गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हिन्दू या मुसलमान होने से पहले 'इंसान' होने का लाभ (Benefits of Becoming a Good Human Being First)


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मेरे 'इंसान' मित्रों,

'इंसान' होने का लाभ (Benefits of Becoming a Good Human Being First)

आज मैं आपको 'इंसान' होने के फायदे बताऊंगा...

धर्म-धार्मिकता-मजहब से परे अगर कोई महज एक अदना सा 'इंसान' है तो उसे क्या क्या फायदे है या कोई अगर धर्म की मानसिक गुलामी से निजात पा महज 'इंसान' बन जाता है तो उसके उसे क्या क्या फायदे होंगे ?... जहाँ तक इस क़ायनात (सृष्टि) का संबंध है, आप बहुत सी निशानियों और सुबूतों के ज़रिये आसानी से पहचान सकते हैं,कि उसका या आपका 'मालिक' कोई नहीं है आपको किसी के सामने सर झुकाने की जरूरत नहीं... आप इस दुनिया में क्यूँ आये ?... आपका इस दुनिया में पैदा होने का मकसद क्या है?... सबसे बड़ी बात है कि आप के पास जवाब होंगे उन सब शब्दों के जिन्हें क्यूँ, कैसे, कब, कहाँ, क्या और दीगर दार्शनिक और तत्वज्ञान सम्बन्धी लंबे चौड़े सवालों के...बशर्ते आप अपने कान, आंखें और दिमाग खुले रखें...प्रश्न करें, तर्क करें और इन सवालों के जवाब उपलब्ध जानकारी के तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण से खोजें...


***सबसे पहला फ़ायदा तो यह है कि आपकी वफ़ादारी, ईमानदारी, सच्चाई, आज्ञापालन, आज्ञापरता केवल आपके फर्ज-कर्तव्य के लिए ही होंगी. आप इस दुनिया में अपनी उक्त विशेषताओं से पहचाने जायेंगे. आपका संघर्ष चाहे वो आपके बॉस से हो, आपकी नौकरी या पेशे से हो, आपके निज़ाम (गवर्नमेंट) से हो, आपके सामाजिक तंत्र से हो, सब के सब आप के उस फर्ज से सम्बद्ध होगा, आप बेशक (undoubtedly) अपने आप पर विश्वास करेंगे.. आप किसी 'अनदेखे-अनजाने' का अनुसरण करने के बजाये समाज के नियमों व अपने दायित्वों का अनुसरण करेंगे...


***दूसरा फ़ायदा यह होगा कि आप अपने आप में, अपने परिवार में, इस दुनिया के लोगों में, वातावरण में, और इस दुनिया में शांति का, अनुरूपता का, अक्षोभ और खुशियों और आनंद का संचार करेंगे...आप व्यर्थ की बहसों व दूसरे के धर्म में से कूड़ा-करकट बटोरने की मजहबी आदत से दूर रहेंगे!


***तीसरा फ़ायदा यह होगा कि आपके शरीर पर, मष्तिष्क पर, तंत्रिका तंत्र पर कोई फालतू का जोर और टेंशन नहीं रहती है क्यूंकि आप के ऊपर कोई मजबूरी नहीं होगी दिन में एक, दो या पांच-सात बार पूजा-उपासना या दुआ करने की... जब आप इंसान के अलावा किसी और ताकत के वजूद को नकारते हैं इस प्रक्रिया में आप अपनी सारी टेंशन और अपने मस्तिष्क के अतिरिक्त बिना मतलब के भार को ज़मींदोज़ (ख़त्म) कर देते हैं. आप अपनी तमाम चिंताओं के हल पाते हैं और चिंतामुक्त होते हैं. यहीं नहीं आप के तमाम मनोरोग भी दूर हो जाते हैं. जिस तरह से अगर आप कहीं जा रहे हों रास्ते में अगर आपको जगह-जगह पर नहरें मिले और आप उसमें हर बार नहा लें तो किन्हीं दो नहरों के बीच आपके शरीर पर जितनी भी धुल या गन्दगी जमेगी/हो जायेगी वह धुलती जायेगी. ठीक उसी तरह से आप अगर यह मानेंगे कि यह आपकी ही दुनिया है और आप ही इसे बना-बिगाड़ सकते हैं, किसी 'ऊपर वाले' का कोई दखल नहीं इसमें... तो हर बार ऐसा सोचने पर अज्ञान व कुतर्क रूपी मैल आपके जेहन से धुल जायेगा।


***चौथा फ़ायदा यह होगा कि आपका व्यक्तित्व आकर्षक (कांतिमय) बन जायेगा... आप अनुकूल और मित्रवत रहेंगे. आप ग़लत काम से परहेज़ करेंगे... आप शराब यदि पीयेंगे तो आनंद के लिये, फ्रस्ट्रेशन में नहीं... घूस नहीं लेंगे, देशविरोधी हरक़त नहीं करेंगे... व्यभिचार नहीं करेंगे... मिथ्या स्वधर्माभिमान आपके पास तक नहीं फटकेगा... अपने वचन और कर्मों से आप समाज में भाईचारे को बढ़ायेंगे, वैमनस्य को नहीं...आप एक खास किस्म का हुलिया रखने या कपड़े पहनने के दबाव से दूर रहेंगे... अपने व्यक्तित्व को सूट करते वस्त्र पहन पायेंगे... महिलाओं को ढक कर रखने का आग्रह नहीं करेंगे...आखिर उन्हें भी पसंद के कपड़े पहनने, सांस लेने व खुली हवा में रहने का हक है...


***पांचवां फ़ायेदा यह है कि साल भर 'अपने होने-बनने-बिगड़ने' के लिये 'खुद' को ही जिम्मेदार मानने के उपरांत आप अपने पर आत्म-नियंत्रण, आत्मानुशासन, आत्म-शिक्षा, आत्म-अनुपालन के गुर सीख लेते हैं ... आप बेशक अपनी सेहत, व्यक्तित्व, चरित्र और स्वभाव को सुधार लेते हैं...आप किसी ऊपर वाले को खुश रखने के लिये एक-तीन-सात-नौ दिन या एक माह भूख से नहीं जूझते... और भूखा रहने की इस अप्राकृतिक क्रिया के दुष्परिणामों से बच जाते हैं।


***छठवां फ़ायदा यह है कि हवस (lust), स्वार्थपरायणता (selfishness), इच्छाओं (desires), लालच (greed), अंहकार (ego), दम्भ (conceitedness) आदि दुर्गुणों से आप दूर रहते है और इन दुर्गुणों पर नियंत्रण रख पाते हैं... आप एक 'उच्छ्रंखल समूह मानसिकता' का कतई शिकार नहीं होते... आपको कतई यह गुमान नहीं रहेगा कि आपके उपरोक्त गलत काम करने पर भी लोग आपका महज इसलिये साथ देंगे क्योंकि आपकी और उन लोगों की उपासना पद्धति एक सी है...आप अपना अतिरिक्त धन मानव जाति को उन्नत करने के काम में लगायेंगे... न कि किसी 'ऊपरवाले मालिक' के कामों में...


***सातवां फ़ायेदा है कि आप आर्थिक, जैविक, मानसिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, राजनैतिक आदि क्षेत्र के सभी प्रकार के exploitations रोकने में सक्षम होते हैं... आप लोगों की आज़ादी के समर्थक होंगे, उन्हें बोलने की आज़ादी के, अपने लिये फैसले आप लेने की आज़ादी के, समतुल्य संबंधों के पक्षधर होंगे, निरपेक्षता (चाहे वो धार्मिक ही क्यूँ न हो) के पक्षधर होंगे... आप नेता होंगे और लोगों में शांति, अक्षोभ (प्रशांति) और खुशियों का नेतृत्व करेंगे...


***आठवां फ़ायेदा यह कि इंसान बनने के उपरांत आप 'धर्म आधारित झुंडों' की बुराईयों से दूर रहेंगे और अच्छाईयों पर अमल करेंगे. आप 'इंसान' बनने के बाद समाज की बुराईयों को बढ़ने से रोकने में मदद करेंगे. जैसे- कर्त्तव्यच्युति, अपचार, पापचरित्र, बाल-अपराध, घरेलु हिंसा, कौटुम्बिक व्यभिचार (सगे-संबंधी के साथ यौन सम्पर्क),महिलाओं का दमन, स्वच्छन्द संभोग, विवाहपूर्व यौन-सम्बन्ध, विवाहेत्तर संबंधों आदि समस्त दोषों से दूर रहेंगे...


***नौवां फ़ायेदा यह है कि आप समाज में उन बिमारियों की दर कम कर सकेंगे जो ला-इलाज हैं मसलन- AIDS आदि... आप अपने परिवार के आकार का निर्धारण अपनी हैसियत के आधार पर करेंगे...क्योंकि आप हर मानव को सम्मान देंगे...इसलिये आप यह भी समझेंगे कि अपनी अगली नस्ल के लिये आधारभूत सुविधाओं को जुटाये बिना 'उस' के बताये अनुसार परिवार को बढ़ाते रहने से हमारी दुनिया में अपराध बढ़ेंगे और असमानता भी...और यही इन बीमारियों के फैलने का कारण भी है।


*** दसवां फ़ायेदा यह होगा कि आपको अपनी छतरी तभी खोलनी पड़ेगी, जब आपके शहर में बारिश हो रही हो... अयोध्या-बनारस या ईरान-अरेबिया में बारिश होने पर अपने शहर में छतरी खोलने की कोई जरूरत नहीं रहेगी आपको...न ही आपको छत पर चढ़ दिन रात चिल्लाना होगा बाकियों को अपनी छतरी के नीचे आने को कहने के लिये ही...


***ग्यारहवां फ़ायेदा यह होगा कि जब आपकी मृत्यु होगी, आप शांति से मृत्यु को प्राप्त होंगे,आपको पता होगा कि 'इंसान' के रूप में एक उपयोगी जीवन आपने जिया...अपनी मानव जाति को आगे बढ़ाने में योगदान किया... अज्ञान और अतार्किकता से आप दूर रहे... आपने जो कुछ किया अपनी जिम्मेदारी पर किया... 'किसी' के रहमोकरम के मोहताज नहीं रहे... न ही 'किसी' से आपने कुछ मांगा... आपको अपनी 'अमरता' का कोई अभिमान नहीं होगा... इस लोक से आगे 'परलोक' और वहाँ पर आत्माओं का वास और उन आत्माओं को सजा या इनाम देने वाला कोई सर्वशक्तिमान भी, इस बेतुकी अवधारणा पर हंसते-हंसते आप मृत्यु को भी जीवन की एक स्वाभाविक परिणति मानेंगे।


कई लाभ या फ़ाएदे और अन्य लाभ मैं यहाँ अंकित नहीं कर सका, वो आप दुनिया भर की दौलत देकर या किसी 'अजन्मे-अनदेखे-अनजाने मालिक' की ताजिंदगी उपासना कर भी नहीं पा सकते...केवल इंसान बन कर रहने पर ही मिलेंगे वो आपको...


तो क्या आप राज़ी है अपने महज 'इंसान' होने और आज ही से महज 'इंसान' बनकर रहने को स्वीकार करने के लिए....???




कल कभी नहीं आएगा...



आज ही 'इंसान' बनो!






(भाई सलीम खान को आभार सहित जिनकी पोस्ट मुसलमान होने का लाभ (Benefits of Becoming a Muslim)... को पढ़ मुझे भी यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा व साहस मिला!)







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बुधवार, 21 जुलाई 2010

यह हिन्दी ब्लॉगिंग ब ब्लॉगरों के तार्किकता बोध का 'दिव्य' लिटमस टेस्ट है !!!



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मेरे 'टिप्पणीकार' मित्रों,

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पोस्ट लेखक जो कहना चाहता है, कोई पाठक-टिप्पणीकार उसी कथ्य को पोस्ट लेखक से बेहतर और सधे हुऐ तरीके से कह जाता है...

मेरी पिछली पोस्ट पर आई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी की यह टिप्पणी एक अच्छा उदाहरण है इसका...



अमरेन्द्र कहते हैं...




प्रवीण जी क्या कहा जाय !
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स्वाभिमान किसपर किया जाय ? , हममें इसके भी विवेक का लोप हो गया है .. आर्यभट्ट अच्छे थे , हमारे गौरव हैं , पर क्या हम आज आर्यभट्ट की शैली ही अपलाई करें , बांस की पोंगी से ही खगोल शास्त्र देखें , ... नया समय आया है तो नयी तकनीक भी चलेगी , इसमें प्राचीन की दुहाई क्यों ? .. देख रहा हूँ ब्लोगवुद में अल्पज्ञों के प्रलाप को .. इस 'दिव्य'-लिटमस-टेस्ट ने हिन्दी ब्लोगिंग और ब्लागरों के तार्किकता बोध को परिभाषित कर दिया है , इनकी फ्री में मिले वेव-पन्नों की ऐसी की तैसी करने की अद्भुत प्रतिभा का !, इनकी बीहड़ छाती-ठोंकू अज्ञानता का ! ... इनके मत से चला जाय तो ओझा लोगों को मेडिकल साइंस पढ़ाने को दे देना चाहिए , ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के आधार पर सीमा रक्षा करनी चाहिए .. 'अमेरिकी मंदी' का कारण भी चाणक्य के अर्थ-शास्त्र में ढूढना चाहिए , न मिले तो भी आँख मूँद कर बाबा रामदेव की शरण ले लेनी चाहिए .... धन्य है यह भारत व्याकुलता ! .......... ये पढ़े लिखे डाक्टर हैं या डाक्टर के नाम पर कलंक जो अथारिटी के साथ अज्ञानता फैलाने का ब्लागीय धंधा खोले/खोली हुए/हुई हैं ! .. कुछ तो कान पर कलम चढ़ाए 'साठे पर पाठे' बने चीख चीख कर फेचकुर फेंक रहे हैं कि देखो हम किसी की अंध-पक्ष-धर्मिता में इस हद तक भी बौद्धिक रूप से अविवेकी होने का माद्दा रखते हैं ! देखकर लगता है रसिया-वृत्ति ,नासमझी ,,,,,,,, आदि चीजें उम्र के किसी भी मुकाम पर की जा सकती हैं !.. अफ़सोस होता है !
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हम आपके साथ हैं !








कहाँ चल दिये मेरे हुजूर ?

बताइये तो सही...



आप किसके साथ हैं ?








प्रिय
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी को आभार सहित।






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पेंसिल के छिलके और दूध, चांदनी रात में रबड़ का बनना... गर्भाधान संस्कार व पुंसवन...मनचाही संतान ???



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मेरे 'संस्कारी' मित्रों,


बात मेरे बचपन की है, यही कोई दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था तब मैं... अखिलेश नाम का दोस्त था एक... एक दिन उसने बताया सब को कि, कटर (पेंसिल शार्पनर) से निकले पेंसिल के छिलकों को एकत्र कर यदि एक कटोरे में दूध में भिगा कर छत पर रख दिया जाये, किसी चांदनी रात को... और रखते समय हाथ जोड़ कर "ओअम् चंदा मामा नम:" भी जाप किया जाये तो सुबह तक कटोरे में रखा यह सब मिश्रण बेहतरीन रबड़(Eraser) में बदल जायेगा...ऐसा उसने अपनी दादी से सुना था और दादी की दादी तो इसी विधि से रबड़ बनाती भी थीं...


फिर क्या था जुट गये हम सब...रबड़ बनाने के काम में... न जाने कितना दूध खराब कर दिया...पर रबड़ बना नहीं कभी... हम सब दोस्त भी बड़े हो गये...पर फिर भी आज भी मिलने पर याद करते हैं... चांदनी रात में किये अपने उन प्रयोगों को...


आज फिर एक बार याद आ गई बचपन में किये उन प्रयोगो की... जब पढ़ा श्रेष्ठ और मनचाही [बेटा या बेटी] संतान प्राप्त करने हेतु भारतीय संस्कृति की एक बहुत बडी उपलब्धि :पुर्णत: वैज्ञानिक पद्धति से होने वाली एक महत्वपूर्ण गर्भधान प्रक्रिया ! को...


जो आधारित है इन दो संस्कारों पर


१- गर्भाधान संस्कार...


२- पुंसवन संस्कार...


तथा पढ़ा एक दो को छोड़ सभी पाठकों के इस प्रक्रिया की सत्यता, तार्किकता और वैज्ञानिकता के प्रति आश्वस्त होने व सहमति जताती टिप्पणियों को...

हो भी क्यों न आखिर लेखिका एक क्वालीफाईड Obstetrician & Gynaecologist जो हैं!


तो ख्याल आया दिल में...


आज बिटिया के स्कूल से आते ही उसके पेंसिल बॉक्स से पेंसिलों को निकाल कर शार्पनर से छिलके उतार दूध की कटोरी ले फिर से जुट ही जाना चाहिये... बचपन के उसी काम में...


शायद इस बार रबड़ बन ही जाये!


मैं इधर रबड़ बनाता हूँ और उधर आप इंतजार करो...



Nobel Laureates और दुनिया के तमाम खेलों और विधाओं के विश्व चैंपियनों की फौज के भारत भूमि पर अवतरण का...



क्या हुआ जो हमारे पास विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान, शोध सुविधायें, ट्रेनिंग सुविधायें, कोच, ट्रेनर, फैकल्टी,खेल के मैदान, संसाधन, सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त करने का आत्मविश्वास, हौसला व जुनून आदि आदि नहीं हैं....




हमारे पास गर्भाधान व पुंसवन संस्कार तो हैं न!




हा हा हा हा,






आभार!





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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

जियो जियो पाकिस्तान...कम से कम यहाँ तो झन्डा बुलंद है पिछले छह सालो से !


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मेरे 'आस्तिक' मित्रों,

बहुत कम होता है ऐसा कि किसी खबर को पढ़ कर बरबस आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाये...

ऐसी ही एक खबर है यह... भी !

यकीन मानिये जब से पढ़ा है मुस्कुराना रूक ही नहीं पा रहा है।

मैं उद्धृत करता हूँ...


Pornistan? Pak tops world in ‘sex’ searches

Islamabad: Pakistan — the land of the pure — has notched up a rather unenviable first place, for porn searches per person across the world, according to Google search trends.
According to a Fox News report, Pakistan is “top dog in searches for ‘horse sex’, since 2004, ‘donkey sex’ since 2007, ‘rape pictures’ and ‘rape sex’ since 2004, ‘child sex’ between 2004 and 2007 and since 2009, ‘animal sex’ since 2004 and ‘dog sex’ since 2005”.
The country also tops or has topped in searches under the categories of sex, camel sex, rape video, child sex video and some other unprintables. The Pakistani embassy did not reply to a request for an interview, the report said.
So far, Pakistan has banned 17 websites for offensive or blasphemous material and is monitoring seven others (including Google, Yahoo, YouTube and Amazon). PTI


अकसर धर्म की आवश्यकता पर जब बहस होती है तो आस्तिकों का तर्क होता है कि धर्म अनाचार को कम करता है और नैतिकता को बल देता है... ब्लॉगवुड में स्वधर्म प्रचार की दुकानें खोले एक धर्म विशेष के मेरे मित्र तो यह विश्वास पाले हैं कि यदि उनके 'परमपिता' को सब मानने लगें और 'उसी' का कानून पूरी दुनिया में लागू हो जाये तो कोई समस्या नहीं रहेगी!

कदाचित ऐसों की ही मान कर मरहूम जनरल जिया उल हक ने काफी सालों पहले पाकिस्तान को इस्लामी मुल्क व पूरे मुल्क में शरई कानून भी लागू कर दिया था... नतीजा ऊपर देखिये... बताने वाले कई इसे मीडिया क्रियेशन कहेंगे... कई इसके समाजशास्त्रीय व व्यवहारशास्त्रीय या राजनीतिक कारण भी बतायेंगे... परंतु कोई सही सही यह नहीं बतायेगा कि क्यों एक ऐसा मुल्क जहाँ ईंटरनेट पर आज भी बहुसंख्य आबादी की पहुंच नहीं है...
नेट पर ‘horse sex’,‘donkey sex’,‘rape pictures’,‘rape sex’,‘child sex’ ,‘animal sex’,‘dog sex’, 'camel sex', rape video, child sex video आदि आदि खोजने में TOP पर है!


क्या आप कोई वजह जानते हैं इस सब की ? यदि हाँ तो बताईये जरूर...

वरना मेरी चिंता इस बात की है कि 'टिक टिक करता इस्लामी आतंकी टाइम बम' तो पहले से ही है हमारा यह पड़ोसी... कहीं सभी को नेट सुविधा मिलने के बाद 'सेक्स बम' भी न फूट पढ़े दुनिया में पाकिस्तान से...

खतरा वास्तविक और बहुत करीब है... कमर कस लीजिये अभी से!





आभार!


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बुधवार, 14 जुलाई 2010

सभी धर्मों व धर्म ग्रंथों में बहुत कूड़ा-करकट भर गया/भर दिया गया है...समय आ गया है सफाई करने का!

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मेरे 'धार्मिक' मित्रों,

अभी दो दिन पहले मित्र सलीम खान ने एक पोस्ट लिखी जिसका सार यह था कि किसी मुसलमान को किसी भी गैर मुस्लिम से न तो दोस्ती करनी चाहिये और न ही उनके त्यौहारों या खुशियों में शामिल होना चाहिये...

आदत से मजबूर मैंने पुरजोर विरोध किया, लगभग सभी ब्लॉगर भाई (चाहे किसी भी धर्म के हों) भी इस बात के खिलाफ थे, भाई शाहनवाज ने तो इस पर एक पोस्ट ही लिख दी... नतीजा या तो हॄदय परिवर्तन के कारण या गुस्से में मित्र सलीम खान ने अपने ब्लॉग से सारी पोस्टें हटा दी।

यहाँ पर यह कहना न्यायोचित व प्रासंगिक होगा कि सलीम खान जी ने जो लिखा था उसके समर्थन में धर्मग्रंथों से संदर्भ सहित उद्धरण भी दिये थे।

अब इस पूरे प्रकरण से एक बार फिर मुझे सभी धर्म ग्रंथों में लिखी तमाम अतार्किक, अप्रासंगिक, अवैज्ञानिक, अनुपयोगी व वैमनस्य को बढ़ाती बातों की याद आई और उसी के साथ एक संवाद भी, जो भाई शाहनवाज के ब्लॉग पर हुआ...

आज सही समय है कि इस पर फिर चर्चा हो...


संवाद इस प्रकार है:-

मैं...

"सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में बहुत सी ऐसी बातें लिखी गई या बताई गई हैं जो उस युग के मनुष्य की अवैज्ञानिक धारणाओं, सीमित सोच, सीमित ज्ञान (या अज्ञान), तत्कालीन देश-काल की परिस्थितियों व लेखक के अपने अनुभवों या मजबूरियों पर आधारित हैं, आज के युग में इन मध्य युगीन या उससे भी प्राचीन बातों की कोई प्रासंगिकता या उपयोग नहीं रहा, यह सब बातें आज आदमी की कौम को जाहिलियत व वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं व इन सब बातों को आप बेबुनियाद-बेकार-बकवास की श्रेणी में रख सकते हैं और अब समय आ गया है कि धर्माचार्यों को अपने अपने ग्रंथों की विस्तृत समीक्षा कर इन बातों को Disown कर देना चाहिये। "



शाहनवाज...

"प्रवीण जी मैं आपकी बातों से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. जो ज्ञान हर युग में प्रासंगिक हों वही तो धर्म है वर्ना वह साधारण ज्ञान कहलाता है. धर्म एक ईश्वरीय ज्ञान होता है और ईश्वर का ज्ञान सदा के लिए होता है. यह तो मनुष्य का ज्ञान है, जो एक अरसे बाद गलत साबित हो जाता है. ईश्वर का ज्ञान तो वही है जो कभी गलत साबित हो ही ना पाए. यह तो हो सकता है कि कोई धार्मिक बात हमारे समझ में ना आए, परन्तु यह नहीं हो सकता कि ईश्वरीय बात गलत हो जाए. इसलिए अगर कोई बात समझ में ना आए तो यह सोचना कि वह बात ही गलत है और यह सोच कर ज्ञानी पुरुषों से प्रश्न ही ना करना बेवकूफी है. इसलिए हर धर्म में कहा गया है कि ज्ञान का प्राप्त करना मनुष्य का फ़र्ज़ है.

धर्मग्रंथो में लिखी गई बाते अगर आज के युग के लिय अप्रासंगिक होती, तो आज भी वैज्ञानिक उनको खागालने में नहीं लगे होते? आज पूरी दुनिया योग की तरफ भाग रही है, अध्यात्म की और लौट रही है. पुरे विश्व में वह लोग जो किसी खुदा को नहीं मानते थे, आज आस्तिक बन रहे हैं. तो इसके पीछे हमारे धर्माचार्यों की मेहनत और उनकी मेहनत के फलस्वरूप ईश्वर की ओर से दिया हुआ ज्ञान ही है. बस ज़रूरत है उस ज्ञान को आत्मसात करने की.

अगर आप विज्ञान को देखोगे तो पाओगे कि कितनी ही बातें धार्मिक ग्रंथो से ली गई हैं. जो बातें अबसे हजारों वर्ष पहले महापुरुष लोगो को बता कर गए, आज जाकर विज्ञान उनको सिद्ध कर रहा है. आखिर कहाँ से उन महापुरुषों के पास इतना ज्ञान आया? आज अगर इन्टरनेट पर सर्च करोगे तो हजारों ऐसी रिसर्च मिल जाएंगी, क्या वह सब की सब गलत हैं?

आप कह रहे हैं कि धार्मिक बातें इन्सान को जाहिलियत और वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं, और मेरा दावा है कि सिर्फ और सिर्फ धार्मिक बातें ही इंसान को जाहिलियत और वैमनस्य से रोक सकती हैं. यह जो जाहिलियत और वैमनस्य फ़ैलाने वाले लोग हैं, असल में यह अपने धर्म का पालन करने वाले लोग है ही नहीं, बल्कि धर्म का इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. इन्हें आप धर्म के व्यापारी कह सकते हैं, जो कि अपने फायदे के लिए धार्मिक ग्रंथो को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं. मेरा मानना है कि इन लोगो को हलके में नहीं लेना चाहिए, यह पूरी एक मुहीम है और इसके पीछे कोई बहुत बड़ा संगठन काम कर रहा है.

जिसका मकसद अपना उल्लू सीधा करने के लिए लोगो को बेवक़ूफ़ बनाना हो सकता है. क्योंकि वह लोग जानते हैं, कि जिन्हें अपने धर्म के बारे में जानकारी नहीं है, उन्हें ही बेवक़ूफ़ बनाया जा सकता है. और इस समस्या से निजात पाने का तरीका भी यही है, कि पुराने ढर्रे पर ना चलकर लोगों को जागरूक बनाया जाए. धर्म की सही शिक्षाओं को सामने लाया जाए, ताकि अन्धकार दूर हो.

या फिर यह भी हो सकता है कि कैसे लोगो को उनके धर्म से दूर ले जाया जाए. ज़रा सोचिये क्यों नहीं पश्चिम के धर्मों के बारे में गलत बातें सामने आती? क्यों सिर्फ हमें ही निशाना बनाया जाता है?

रही बात समीक्षा की तो लोगो के द्वारा की जा रही अनावश्यक समीक्षा की वजह से ही तो सारा फसाद फ़ैल रहा है. मेरे विचार से तो समीक्षा उसकी की जानी चाहिए है जिसकी कोई बात गलत साबित हो."




मैं...

मित्र शाहनवाज,

मेरी टिप्पणी से असहमति जताती यह पोस्ट बनाकर एक स्वस्थ संवाद शुरू करने के लिये आपका आभार ।

अब लीजिये बिन्दुवार जवाब...

*** जो ज्ञान हर युग में प्रासंगिक हों वही तो धर्म है वर्ना वह साधारण ज्ञान कहलाता है

पाषाण युग से आज तक प्रासंगिक ऐसे ज्ञान हैं पहिया, लीवर(Lever), गरारी व आग की ताकत... किसी एक खास जगह जाकर कुछ खास शब्द समूहों को बार बार दोहरा कर किसी परमपिता के सामने सर झुकाना या उसकी प्रार्थना करना जिसे आज धर्म के नाम से जाना जाता है महज ८-१० हजार साल पुराना है... यह तथाकथित ज्ञान आदमी की कौम के लिये क्या उपयोगिता रखता है?


*** धर्म एक ईश्वरीय ज्ञान होता है और ईश्वर का ज्ञान सदा के लिए होता है. यह तो मनुष्य का ज्ञान है, जो एक अरसे बाद गलत साबित हो जाता है. ईश्वर का ज्ञान तो वही है जो कभी गलत साबित हो ही ना पाए.

ईश्वर के इस तथाकथित ज्ञान के कुछ उदाहरण दीजिये तब कुछ कहूँगा।


*** यह तो हो सकता है कि कोई धार्मिक बात हमारे समझ में ना आए, परन्तु यह नहीं हो सकता कि ईश्वरीय बात गलत हो जाए.

बतलाईये तो सही क्या कहा है उसने।

*** अगर आप विज्ञान को देखोगे तो पाओगे कि कितनी ही बातें धार्मिक ग्रंथो से ली गई हैं. जो बातें अबसे हजारों वर्ष पहले महापुरुष लोगो को बता कर गए, आज जाकर विज्ञान उनको सिद्ध कर रहा है.

यहाँ पर फिर कुछ उदाहरणों की दरकार है।

*** आप कह रहे हैं कि धार्मिक बातें इन्सान को जाहिलियत और वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं, और मेरा दावा है कि सिर्फ और सिर्फ धार्मिक बातें ही इंसान को जाहिलियत और वैमनस्य से रोक सकती हैं.

दुनिया में ज्यादातर झगड़े, बड़ी लड़ाइयाँ धर्म के कारण हुई हैं यह जगजाहिर बात है, ब्लॉगवुड में चल रहा ताजा विवाद भी उदाहरण है इसका ।

*** ज्यादा विस्तार से लिखना यहाँ संभव नहीं पर धर्म व ईश्वर को समझने का प्रयास करती मेरी यह लेखमाला जरूर देखियेगा, चिंतन के लिये एक नई दिशा व विचार के लिये कुछ हटकर खुराक अवश्य मिलेगी ।

आभार!




शाहनवाज...

@ प्रवीण शाह

*** "पाषाण युग से आज तक प्रासंगिक ऐसे ज्ञान हैं पहिया, लीवर(Lever), गरारी व आग की ताकत... किसी एक खास जगह जाकर कुछ खास शब्द समूहों को बार बार दोहरा कर किसी परमपिता के सामने सर झुकाना या उसकी प्रार्थना करना जिसे आज धर्म के नाम से जाना जाता है महज ८-१० हजार साल पुराना है... यह तथाकथित ज्ञान आदमी की कौम के लिये क्या उपयोगिता रखता है?"

प्रवीण जी,

देखिये मैं तो आपको सिर्फ इस्लाम की बातें ही बता सकता हूँ, अन्य धर्म के ज्ञान के लिए तो अमित शर्मा और अनवर जमाल जैसे महानुभवो को आना पड़ेगा.

पहिया, लीवर, गरारी, जैसी बहुत सी बातें अल्लाह ने कुरान के ज़रिये इंसानों को बताई, इन की सूचि बहुत लम्बी है, इसके लिए पूरी एक पोस्ट बनानी पड़ेगी. तब तक आप "हमारी अंजुमन" पर जाकर विज्ञानं के गूढ़ रहस्यों से सम्बंधित कुछ जानकारिया हासिल कर सकते हैं.

इसी ज्ञान ने इंसान को इंसान बनाए रखा हुआ है और सबसे बड़ी बात तो यह है, कि इसी ज्ञान के ज़रिये हम हमारे पैदा करने वाले का आभार प्रकट करते हैं. ज़रा सोचिये, कोई आपको तनख्वाह देता है, और बदले में आप उसका काम ही ना करें तो क्या वह आपको तनख्वाह देगा? और क्या तनख्वाह लेना आपके लिए सही होगा?

ईश्वर ने दुनिया की हर वास्तु किसी न किसी मकसद से पैदा की है, जैसे कि खाद्य पदार्थ, फल इत्यादि जीवों के खाने के लिए, वहीँ छोटे से छोटा जीव भी किसी न किसी कार्य में आता है. तो क्या आप सोचते हैं कि उसने मनुष्य को बिना किसी मकसद के ही पैदा कर दिया?


*** ईश्वर के इस तथाकथित ज्ञान के कुछ उदाहरण दीजिये तब कुछ कहूँगा।

ईश्वर के इस ज्ञान का एक उदहारण कुरआन-ए-करीम है. आज तक इसके जैसी अपने आप में सम्पूर्ण किताब कोई भी मनुष्य नहीं बना पाया है. चाहे वह विज्ञान के हिसाब से हो या गणित अथवा तर्क के हिसाब से. कुरआन अपने आप में जीता-जागता करिश्मा है. इसको ईश्वर ने ऐसे विज्ञान के साथ बनाया है कि इसमें अगर कोई एक मात्रा भी बदलने की कोशिश करता है तो वह पकड़ा जाता है.

*** बतलाईये तो सही क्या कहा है उसने।

कुरआन अथवा वेद पढ़िए आपको स्वयं पता चल जाएगा कि उसने क्या कहा.

*** "दुनिया में ज्यादातर झगड़े, बड़ी लड़ाइयाँ धर्म के कारण हुई हैं यह जगजाहिर बात है, ब्लॉगवुड में चल रहा ताजा विवाद भी उदाहरण है इसका ।"

दुनिया का एक भी झगडा धर्म के कारण नहीं हुआ, हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि धर्म के दुरूपयोग के कारण हुआ. और शैतान प्रवित्ति के लोग तो अगर धर्म नहीं होता तब भी अवश्य झगडा करते. यह तो आप भी जानते हैं, कि धर्म का सहारा लेकर जो युद्ध हुए उनकी संख्या अन्य कारणों से हुए युद्धों के मुकाबले ना के बराबर है.





मैं...

"मित्र शाहनवाज,

आपको मेरे कहे को समझने के लिये Organic Evolution व Origin of life on Earth के बारे में काफी कुछ पढ़ना होगा... तभी आप समझोगे कि ईश्वर की यह अवधारणा कितने बाद में आई मानव समाज के बीच...

सही क्रम है...

* बड़े कपियों का एक समूह...
* पिछले पैरों पर खड़ा होकर चलना सीखना...
* दोनों अगले पैरों का किसी भी अन्य कार्य के लिये मुक्त होना...
* दोनों अगले पैरों(आज के हाथ) में अंगूठे का बाकी ऊंगलियों से ९० डिग्री के कोण पर शिफ्ट होना...
* हाथ के जरिये प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध चीजों को औजार रूप में प्रयोग करने की योग्यता का विकास...
* सामूहिक रूप से बड़े पशुओं का आखेट...
* समूह में रहने व आखेट करने के कारण भाषा का विकास...
* कालांतर में लिपियों का विकास...
* समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिये कुछ नियमों का बनना...
* परिवार, उत्तराधिकार आदि अवधारणाओं का उदय...
* चल व अचल संपत्ति की मान्यता...

यह सब होता रहा लाखों साल तक...

इस दौरान नहीं था कोई धर्म या ईश्वर का दखल!

महज पिछले ७-८ हजार सालों में आई हैं यह अवधारणायें... भाषा के विकास के बाद... बिना भाषा के इनको अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकता।

धर्म ग्रंथ भले ही कुछ भी कहते रहें परंतु सूर्य के एक दहकते टुकड़े के रूप में उसके चक्कर लगाती पृथ्वी पर जीवों व पादपों का होना एल लम्बी व सतत प्रक्रिया के तहत हुआ... Evolution आज भी जारी है... भविष्य का मानव (Homo futuris) कैसा होगा इस पर भी आज कयास लगाये जाते हैं... इतने लम्बे मानव इतिहास में धर्म व ईश्वर का यह दौर काफी कम समय से है... कुछ अच्छे कुछ बुरे समयकालों की तरह यह भी गुजर जायेगा ।

आस्था व विश्वास पर मैं कुछ नहीं कहूँगा सिवाय इसके कि ...

"किसी चीज का अस्तित्व वाकई में नहीं है यह कोई कैसे साबित कर सकता है ?"

और हाँ यह जरूर कहूंगा कि पहिया, लीवर व गरारी का ज्ञान इस्लाम के उदय से पुर्व से ही था आदमी के पास..."





प्रिय पाठक,
क्या आपको नहीं लगता कि...
सभी धर्मों व धर्म ग्रंथों में बहुत कूड़ा-करकट भर गया/भर दिया गया है...

समय आ गया है सफाई करने का!



हम तो कह लिये अपनी...
अब आप ही कुछ कहो!





आभार!




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सोमवार, 12 जुलाई 2010

कश्मीर भारत के लिये समस्या नहीं बल्कि इम्तहान है... यह चुनौती भी है और अवसर भी...हल एकदम सीधा सादा व आसान है।



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मेरे 'कश्मीर चिंतक' मित्रों,

आज ही प्रसिद्ध बुद्धिजीवी व राजनीतिक-विचारक-चिंतक शेष नारायण सिंह जी की यह पोस्ट पढ़ी...पूरी तरह किताबी व इकतरफा इस पोस्ट पर हमारे आलसी महाराज गिरिजेश राव जी ने बहुत अच्छा मोर्चा लिया उनसे और सबसे अंत में मित्र असहज ने पोस्ट व तर्क के खोखलेपन को उकेर कर रख दिया अपने छोटे से कमेंट में!

कश्मीर को मैं समस्या नहीं मानता... वहाँ तो इम्तहान है उन मूल्यों का जिसके आधार पर हमारा यह देश बना है...स्वायत्तता, पाकिस्तान में विलय या नये इस्लामिक मुल्क की जो यह माँग कश्मीर में उठती है उसका आधार यह नहीं है कि पाक अधिकृत कश्मीर में बहुत अच्छा राज चलता है... आधार सिर्फ धर्म है... वे यह मान कर चलते हैं कि दिल्ली में हिंदुओं का राज है...और क्योंकि कश्मीरी पंडितों को भगाकर अब घाटी में उन लोगों ने केवल एक ही धर्म का वर्चस्व कर दिया है...अत: भारत का कोई भी दखल या अधिकार उन्हें मंजूर नहीं...

यह स्थिति 'समस्या' नहीं अपितु हमारे देश के लिये चुनौती है और अवसर भी...अपने स्थापना के मूल्यों को परखने व दॄढ़ करने का...बंदूक या पत्थर उठाकर देश को चुनौती देते यह आतंकी व अलगाववादी और उत्साहित होते हैं यदि इन्हें मीडिया में जगह मिले...कथित रूप से सुरक्षा बलों के हाथ मरे लोगों पर तो स्यापा कर रहा है मीडिया...पर क्या कश्मीर के सुदूर गांवों में इन अलगावी-आतंकियों द्वारा फैलाई दहशत के शिकार नहीं दिखते उसको... अक्सर उन गांवों में अपनी दहशत को बनाये रखने के लिये ये किसी बेकसूर का या तो गला रेत देते हैं ता सरे आम गोलियों से भून देते हैं उसे...मुखबिरी, जेहाद से दगा या कश्मीर की आजादी के खिलाफ होने का इल्जाम लगा कर...

जिस तरह की मानसिकता पाकिस्तान रखता है उसमें कश्मीर आज भारत का 'बफर जोन' बन गया है... यह अगर हाथ से निकला तो क्या यही आग जम्मू, हिमांचल, पंजाब व हरियाणा में नहीं लगाई जायेगी हमारे इस पड़ोसी द्वारा...

आतंकवाद व अलगाववाद को पूरी दुनिया में कभी भी बातचीत की मेज पर बैठ कर खत्म नहीं किया जा सका है... उसे खत्म किया जाता है प्रचार व चर्चा नाम की उसकी आक्सीजन को काट कर...लंबे समय तक उनके इरादों को विफल करते हुए थका-थका कर...एलटीटीई, मिजो व नागा आतंक-अलगाव वाद इसके उदाहरण हैं...

हमारा राजनीतिक नेतृत्व इस चुनौती के आगे सीना तान कर खड़े हो...भारत की अखंडता नॉन नेगोशियेबल होनी चाहिये...जब आप ऐसे फैसले लेते हैं तो कुछ जान-माल का नुकसान लाजिमी है...पर इस नुकसान के डर से मुल्क धार्मिक आतंक-अलगाव के आगे घुटने नहीं टेकते...

कश्मीर की चुनौती का हल यही है...थका-थका कर मारो आतंकी-अलगाववादियों को...उन्हें हेडलाइन न बनने दो...अपने आप ही खतम हो जायेंगे उनमें बहुत से... बाकी के लिये फौज है ही!






आभार!


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शनिवार, 10 जुलाई 2010

आखिर ऐसा अजीबोगरीब बर्ताव क्यों करती हैं महिलायें ?. . . . . . मैं तो आज तक समझ नहीं पाया. . . . . . :(


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मेरे 'खरीदार' मित्रों,

रोज ठीक दस बजे सुधांशु की एंट्री होती है...समय की इतनी पाबंदी कि आप अपनी घड़ी मिला सकते हैं उसके आने पर... आज वह दोपहर बारह बजे आया और आते ही सीधे अपनी मेज पर काम में जुट गया...काफी परेशान सा लग रहा था मेरा यह जोशीला और हंसमुख सहकर्मी...

खैर लंच टाइम पर मैंने उसे अपने पास बुला लिया...कबीर रोजाना मेरे ही साथ लंच करता है...खाना खाने के बाद चाय पीते-पीते मैंने पूछा " क्या बात सुधांशु सब कुछ ठीक-ठाक तो है ?"

उसे शायद मेरे यह पूछने का ही इंतजार था..." मूड खराब है बॉस, आज बहुत मेरा।"

"हुआ क्या?" पूछा कबीर ने...

" अरे यार सुबह सुबह बड़ी शर्मिंदगी झेल कर आ रहा हूँ...कल शाम रूचि और मैं गये थे मार्केट... बोली सलवार-सूट लेना है...पूरे दो घंटे तक दुकान के सारे सूट देखे...एक पसंद किया...खरीद के घर लाये... घर आकर ड्रैसिंग टेबल के सामने उसे शरीर पर लगा देखती रही... फिर बोली- ऊंह... अच्छा नहीं लग रहा ये अब... कल सुबह सुबह जाकर वापस कर आना इसे!"

बेचारा सुधांशु सुबह दुकान पहुंचा तो पहले तो दुकानदार ने उलाहना दिया " अरे साहब बोहनी तो होने देते वापसी से पहले " फिर दुकानदार ने यह भी पूछा कि एक रात में ऐसा क्या हो गया कि सूट एकदम नापसंद ही कर दिया गया।

क्या कहता वह बेहद सीधा और ईमानदार इंसान... " एक नहीं कई बार हुआ है ऐसा बॉस... पसंद तुम करो... फिर नापसंद करने के बाद जलालत झेलने-वापस करने जाये पति!"... "अब तो हालत यह हो गई है मेरी कि जब यह शॉपिंग कर रही होती हैं तो मैं कितना ही चुप होकर इधर-उधर ध्यान लगाने की कोशिश करता हूँ पर मेरे पूरे बदन में एलर्जी सी खुजली होने लगती है"... अपने दिल का दर्द निकाल बाहर रख ही दिया सुधांशु ने...

कबीर अभी तक मंद-मंद मुस्करा रहा था... फिर वो बोला..."यार, कुछ-कुछ ऐसे ही हाल हैं मेरे भी अभी पिछले हफ्ते अमीनाबाद गये... पूरी दुकान पलटवा दी दिलशाद ने... फिर कहती है कुछ है ही नहीं यहाँ मेरी पसंद का... चलो चलते हैं... मेरा तो मुंह खुला का खुला ही रह गया... थोड़ा दुकानदार के श्रम और समय का भी ख्याल रखा होता"... " यार मैं कभी कुर्ता-पाजामा नहीं पहनता फिर भी दुकानदार का ख्याल रखते हुऐ मैंने अपने लिये चिकन का एक कुर्ता-पाजामा खरीदा और तब बाहर आया।"

अब अपनी बारी थी...हमारी श्रीमती के साथ भी कुछ दिक्कतें हैं... मैं जब अपने कपड़े खरीदता हूँ तो वह अपनी चलाती हैं... क्योंकि उनकी राय में इंसान कपड़े तो दूसरों के लिये ही पहनता है... और जब पूरी इमानदारी से कपड़े खरीदते हुऐ मैं कहता हूँ कि फलानी साड़ी या वह सूट तुम पर बहुत फबेगा... तो गर्दन के एक झटके में मेरी इस पसंद को खारिज कर देती हैं वो...यह भी सत्य है कि अधिकतर वह वही कपड़े पहनती हैं जो मैं उन्हे विशेष अवसरों में 'गिफ्ट' देता हूँ... और मैं ये गिफ्ट कभी उनको साथ ले जाकर नहीं खरीदता!

एक और बात जिससे मुझे बड़ी कोफ्त होती है जब वे दुकानदार से कहती हैं... कि, मुझे कुछ ऐसी साड़ी दिखाइये जिसका रंग तो साड़ी ABC सा हो, कपड़ा साड़ी BCD सा, कढ़ाई साड़ी CDE के जैसी, बार्डर साड़ी DEF सा और पल्लू हो साड़ी EFG के जैसा... आप बताओ क्या यह संभव है ?

आखिर ऐसा अजीबोगरीब बर्ताव क्यों करती हैं महिलायें ?

मैं तो आज तक समझ नहीं पाया. . . . . . :(

चलता हूँ अब...
मनाईये कि वो इसे न पढ़े...
नहीं तो अपना खाना-पानी बंद हो जायेगा कई दिनों तक...... ;)





आभार!


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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

'उस' का गुनहगार तो जब बनूंगा तब देखी जायेगी पर अपने बच्चों का गुनहगार नहीं बन सकता मैं अभी से !


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मेरे 'बेगुनाह' मित्रों,

'ताज आटो सर्विस', जी हाँ यही नाम है उस दुकान का जहाँ मैं अपनी नई-नई नौकरी की कमाई से १९९५ में खरीदी YAMAHA RXZ मोटर साइकिल को ले जाता हूँ हर दूसरे महीने सर्विसिंग करवाने के लिये...मेरी यह बाईक ३ लाख कि०मी० चल चुकी है अब तक...अब तो शायद ही कभी इसे चलाता हूँ पर इस पुरानी साथिन को 'टिच्च' रखने का शौक है मुझे...श्रीमती मेरी इस बाईक के प्रति भावना को नहीं समझ पाती और अक्सर मजाक भी उड़ातीं है मेरा...

हाँ तो 'ताज आटो सर्विस' के प्रोप्राइटर हैं नफीस'मुल्ला जी'... वह खुद और उनके चचेरे चार भाई मिलकर चलाते हैं दुकान को... नफीस ३१-३२ साल का होगा...हमेशा मजहब और ईमान की बातें करता है, सर पर हमेशा क्रोशिये की गोल टोपी और शरीर पर ढीला पठानी सलवार कमीज, यही पहनावा है उसका... इसीलिये आदर से 'मुल्ला जी'कहा जाता है उसे... दुकान में बाकी चार भाई हैं फैजल, आमिर, जाहिद और मेहबूब... न जाने क्या है, कुछ ऐसा है कि मुझे अच्छा लगता है कि हर दो महीने में किसी छुट्टी के दिन मैं खुद ही जाऊं उस दुकान पर...अपनी बाईक बनवाने...ड्राइवर अक्सर कहता है "आप क्यों जाते हैं, मैं बनवा लाऊंगा"... पर मेरा मन नहीं मानता...मुझे अच्छा लगता है नफीस, फैजल, आमिर, जाहिद और मेहबूब की दुकान पर जाना और उनके साथ बैठना...

यह म्यचुअल एडमिरेशन जैसी ही बात है क्योंकि मेरे दुकान पर पहुंचते ही पाँचों भाईयों के चेहरे खिल उठते हैं... मेरे लिये साफ सी कुर्सी का इंतजाम होता है दुकान के इकलौते पंखे के ठीक नीचे और पड़ोस की दुकान से तुरंत मौसम अनुसार गन्ने का रस या चाय लाई जाती है...फैजल मेरा फेवरेट है क्योंकि वह अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी है और मैं खेलों का शौकीन...दुकान में मेरे बैठे रहने के दौरान मेरे छोटे भाईयों के समान वह पाँचों भाई जरा सी भी फुर्सत पाने पर देश-दुनिया की उन तमाम चीजों या खबरों, जिन्हें वह समझ नहीं पाते या उनके बारे में और जानना चाहते हैं, के बारे में मुझ से सवालात करते हैं और अपनी हैसियत भर मैं उन्हें बताता-समझाता भी हूँ।

जैसा मैंने पहले ही बताया नफीस बहुत धार्मिक है...पाँचों वक्त नमाज पढ़ना... मजहब के हर नियम का पालन करना... और हर वक्त ऊपर वाले का ध्यान करना... ईश्वर के प्रति उसकी आस्था को देख कभी-कभी रश्क सा होता है मुझे उस से...'ईमान' का भी वह एकदम पाक-साफ है... यह मैंने कई बार देखा है...दुकान में ही स्पेयर पार्ट्स रखे हैं...जब सप्लाई आती है तो अपना वाजिब मुनाफा जोड़कर नफीस हर आईटम पर रेट लिखता है...उस रेट से दुकान में कोई एक पैसा भी ग्राहक से ज्यादा ले ले यह उसे मंजूर नहीं...एक बार की बात है नफीस किसी काम से थोड़ी देर को बाहर गया और इसी दौरान सबसे छोटे महबूब ने मोटरसाइकिल के पीछे लगने वाली एक डिक्की ग्राहक को ४९५ रू० में बेच दी...नफीस जब आया तो ग्राहक जा रहा था...नफीस को पता चलने पर उसने ग्राहक को पीछे से बुला कर ९० रू० वापिस कर दिये क्योंकि उसके हिसाब से यही वाजिब रेट था...

शादी नहीं हुई है अभी नफीस की...कब करोगे पूछने पर शरमाते हुऐ वह बताता है कि आखिरी बहन की शादी चंद महीने पहले ही निपटाई है...अब घर में पहले एक और कमरा बनवायेगा...फिर ही शादी की बात सोची जायेगी...

बगल में ही शॉकर रिपेयर की दुकान है अनवार की...मस्तमौला यह लड़का भी मेरे दुकान में जाने पर किसी न किसी बहाने अक्सर आकर मेरे पास बैठ जाता है...अनपढ़ है पर देश और दुनिया की राजनीति पर नजर रखता है और अपने निकाले गये निष्कर्षों को अक्सर वह मुझसे पूछ कर परखता है।

इस बार थोड़ा गड़बड़ सा हो गया...

हुआ यह कि मेरे दुकान में जाने के थोड़ी देर बाद अनवार भी अपने नियम अनुसार आया दुकान पर...इतने में आमिर बोल पड़ा..." अनवार भाई क्या बात तीन दिन दुकान नहीं खोली ?"... "अरे यार मुनीर की अम्मी की दूरबीन से नसबंदी करा लाया मैं, एक एक कर के पाँच बच्चे हो गये बड़ी जल्दी ही, अब थोड़ा आराम हो जायेगा।", बोला अनवार...

अब तक नफीस एक इंजन बाँधने में लगा था... काम करते-करते सर झुकाये हुऐ ही हल्के से वह बोला..." अनवार भाई यह क्या किया ? आप तो उस के गुनहगार हो गये!"

इतना सुनना था कि गुस्से से उफन पड़ा अनवार... " मुल्ला जी, चुप भी रहा करो कभी, अभी शादी तो हुई नहीं है...अरे जब शादी हो गई होती और मेरी तरह पाँच-पाँच बच्चे हो जाते...और बाजार में कोई बच्चा किसी चीज के लिये मचलता...और चीज दिलाने के पैसे न होते जेब में...स्कूल की फीस भरनी भारी पड़ जाती... या ईद के दिन भी सबको नये कपड़े न दिला पाता... तो क्या 'अपने बच्चों का गुनहगार' नहीं बनता... अरे 'उस' का गुनहगार तो जब बनूंगा तब देखी जायेगी पर 'अपने बच्चों का गुनहगार' नहीं बन सकता मैं अभी से!"

एकदम से माहौल थोड़ा भारी सा हो गया...नफीस और अनवार दोनों ने मेरी ओर देखा...दोनों चाहते थे कि मैं कुछ कहूँ...

पर मुझसे कुछ भी कहा नहीं गया वहाँ पर...क्या कहता मैं?

आप बताइये अगर आप मेरी जगह होते तो क्या कहते?







आभार!





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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

नॉनसेन्स है होमियोपैथी. . . There should be no Public Funding of Homeopathy in India too!!!

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मेरे 'दिन रात चमत्कार की आस करते' मित्रों,

हा हा हा हा,

जानता हूँ कि आप में से बहुत को अच्छा नहीं लगेगा यह आलेख...

आप में से कई यह भी बतायेंगे कि कैसे उनको चमत्कारिक फायदे मिले इस पैथी से...

आप में से कुछ तो इसे जानवरों, पेड़-पौधों और फसलों में भी प्रयोग करने हेतु रिसर्च(???) कर रहे होंगे...

पर आज आप यह लिंक पढ़िये पहले तो...

होमियोपैथी नॉनसेन्स है: कहते हैं ब्रिटिश डॉक्टर

अवैज्ञानिकता के वकीलों को लगा जोर का झटका!

टैक्स देने वालों की कमाई से इन मीठी गोलियों पर खर्च बहुत कड़वा है!


तीसरे लिंक में से उद्धृत करता हूँ...


"This argument tends to ignore the distinction that unlike homeopathy, organised religions do not dress their beliefs up in the language of science, nor make empirical claims about the effectiveness of prayer."


"And, rather than being a relic of the medieval era, homeopathy is, like religious fundamentalism, a modern reaction to the Enlightenment, and seems to flourish in anxious, doubtful societies."


"The best thing that can be said about homeopathy is that, like religion, it provides comfort to the distressed, and that its ministers show tender, loving care to the sick. TLC is no bad thing, so long as it is not exploited, nor taken as a substitute for real medicine. But as the BMA has pointed out, it is certainly not the state's job to provide it."

तो दोस्तों ऐसे में क्या अपनी सरकार से भी यह उम्मीद करना कुछ गलत होगा कि AYUSH विभाग के माध्यम से होमियोपैथी जैसी Pseudo Scientific Mumbo-Jumbo को राज्य की ओर से बढ़ावा देना बंद किया जाये !

अपनी सनक या शौक के चलते अगर कोई अपने निजी खर्चे पर इस पद्धति को अपनाना जारी रखना चाहता है तो इस पर किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये... आखिर दुनिया में तमाम अतार्किक, अवैज्ञानिक बातों को मानते और अपनाते हैं लोग... परंतु कोई यह कभी नहीं कहता कि राज्य को हाथ की उंगलियों में रत्न पहनने या जन्मकुंडली बंचवाने के लिये भी अनुदान देना/ खर्च करना चाहिये।

आभार!




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शाबाश निशात, हिना और अर्शी !!! . . . . . . . आप भी शाबाशी दीजिये इन बहादुर महिलाओं को. . . . काश सभी आप जैसी ही बन पाती!



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मेरे मित्रों,

आज ज्यादा कुछ नहीं...

बस एक खबर का यह लिंक आपके लिये...

पढ़िये और मेरी ही तरह शाबाशी दीजिये निशात, हिना और अर्शी को... रूढ़िवादिता के बीच जुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने के उनके साहस के लिये...

काश मेरे मुल्क की बाकी स्त्रियां भी उन सा हो पाती...





आभार!

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