीं कर सकते ! हाँ गर्व मुझे भी है आर्यभट्ट पर ! पर अब सब कुछ वहीं है ऐसा नहीं मान सकते ! जोर देकर कहूंगा कि हमारा प्राचीन इतिहास स्वर्णकाल था ( सीमाओं के साथ ) पर अतीत के लिए ही , आज वर्तमान में हम उसकी लीक नहीं पीट सकते ! हाँ उसपर गर्व कर सकते हैं पर वर्तमान की समस्याएं कहाँ उससे मिटने वाली हैं ! यही बात चरक और सुश्रुत के बारे में कहूंगा !

    जहां तक छाती फुलाने की बात है हम कोलोनियल इफेक्ट से अलग छाती फुला भी सकते हैं पश्चिम पर ! हमारे यहाँ सब होने के बाद भी खुले में ही हगने - मूतने की व्यवस्था थी , इसपर तो हम छाती नहीं फुलायेंगे परन्तु हाँ इसपर जरूर फुलायेंगे कि योरोयियों ने आकर एक 'लैट्रिन व्यवस्था' का सभ्य माडल दिया ! आज आपलोग सुबह सुबह जिस व्यवस्था में सौच करते हैं वह योरोपीय है क्या छोड़ सकेंगे इसे ! व्यर्थ के प्रलाप का क्या मतलब !

    जिन देवी के नाम के शुभ-वैज्ञानिक स्मरण के साथ आपने टीप की शुरुआत की है उनमें भारत-व्याकुलता है , अतीत पर गौरव बोध नहीं ! गौरव-बोध और कीबोर्ड पर की जाने वाली तर्कहीन डकार में अंतर करना सीखें , प्रभु ! आभार !

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  7. अमरेन्द्र जी की कई बातों से असहमत।
    उनकी बातों से लगता है कि हर प्राचीन बात कूड़े में फ़ेंक दिये जाने योग्य है, और जो पश्चिम कहे वही सही, यह बात ठीक नहीं है।

    रामदेव बाबा से कईयों को इसलिये खुन्नस है, क्योंकि उन्होंने योग की सही तरीके से मार्केटिंग कर ली, जबकि "योगा" की मार्केटिंग करने वाले पिछड़ गये… :) :)

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  8. अमरेन्द्र का इंटेलेक्चुअल सेन्स बहुत अच्छा लगता है.... मैं जब अमरेन्द्र से पहली बार मिला था अपने घर पर... तो लगा ही नहीं कि पहली बार मिला हूँ... अमरेन्द्र बहुत सरल और इंटेलिजेंट लड़का है... विउज़ का भण्डार है...

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  9. @ सुरेश चिपलूनकर जी ,
    कब मैंने कहा कि प्राचीन कूड़े में फेंक दिया जाय ..... मैंने तो उसकी तार्किक वीक्षा की वकालत की है !

    मैं 'कोलोनियल इफेक्ट' का निंदक हूँ , फिर भी मुझे पश्चिम का पक्ष-धर्मी कहकर आप मेरी बात की तह तक नहीं जा रहे हैं !

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  10. यह स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ ( नहीं तो जमात देशद्रोही का फतवा देने को उतावली सी है ) कि तीसरी दुनिया को देखने वाले पश्चिम के उस 'व्यू-पोलिटिक्स' की निंदा करता हूँ जो यह मानती है कि सभ्यता फैलाना 'व्हाईट मैन्स बर्डन' ( थियरी) है ! भारतीय सभ्यता व संस्कृति से स्नेह है , अलग से क्या कहूँ , करनी से कभी साबित करने का मौक़ा आयेगा तो जरूर साबित करूंगा ! पर ज्ञान - जागृत होना आवश्यक है , तार्किक होना आवश्यक है , और कवि-कुल-गुरु कालिदास ने भी तो कहा है ---
    '' पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्‌ ।
    सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ''
    [ मालविकाग्निमित्रम् ]
    --- एतदर्थ कालिदास द्वारा प्रोक्त '' परिक्षा '' पर जोर देता हूँ चाहे पुराना हो या नया , चाहे पूर्व का हो या पश्चिम का , चाहे अपना हो या पराया ! इस 'व्यू-प्वाइंट' को ठेठ भारतीय मानता हूँ और गर्व करता हूँ कालिदास प्रभृति विद्वानों पर !

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  11. हर किसी को अपना विचार रखने का अधिकार है लेकिन उसके साथ-साथ देश ,समाज व इंसानियत का विकाश सही मायने में कैसे होगा इस बात का भी ख्याल अपने विचारों में पोस्ट या ब्लॉग पिट जायेगा या हिट होगा यह सोचे बिना रखना है | असली मुद्दा ईमानदारी से सोचने और अपने सोच में ईमानदारी से उसे उतारकर जमीनी स्तर पर भी कुछ करने और दूसरों को प्रेरित करने की है | पश्चिम कर रहा है या पूरब इससे कोई फर्क नहीं परता अच्छा और इंसानियत को जिन्दा करने के लिए कर रहा है तो हमें उसका हर हाल में समर्थन करना चाहिए यह देखे बिना की वो पूरब है ,पश्चिम है ,अपना है या पराया है | रही अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी के बारे में तो मैं महफूज भाई जैसा ही विचार रखता हूँ त्रिपाठी जी के लिए ....अच्छी जनकल्याणकारी सोच है उनकी ...

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  12. Agree with Amrendr....atleast he is honest in saying what he feels..वरना यहाँ लोग तटस्थता का लबादा ओढ़ कर ...बड़ी समझदारी से टिप्पणी करते है .....मैंने भी वहां कहा था ...के नैतिकता के जींस डी एन ए में नहीं आते .....वरना गाँधी जी का खानदान आज भी विश्व के मानचित्र अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा होता

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  13. देख रहा हूँ ब्लोगवुद में अल्पज्ञों के प्रलाप को .. इस 'दिव्य'-लिटमस-टेस्ट ने हिन्दी ब्लोगिंग और ब्लागरों के तार्किकता बोध को परिभाषित कर दिया है , इनकी फ्री में मिले वेव-पन्नों की ऐसी की तैसी करने की अद्भुत प्रतिभा का !, इनकी बीहड़ छाती-ठोंकू अज्ञानता का ! .

    ब्लॉग जगत एक ऐसा माध्यम है जहा पर हर कोई अपने विचार और मान्यताए रखता है जिसे पसंद आये वो उसकी सराहना करे जिसे न पसंद आये वो टिप्पणी में अपनी बात को सभ्य तरीके से रख सकता है पर किसी के विचारो से असहमत होने पर उस पर व्यक्तिगत छींटा कशी करने की क्या आवश्यकता है| ये कही से भी ज्ञानी और सभ्य होने की निशानी नहीं है | मुझे समझ में नही आता की लोग किस आधार पर खुद को ज्ञानी और दूसरो को अज्ञानी कहने लगाते है | कुछ बाते उनकी सही हो सकती है कुछ आप की और कुछ बाते उनकी गलत हो सकती है तो कुछ आप की फिर ये कौन तय करेगा की कौन ज्ञानी है और कौन अज्ञानी | कालिदास जी की कथा में जब कालिदास विद्योत्मा के सवालो का जवाब अपनी मुर्खता पूर्ण हरकत से दे रहे थे तो पास पैठे ज्ञानी महात्मा उनकी उस बेमतलब की हरकतों को भी ज्ञान पूर्ण जवाब में बदल दे रहे थे | ज्ञान चाहे देशी हो या विदेशी यदि वो हमें फायदा पहुच रहा है तो उसे अपनाने में कोई बुराई नहीं है |

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  14. प्रवीण जी चर्चा का एक पहलू छूट न जाय इसलिए यह जोड़ रहा हूँ -
    जहां तक वैचारिक चिंतन ,ज्ञान विज्ञान की बात है हम अपने पूर्वजों के कितने ही योगदानों पर गर्व कर सकते हैं -शून्य और दशमलव प्रणाली हमारी ही देन है दुनिया को ...तत्कालीन कितने ही मिथक ऐसे हैं जो हमें आविष्कारों की राह सुझाते हैं -पुष्पक विमान जिसके एक इंटेलिजेंट और इमोशनल मशीन की अवधारणा लुभाती है ,मेघनाथ का मायायुद्ध जिसमें शत्रु भयग्रस्त होकर हार मान लेने को विवश होता है ..ऐसे अनेक उदाहरण है -ऐसी दूर की कौड़ी सरीखी सोच वाले विराट बुद्धि मानवों के प्रति हम कतई अक्रितज्ञ नहीं हो सकते -तुलसी दास एक नहीं अनेक ब्रह्मांडों की बात करते हैं -और आज का अधुनातन भौतिकीविद भी अल्टरनेट ब्रह्मांडो के पक्ष में गणनाए कर रहा है -हम मारे कहा गए -प्रौद्योगिकी में ,प्राविधि में और सैकड़ो सालों की गुलामी ने दम तोड़ दिया -
    आज कोई कहता है की नहीं नहीं पुष्पक विमान था तो मुझे उस पर हंसी आती है ,ऐसे लोगों ने हमारी थाती को और भी नुकसान पहुंचाया है ,हम केवल इसी में गर्वित क्यों नहीं हो लेते की हमारे पूर्वज कितने कल्पनाशील थे ...अब हम क्यों साबित करने पर उतारू हो जाते हैं की सुदर्शन चक्र था ही ...हाँ सच है प्रौद्योगिकी किसी दिन पुष्पक विमान को सामने ला खड़ा करेगी वैसे ही जैसे आज हमारे पास विश्व में कहीं भी घट रही घटनाओं को देखने की संजय दृष्टि है ....बड़ा विषय है -मगर अल्प अध्ययन ,नीर क्षीर विवेक का अभाव लोगों को हास्यास्पद बना रहा है -

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  17. हम इतने असहिष्णु नहीं हो सकते की पूर्वजों के योगदानों की कर दें -मगर बुद्धि विवेक से इतने पैदल भी न हों उनके कार्यों का सही परिप्रेक्ष्य एवं तर्कसंगत मूल्यांकन भी न कर सकें ....

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  18. @ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
    @ Arvind Mishra

    मैं संभवतः बहस को पूरे परिप्रेक्ष्य में देख नहीं पाया और संदर्भों से इर्द गिर्द टिप्पणी कर गया। मैंने तर्कसंगतकता से कभी मना नहीं किया है और कदाचित यही कारण हो कि इतनी सुदृढ़ वैज्ञानिक और आर्थिक उपलब्धियों के बाद भी हम सामाजिकता में पिछड़ गये। सिद्धान्त सुदृढ़ थे और उन्हे स्थापित बनाये रखने के लिये उतना ही तार्किक प्रयास आवश्यक होता है। एक महल को महल बनाये रखने के प्रयास साधारण नहीं हो सकते। यदि वैज्ञानिक तरीके से उपलब्धियों को सहेज कर उसे परिमार्जित किया गया होता तो आज इस बहस की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
    निश्चय ही संस्कृति पर गर्व के नाम पर अंधविश्वासों को प्रश्रय न मिले और साथ ही साथ विद्वेष के कारण हम घर का कंगन भी न दान कर बैठें।

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  19. अमरेन्द्र जी की टिप्पणियों का मैं शुरू से कायल रहा हूँ। हर टिप्पणी कई पोस्टों से बेहतर होती हैं...

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  20. कालिदास ने कहा था कि पुराना सब अच्छा नहीं होता, नया सब बुरा नहीं होता। दोनों का समन्वय ज़रूरी है। मनुष्य का विवेक सर्वोपरि है। और उसी के आधार पर यह समन्वय सम्भव होगा। परम्परा साधन है, साध्य नहीं।
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    बुद्ध का उपदेश इस सन्दर्भ में बहुत सार्थक है-नाव नदी पार करने के लिए होती है। उसका उपयोग करो, पर कृतज्ञ भाव से उसका बोझ जीवन भर ढोते मत फिरो। अचेतन नाव तुम्हारी भावना की नहीं समझेगी पर उसके भार से तुम्हारी कमर अवश्य झुक जाएगी।
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    किसी भी बहस में शामिल होने से पहले मुझे आदरणीय ताऊ की प्रोफाईल में लिखे वाक्य का स्मरण हो आता है -"कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं !" :)))

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  21. हम जवाब तो देते, लेकिन ये दिव्य वाला मामला समझ में नहीं आया।
    ………….
    ये ब्लॉगर हैं वीर साहसी, इनको मेरा प्रणाम

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