गुरुवार, 24 जून 2010

आग से यों मत खेलिये सरकार... कुछ भी बदलने से पहले जरूर कीजिये सोच-विचार... Amendments in AFSPA ??????



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मेरे 'भारतीय मानव के अधिकार चिंतक' मित्रों,

बहुत इंतजार करता रहा मैं कि ब्लॉगवुड में भी कोई तो आवाज उठायेगा हमारी सरकार के इस अदूरदर्शी व तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिये देश के दीर्घकालीन हितों को ताक पर रखने वाले कदम के बारे में... परंतु कोई आवाज न उठती देख आपके सामने ला रहा हूँ इसे...

सबसे पहले आप इस समाचार को देखिये...

उद्धृत करता हूँ...

"Notwithstanding opposition from the Army and faced with reports of fake encounters, the government is planning to go ahead with certain amendments in the Armed Forces Special Powers Act, which includes handing over of an Army personnel in case of extra-judicial killings to the state authorities."

जैसा कि लेख में लिखा है कि AFSPA कश्मीर व आतंकवाद प्रभावित कुछ अन्य राज्यों में लागू है।

अपने खुद के अनुभव से यह कह सकता हूँ कि चाहे वह कश्मीर का पाक समर्थित-पोषित आतंकवाद हो या उत्तरपूर्व के किसी और राज्य का चीन-बर्मा-बांग्लादेश पोषित अलगाववाद... स्थानीय लोगों, प्रशासन और राजनीतिज्ञों में भी काफी लोग ऐसे होते हैं जो इस आतंक-अलगाव वाद का प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन करते हैं...इन्हीं तत्वों के द्वारा अक्सर सेना द्वारा वास्तविक एनकाउंटर में मारे गये हथियारबंद आतंकियों को भी 'सीधा सादा अनपढ़ बच्चा या नौजवान' बता कर तमाम अनर्गल आरोप सैन्यबलों पर लगाये जाते हैं... यह जगजाहिर है...कि सेना के द्वारा मारे जाने वाले हर राष्ट्रद्रोही हथियारबंद आतंकी को यह तत्व मिथ्या प्रचार से 'सैन्य दमन का शिकार,बेकसूर शहीद' बनाना चाहते हैं और कभी-कभी इसमें कामयाब भी रहते हैं।

AFSPA के इस प्रस्तावित संशोधन के लागू होने पर यदि कभी ऐसा हुआ कि किसी कर्तव्यपरायण सैनिक को इसी मिथ्या दुष्प्रचार से प्रभावित हो स्थानीय प्रशासन के कुछ इसी प्रकार के तत्वों के रहमोकरम पर रखते हुऐ उन्हीं को सौंप दिया गया तो पूरे के पूरे बल का मनोबल (Morale) इस से टूट सकता है... और यदि ऐसा हुआ तो एकमात्र ऐसी संस्था जो देश के दुश्मनों के मनसूबों को ध्वस्त करते हुऐ अभी तक इसे अखंड रखे हुए है... वह भी अपनी धार खो देगी!



आग से खेलने जैसा ही होगा यह कुछ-कुछ...



इसलिये मेरे साथ आप भी कहें...


आग से यों मत खेलिये सरकार...

कुछ भी बदलने से पहले जरूर कीजिये सोच-विचार...





आभार!
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जब बाड़ ही खेत को खाने को तैयार हो तब क्‍या किया जा सकता है? बेचारी जनता तो बस थोड़ा बहुत चिल्‍ला लेगी और क्‍या?

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  2. अच्छा विषय उठाया है आपने, लेकिन समर्थन नहीं मिलने वाला है इस पर।
    सरकार को और पब्लिक को भी वही खबरें ज्यादा लुभाती हैं जिसमें अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं पर अत्याचार की बातों को हाईलाईट किया जाता है, बेशक ऐसी खबरें तिल का ताड़ बना कर पेश की गई हों।
    हम विरोध करते हैं, सरकार के ऐसे निर्णय का। अपराधी की एक पहचान होनी चाहिये कि उसने अपराध किया है, फ़िर वो चाहे किसी भी जाति, धर्म, वर्ग, लिंग से हो।

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  3. This decision is disgusting. If it is implemented then definitely some innocent and honest army personnel will suffer one day.

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  4. चिंता की बात है।
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    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

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