गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हिन्दू या मुसलमान होने से पहले 'इंसान' होने का लाभ (Benefits of Becoming a Good Human Being First)


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मेरे 'इंसान' मित्रों,

'इंसान' होने का लाभ (Benefits of Becoming a Good Human Being First)

आज मैं आपको 'इंसान' होने के फायदे बताऊंगा...

धर्म-धार्मिकता-मजहब से परे अगर कोई महज एक अदना सा 'इंसान' है तो उसे क्या क्या फायदे है या कोई अगर धर्म की मानसिक गुलामी से निजात पा महज 'इंसान' बन जाता है तो उसके उसे क्या क्या फायदे होंगे ?... जहाँ तक इस क़ायनात (सृष्टि) का संबंध है, आप बहुत सी निशानियों और सुबूतों के ज़रिये आसानी से पहचान सकते हैं,कि उसका या आपका 'मालिक' कोई नहीं है आपको किसी के सामने सर झुकाने की जरूरत नहीं... आप इस दुनिया में क्यूँ आये ?... आपका इस दुनिया में पैदा होने का मकसद क्या है?... सबसे बड़ी बात है कि आप के पास जवाब होंगे उन सब शब्दों के जिन्हें क्यूँ, कैसे, कब, कहाँ, क्या और दीगर दार्शनिक और तत्वज्ञान सम्बन्धी लंबे चौड़े सवालों के...बशर्ते आप अपने कान, आंखें और दिमाग खुले रखें...प्रश्न करें, तर्क करें और इन सवालों के जवाब उपलब्ध जानकारी के तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण से खोजें...


***सबसे पहला फ़ायदा तो यह है कि आपकी वफ़ादारी, ईमानदारी, सच्चाई, आज्ञापालन, आज्ञापरता केवल आपके फर्ज-कर्तव्य के लिए ही होंगी. आप इस दुनिया में अपनी उक्त विशेषताओं से पहचाने जायेंगे. आपका संघर्ष चाहे वो आपके बॉस से हो, आपकी नौकरी या पेशे से हो, आपके निज़ाम (गवर्नमेंट) से हो, आपके सामाजिक तंत्र से हो, सब के सब आप के उस फर्ज से सम्बद्ध होगा, आप बेशक (undoubtedly) अपने आप पर विश्वास करेंगे.. आप किसी 'अनदेखे-अनजाने' का अनुसरण करने के बजाये समाज के नियमों व अपने दायित्वों का अनुसरण करेंगे...


***दूसरा फ़ायदा यह होगा कि आप अपने आप में, अपने परिवार में, इस दुनिया के लोगों में, वातावरण में, और इस दुनिया में शांति का, अनुरूपता का, अक्षोभ और खुशियों और आनंद का संचार करेंगे...आप व्यर्थ की बहसों व दूसरे के धर्म में से कूड़ा-करकट बटोरने की मजहबी आदत से दूर रहेंगे!


***तीसरा फ़ायदा यह होगा कि आपके शरीर पर, मष्तिष्क पर, तंत्रिका तंत्र पर कोई फालतू का जोर और टेंशन नहीं रहती है क्यूंकि आप के ऊपर कोई मजबूरी नहीं होगी दिन में एक, दो या पांच-सात बार पूजा-उपासना या दुआ करने की... जब आप इंसान के अलावा किसी और ताकत के वजूद को नकारते हैं इस प्रक्रिया में आप अपनी सारी टेंशन और अपने मस्तिष्क के अतिरिक्त बिना मतलब के भार को ज़मींदोज़ (ख़त्म) कर देते हैं. आप अपनी तमाम चिंताओं के हल पाते हैं और चिंतामुक्त होते हैं. यहीं नहीं आप के तमाम मनोरोग भी दूर हो जाते हैं. जिस तरह से अगर आप कहीं जा रहे हों रास्ते में अगर आपको जगह-जगह पर नहरें मिले और आप उसमें हर बार नहा लें तो किन्हीं दो नहरों के बीच आपके शरीर पर जितनी भी धुल या गन्दगी जमेगी/हो जायेगी वह धुलती जायेगी. ठीक उसी तरह से आप अगर यह मानेंगे कि यह आपकी ही दुनिया है और आप ही इसे बना-बिगाड़ सकते हैं, किसी 'ऊपर वाले' का कोई दखल नहीं इसमें... तो हर बार ऐसा सोचने पर अज्ञान व कुतर्क रूपी मैल आपके जेहन से धुल जायेगा।


***चौथा फ़ायदा यह होगा कि आपका व्यक्तित्व आकर्षक (कांतिमय) बन जायेगा... आप अनुकूल और मित्रवत रहेंगे. आप ग़लत काम से परहेज़ करेंगे... आप शराब यदि पीयेंगे तो आनंद के लिये, फ्रस्ट्रेशन में नहीं... घूस नहीं लेंगे, देशविरोधी हरक़त नहीं करेंगे... व्यभिचार नहीं करेंगे... मिथ्या स्वधर्माभिमान आपके पास तक नहीं फटकेगा... अपने वचन और कर्मों से आप समाज में भाईचारे को बढ़ायेंगे, वैमनस्य को नहीं...आप एक खास किस्म का हुलिया रखने या कपड़े पहनने के दबाव से दूर रहेंगे... अपने व्यक्तित्व को सूट करते वस्त्र पहन पायेंगे... महिलाओं को ढक कर रखने का आग्रह नहीं करेंगे...आखिर उन्हें भी पसंद के कपड़े पहनने, सांस लेने व खुली हवा में रहने का हक है...


***पांचवां फ़ायेदा यह है कि साल भर 'अपने होने-बनने-बिगड़ने' के लिये 'खुद' को ही जिम्मेदार मानने के उपरांत आप अपने पर आत्म-नियंत्रण, आत्मानुशासन, आत्म-शिक्षा, आत्म-अनुपालन के गुर सीख लेते हैं ... आप बेशक अपनी सेहत, व्यक्तित्व, चरित्र और स्वभाव को सुधार लेते हैं...आप किसी ऊपर वाले को खुश रखने के लिये एक-तीन-सात-नौ दिन या एक माह भूख से नहीं जूझते... और भूखा रहने की इस अप्राकृतिक क्रिया के दुष्परिणामों से बच जाते हैं।


***छठवां फ़ायदा यह है कि हवस (lust), स्वार्थपरायणता (selfishness), इच्छाओं (desires), लालच (greed), अंहकार (ego), दम्भ (conceitedness) आदि दुर्गुणों से आप दूर रहते है और इन दुर्गुणों पर नियंत्रण रख पाते हैं... आप एक 'उच्छ्रंखल समूह मानसिकता' का कतई शिकार नहीं होते... आपको कतई यह गुमान नहीं रहेगा कि आपके उपरोक्त गलत काम करने पर भी लोग आपका महज इसलिये साथ देंगे क्योंकि आपकी और उन लोगों की उपासना पद्धति एक सी है...आप अपना अतिरिक्त धन मानव जाति को उन्नत करने के काम में लगायेंगे... न कि किसी 'ऊपरवाले मालिक' के कामों में...


***सातवां फ़ायेदा है कि आप आर्थिक, जैविक, मानसिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, राजनैतिक आदि क्षेत्र के सभी प्रकार के exploitations रोकने में सक्षम होते हैं... आप लोगों की आज़ादी के समर्थक होंगे, उन्हें बोलने की आज़ादी के, अपने लिये फैसले आप लेने की आज़ादी के, समतुल्य संबंधों के पक्षधर होंगे, निरपेक्षता (चाहे वो धार्मिक ही क्यूँ न हो) के पक्षधर होंगे... आप नेता होंगे और लोगों में शांति, अक्षोभ (प्रशांति) और खुशियों का नेतृत्व करेंगे...


***आठवां फ़ायेदा यह कि इंसान बनने के उपरांत आप 'धर्म आधारित झुंडों' की बुराईयों से दूर रहेंगे और अच्छाईयों पर अमल करेंगे. आप 'इंसान' बनने के बाद समाज की बुराईयों को बढ़ने से रोकने में मदद करेंगे. जैसे- कर्त्तव्यच्युति, अपचार, पापचरित्र, बाल-अपराध, घरेलु हिंसा, कौटुम्बिक व्यभिचार (सगे-संबंधी के साथ यौन सम्पर्क),महिलाओं का दमन, स्वच्छन्द संभोग, विवाहपूर्व यौन-सम्बन्ध, विवाहेत्तर संबंधों आदि समस्त दोषों से दूर रहेंगे...


***नौवां फ़ायेदा यह है कि आप समाज में उन बिमारियों की दर कम कर सकेंगे जो ला-इलाज हैं मसलन- AIDS आदि... आप अपने परिवार के आकार का निर्धारण अपनी हैसियत के आधार पर करेंगे...क्योंकि आप हर मानव को सम्मान देंगे...इसलिये आप यह भी समझेंगे कि अपनी अगली नस्ल के लिये आधारभूत सुविधाओं को जुटाये बिना 'उस' के बताये अनुसार परिवार को बढ़ाते रहने से हमारी दुनिया में अपराध बढ़ेंगे और असमानता भी...और यही इन बीमारियों के फैलने का कारण भी है।


*** दसवां फ़ायेदा यह होगा कि आपको अपनी छतरी तभी खोलनी पड़ेगी, जब आपके शहर में बारिश हो रही हो... अयोध्या-बनारस या ईरान-अरेबिया में बारिश होने पर अपने शहर में छतरी खोलने की कोई जरूरत नहीं रहेगी आपको...न ही आपको छत पर चढ़ दिन रात चिल्लाना होगा बाकियों को अपनी छतरी के नीचे आने को कहने के लिये ही...


***ग्यारहवां फ़ायेदा यह होगा कि जब आपकी मृत्यु होगी, आप शांति से मृत्यु को प्राप्त होंगे,आपको पता होगा कि 'इंसान' के रूप में एक उपयोगी जीवन आपने जिया...अपनी मानव जाति को आगे बढ़ाने में योगदान किया... अज्ञान और अतार्किकता से आप दूर रहे... आपने जो कुछ किया अपनी जिम्मेदारी पर किया... 'किसी' के रहमोकरम के मोहताज नहीं रहे... न ही 'किसी' से आपने कुछ मांगा... आपको अपनी 'अमरता' का कोई अभिमान नहीं होगा... इस लोक से आगे 'परलोक' और वहाँ पर आत्माओं का वास और उन आत्माओं को सजा या इनाम देने वाला कोई सर्वशक्तिमान भी, इस बेतुकी अवधारणा पर हंसते-हंसते आप मृत्यु को भी जीवन की एक स्वाभाविक परिणति मानेंगे।


कई लाभ या फ़ाएदे और अन्य लाभ मैं यहाँ अंकित नहीं कर सका, वो आप दुनिया भर की दौलत देकर या किसी 'अजन्मे-अनदेखे-अनजाने मालिक' की ताजिंदगी उपासना कर भी नहीं पा सकते...केवल इंसान बन कर रहने पर ही मिलेंगे वो आपको...


तो क्या आप राज़ी है अपने महज 'इंसान' होने और आज ही से महज 'इंसान' बनकर रहने को स्वीकार करने के लिए....???




कल कभी नहीं आएगा...



आज ही 'इंसान' बनो!






(भाई सलीम खान को आभार सहित जिनकी पोस्ट मुसलमान होने का लाभ (Benefits of Becoming a Muslim)... को पढ़ मुझे भी यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा व साहस मिला!)







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41 टिप्‍पणियां:

  1. कहां सपने में हैं आप। रामराज्य था बरसो पहले। अब रामराज्य के नाम पर सिर्फ मुर्ख बनते हैं हम। इंसान बनने का रिवाज खत्म हो गया है। हिंदु बनेंगे पैदा होने का बाद भी। मुसलमान बनाएंगे लोगो को अगर पैदाइश नहीं हैं तो। पर इंसान न बाबा न। ऐसा किया तो दुकान कैसे चलेगी। भूखे का निवाला छीनेगे, पड़ोसी मरे तो मरे, पर इंसानियत को तो उम्रकैद से छुटकारा नहीं दिलाएंगे। कहां आप भी सुबह सुबह या रात रात को ही सही...या जब मर्जी सपने देखते हैं

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  2. ये टिप्पणी सिर्फ आपके पोस्ट के लिए है। बाकी किसी पोस्ट को न पढ़ा है न ही पढ़ना है प्रवीण जी। आपको लगता नहीं कि राष्ट् के लिए इंसान बनाने वाली मुहिम में ही हम आप लगे रहें। व्यक्तिगत चीजों को दूसरों पल लादने की कोशिश न करें। भाई को भाई से बांटने में, दिल को दिल से तोड़ने में लगे लोगो पर अपनी ऊर्जा न खर्च करें।

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  3. फायदे ही फायदे ..कोई तो चुन लो !

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    @ boletobindas जी,

    आपकी बात काफी हद तक सही है...परंतु भाई को भाई से बांटने में, दिल को दिल से तोड़ने में लगे जाहिल 'धार्मिक'(???) नरपशुओं को हाशिये पर कैसे डाला जाये ?... कोई रास्ता तो सुझाइये...


    आभार!


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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    धन्यवाद देव!
    आपकी मौजूदगी व समर्थन आश्वस्त करता है मुझे।

    आभार!


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  6. हहा...जबरदस्त ! आपके प्रेरणा स्रोत आलेख को पढ़ा नहीं , पर विजुआलाइज कर पा रहा हूं :)

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  7. आज ही 'इंसान' बनो!
    बहुत ही सार्थक विचार व सराहनीय प्रयास ,सफलता की चिंता किये बिना अच्छा कार्य और अच्छे सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास हर किसी को करते रहना चाहिए इससे ही इंसानियत जिन्दा होगी | आज आप जैसे लेखनी और सोच की बहुत आवश्यकता है ...

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  8. सोच रहा हूं, उनके लाभ, आपके लाभ ।
    गुणधारी और गुणग्राहकता रूपी लाभ।
    शुभ चरित्र बन जायेगा।
    पर यह सब गुण है,और लाभकारी भी है इसकी प्रेरणा कहां से मिलेगी?
    स्वार्थी मन अधिकार चाहता है,कर्तव्य क्या होते है?

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  9. प्रवीण जी, आपने जो फायदे गिने उनमे से कुछ तो वाकई बहुत अच्छे हैं, लेकिन आप अपने ही प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए की हिन्दू-मुसलमान (अर्थात आस्तिक) क्यों ना बने? क्योंकि आप जो भी धार्मिकों की पहचान बताते हैं, वह असल में धार्मिकों की नहीं बल्कि धर्म का व्यापार करने वाले लोगो की पहचान हैं. ऐसे लोग धर्म को अपने निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. दर-असल एक सही इंसान बन जाना ही ईश्वर की सच्ची अराधना है. अपनी अच्छाइयों का दिखावा करने वाले लोग कभी भी धार्मिक नहीं होते हैं, और ऐसे कर्म ईश्वर कभी क़ुबूल भी नहीं करता है.

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  10. इनसान बनो ?

    वो तो पैदाइशी है मुद्दा है नेक इंसान बनो,

    अब ये नेक (अछाई) और बद (बुराई) क्या है ये कौन तय करेगा ?

    कोई कहता है की मै शादी से पहेले संबंध बना लू तो किसी क्या मतलब, मेरी जिंदगी है, दूसरा इसे अवेध संबंध, वयभिचार कहता है,

    अब लडो बैठ कर कौन सही है और कौन ग़लत,

    दुनिया मे लाखो पुस्तकालय है और उनमे एक पुस्तकालय मे लाखो किताबे होंगी और करोड़ो लोग पुस्तको के ज़रिए ज्ञानि बनने का दावा भी करते है

    लेकिन ये सारे ज्ञानि एक बात तय नही कर पाए की मर्द कितने कपड़े पहने तो नगन्ता और अश्लीलता मे नही आता और औरत कितने कपड़े पहेने या जिस्म का कितना हिस्सा छुपाए और दिखाए तो वो अश्लीलता और नगन्ता मे नही आता है

    अब ये तो सिर्फ़ एक नियम की बात है और मनुष्ये से कितने नियम और बाते जुड़ी है

    अगर समझते हो की इन किताबो को पड़कर महा ज्ञानि हो गये हो

    तो

    करो बैठ कर तय, बनाओ नियम ऐसे जो सब पर लागू हो जाए

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  11. इनसान बनो ?

    वो तो पैदाइशी है मुद्दा है नेक इंसान बनो,

    अब ये नेक (अछाई) और बद (बुराई) क्या है ये कौन तय करेगा ?

    कोई कहता है की मै शादी से पहेले संबंध बना लू तो किसी क्या मतलब, मेरी जिंदगी है, दूसरा इसे अवेध संबंध, वयभिचार कहता है,

    अब लडो बैठ कर कौन सही है और कौन ग़लत,

    दुनिया मे लाखो पुस्तकालय है और उनमे एक पुस्तकालय मे लाखो किताबे होंगी और करोड़ो लोग पुस्तको के ज़रिए ज्ञानि बनने का दावा भी करते है

    लेकिन ये सारे ज्ञानि एक बात तय नही कर पाए की मर्द कितने कपड़े पहने तो नगन्ता और अश्लीलता मे नही आता और औरत कितने कपड़े पहेने या जिस्म का कितना हिस्सा छुपाए और दिखाए तो वो अश्लीलता और नगन्ता मे नही आता है

    अब ये तो सिर्फ़ एक नियम की बात है और मनुष्ये से कितने नियम और बाते जुड़ी है

    अगर समझते हो की इन किताबो को पड़कर महा ज्ञानि हो गये हो

    तो

    करो बैठ कर तय, बनाओ नियम ऐसे जो सब पर लागू हो जाए

    करो बैठ कर तय, बनाओ नियम ऐसे जो सब पर लागू हो जाए

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  13. एक मुसलमान तब तक एक अच्छा मुसलमान नहीं हो सकता, जब तक कि वह एक अच्छा इंसान नहीं होता.

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  14. हा हा हा हा हा, प्रवीण भाई… क्या कहर करते हो यार…

    लगता है आप कई लोगों को बेरोज़गार करके मानोगे…।

    भाई, यदि "मेरा धर्म बड़ा…", "मेरा पैगम्बर महान…", "मेरी पुस्तक सर्वश्रेष्ठ…", "मेरी छतरी के नीचे आजा…", जैसे राग नहीं अलापे, तो फ़िर लिखेंगे क्या? और उन्हें क्या जवाब देंगे जिनसे पैसा मिला है? यानी फ़ुल्टू बेरोजगार… :) :)

    आपके इस "अतिवादी" लेख की, Anonymous बनकर भर्त्सना करता हूं… :) :) :)

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  15. कुछ भी होने से पहले एक अच्छा इंसान ही होना चाहिए ...
    अच्छी पोस्ट ...!

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  16. No Burqa, No teaching
    In a shocking development a teacher who denied to wear a burqa in a West Bengal Muslim university, has been barred from teaching.

    For the past three months, 24-year-old Sirin Middya has not been able to hold her classes at West Bengal's first Muslim university. While the guidelines at Aliah University in Kolkata don't stipulate the same, the students' union has demanded that Middya can teach but only in burqa.

    Middya was appointed a guest lecturer at the university in March this year and got the union "diktat" in the second week of April. "I was told that I would not be allowed to attend college if I did not agree to come in a burqa. The University Grants Commission does not prescribe any such dress code and even the university does not have a dress code. But the most unfortunate part is that students are forcing us to wear burqa," Middya told The Indian Express.

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  22. ऊपर जो खबर मैंने अंगरेजी में लगाईं है उसे हलके में मत लीजिये . इस देश के कानूनों और संविधान की बहिया उधेड़ने की एक सोची समझी चाल है यह ताकि आगे चलकर शरियत का डंका बजा सके ये देश दोर्ही

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  23. ऊपर जो खबर मैंने अंगरेजी में लगाईं है उसे हलके में मत लीजिये . इस देश के कानूनों और संविधान की बहिया उधेड़ने की एक सोची समझी चाल है यह ताकि आगे चलकर शरियत का डंका बजा सके ये देश दोर्ही

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  24. ऊपर जो खबर मैंने अंगरेजी में लगाईं है उसे हलके में मत लीजिये . इस देश के कानूनों और संविधान की बहिया उधेड़ने की एक सोची समझी चाल है यह ताकि आगे चलकर शरियत का डंका बजा सके ये देश दोर्ही

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  25. ऊपर जो खबर मैंने अंगरेजी में लगाईं है उसे हलके में मत लीजिये . इस देश के कानूनों और संविधान की बहिया उधेड़ने की एक सोची समझी चाल है यह ताकि आगे चलकर शरियत का डंका बजा सके ये देश दोर्ही

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  26. ऊपर जो खबर मैंने अंगरेजी में लगाईं है उसे हलके में मत लीजिये . इस देश के कानूनों और संविधान की बहिया उधेड़ने की एक सोची समझी चाल है यह ताकि आगे चलकर शरियत का डंका बजा सके ये देश दोर्ही

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  28. ***ग्यारहवां फ़ायेदा यह होगा कि जब आपकी मृत्यु होगी, आप शांति से मृत्यु को प्राप्त होंगे,आपको पता होगा कि 'इंसान' के रूप में एक उपयोगी जीवन आपने जिया...अपनी मानव जाति को आगे बढ़ाने में योगदान किया... अज्ञान और अतार्किकता से आप दूर रहे... आपने जो कुछ किया अपनी जिम्मेदारी पर किया... 'किसी' के रहमोकरम के मोहताज नहीं रहे... न ही 'किसी' से आपने कुछ मांगा... आपको अपनी 'अमरता' का कोई अभिमान नहीं होगा... "

    आदरणीय शाह जी बहुत दिनों बाद आ रहा हूँ आपके ब्लॉग पर जिसके लिए क्षमा चाहता हूँ ! आपने बहुत पते की है, इंसान अपने गुणों को पहचान ले तो धर्म की आड़ लेने की जरुरत ही क्या है ?

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  29. बिलकुल ठीक बात है, हम सबको हिंदू या मुसलमान बनने की बजाये एक अच्छा इंसान बनना चाहिए

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  30. The above news was also published in some news papers last month ;
    Aliah University is the erstwhile Aliah Madrassa of Haji Mohammad
    Mohsin Sqare of Kolkata. It came to news when Trinamool congress
    Student Union AGS Hasanujjaman threatened the Bengali Lecturer Smt
    Shirin Midya to wear "Burqa" which she denied. Smt Midya went to Vice
    Chancellor Samsul Alam, Registrar Dr . Anwar Hossain & they took no
    action. Rather they advised Midya not to go to the University. She
    then went to Minister of Minority affairs of West Bengal Government,
    Abdus Sattar, who transferred her to the Library at the Salt Lake
    City Campus.

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  31. दूस्रों को ग्यान का बाते पढ़ाने वाले ये लोग इस बात का क्या जबाब देगे कि धर्म के नाम पर ये लोग एक महिला के अधिकारों को दबा रहे है .

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  32. कैरानवी मियां अनोनिमस बन कर क्यों खुद भड़काने वाले कमेन्ट कर रहे हो? कभी अनोनिमस कभी संदीप कभी अवधिया चाचा कव्ही सत्य गौतम......

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  33. अच्छा इन्सान बनेंगे तो अच्छा हिंदू या अच्छा मुसलमान अपने आप बन जायेंगे । इस पोस्ट को पढ कर बडा पुराना एक गीत याद आ रहा है ।
    तू हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा
    इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा ।

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  34. एक तरफ दलित मासूम बच्चों को 40-40 रूपये में पेट की खातिर बाजार में बेच देते हैं वहीं इन हिन्दुओं के अपने मसाजघर, मनोरंजन थियेटर, नाचघर, जुआघर और मयखाने हैं जहां जीवित मांस का व्यापार होता है।

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  35. पर इस दुनिया में इन्सान बनना ही कौन चाहता है जब कोई चाहेगा तब तो उसे ये फायदे नजर आएगा और फायदा तो उन्हें हिन्दू मुसलमान सिक्ख ईसाई बनने में ज्यादा है वो उसी का फायदा उठा रहे है | जिस दिन लोग बस अपने ही निजी फायदे के बारे में सोचना छोड़ देंगे और सबके फायदे कि बात सोचेंगे उसी दिन इन्सान बन जायेंगे |

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  36. अरे वाह !
    प्रवीण शाह गुरुदेव बन गए...कुछ समझ नहीं आया प्रभो ..मगर लिखा आपने है सो पढना तो पड़ेगा मगर तीसरी बार पढ़ने पर भी पल्ले अधिक नहीं पड़ा लगता है गूढ़ बातों को समझाने में और समय चाहिए !

    खैर प्रवीण भाई !
    आपका यह लेख जितना "मेरी समझ आया और जैसा समझा" के हिसाब से बहुत बढ़िया लेख है!
    काश इन कूप मंडूक महाविद्वानों की समझ आ जाये जो सारे संसार को समझाने के लिए, ५० फूट ऊंचे तख़्त पर चढ़ कर रोज प्रवचन कर अपने आपको विश्व गुरु स्थापित किये बैठे हैं ! जिन्होंने न इतिहास से कोई सबक लिया न वर्तमान में अपनी स्थिति जाननें की कोई इच्छा और समझ है ! मंदबुद्धि चाटुकारों से घिरे, दुनियां को अपनी तुच्छ और संकीर्ण बुद्धि से तौलते यह लोग मानव समाज के लिए कोढ़ हैं !

    पूरे समय परब्रह्म परमेश्वर की बात करते यह ढोंगी लोग, इस खूबसूरत दुनिया और आने वाली नस्ल को बर्वाद करने पर कमर कसे हैं ....ईश्वर बच्चों को इनकी छोड़ी हुई बदबू से बचाए ...

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  37. @एक मुसलमान तब तक एक अच्छा मुसलमान नहीं हो सकता, जब तक कि वह एक अच्छा इंसान नहीं होता.


    दोगला सलीम तो कहता था की "इंसान" तो "चोर" भी हो सकता है इसलिए मुस्लमान बनो. अपनी एक पोस्ट में उसने यही लिखा है.

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  38. मुसलमान होने के लाभ
    अपनी बहनों के साथ मस्ती करने की विशेष सुविधा
    चार-चार पत्नियाँ रखने की विशेष सुविधा
    कई लोंडिये (रखैले) रखने की विशेष सुविधा
    गुदा मैथुन की विशेष सुविधा
    जन्नत में १७ हूरों के साथ संभोग की विशेष सुविधा
    गुदा मैथुन की सुविधा
    कमसिन लड़कों के साथ संभोग की विशेष सुविधा
    जन्नत में "फुल अय्याशी" की विशेष सुविधा

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  39. अगर हमसे कोई ग़लती हो जाए तो उसके लिए माफ़ी मांगकर हम छोटे नहीं हो जाते। हमारा अज्ञान हमें आपस में लड़ाता है और अपने अहंकार की वजह से हम अपनी ग़लती पर डटे रहते हैं। आत्मविकास के लिए हमें आत्मसुधार करना होगा और यह सबको करना होगा। ऐसा नहीं है कि कोई क़ौम पूरी सुधरी हुई है और कोई दूसरी क़ौम पूरी की पूरी ही ख़राब है। सब इंसान हैं और सब अपनी भलाई और समाज में शांति चाहते हैं। इसके लिए हम सबको एक दूसरे को आदर देना सीखना होगा।
    यह ज़रूरत आज भी बनी हुई है कि विभिन्न धर्मों के मानने वाले एक दूसरे को अपने नज़रिए की जानकारी दें और ऐसी बातें कहने से बचें, जिससे विवाद पैदा हो और समाज में नफ़रत फैले। बिना इल्ज़ाम लगाए भी सवाल पूछा जा सकता है और बिना भड़के भी उसका जवाब दिया जा सकता है। ऐसी बातचीत से ही आपस में धार्मिक सद्भाव पैदा हो सकता है। हम सबको मिलकर इसके लिए कोशिश करनी चाहिए। इसी में हमारा और हमारी आने वाली नस्लों का भला है। हमारे देश का भला भी इसी में है।
    Please see :
    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/pope_benedict

    उत्तर देंहटाएं

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असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!