बुधवार, 21 जुलाई 2010

पेंसिल के छिलके और दूध, चांदनी रात में रबड़ का बनना... गर्भाधान संस्कार व पुंसवन...मनचाही संतान ???



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मेरे 'संस्कारी' मित्रों,


बात मेरे बचपन की है, यही कोई दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था तब मैं... अखिलेश नाम का दोस्त था एक... एक दिन उसने बताया सब को कि, कटर (पेंसिल शार्पनर) से निकले पेंसिल के छिलकों को एकत्र कर यदि एक कटोरे में दूध में भिगा कर छत पर रख दिया जाये, किसी चांदनी रात को... और रखते समय हाथ जोड़ कर "ओअम् चंदा मामा नम:" भी जाप किया जाये तो सुबह तक कटोरे में रखा यह सब मिश्रण बेहतरीन रबड़(Eraser) में बदल जायेगा...ऐसा उसने अपनी दादी से सुना था और दादी की दादी तो इसी विधि से रबड़ बनाती भी थीं...


फिर क्या था जुट गये हम सब...रबड़ बनाने के काम में... न जाने कितना दूध खराब कर दिया...पर रबड़ बना नहीं कभी... हम सब दोस्त भी बड़े हो गये...पर फिर भी आज भी मिलने पर याद करते हैं... चांदनी रात में किये अपने उन प्रयोगों को...


आज फिर एक बार याद आ गई बचपन में किये उन प्रयोगो की... जब पढ़ा श्रेष्ठ और मनचाही [बेटा या बेटी] संतान प्राप्त करने हेतु भारतीय संस्कृति की एक बहुत बडी उपलब्धि :पुर्णत: वैज्ञानिक पद्धति से होने वाली एक महत्वपूर्ण गर्भधान प्रक्रिया ! को...


जो आधारित है इन दो संस्कारों पर


१- गर्भाधान संस्कार...


२- पुंसवन संस्कार...


तथा पढ़ा एक दो को छोड़ सभी पाठकों के इस प्रक्रिया की सत्यता, तार्किकता और वैज्ञानिकता के प्रति आश्वस्त होने व सहमति जताती टिप्पणियों को...

हो भी क्यों न आखिर लेखिका एक क्वालीफाईड Obstetrician & Gynaecologist जो हैं!


तो ख्याल आया दिल में...


आज बिटिया के स्कूल से आते ही उसके पेंसिल बॉक्स से पेंसिलों को निकाल कर शार्पनर से छिलके उतार दूध की कटोरी ले फिर से जुट ही जाना चाहिये... बचपन के उसी काम में...


शायद इस बार रबड़ बन ही जाये!


मैं इधर रबड़ बनाता हूँ और उधर आप इंतजार करो...



Nobel Laureates और दुनिया के तमाम खेलों और विधाओं के विश्व चैंपियनों की फौज के भारत भूमि पर अवतरण का...



क्या हुआ जो हमारे पास विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान, शोध सुविधायें, ट्रेनिंग सुविधायें, कोच, ट्रेनर, फैकल्टी,खेल के मैदान, संसाधन, सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त करने का आत्मविश्वास, हौसला व जुनून आदि आदि नहीं हैं....




हमारे पास गर्भाधान व पुंसवन संस्कार तो हैं न!




हा हा हा हा,






आभार!





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14 टिप्‍पणियां:

  1. पेन्सिल के छिलकों से रबड़ बनाने जैसा महान कार्य तो हम भी कर चुके बचपन में ...
    अच्छी याद दिलाई ...
    अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान नहीं है अब देश में मगर ये भी ना भूलें की प्राचीन समय में नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संस्थान से कम नहीं थी ...

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  2. प्रवीण भाई,
    मैं भी इस पर विश्वास नहीं करता था, लेकिन हाल ही में मेरा विश्वास थोड़ा हिला है। उज्जैन में हमारे एक परिचित पण्डित जी हैं, वे सिर्फ़ उन्हीं को गर्भाधान और पुंसवन के बारे में बताते हैं जिनकी पात्रता हो (ज़ाहिर है कि "पात्रता" सम्बन्धी निर्णय वे खुद होने वाले माता-पिता से काउंसिलिंग करके और उनकी सामाजिक/पारिवारिक स्थिति का पता करने के बाद करते हैं)।
    खैर, तो पंडित जी उस जोड़े को तमाम तरह के नियम पालन करने, खाने में कई तरह के प्रयोग और परहेज करने को कहते हैं। इसी के साथ वे मासिक धर्म के दिनों की गिनती करके किस दिन संसर्ग किया जाये, कौन से कपड़े पहनकर किया जाये, किस मुद्रा में किया जाये और किन मंत्रो को पढ़कर किया जाये सभी कुछ डीटेल्स में बताते हैं…

    मेरा विश्वास हिलने का एकमात्र कारण यह है कि मैं इस प्रयोग के लगातार 10 मामले देख चुका हूं और उसमें से 8 जोड़ों को लड़का हुआ (जो कि पंडित जी ने बताया था) एक जोड़े को लड़की हुई (जो कि जोड़े द्वारा चाही गई थी), सिर्फ़ एक मामले में उनका "आकलन"(?) (या प्रयोग या सिद्धान्त जो भी कहें) फ़ेल हुआ, यानी सफ़लता प्रतिशत 90% हुआ… अब मैं क्या कहूं? मैं उनसे कोई बहस भी नहीं कर सकता, और आपसे भी नहीं… :)

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  3. यह रबर बनाने के उद्द्यम से हम भी गुजर चुके है,हमें दंतकथा मिली थी कि आक के दूध को गर्म करने पर रबर बनता है,रबर तो नहिं बना।पर आगे चल कर ज्ञान हुआ कि रबर वास्तव में एक पेड का दूध ही हुआ करता है,और आक के पौधे के दूध में रबर बनने के गुण-धर्म नहिं है। हमारा उद्यम अर्धवैज्ञानिक था।
    कई बार हमारे पास सही जानकारी होती है,पर तथ्य,सामग्री या विधि अधूरी पड जाती है।

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  4. लड़का पाने का तरीका आप को कोई भी जानकार डाक्टर बता सकता है किसी पंडित जी की जरुरत नहीं है न ही किसी संस्कार की | सबसे पहले वो पुरुष का मेडिकल चेकअप ( उसके वाई क्रोमोसोंस की संख्या सेहत ) करके बता सकता है की बेटा होने का चांस कितना है फिर आप को किस किस दिन संसर्ग करना है और किस दिन नहीं बता देगा कपडे और जगह आप जो चाहे चुने उससे फर्क नही पड़ता है | जहा लड़का लड़की होने चांस आधा आधा होता है वो बढ़ कर ७०-३० या ८०-२० का हो जाता है | तरीका आजमाया हुआ है सफलता प्रतिशत ८० है २० जो रह गया उनको पहले से ३ पुत्रिया थी यानी परेशानी शायद पति के सेहत और शरीर से जुडी थी | मुझे लगता है की यदि लोग बच्चा प्लान करने से पहले ही किसी डाक्टर(वैसे इन बातो की जानकारी तो अब हम जैसी आम गृहणियो को भी है ) से मिल कर बात करे तो वो कन्या भूर्ण हत्या के दोष से बच सकता है |

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  5. प्रवीण भाई ,
    मित्र आपने अपने ब्लॉग में ये जो खुरदरे पटिये लगा रखे हैं इनकी वज़ह से मेरे मासूम नाज़ुक शब्द छिल छिल जाते हैं ! मुद्दे पर कहूंगा तो फिर से घायल होंगे :)
    कुछ मित्रों को रबड़ वाले गलियारे से सुरक्षित भागते देखा तो मैं भी निकल रहा हूं !
    आप लोग रबड़ बनाइये तब तक मैं चिकित्सा विज्ञान के जयकारे लगाता हूं :)

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  6. मैंने देखा है की भारत के ज्यादातर चिकित्सकों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का टोटा होता है और न्यायाधीश अन्धविश्वासी !
    बहुत दुर्भाग्योपूर्ण है यह ...आप अलख जगाये रहिएगा -और कोई नहीं तो मैं साथ रहूँगा ही !

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    प्रवीण जी क्या कहा जाय !
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    स्वाभिमान किसपर किया जाय ? , हममें इसके भी विवेक का लोप हो गया है .. आर्यभट्ट अच्छे थे , हमारे गौरव हैं , पर क्या हम आज आर्यभट्ट की शैली ही अपलाई करें , बांस की पोंगी से ही खगोल शास्त्र देखें , ... नया समय आया है तो नयी तकनीक भी चलेगी , इसमें प्राचीन की दुहाई क्यों ? .. देख रहा हूँ ब्लोगवुद में अल्पज्ञों के प्रलाप को .. इस 'दिव्य'-लिटमस-टेस्ट ने हिन्दी ब्लोगिंग और ब्लागरों के तार्किकता बोध को परिभाषित कर दिया है , इनकी फ्री में मिले वेव-पन्नों की ऐसी की तैसी करने की अद्भुत प्रतिभा का !, इनकी बीहड़ छाती-ठोंकू अज्ञानता का ! ... इनके मत से चला जाय तो ओझा लोगों को मेडिकल साइंस पढ़ाने को दे देना चाहिए , ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के आधार पर सीमा रक्षा करनी चाहिए .. 'अमेरिकी मंदी' का कारण भी चाणक्य के अर्थ-शास्त्र में ढूढना चाहिए , न मिले तो भी आँख मूँद कर बाबा रामदेव की शरण ले लेनी चाहिए .... धन्य है यह भारत व्याकुलता ! .......... ये पढ़े लिखे डाक्टर हैं या डाक्टर के नाम पर कलंक जो अथारिटी के साथ अज्ञानता फैलाने का ब्लागीय धंधा खोले/खोली हुए/हुई हैं ! .. कुछ तो कान पर कलम चढ़ाए 'साठे पर पाठे' बने चीख चीख कर फेचकुर फेंक रहे हैं कि देखो हम किसी की अंध-पक्ष-धर्मिता में इस हद तक भी बौद्धिक रूप से अविवेकी होने का माद्दा रखते हैं ! देखकर लगता है रसिया-वृत्ति ,नासमझी ,,,,,,,, आदि चीजें उम्र के किसी भी मुकाम पर की जा सकती हैं !.. अफ़सोस होता है !
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    हम आपके साथ हैं !

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  8. दूसरे ज़रूरी कामों में व्यस्त होने के कारण आजकल ब्लौगजगत की हलचल से दूर रहता हूँ इसलिए इस मामले का पता देर से चला.
    लेकिन अब मुझे लगता है कि हमारे अपने ही ग्रंथों को हम ही समझ नहीं पा रहे हैं और दुनिया भर के लोगों ने इस बीच उनसे बातें सीखकर इतना कुछ कर डाला. धिक्कार है हम पर!
    मुझे लगता है कि पिछले दो सौ सालों में हुए बड़े बदलावों और उनके कारक व्यक्तित्वों की पैदाइश के बारे में जानने से सारी पोल-पट्टी खुल जाएगी.
    काम बहुत बड़ा है. कौन करेगा?

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  9. प्रवीण जी, हो सकता है जो कहा जा रहा है सच हो। किन्तु उस स्थिति में तो हम भारतीय भर्त्सना के और भी अधिक बड़े पात्र हैं। जब पता था कि उत्तम किस्म की(ठीक वैसे जैसे उत्तम किस्म का धान, गेहूँ पैदा किया जाता है!)संतान कैसे पैदा की जाती है तो इतना आलस किया कि वह तरीका भी न आजमाया और ऐसे सपूत पैदा किए कि वे अपनी भूमि की रक्षा भी नहीं कर सके! धिक्कार है उस जमाने के भारतीयों पर!कुछ हजार भी वीर पैदा किए होते तो हमारी संस्कृति और ऐसे गजब के ज्ञान का क्या लोप होता?
    वैसे ऐसे प्रयोग पैन्सिल के छिलकों तक ही ठीक हैं। कहीं अधिक ही प्रयोग हुए तो भारत भूमि स्त्री जाति विहीन हो जाएगी।
    घुघूती बासूती

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  10. आपने गर्भाधान संस्कार के बारे में सुना और लिख डाला क्या उसकीं जाँच-पड़ताल भी की --लगता तो नहीं. जाँच पड़ताल से मेरा मतलब मूल धर्म पुस्तक में उसके बारे में क्या लिखा है और क्यों लिखा यह जानने का प्रयास किया-- ये भी नहीं लगता. आप क्या अनवर जमाल के सहयोगी हैं जो कहीं से भी उठाया पढ़ा या सुना और ब्लॉग पर लिख दिया जबकि उसके बारे में पूर्ण जानकारी तक नहीं. खैर जो भी है क्षमा करना यदि आपको बुरा लगा हो पर मुझे आपकी और जगह टिप्पणियों को पढकर आपसे ऐसी आशा नहीं थी. खैर मनुष्य जीवन में सोलह संस्कार होते हैं जिनमें गर्भधान भी एक है.गर्भाधान के बारे में मुझे ही कुछ लिखना पड़ेगा क्योंकि काफी लोग मजे ले रहे हैं इसके बारे में.

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