मंगलवार, 6 जुलाई 2010

'उस' का गुनहगार तो जब बनूंगा तब देखी जायेगी पर अपने बच्चों का गुनहगार नहीं बन सकता मैं अभी से !


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मेरे 'बेगुनाह' मित्रों,

'ताज आटो सर्विस', जी हाँ यही नाम है उस दुकान का जहाँ मैं अपनी नई-नई नौकरी की कमाई से १९९५ में खरीदी YAMAHA RXZ मोटर साइकिल को ले जाता हूँ हर दूसरे महीने सर्विसिंग करवाने के लिये...मेरी यह बाईक ३ लाख कि०मी० चल चुकी है अब तक...अब तो शायद ही कभी इसे चलाता हूँ पर इस पुरानी साथिन को 'टिच्च' रखने का शौक है मुझे...श्रीमती मेरी इस बाईक के प्रति भावना को नहीं समझ पाती और अक्सर मजाक भी उड़ातीं है मेरा...

हाँ तो 'ताज आटो सर्विस' के प्रोप्राइटर हैं नफीस'मुल्ला जी'... वह खुद और उनके चचेरे चार भाई मिलकर चलाते हैं दुकान को... नफीस ३१-३२ साल का होगा...हमेशा मजहब और ईमान की बातें करता है, सर पर हमेशा क्रोशिये की गोल टोपी और शरीर पर ढीला पठानी सलवार कमीज, यही पहनावा है उसका... इसीलिये आदर से 'मुल्ला जी'कहा जाता है उसे... दुकान में बाकी चार भाई हैं फैजल, आमिर, जाहिद और मेहबूब... न जाने क्या है, कुछ ऐसा है कि मुझे अच्छा लगता है कि हर दो महीने में किसी छुट्टी के दिन मैं खुद ही जाऊं उस दुकान पर...अपनी बाईक बनवाने...ड्राइवर अक्सर कहता है "आप क्यों जाते हैं, मैं बनवा लाऊंगा"... पर मेरा मन नहीं मानता...मुझे अच्छा लगता है नफीस, फैजल, आमिर, जाहिद और मेहबूब की दुकान पर जाना और उनके साथ बैठना...

यह म्यचुअल एडमिरेशन जैसी ही बात है क्योंकि मेरे दुकान पर पहुंचते ही पाँचों भाईयों के चेहरे खिल उठते हैं... मेरे लिये साफ सी कुर्सी का इंतजाम होता है दुकान के इकलौते पंखे के ठीक नीचे और पड़ोस की दुकान से तुरंत मौसम अनुसार गन्ने का रस या चाय लाई जाती है...फैजल मेरा फेवरेट है क्योंकि वह अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी है और मैं खेलों का शौकीन...दुकान में मेरे बैठे रहने के दौरान मेरे छोटे भाईयों के समान वह पाँचों भाई जरा सी भी फुर्सत पाने पर देश-दुनिया की उन तमाम चीजों या खबरों, जिन्हें वह समझ नहीं पाते या उनके बारे में और जानना चाहते हैं, के बारे में मुझ से सवालात करते हैं और अपनी हैसियत भर मैं उन्हें बताता-समझाता भी हूँ।

जैसा मैंने पहले ही बताया नफीस बहुत धार्मिक है...पाँचों वक्त नमाज पढ़ना... मजहब के हर नियम का पालन करना... और हर वक्त ऊपर वाले का ध्यान करना... ईश्वर के प्रति उसकी आस्था को देख कभी-कभी रश्क सा होता है मुझे उस से...'ईमान' का भी वह एकदम पाक-साफ है... यह मैंने कई बार देखा है...दुकान में ही स्पेयर पार्ट्स रखे हैं...जब सप्लाई आती है तो अपना वाजिब मुनाफा जोड़कर नफीस हर आईटम पर रेट लिखता है...उस रेट से दुकान में कोई एक पैसा भी ग्राहक से ज्यादा ले ले यह उसे मंजूर नहीं...एक बार की बात है नफीस किसी काम से थोड़ी देर को बाहर गया और इसी दौरान सबसे छोटे महबूब ने मोटरसाइकिल के पीछे लगने वाली एक डिक्की ग्राहक को ४९५ रू० में बेच दी...नफीस जब आया तो ग्राहक जा रहा था...नफीस को पता चलने पर उसने ग्राहक को पीछे से बुला कर ९० रू० वापिस कर दिये क्योंकि उसके हिसाब से यही वाजिब रेट था...

शादी नहीं हुई है अभी नफीस की...कब करोगे पूछने पर शरमाते हुऐ वह बताता है कि आखिरी बहन की शादी चंद महीने पहले ही निपटाई है...अब घर में पहले एक और कमरा बनवायेगा...फिर ही शादी की बात सोची जायेगी...

बगल में ही शॉकर रिपेयर की दुकान है अनवार की...मस्तमौला यह लड़का भी मेरे दुकान में जाने पर किसी न किसी बहाने अक्सर आकर मेरे पास बैठ जाता है...अनपढ़ है पर देश और दुनिया की राजनीति पर नजर रखता है और अपने निकाले गये निष्कर्षों को अक्सर वह मुझसे पूछ कर परखता है।

इस बार थोड़ा गड़बड़ सा हो गया...

हुआ यह कि मेरे दुकान में जाने के थोड़ी देर बाद अनवार भी अपने नियम अनुसार आया दुकान पर...इतने में आमिर बोल पड़ा..." अनवार भाई क्या बात तीन दिन दुकान नहीं खोली ?"... "अरे यार मुनीर की अम्मी की दूरबीन से नसबंदी करा लाया मैं, एक एक कर के पाँच बच्चे हो गये बड़ी जल्दी ही, अब थोड़ा आराम हो जायेगा।", बोला अनवार...

अब तक नफीस एक इंजन बाँधने में लगा था... काम करते-करते सर झुकाये हुऐ ही हल्के से वह बोला..." अनवार भाई यह क्या किया ? आप तो उस के गुनहगार हो गये!"

इतना सुनना था कि गुस्से से उफन पड़ा अनवार... " मुल्ला जी, चुप भी रहा करो कभी, अभी शादी तो हुई नहीं है...अरे जब शादी हो गई होती और मेरी तरह पाँच-पाँच बच्चे हो जाते...और बाजार में कोई बच्चा किसी चीज के लिये मचलता...और चीज दिलाने के पैसे न होते जेब में...स्कूल की फीस भरनी भारी पड़ जाती... या ईद के दिन भी सबको नये कपड़े न दिला पाता... तो क्या 'अपने बच्चों का गुनहगार' नहीं बनता... अरे 'उस' का गुनहगार तो जब बनूंगा तब देखी जायेगी पर 'अपने बच्चों का गुनहगार' नहीं बन सकता मैं अभी से!"

एकदम से माहौल थोड़ा भारी सा हो गया...नफीस और अनवार दोनों ने मेरी ओर देखा...दोनों चाहते थे कि मैं कुछ कहूँ...

पर मुझसे कुछ भी कहा नहीं गया वहाँ पर...क्या कहता मैं?

आप बताइये अगर आप मेरी जगह होते तो क्या कहते?







आभार!





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9 टिप्‍पणियां:

  1. यही कि अनवार भाई सही कह रहे हैं।
    बहुत अच्छा लिखा है। नफ़ीस की अन्य विषेताएँ में से काफी बहुत पसन्द की जा सकती हैं किन्तु यहाँ सहमत नहीं हुआ जा सकता।
    घुघूती बासूती

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  2. आपके लेखन की सादगी बहुत भायी है...
    और आपके प्रश्न का जवाब...मेरा भी यही है ..अनवार ने बिलकुल सही कदम उठाया ...
    'उसे' तो जवाब तब देना होगा जब क़यामत का दिन आएगा..और वो जाने कब आएगा..अब तक तो नहीं आया..अनवार की बारी बहुत बाद में आनी है..
    लेकिन बच्चों को जवाब तो आज ही देना है...साथ ही उनके भविष्य से खेलने का अधिकार किसी को नहीं है...माँ-बाप को भी नहीं...
    आपका संस्मरण बहुत पसंद आया...
    धन्यवाद...

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  3. क्या हो गया प्रवीण भाई ! ! यह कमेंट्स कहाँ गायब हो जाते हैं ! आपकी साईट पर भी ,मेरी तरह ,सुबह ६ बजे के बाद, एक भी कमेन्ट न पाकर दिल कुछ हल्का हुआ ;-)
    आखिर हूँ तो ब्लागर ही

    ( मेरे ब्लाग पर पिछले कई घंटे से आये सारे कमेन्ट गूगल खा गया ).

    एक शेर नज़र है

    दिल खुश हुआ मस्जिद ए वीरान देख कर
    मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है !

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  4. प्रश्न में ही आपका उत्तर छिपा है ।

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  5. अनवार भाई ने बिलकुल ठीक कहा ,अगर मैं वहाँ पर आपकी जगहं होता तो अनवार भाई को शाबाशी देता उनके इस समझदारी वाले कदम के लिए

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  6. लेकिन मैं परिवार नियोजन के परमानेंट रोक के उपाय (जैसे कि नसबंदी इत्यादि) को उचित नहीं मानता हूँ. कंडोम अथवा 3-4 वर्ष के अंतराल के लिए किए गए उपाय ही अधिक बेहतर हैं.

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  7. बहुत भाई यह पोस्ट -यह तो व्यर्थ ही है अब कि मैं कहता तब ?

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