बुधवार, 14 जुलाई 2010

सभी धर्मों व धर्म ग्रंथों में बहुत कूड़ा-करकट भर गया/भर दिया गया है...समय आ गया है सफाई करने का!

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मेरे 'धार्मिक' मित्रों,

अभी दो दिन पहले मित्र सलीम खान ने एक पोस्ट लिखी जिसका सार यह था कि किसी मुसलमान को किसी भी गैर मुस्लिम से न तो दोस्ती करनी चाहिये और न ही उनके त्यौहारों या खुशियों में शामिल होना चाहिये...

आदत से मजबूर मैंने पुरजोर विरोध किया, लगभग सभी ब्लॉगर भाई (चाहे किसी भी धर्म के हों) भी इस बात के खिलाफ थे, भाई शाहनवाज ने तो इस पर एक पोस्ट ही लिख दी... नतीजा या तो हॄदय परिवर्तन के कारण या गुस्से में मित्र सलीम खान ने अपने ब्लॉग से सारी पोस्टें हटा दी।

यहाँ पर यह कहना न्यायोचित व प्रासंगिक होगा कि सलीम खान जी ने जो लिखा था उसके समर्थन में धर्मग्रंथों से संदर्भ सहित उद्धरण भी दिये थे।

अब इस पूरे प्रकरण से एक बार फिर मुझे सभी धर्म ग्रंथों में लिखी तमाम अतार्किक, अप्रासंगिक, अवैज्ञानिक, अनुपयोगी व वैमनस्य को बढ़ाती बातों की याद आई और उसी के साथ एक संवाद भी, जो भाई शाहनवाज के ब्लॉग पर हुआ...

आज सही समय है कि इस पर फिर चर्चा हो...


संवाद इस प्रकार है:-

मैं...

"सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में बहुत सी ऐसी बातें लिखी गई या बताई गई हैं जो उस युग के मनुष्य की अवैज्ञानिक धारणाओं, सीमित सोच, सीमित ज्ञान (या अज्ञान), तत्कालीन देश-काल की परिस्थितियों व लेखक के अपने अनुभवों या मजबूरियों पर आधारित हैं, आज के युग में इन मध्य युगीन या उससे भी प्राचीन बातों की कोई प्रासंगिकता या उपयोग नहीं रहा, यह सब बातें आज आदमी की कौम को जाहिलियत व वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं व इन सब बातों को आप बेबुनियाद-बेकार-बकवास की श्रेणी में रख सकते हैं और अब समय आ गया है कि धर्माचार्यों को अपने अपने ग्रंथों की विस्तृत समीक्षा कर इन बातों को Disown कर देना चाहिये। "



शाहनवाज...

"प्रवीण जी मैं आपकी बातों से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. जो ज्ञान हर युग में प्रासंगिक हों वही तो धर्म है वर्ना वह साधारण ज्ञान कहलाता है. धर्म एक ईश्वरीय ज्ञान होता है और ईश्वर का ज्ञान सदा के लिए होता है. यह तो मनुष्य का ज्ञान है, जो एक अरसे बाद गलत साबित हो जाता है. ईश्वर का ज्ञान तो वही है जो कभी गलत साबित हो ही ना पाए. यह तो हो सकता है कि कोई धार्मिक बात हमारे समझ में ना आए, परन्तु यह नहीं हो सकता कि ईश्वरीय बात गलत हो जाए. इसलिए अगर कोई बात समझ में ना आए तो यह सोचना कि वह बात ही गलत है और यह सोच कर ज्ञानी पुरुषों से प्रश्न ही ना करना बेवकूफी है. इसलिए हर धर्म में कहा गया है कि ज्ञान का प्राप्त करना मनुष्य का फ़र्ज़ है.

धर्मग्रंथो में लिखी गई बाते अगर आज के युग के लिय अप्रासंगिक होती, तो आज भी वैज्ञानिक उनको खागालने में नहीं लगे होते? आज पूरी दुनिया योग की तरफ भाग रही है, अध्यात्म की और लौट रही है. पुरे विश्व में वह लोग जो किसी खुदा को नहीं मानते थे, आज आस्तिक बन रहे हैं. तो इसके पीछे हमारे धर्माचार्यों की मेहनत और उनकी मेहनत के फलस्वरूप ईश्वर की ओर से दिया हुआ ज्ञान ही है. बस ज़रूरत है उस ज्ञान को आत्मसात करने की.

अगर आप विज्ञान को देखोगे तो पाओगे कि कितनी ही बातें धार्मिक ग्रंथो से ली गई हैं. जो बातें अबसे हजारों वर्ष पहले महापुरुष लोगो को बता कर गए, आज जाकर विज्ञान उनको सिद्ध कर रहा है. आखिर कहाँ से उन महापुरुषों के पास इतना ज्ञान आया? आज अगर इन्टरनेट पर सर्च करोगे तो हजारों ऐसी रिसर्च मिल जाएंगी, क्या वह सब की सब गलत हैं?

आप कह रहे हैं कि धार्मिक बातें इन्सान को जाहिलियत और वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं, और मेरा दावा है कि सिर्फ और सिर्फ धार्मिक बातें ही इंसान को जाहिलियत और वैमनस्य से रोक सकती हैं. यह जो जाहिलियत और वैमनस्य फ़ैलाने वाले लोग हैं, असल में यह अपने धर्म का पालन करने वाले लोग है ही नहीं, बल्कि धर्म का इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. इन्हें आप धर्म के व्यापारी कह सकते हैं, जो कि अपने फायदे के लिए धार्मिक ग्रंथो को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं. मेरा मानना है कि इन लोगो को हलके में नहीं लेना चाहिए, यह पूरी एक मुहीम है और इसके पीछे कोई बहुत बड़ा संगठन काम कर रहा है.

जिसका मकसद अपना उल्लू सीधा करने के लिए लोगो को बेवक़ूफ़ बनाना हो सकता है. क्योंकि वह लोग जानते हैं, कि जिन्हें अपने धर्म के बारे में जानकारी नहीं है, उन्हें ही बेवक़ूफ़ बनाया जा सकता है. और इस समस्या से निजात पाने का तरीका भी यही है, कि पुराने ढर्रे पर ना चलकर लोगों को जागरूक बनाया जाए. धर्म की सही शिक्षाओं को सामने लाया जाए, ताकि अन्धकार दूर हो.

या फिर यह भी हो सकता है कि कैसे लोगो को उनके धर्म से दूर ले जाया जाए. ज़रा सोचिये क्यों नहीं पश्चिम के धर्मों के बारे में गलत बातें सामने आती? क्यों सिर्फ हमें ही निशाना बनाया जाता है?

रही बात समीक्षा की तो लोगो के द्वारा की जा रही अनावश्यक समीक्षा की वजह से ही तो सारा फसाद फ़ैल रहा है. मेरे विचार से तो समीक्षा उसकी की जानी चाहिए है जिसकी कोई बात गलत साबित हो."




मैं...

मित्र शाहनवाज,

मेरी टिप्पणी से असहमति जताती यह पोस्ट बनाकर एक स्वस्थ संवाद शुरू करने के लिये आपका आभार ।

अब लीजिये बिन्दुवार जवाब...

*** जो ज्ञान हर युग में प्रासंगिक हों वही तो धर्म है वर्ना वह साधारण ज्ञान कहलाता है

पाषाण युग से आज तक प्रासंगिक ऐसे ज्ञान हैं पहिया, लीवर(Lever), गरारी व आग की ताकत... किसी एक खास जगह जाकर कुछ खास शब्द समूहों को बार बार दोहरा कर किसी परमपिता के सामने सर झुकाना या उसकी प्रार्थना करना जिसे आज धर्म के नाम से जाना जाता है महज ८-१० हजार साल पुराना है... यह तथाकथित ज्ञान आदमी की कौम के लिये क्या उपयोगिता रखता है?


*** धर्म एक ईश्वरीय ज्ञान होता है और ईश्वर का ज्ञान सदा के लिए होता है. यह तो मनुष्य का ज्ञान है, जो एक अरसे बाद गलत साबित हो जाता है. ईश्वर का ज्ञान तो वही है जो कभी गलत साबित हो ही ना पाए.

ईश्वर के इस तथाकथित ज्ञान के कुछ उदाहरण दीजिये तब कुछ कहूँगा।


*** यह तो हो सकता है कि कोई धार्मिक बात हमारे समझ में ना आए, परन्तु यह नहीं हो सकता कि ईश्वरीय बात गलत हो जाए.

बतलाईये तो सही क्या कहा है उसने।

*** अगर आप विज्ञान को देखोगे तो पाओगे कि कितनी ही बातें धार्मिक ग्रंथो से ली गई हैं. जो बातें अबसे हजारों वर्ष पहले महापुरुष लोगो को बता कर गए, आज जाकर विज्ञान उनको सिद्ध कर रहा है.

यहाँ पर फिर कुछ उदाहरणों की दरकार है।

*** आप कह रहे हैं कि धार्मिक बातें इन्सान को जाहिलियत और वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं, और मेरा दावा है कि सिर्फ और सिर्फ धार्मिक बातें ही इंसान को जाहिलियत और वैमनस्य से रोक सकती हैं.

दुनिया में ज्यादातर झगड़े, बड़ी लड़ाइयाँ धर्म के कारण हुई हैं यह जगजाहिर बात है, ब्लॉगवुड में चल रहा ताजा विवाद भी उदाहरण है इसका ।

*** ज्यादा विस्तार से लिखना यहाँ संभव नहीं पर धर्म व ईश्वर को समझने का प्रयास करती मेरी यह लेखमाला जरूर देखियेगा, चिंतन के लिये एक नई दिशा व विचार के लिये कुछ हटकर खुराक अवश्य मिलेगी ।

आभार!




शाहनवाज...

@ प्रवीण शाह

*** "पाषाण युग से आज तक प्रासंगिक ऐसे ज्ञान हैं पहिया, लीवर(Lever), गरारी व आग की ताकत... किसी एक खास जगह जाकर कुछ खास शब्द समूहों को बार बार दोहरा कर किसी परमपिता के सामने सर झुकाना या उसकी प्रार्थना करना जिसे आज धर्म के नाम से जाना जाता है महज ८-१० हजार साल पुराना है... यह तथाकथित ज्ञान आदमी की कौम के लिये क्या उपयोगिता रखता है?"

प्रवीण जी,

देखिये मैं तो आपको सिर्फ इस्लाम की बातें ही बता सकता हूँ, अन्य धर्म के ज्ञान के लिए तो अमित शर्मा और अनवर जमाल जैसे महानुभवो को आना पड़ेगा.

पहिया, लीवर, गरारी, जैसी बहुत सी बातें अल्लाह ने कुरान के ज़रिये इंसानों को बताई, इन की सूचि बहुत लम्बी है, इसके लिए पूरी एक पोस्ट बनानी पड़ेगी. तब तक आप "हमारी अंजुमन" पर जाकर विज्ञानं के गूढ़ रहस्यों से सम्बंधित कुछ जानकारिया हासिल कर सकते हैं.

इसी ज्ञान ने इंसान को इंसान बनाए रखा हुआ है और सबसे बड़ी बात तो यह है, कि इसी ज्ञान के ज़रिये हम हमारे पैदा करने वाले का आभार प्रकट करते हैं. ज़रा सोचिये, कोई आपको तनख्वाह देता है, और बदले में आप उसका काम ही ना करें तो क्या वह आपको तनख्वाह देगा? और क्या तनख्वाह लेना आपके लिए सही होगा?

ईश्वर ने दुनिया की हर वास्तु किसी न किसी मकसद से पैदा की है, जैसे कि खाद्य पदार्थ, फल इत्यादि जीवों के खाने के लिए, वहीँ छोटे से छोटा जीव भी किसी न किसी कार्य में आता है. तो क्या आप सोचते हैं कि उसने मनुष्य को बिना किसी मकसद के ही पैदा कर दिया?


*** ईश्वर के इस तथाकथित ज्ञान के कुछ उदाहरण दीजिये तब कुछ कहूँगा।

ईश्वर के इस ज्ञान का एक उदहारण कुरआन-ए-करीम है. आज तक इसके जैसी अपने आप में सम्पूर्ण किताब कोई भी मनुष्य नहीं बना पाया है. चाहे वह विज्ञान के हिसाब से हो या गणित अथवा तर्क के हिसाब से. कुरआन अपने आप में जीता-जागता करिश्मा है. इसको ईश्वर ने ऐसे विज्ञान के साथ बनाया है कि इसमें अगर कोई एक मात्रा भी बदलने की कोशिश करता है तो वह पकड़ा जाता है.

*** बतलाईये तो सही क्या कहा है उसने।

कुरआन अथवा वेद पढ़िए आपको स्वयं पता चल जाएगा कि उसने क्या कहा.

*** "दुनिया में ज्यादातर झगड़े, बड़ी लड़ाइयाँ धर्म के कारण हुई हैं यह जगजाहिर बात है, ब्लॉगवुड में चल रहा ताजा विवाद भी उदाहरण है इसका ।"

दुनिया का एक भी झगडा धर्म के कारण नहीं हुआ, हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि धर्म के दुरूपयोग के कारण हुआ. और शैतान प्रवित्ति के लोग तो अगर धर्म नहीं होता तब भी अवश्य झगडा करते. यह तो आप भी जानते हैं, कि धर्म का सहारा लेकर जो युद्ध हुए उनकी संख्या अन्य कारणों से हुए युद्धों के मुकाबले ना के बराबर है.





मैं...

"मित्र शाहनवाज,

आपको मेरे कहे को समझने के लिये Organic Evolution व Origin of life on Earth के बारे में काफी कुछ पढ़ना होगा... तभी आप समझोगे कि ईश्वर की यह अवधारणा कितने बाद में आई मानव समाज के बीच...

सही क्रम है...

* बड़े कपियों का एक समूह...
* पिछले पैरों पर खड़ा होकर चलना सीखना...
* दोनों अगले पैरों का किसी भी अन्य कार्य के लिये मुक्त होना...
* दोनों अगले पैरों(आज के हाथ) में अंगूठे का बाकी ऊंगलियों से ९० डिग्री के कोण पर शिफ्ट होना...
* हाथ के जरिये प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध चीजों को औजार रूप में प्रयोग करने की योग्यता का विकास...
* सामूहिक रूप से बड़े पशुओं का आखेट...
* समूह में रहने व आखेट करने के कारण भाषा का विकास...
* कालांतर में लिपियों का विकास...
* समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिये कुछ नियमों का बनना...
* परिवार, उत्तराधिकार आदि अवधारणाओं का उदय...
* चल व अचल संपत्ति की मान्यता...

यह सब होता रहा लाखों साल तक...

इस दौरान नहीं था कोई धर्म या ईश्वर का दखल!

महज पिछले ७-८ हजार सालों में आई हैं यह अवधारणायें... भाषा के विकास के बाद... बिना भाषा के इनको अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकता।

धर्म ग्रंथ भले ही कुछ भी कहते रहें परंतु सूर्य के एक दहकते टुकड़े के रूप में उसके चक्कर लगाती पृथ्वी पर जीवों व पादपों का होना एल लम्बी व सतत प्रक्रिया के तहत हुआ... Evolution आज भी जारी है... भविष्य का मानव (Homo futuris) कैसा होगा इस पर भी आज कयास लगाये जाते हैं... इतने लम्बे मानव इतिहास में धर्म व ईश्वर का यह दौर काफी कम समय से है... कुछ अच्छे कुछ बुरे समयकालों की तरह यह भी गुजर जायेगा ।

आस्था व विश्वास पर मैं कुछ नहीं कहूँगा सिवाय इसके कि ...

"किसी चीज का अस्तित्व वाकई में नहीं है यह कोई कैसे साबित कर सकता है ?"

और हाँ यह जरूर कहूंगा कि पहिया, लीवर व गरारी का ज्ञान इस्लाम के उदय से पुर्व से ही था आदमी के पास..."





प्रिय पाठक,
क्या आपको नहीं लगता कि...
सभी धर्मों व धर्म ग्रंथों में बहुत कूड़ा-करकट भर गया/भर दिया गया है...

समय आ गया है सफाई करने का!



हम तो कह लिये अपनी...
अब आप ही कुछ कहो!





आभार!




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16 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण जी,

    ज्ञान दो तरह के होते हैं, एक ज्ञान वह है जो मनुष्य की आवश्यकताओं से सम्बंधित होता है, जिसे दुनिया का ज्ञान कहते हैं. तथा एक दूसरा ज्ञान होता है जो इसके धरती पर पैदा होने के मकसद से सम्बंधित होता है. उसको अध्यात्मिक ज्ञान कहते हैं. दुनिया के ज्ञान के लिए ईश्वर ने कोई संदेशवाहक नहीं भेजा, बल्कि वह ज्ञान ईश्वर ने मस्तिष्क में पहले से सुरक्षित कर दिया है. जब किसी चीज़ की आवश्यकता होती है तो मनुष्य मेहनत करता है, उस पर रास्ते खुलते चले जाते हैं. खाना कैसे बनाना है, यह धीरे-धीरे अपने आप ही पता चल गया मनुष्य को. फसलें कैसे उगानी है, उद्योग कैसे चलने हैं, इसके लिए कोई संदेशवाहक नहीं भेजा ईश्वर ने. मनुष्य सोचता रहा, ईश्वर रहनुमाई करता रहा. यह ज्ञान भी ईश्वर ही देता है. बेशुमार, बल्कि अक्सर जो भी खोजें हुई वह अपने आप ही हो गई . इंसान कुछ और खोज रहा था, और कुछ और मिल गया. इस तरह वह ज्ञान भी ईश्वर ने ही दिया है.

    लेकिन आदरनिये प्रवीण जी, इंसान सारी ज़िन्दगी भी कोशिश करता रहे तो यह पता नहीं लगा सकता है कि मैं कहा से आया हूँ? मुझे किसने भेजा है? मुझे किसने पैदा किया है? यह मुझे मारता कौन है? मैं तो स्वास्थ्य से सम्बंधित हर बात पर अमल कर रहा था, फिर यह दिल का दौरा कैसे पड़ गया? और मैंने तो सुरक्षा के सारे बंदोबस्त कर रखे थे, फिर यह साँस किसने खींच ली? जीती जागती देह का अंत कैसे हो गया? यह वो प्रश्न है जिसका उत्तर इंसान के पास नहीं है, ना ही इसके मस्तिष्क में है. किसी इंसानी किताब में भी इसका उत्तर नहीं मिल सकता. यह वह प्रश्न है जिसका उत्तर बाहर से मिलता है.

    और इसी उत्तर को देने के लिए ईश्वर ने दुनिया के हर क्षेत्र में महापुरुष या यूँ कहें की सन्देश वाहक भेजे. परेशानी की बात यह है की लोग जिसे महापुरुष मानते हैं, वह उसके अलावा किसी और को महापुरुष मानने को तैयार ही नहीं हैं. वहीँ दुसरे लोग उन महापुरुषों को महज़ भ्रम समझते हैं. दर-असल अगर गौर से देखा जाए तो यह हालात हमने अर्थात इंसानों से स्वयं पैदा किये हैं और दोष धर्म को देते हैं. लोग एक-दुसरे को कहते हैं की मेरा धर्म सत्य है, तुम्हारे असत्य. लेकिन जिसका धर्म है अर्थात ईश्वर / अल्लाह उससे मालूम करते ही नहीं हैं. मेरे विचार से सबसे बेहतर बात तो यही है की स्वयं उसी से मालूम किया जाए की सत्य क्या है? और जिसे वह सत्य बताए उसे ही सत्य माना जाए. मेरा यह विश्वास है कि अगर उससे मालूम किया जाए तो यह हो ही नहीं सकता है कि वह सत्य का ज्ञान दिए बिना ही मनुष्य को इस लोक से मृत्यु लोक में बुला ले.

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  3. वैसे मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि लोगो ने धार्मिक ग्रंथो में कचरा भर दिया है, लेकिन यह ईश्वरीय ग्रन्थ (जैसे की कुरआन अथवा वेदों इत्यादि) में नहीं बल्कि इन ग्रंथों से सम्बंधित अन्य पुस्तकों अथवा व्याख्याओं में हुआ है. खासतौर पर कुरआन के लिए तो स्वयं ईश्वर (अल्लाह) ने कहा कि कोई इस किताब में कोई चाहे भी तो बदलाव नहीं कर सकता है. जब लोगो ने देखा की इन ग्रंथो में बदलाव ना-मुमकिन है तो उन्होंने इनकी अपने हिसाब से व्याख्याएँ कारके अपनी दुकानदारी चलाना शुरू कर दी. और सारा झगडा-फसाद इसी कारण है.

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  4. जहाँ तक बात Organic Evolution व Origin of life on Earth की है तो यह केवल अवधारणा ही है, और अगर यह सत्य हुआ भी (जो की लगता नहीं है) तो भी बात मनुष्य के पैदा होने के बाद की है उससे पहले की नहीं. और धर्म धरती पर मनुष्य के पैदा होने से आज तक एक ही है. लोगों ने अवश्य ही इसे अलग-अलग बना दिया है. बहुत सी ऐसी research हैं (और मेरा भी मानना है) जो यह साबित करती हैं, कि सनातन, बोद्धिष्ट, जैन, यहूदी, इसाई, मुसलमान इत्यादि एक ही धर्म की अलग-अलग शाखाएँ हैं या यूँ कहें की अलग-अलग समय के धर्म हैं. और यह research इन धर्मों की धर्म ग्रंथो में से ही की गई हैं.

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  5. हा हा हा हा, प्रवीण भाई… अब आपको "असली" ज्ञान प्राप्त होकर ही रहेगा… :) :) भुगतो अब… :)

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  6. एकै दिन मा इत्ता ज्ञान
    कहीं बदहजमी ना होई जाए
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    चलिए मान लीजिये मैंने सारे धार्मिक ग्रंथों को इकठ्ठा किया ...बोरियों में बाँधा और गटर में बहा दिया
    हाँ .... अब बताईये आपके जीवन में क्या फर्क आएगा ? समाज को क्या हानि होगी ? दुनिया में क्या तब्दीली आएगी ?
    [ मैं फायदे पचासों बता सकता हूँ .... आप सिर्फ क्षति बताईये]
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    जिस ज्ञान को आप पिला रहे हैं क्या वो ज्ञान भगवान का दिया है ?
    क्या मनुष्य की लाखों वर्षों की विकास गाथा भी बतानी पड़ेगी ?
    गुफाओं और जंगलों में रहने से लेकर चाँद व मंगल में बसने की परिकल्पना क्या रातों-रात बनी है ?
    मनुष्य ने अनुभवों से, प्रयोगों से , अनुसंधान से पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान प्राप्त किया है !
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    धार्मिक ग्रन्थ अपने-अपने समाज को संगठित रखने और श्रेष्ठता का मिथ्या अहंकार भरने में प्रबल भूमिका निभाते हैं !

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  7. कैसे निर्णय होगा जब हम सभी किसी न किसी पूर्वाग्रन्थियों के शिकार है।
    प्रवीण जी,
    कौन निर्णय करेगा कि कौन सा कचरा है,किस कचरे की अब आवश्यक्ता नहिं,आज किसी बात को अनुपयोगी मान विस्मृत कर दें,भविष्य में उपयोगी हुई तो?,
    जब विश्व में युद्धों का दौर था,और शन्ति,धेर्य क्षमा एवं संतोष को कायरता माना जाता था,उस समय मानवता के ये नियम कचरा मान त्याग दिये जाते तो?
    प्रकाश जी,
    उस धरोहर को त्याग देने से बहुत फ़र्क पडता है।
    आज जिन मानवता के गुणों पर आप सभ्य संसकारशील और जानवरो से श्रेष्ठ होनें का दावा ठोक रहे है,उसका विचारबीज इन्ही धार्मिक ग्रंथों की देन है। मनुष्यों की लाखों वर्षों की विकास गाथा इन्ही 'जीवन-विज्ञान'से प्रेरित है।
    उन्हें फ़ेक देने की बात छोडो, आप के इन विकास गाथा के इतिहास ग्रन्थ,अनुभव-शोध ग्रन्थ जिसकी विकास के बाद कोइ आवश्यकता नहिं,फ़ैकने को तैयार हैं?

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    @ Shah Nawaz जी,

    Organic Evolution व Origin of life on Earth एक हकीकत हैं, यह पूरी तरह से साबित हो चुका है कि Primitive अमीनो एसिड मिले जलीय काढ़े मे एककोशीय जीवन की शुरूआत हुई थी... निरंतर विकास हुआ...और इसी जैविक विकास की परिणति आज का मानव है।

    किसी परमात्मा ने नहीं बनाया आदम जात को...

    उपरोक्त ठोस हकीकत को नकारना हद दर्जे की मूर्खता या जिद ही कही जायेगी।

    आभार!

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    @ आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,

    देव, ज्ञान प्राप्ति के लिये ही तो ब्लॉग बनाया है... पर आप देते ही नहीं...चुहल कर निकल लेते हैं ;)

    आभार!

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    @ सुज्ञ,

    महज कुछेक काम की बातें छोड़ अधिकतर तो कचरा ही है कहाँ तक गिनायेगा कोई!

    चलिये आपके विचार के लिये:-

    मृत्यु उपरांत 'आत्मा' या 'रूह' का अस्तित्व और इस आत्मा या रूह को 'ऊपरवाले' के द्वारा स्वर्ग या नरक अलॉट करना... यह हिसाब लगाकर कि जिंदगी में कितनी बार उस इंसान ने 'ऊपरवाले' को याद किया, उसके सामने झुका या उसकी इगो-मसाज की, क्या कहोगे या कैसे जस्टीफाई करोगे आप इसको ?

    आभार!

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  11. प्रवीण जी,
    आत्मा(चेतन) के अस्तित्व से ही इन्कार इसलिये है कि……॥
    "इस आत्मा या रूह को 'ऊपरवाले' के द्वारा स्वर्ग या नरक अलॉट करना... यह हिसाब लगाकर कि जिंदगी में कितनी बार उस इंसान ने 'ऊपरवाले' को याद किया, उसके सामने झुका या उसकी इगो-मसाज की" ? यानि आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने पर यह बेतुकी अन्यायपूर्ण मान्यता को भी स्वीकारना पडेगा?
    या फ़िर यदि इस बेतुके अन्यायपूर्ण कचरे को हटा देने पर आत्मा के अस्तित्व से कोई समस्या नहिं?

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  12. प्रवीण भाई ,
    बड़ी फुर्सत है भाई आपके पास , हमारे पास भी एक अदद आर्कियालोजी डिपार्टमेंट था यूं समझिए उसकी चाभी खो गई है कभी फुर्सत मिली तो जरुर खोजेंगे :)

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  13. प्रवीण जी एक चूक हो गयी आपसे -संशोधित कर लेगें तो बहुत आभारी होऊंगा !
    कूड़ा करकट धर्मग्रंथों में नहीं लोगों के दिमागों में भरा है ......(मतलब जो उनका भाष्य करते है ! )
    और ब्रह्मा या अल्ला मियाँ का कोई शरीरी वजूद तो है नहीं तो क्या ये अहमक इतना भी नहीं समझ पाते कि न तो वेड ब्रह्मा के मुंह से निकला और न कुरआन किसी अदृश्य स्रोत से ...
    ये सभी रचनाएं मनुष्य की ही हैं हाँ उसे प्रेरणा जरूर कुदरत से मिली ...
    बस इतना ही कहना था !

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    .
    .
    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    यह तो कह सकता हूँ कि:-

    "कूढ़ा करकट कुछ उन लोगों के दिमागों में भी भरा है जो धर्मग्रंथों का भाष्य करते हैं।"

    परंतु ससम्मान अपनी बात पर टिकना चाहूंगा...

    'सभी धर्मों के धर्मग्रंथों मे बहुत कुछ अनाप-शनाप, अनर्गल भी लिखा गया है जिसके संशोधन की आवश्यकता है।'

    आभार!


    ...

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  15. @प्रवीण जी
    धर्म ग्रन्थ केवल वेद या उनका अनुसरण करने वाले वैदिक ग्रन्थ हैं . सबसे पहले तो आप यह समझो कुरान धर्मग्रन्थ नहीं है क्योंकि उसमे अनेक बकवास और मिथ्या बाते हैं. इसीलिए आप विज्ञान की तुलना कुरान से करेंगे तो उससे कोई लाभ नहीं है. वैदिक ग्रन्थो में एक बात भी यदि मिथ्या लिखी है तो आप उसको यहाँ रखें. मुसलमान लोगो का कुरान को वेद से जोड़ने का कारण इनका छल और स्वार्थ है. मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त मनुष्य नहीं हूँ ज्ञान और तर्क को ही महत्ता देता हूँ जो बात तर्क से सिद्ध नहीं हो सकती उसको मैं भी नहीं मानता हूँ. शाहनवाज़, जमाल आदि जेहादी बेवकूफ लोग हैं जिनको कुरान में विज्ञान दिखाई देता है जबकि उसमें कितनी ही प्रत्यक्ष सैकड़ों बाते विज्ञान विरुद्ध और बेतुकी हैं. अभी के लिये आप समय मिलने पर ये ३ लेख अवश्य पढ़े. डार्विन के सिद्धांत का पूर्ण तार्किक विवेचन मैं जल्द ही करने का प्रयास करूँगा ओर तब आपसे प्रश्नोत्तर करूँगा उस बारे में.
    वेद कुरान को एक बताने वालो का उद्देश्य समझो हिन्दुओं

    हिंदू वेदों को इतना अत्यधिक महत्त्व क्यों देते हैं?

    धर्म और विज्ञान तथा धर्म और राष्ट्र में कौन बड़ा ?
    इन लेखों के अतिरिक्त आप २०१० मार्च में मेरे द्वारा प्रकाशित "सत्य का निर्धारण कैसे हो" के तीनों भाग पढकर देखे जिससे आपको ये अन्दाज़ा होगा की हमारे धर्मग्रंथों में कितनी विज्ञानमय और तार्किक बातें लिखी हैं यह तो केवल एक नमूना भर है.

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  16. पहली बात हिन्दू ब्लॉगर और मुस्लिम ब्लॉगर ये किसीने शुरू किया ?? सलीम खान ने ,


    दूसरी बात महिला को क्या पहनना चाहिये , उनके लिये संस्कार इत्यादि पर लम्बी लम्बी किस ने हाकी हिन्दू ब्लॉगर मिथिलेश दुबे , मुस्लिम ब्लॉगर सलीम खान .


    सलीम और मिथिलेश अपने हर आलेख मे एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं और दोनों अलग अलग धर्मं से हैं लेकिन मित्र हैं और प्रगाढ़ मित्र हैं


    सबसे ज्यादा वाहियात बाते आपको इनके ही ब्लॉग पर मिलेगीइन दोनों कि उम्र , इन शैक्षिक योग्यता सब को नज़र मे रखे और ये भी जाने कि दोनों ही कहीं कहीं से पढ़ कर आलेख कॉपी पेस्ट करते हैं . जीविका के प्रति अपने माता पिता के प्रति इनके क्या कर्तव्य हैं पता नहीं . हां ये सब भी इसलिये क्युकी इनके प्रोफाइल पर लिखा हैं / था नौकरी नहीं हैं , बेरोजगार

    हम लोग कितना ज़िम्मेदार हैं ऐसे लोगो को पर बात करके उनको "कुछ ना करने के लिये उकसाने को " ??

    दूसरी बात धर्म ग्रन्थ कि तो मात्र किताबे , पढ़ कर समझिये और जो हितकर को उसको अपनाइये . धर्म अगर आस्था हैं तो ठीक अन्यथा अगर रुढ़िवादी सोच हैं तो बेकार . धर्म ग्रन्थ पढने से अगर जीवन चलता होता तो सलीम और मिथिलेश मित्र ना होते .


    हम किसी भी पुस्तक को एडिट या रीवैज तभी तक करे सकते हैं जब तक लेखक जिंदा हो उसके बाद तो प्रिंट ही होती हैं साल दर साल . मैने बहुत सी धार्मिक पुस्तके पढी हैं और वो मेरे लिये पुस्तके ही हैं .


    संविधान और कानून बनते और नए बनते हैं समय अनुसार

    संविधान मे धर्म कि जो परिभाषा हैं उसको सब अपना ले बात ख़तम होती हैं

    नारी ब्लॉग पर हर दूसरे दिन एक आध कमेन्ट मुझे असंस्कारी , अधार्मिक इत्यादि बताता हैं और धर्म ग्रंथो मे नारी का क्या स्थान हैं ये बताता हैं डिलीट कर देती हूँ

    क्युकी नेट पर क्यूँ वो सब पहले जो कहीं किन्ही किताबो मे दफ़न हैं

    सहमत हूँ आप के नज़रिये से बात दृष्टिकोण कि हैं धर्म , संस्कार और अधर्म कि नहीं

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