मंगलवार, 15 जून 2010

क्यों इतना बदल गई हैं आज की माँयें. . . कहीं ख्वामखाह ही तो नॉस्टेल्जिक नहीं हो रहा मैं ?


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मेरे नॉस्टेल्जिक मित्रों,

बहुत तेज गर्मी थी कल तक...शरीर, मन और आत्मा सब को मानो सुखा सा डाला था इस दहकती गर्मी ने...

इतने में देखता क्या हूँ कि भरी दोपहर में न जाने कहाँ से अचानक अवतरित हुऐ काले-घने बादल... तकरीबन आधे घंटे तक चली बहुत तेज आँधी और फिर... तन-मन को शीतलता देती हल्की हल्की फुहारें पड़ने लगी बारिश की... मौसम की पहली बारिश थी यह...

मुग्ध-आनन्दित हो निहार रहा था मैं कुदरत के इस खेल को...अचानक कुछ याद सा आया मुझे... भीतर गया और टी०वी० देख रही बिटिया रानी को बोला... "चल बिटिया छत पर चल कर भीगते हैं"...

आँखें तरेरी श्रीमती जी ने... "बड़ी मुश्किल से आजकल तबीयत ठीक है... अब लगता है तुम फिर से बीमार करोगे बच्चे को"...

मेरे बहुत समझाने-मनाने पर भी नहीं मानी वे... महज पाँच साल की 'समझदार' बिटिया ने भी माँ की ही हाँ में हाँ मिलाई...

थक-हार कर अकेला ही छत को गया यह चालीस बरस का 'बच्चा'... जी भर कर भीगा भी... पर वह पहले सा आनंद नहीं आया...


मुझे याद आया अपना बचपन... हम चार भाई और हमारी इकलौती बहना... गर्मियों में जब भी बारिश होती तो पाँचों सीधी दौड़ लगाते छत को... घंटों भीगते... कभी-कभी किसी को जुकाम सा भी हो जाता... पर माँ न तो कभी हमें मना करती... न ही भीगकर नीचे वापस लौटने पर नाराज होती... हम सबके गीले कपड़े बदलने, सूखे कपड़े पहनाने के अतिरिक्त कार्य से भी कोई शिकन तक न आती माथे पर... केवल हमारी माँ ही नहीं... मौहल्ले की सारी ही छतों पर बच्चे जमकर भीग रहे होते थे... और सभी की माँयें ऐसा ही करती थीं ।




तो फिर ऐसा अचानक क्या हो गया है...



जो...


इतना बदल गई हैं आज की माँयें...

कहीं ख्वामखाह ही तो नॉस्टेल्जिक नहीं हो रहा मैं?




बताइये जरूर!










आभार!
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15 टिप्‍पणियां:

  1. आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  2. "शरीर मन और आत्मा सब को मानो सुखा सा डाला था"

    यानि आप भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने लगे:)

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  3. माँ तो अब भी माँ ही होती है...

    लेकिन शायद अब हमारी और आने वाली नस्लों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटी है और नई माँएं इस बात से परिचित हैं...वो जानती हैं कि न तो आज के बच्चे इतना धूल मिट्टी धूप झेल सकते हैं और न ही बारिश.

    हम अपने समय में पंखें में कितना ठंडा महसूस करते थे और अब खुद बिना एसी परेशान हो उठते हैं..नलके का पानी पी लें बिना फिल्टर तो पेट खराब हो जाता है और पहले कहीं भी पानी पी लिया करते थे.

    वही हाल खाने को लेकर है.

    मुझे लगता है शायद आपके प्रश्न पर मैं अपनी बात ठीक से कह पाया.

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  4. मेरे साथ भी ऐसा कई बार होता है।

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  5. @ लेकिन शायद अब हमारी और आने वाली नस्लों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटी है...
    मैं मानती हूँ कि जरुरत से ज्यादा देखभाल ही आने वाली नस्लों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर रही है ...

    हमारी समझदार बेटियां तो खुद ही हमें खिंच ले जाती है बारिश में ...!!

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  6. ham dono aur hamree bitiya aaj bhi barish me nahane ka lutf uthate hain....dar bhi lagta hai ki kaheen beemaar naa ho jaae bitiya...sameer lal ji se shamat hu...

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  7. प्रवीण, पहले जैसा आनंद तभी आता जब बारिश से डूबी सडको पर चप्पलें फटकारते हुए दोस्तों के साथ उधम करते.

    कुछ साल पहले तक तो बड़े-बूढ़े कहते थे की घर के सभी लोग पहली बारिश में नहा लो, साल भर तक बीमार नहीं पड़ोगे, लेकिन अब कोई कुछ नहीं कहता. खाली-पीली नौस्टेल्जिक होने में कुछ नहीं रक्खा है.वो गुज़रा जमाना अब वापस नहीं आएगा.

    हम तो कीचड में खेलते थे और घाव पर मिटी डाल लेते थे. अब तो पत्नी बच्चों को घास में भी बहुत अहतियात से खेलने देती है.

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  8. सुन्दर प्रस्तुति और अवलोकन ।

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  9. समीर लाल जी की बात से पूर्ण रूप से सहमत हु मेरी भी तीन साल की बेटी है और उसे भी बार बार ठण्ड से जुकाम हो जाता है जिस कारण मै दो सालो से ठंडा पानी और आइसक्रीम को हाथ भी नहीं लगाया क्योकि फिर वो भी खाने की जिद्द करेगी जबकि मै पुरे साल इनका सेवन करती थी | बच्चा जब एक बार भले ही चार दिन के लिए ही बीमार हो उससे उसका विकाश काफी दिनों के लिए रुक जाता है इसलिए ऐसा करना माँ की मज़बूरी होती है |

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  10. एक बात और पापा लोग तो बच्चो के साथ मजे ले कर अगले दिन अपने काम पर बड़े आराम से निकाल जाते है यदि बच्चा बीमार पड़ जाये तो सामत माँ की आ जाती है जब पुरा दिन वो आप से चिपका रहता है और आप को पानी पीने के लिए भी जाने नहीं देता है | एक बार दो दिन अपने बीमार बच्चे के साथ गुजरिये फिर कभी उसके साथ बारिस में भीगने का नाम नहीं लेंगे |

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  11. आपका यह लेख पढ़कर पुरानी यादे ताजा हो गयी हम बारिष के दिनो में पुरे गांव में रास्ते में पानी का नाला बहने लगता था हम सभी मोहल्ले के लड़के पानी नहाते हुए भागते रहते कभी कभी तो हम गाय भैसो के चारा खाने की ठाण (नाव के जैसी आकार ) में बैठ कर तैरते रहते याद करके बहुत अच्छा लगता है लेकिन यह सच है कि आज का खान पान पहले के मुकाबले काफी मिलावटी हो गया बच्चों ही क्या बड़ो की रोग सहन करने की क्षमता क्षीण होती जा रही है । ईष्वर से कामना करता हूं कि वो दिन लौट ंआये और सब मिलजुल कर मौके का आनन्द ले।
    धन्यवाद

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  12. प्रवीण जी, वर्षा मुझे बेहद पसन्द है और उसमें भीगना बहुत बहुत आवश्यक। मैं तो हाल तक यह करती रही हूँ। बेटियों के साथ भीगना हमारे घर की एक परम्परा बन गई थी, जबकि मुझे और छोटी बिटिया को दमा है।
    मुझे लगता है कि यदि बच्चों यह सब करने देना है तो शायद प्राणायाम, व्यायाम, योग आदि करवाना पड़ेगा। सबकुछ बेहद प्रदूषित हो गया है। सो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत कम है।
    एक बात और, नॉस्टेलजिया के लिए मेरी भाषा कुमाँउनी में एक बहुत बढ़िया शब्द है नराई। प्रयोग यूँ होता है.... मुझे बचपन/ पहाड़/ मायके/ भारत की नराई लग रही है।
    घुघूती बासूती

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