रविवार, 27 जून 2010

देखिये क्या कह रहे हैं सेनाध्यक्ष, अब तो सुनो 'सरकार' !!! मत खेलो आग से, मत बदलो AFSPA को !!!


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मेरे 'देश हित चिंतक' मित्रों,


यों तो अपनी पिछली पोस्ट सुनिये मेरी भी....: आग से यों मत खेलिये सरकार... कुछ भी बदलने से पहले जरूर कीजिये सोच-विचार... Amendments in AFSPA ?????? भी इसी विषय पर लगाई थी मैंने...



पर जब आज का अखबार देखा और पाया कि हमारे सेनाध्यक्ष जनरल वी. के. सिंह ने बयान दिया है (लिंक) कि:-


***जनरल सिंह ने स्पष्ट किया कि AFSPA के तहत प्राप्त अधिकारों का सेना द्वारा कोई दुरूपयोग न हो इसके लिये पर्याप्त कदम उठाये गये हैं:-

But, General Singh has maintained during the interview that “adequate measures have been instituted at organizational and functional levels to ensure that the powers entrusted through the Act are not misused”.

***और कश्मीर जैसी चुनौतीपूर्ण स्थितियों में ऑपरेट करने के लिये सेना को जरूरी कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है:-

Security forces are required to undertake operations in J&K in “challenging circumstances’’ against highly-trained terrorists armed and equipped with sophisticated weapons, the General said, adding, “therefore, we need requisite legal protection”. PTI

***जनरल यह भी बोले कि:-

Describing AFSPA as a “misunderstood Act’’, the Army Chief told a defence journal, " All who ask for its dilution or withdrawal, probably do so for narrow political gains ". Any dilution “will lead to constraining our operations”, he said.


***यानी क्षुद्र तात्कालिक राजनीतिक हितलाभ के लिये AFSPA के साथ बदलाव किये जा रहे हैं...





तो एक बार फिर मुझे अपना दायित्व सा लगा कि भले ही और कुछ न कर सकें हम कम से कम शोर तो मचा ही सकते हैं शायद कभी इनमें से कोई आवाज हमारे नीति-निर्धारकों के कानों मे पड़े... और यह अविवेकी कदम रूक सके...




आइये मेरे साथ-साथ शोर मचाइये!









आभार!

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3 टिप्‍पणियां:

  1. कश्मीर में आये दिन सेना अधिकारियों पर लादे जा रहे मुकदमे और यह कानून हटवाने के लिये चलाया जा रहा प्रचार अभियान, सेना का नैतिक बल गिराने की गहरी साजिश है, और इसका तगड़ा विरोध किया जाना चाहिये। लेकिन सभी विपक्षी राजनैतिक दल मिलकर ऐसा करेंगे इसमें शंका है, क्योंकि इनमें एक पार्टी "साम्प्रदायिक" भी है जो 25-50 क्षेत्रीय चूहों से भले ही काफ़ी बड़ी हो, लेकिन फ़िर भी उससे हाथ मिलाने पर "खुजलीग्रस्त" होने का भय सताता है…

    वामपंथियों, नक्सलियों, उत्तर-पूर्व के उग्रवादियों, इन लोगों की समर्थक अरुंधती टाइप के मानवाधिकारवादियों और आजीवन अल्पसंख्यकों की गन्दी राजनीति करने वाली "सेकुलर कांग्रेस" के लिये यह विशेष कानून हटवाना बेहद जरूरी है…।

    रही चन्द "पागल" किस्म की पार्टियाँ, तो उन पर "फ़ासीवादी" होने का ठप्पा लगाया जा चुका है… तो उन्हें दूर ही रखा जाये… मीडिया से भी, किसी महत्वपूर्ण निर्णय से भी और सत्ता से भी।

    यानी मैदान खुला है चारों तरफ़ से…

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  2. Do we have better options? We cannot do more than yelling against such decisions /amendments.

    उत्तर देंहटाएं

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