शनिवार, 10 जुलाई 2010

आखिर ऐसा अजीबोगरीब बर्ताव क्यों करती हैं महिलायें ?. . . . . . मैं तो आज तक समझ नहीं पाया. . . . . . :(


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मेरे 'खरीदार' मित्रों,

रोज ठीक दस बजे सुधांशु की एंट्री होती है...समय की इतनी पाबंदी कि आप अपनी घड़ी मिला सकते हैं उसके आने पर... आज वह दोपहर बारह बजे आया और आते ही सीधे अपनी मेज पर काम में जुट गया...काफी परेशान सा लग रहा था मेरा यह जोशीला और हंसमुख सहकर्मी...

खैर लंच टाइम पर मैंने उसे अपने पास बुला लिया...कबीर रोजाना मेरे ही साथ लंच करता है...खाना खाने के बाद चाय पीते-पीते मैंने पूछा " क्या बात सुधांशु सब कुछ ठीक-ठाक तो है ?"

उसे शायद मेरे यह पूछने का ही इंतजार था..." मूड खराब है बॉस, आज बहुत मेरा।"

"हुआ क्या?" पूछा कबीर ने...

" अरे यार सुबह सुबह बड़ी शर्मिंदगी झेल कर आ रहा हूँ...कल शाम रूचि और मैं गये थे मार्केट... बोली सलवार-सूट लेना है...पूरे दो घंटे तक दुकान के सारे सूट देखे...एक पसंद किया...खरीद के घर लाये... घर आकर ड्रैसिंग टेबल के सामने उसे शरीर पर लगा देखती रही... फिर बोली- ऊंह... अच्छा नहीं लग रहा ये अब... कल सुबह सुबह जाकर वापस कर आना इसे!"

बेचारा सुधांशु सुबह दुकान पहुंचा तो पहले तो दुकानदार ने उलाहना दिया " अरे साहब बोहनी तो होने देते वापसी से पहले " फिर दुकानदार ने यह भी पूछा कि एक रात में ऐसा क्या हो गया कि सूट एकदम नापसंद ही कर दिया गया।

क्या कहता वह बेहद सीधा और ईमानदार इंसान... " एक नहीं कई बार हुआ है ऐसा बॉस... पसंद तुम करो... फिर नापसंद करने के बाद जलालत झेलने-वापस करने जाये पति!"... "अब तो हालत यह हो गई है मेरी कि जब यह शॉपिंग कर रही होती हैं तो मैं कितना ही चुप होकर इधर-उधर ध्यान लगाने की कोशिश करता हूँ पर मेरे पूरे बदन में एलर्जी सी खुजली होने लगती है"... अपने दिल का दर्द निकाल बाहर रख ही दिया सुधांशु ने...

कबीर अभी तक मंद-मंद मुस्करा रहा था... फिर वो बोला..."यार, कुछ-कुछ ऐसे ही हाल हैं मेरे भी अभी पिछले हफ्ते अमीनाबाद गये... पूरी दुकान पलटवा दी दिलशाद ने... फिर कहती है कुछ है ही नहीं यहाँ मेरी पसंद का... चलो चलते हैं... मेरा तो मुंह खुला का खुला ही रह गया... थोड़ा दुकानदार के श्रम और समय का भी ख्याल रखा होता"... " यार मैं कभी कुर्ता-पाजामा नहीं पहनता फिर भी दुकानदार का ख्याल रखते हुऐ मैंने अपने लिये चिकन का एक कुर्ता-पाजामा खरीदा और तब बाहर आया।"

अब अपनी बारी थी...हमारी श्रीमती के साथ भी कुछ दिक्कतें हैं... मैं जब अपने कपड़े खरीदता हूँ तो वह अपनी चलाती हैं... क्योंकि उनकी राय में इंसान कपड़े तो दूसरों के लिये ही पहनता है... और जब पूरी इमानदारी से कपड़े खरीदते हुऐ मैं कहता हूँ कि फलानी साड़ी या वह सूट तुम पर बहुत फबेगा... तो गर्दन के एक झटके में मेरी इस पसंद को खारिज कर देती हैं वो...यह भी सत्य है कि अधिकतर वह वही कपड़े पहनती हैं जो मैं उन्हे विशेष अवसरों में 'गिफ्ट' देता हूँ... और मैं ये गिफ्ट कभी उनको साथ ले जाकर नहीं खरीदता!

एक और बात जिससे मुझे बड़ी कोफ्त होती है जब वे दुकानदार से कहती हैं... कि, मुझे कुछ ऐसी साड़ी दिखाइये जिसका रंग तो साड़ी ABC सा हो, कपड़ा साड़ी BCD सा, कढ़ाई साड़ी CDE के जैसी, बार्डर साड़ी DEF सा और पल्लू हो साड़ी EFG के जैसा... आप बताओ क्या यह संभव है ?

आखिर ऐसा अजीबोगरीब बर्ताव क्यों करती हैं महिलायें ?

मैं तो आज तक समझ नहीं पाया. . . . . . :(

चलता हूँ अब...
मनाईये कि वो इसे न पढ़े...
नहीं तो अपना खाना-पानी बंद हो जायेगा कई दिनों तक...... ;)





आभार!


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6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण भाई, बड़ा गूढ़ सवाल पूछ लिया आज तो…

    इस का जवाब तो प्राचीन काल से ॠषि-मुनि, राजे-महाराजे भी ढूंढ रहे थे, और आज हम लोग भी ढूंढ ही रहे हैं… :)

    गनीमत ये है कि महिलाएं कम से कम एक पुरुष को पसन्द करके उसी को जीवन भर सुधारने के काम में लग जाती हैं… वरना शादी की अगली रात ही "माल वापस" करने लगें तो दुनिया का क्या हो… :)

    एक बात और है कि पति रुपी पुरुष को जीवन भर ताने-उलाहने देकर सुधारने के बाद मेहनत बेकार न जाये इसलिये अगले जन्म में भी उसी को माँग लेती हैं, ताकि अगले जन्म में पिछले जन्म की मेहनत का मीठा फ़ल खा सकें… :) :) :)

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  2. मैं कई बार अपनी बेटी से कहती हूं कि तुमने शादी का निर्णय तो एक झटके में ही ले लिया जिसे सारा जीवन साथ रहना है और कपड़े खरीदते समय इतनी नुक्‍ताचीनी? यह समस्‍या नवीन पीढी में बढती ही जा रही है बस आप लोगों के लिए दुआ ही मांग सकते हैं। हा हा हाहा

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  3. भईय़ा, बडे बडे कतरा के निकल जायेंगे। अप्रैल की गर्मी में दिल्ली के चांदनी चौक में अपनी मौसेरी बहन के साथ उसकी शादी की खरीददारी आज तक याद है :)

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  4. औरत खुद अपना निर्णय नहीं लेती ...बस कुछ होने का इंतजार करती हैं...इस होने में ही उनकी बुद्धि चकरा जाती है ।

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  5. भाई साब, ये किसी इक्के दुक्के की परेशानी नहीं है ... पूरा मर्द जात इस परेशानी से जूझ रहा है ...
    शादी के फैसले इस तरह नहीं लेते हैं क्यूंकि हमारे देश की औरतों के पास बहुत ज्यादा चाइस नहीं होता है ...
    विदेश में देखिये वहां मर्दों की भी वही हालत है जो हमारे यहाँ कपड़ों की है ...

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