शुक्रवार, 28 मई 2010

और उस 'ईमान' रखने वाले ने मुझे चाय तक पिलाने से मना कर दिया... है कोई समाधान आपकी नजर में ?

.
.
.
मेरे 'ईमान' रखने वाले मित्रों,

अपना भी हाल कुछ अजीब है...जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती जाती है...चाय की तलब भी उतनी ही बढ़ जाती है।

जा रहा था मुख्यालय को...अचानक चाय पीने की इच्छा हुई...छोटा सा छप्पर डले एक ढाबा सा दिखा... गाड़ी रूकवाई और ड्राईवर को बोला चाय बनवा लाओ...

"साहब वो कह रहा है आगे कहीं पी लेना"

"क्यों, क्या उसके पास नहीं है"

चुप रहा ड्राईवर...

उतर कर गया मैं...

"आदाब साहब, मैं ये कह रहा था आगे कहीं पी लेते... मेरे बर्तन ठीक नहीं हैं, 'आपके' लिये, 'बड़े' का मीट बनता है मेरे यहाँ ।"

अब मैं भी जिद्दी हूँ...

बहुत मनाने पर चाय के बर्तन को कई बार धोकर उसने चाय बनाई... लेकिन पिलाई प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलासों में ही... बार बार मांगने पर भी वो कांच के गिलास देने को तैयार नहीं हुआ ।

अब पीछे मुड़कर सोचता हूँ तो इस वाकये के दो सबक हैं...

*** उस गरीब अनपढ़ 'ईमान' वाले को किसी अनदेखे-अनजाने के 'ईमान' की भी जितनी फिक्र है... वैसी कुछ पढ़े-लिखे 'अनपढ़ो' को भी गर होती... तो शायद ज्यादातर बबाल होते ही नहीं!

*** दो 'खास' जानवरों के मांस और उनको काटने के दो 'खास तरीकों' ने कितना दूर-दूर किया हुआ है...आदमी को आदमी से।


मेरा तो मन करता है कि एक बड़े से बर्तन में 'दोनों जानवरों' का 'दोनों तरीके से' काटा गया मांस बनवाऊँ... और उसी का सहभोज दूं, सबके लिये...


क्या आप ऐसे 'सहभोज' में शामिल होना चाहोगे ?...


यदि नहीं तो अपना तरीका बताइये इस दूरी को खत्म करने का!









आभार!

...

19 टिप्‍पणियां:

  1. नहीं मैं उस सहभोज में नहीं शामिल होना चाहूंगा. मैं मांस नहीं खाता लेकिन इसका कारण धार्मिक नहीं है. मैं मांस खाने को सही नहीं समझता.

    उत्तर देंहटाएं
  2. चखी हुई चाय के कपों को फिर से मिलाकर, उन्ही कपों में दुबारा डालकर पीने के आनंद से बढ़कर दोस्ती का दूसरा जायका मुझे प्राप्त नहीं हुआ है. आप भी पी कर देखिये.

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या माँस खाने से दुनिया के झगडे मिट जाएंगें ?

    उत्तर देंहटाएं
  4. 1)भाई साहब, आपकी जगह मैं होता तो उस चाय वाले को दो थप्पड़ मारकर बोलता अब बना चाय, छुआछूत और उंच-नीच फैलाता है !
    2) NO

    उत्तर देंहटाएं
  5. .
    .
    .
    @ पं.डी.के.शर्मा"वत्स" जी,

    क्षमा करें देव,

    मुझे लगता है कि You have missed the point.
    मैं मांस खाने की वकालत नहीं कर रहा यहाँ पर...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज आपकी पोस्ट पढ़कर एक क़िस्सा याद आ गया...
    दूरदर्शन में एक दिन प्रोड्यूसर रूम में हम (प्रोड्यूसर व सहायक समाचार संपादक), कुछ प्रोड्यूसर और कैमरा मैन बैठे थे. अचानक निदेशक महोदय आ गए और बोले आज सबके साथ चाय पी जाए... तभी एक वरिष्ठ प्रोड्यूसर ने कैंटीन में फ़ोन कर चाय का ऑर्डर दिया और कहा मेरे (अपने) लिए अलग गिलास में चाय लाना...

    कुछ ही देर में चाय आ गई. सब लोगों के लिए टी सैट में और उन प्रोड्यूसर के लिए एक गिलास में... प्रोड्यूसर ने हम सबकी तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा कि- "मैं उस बर्तन में चाय नहीं पीता, जिसमें सब पीते हैं..."
    तभी हमने कहा- आप ख़ुद को 'अछूत' क्यों मानते हैं... इस बात पर सभी की हंसी छूट गई...उन प्रोड्यूसर का चेहरा देखने लायक़ था...
    निदेशक महोदय ने कहा- इसे कहते हैं- ''सेर पर सवा सेर''...

    उत्तर देंहटाएं
  7. चखी हुई चाय के कपों को फिर से मिलाकर, उन्ही कपों में दुबारा डालकर पीने के आनंद से बढ़कर दोस्ती का दूसरा जायका मुझे प्राप्त नहीं हुआ है. आप भी पी कर देखिये.

    उत्तर देंहटाएं
  8. मेरी अल्पबुद्धि में जो आया वही बताया....एक बात को छोड़ कर आपके सारे सन्देश स्पष्ट और सार्थक है....लेकिन "क्या वो वाला सहभोज ही तरीका है?"....मै समझ नहीं पाया....आपका उद्देश्य मानव मात्र के कल्याण स्वरूप है सो जो समझ नहीं पाया वही थोडा विस्तार से जानना चाहता हूँ!

    मै कई बार पढ़ कर भी जो समझ रहा हु उस से अलग नहीं सोच पा रहा हूँ!मेरी मति-सीमा एक कारण है....कृप्या उस से भी ताल मिलाने की कृपा करे...

    कुंवर जी,

    उत्तर देंहटाएं
  9. कुल्हड़ की चाय का एक फ़ायदा है उसे फोड़ते वक़्त चाय पीने से भी ज़्यादा मज़ा आता है।
    हो जाए कुल्हड़ की चाय।

    उत्तर देंहटाएं
  10. सब की अपनी अपनी मान्यताएँ हैं। इन चीजों की चर्चा की आवश्यकता ही नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. us iman vale ko aadab
    pr aap ka iman kya is se hi bda bngya
    prem dil se hota hai khane se nhi

    ydi ek sath ya ek sa khana khne se prem bdhta to shiya sunniyon ke khoon khrabe nhi hote

    isi trh jhootha khne vale jin ko t. b. i bimari hai usi me khye aur prinam bhugten yh to vigyan sidh krta hai ki jhootha mt khao
    prntu ye kttr pnthi apni soch thodi bdlenge ye jaise hain vaise hi rhenge
    dr. ved vyathit

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. प्रवीण जी ,इस देश में ऐसा सहभोज कितनी ही बार होता है..जहां एक रेस्टोरेंट में मेरे सामने की मेज़ पर एक ब्रिटिश परिवार बैठा खाना खा रहा है...[जो पोर्क खाते हैं]..मेरे दायें एक हैदराबादी परिवार जो सिर्फ हलाल मांस खाता है....झटका खाने वाले भी दो मेज़ आगे बैठे होंगे..मैं भी इसी जगह खाना खा रही हूँ...मैं जो शाकाहारी हूँ...
    उन्हीं किन्हीं बर्तनों में से कोई बर्तन धुल कर मेरे पास आया होगा..एक पल को भी हमने कभी किसी से इस बारे में नहीं सोचा न कोई सोचता है..यह सहभोज से क्या कम है???-
    -------------------------
    अंतर सिर्फ हमारी सोच में है ..मानसिकता में ...और कहीं नहीं..

    उत्तर देंहटाएं
  14. आश्चर्य है प्रकाश गोविन्द जी ने अपने विचार खुल कर नहीं लिखे???
    उनकी टिप्पणी बस इतनी सी....
    सिर्फ 'विचारणीय पोस्ट'likha hai ??
    [****क्या ये उन के असली प्रोफाइल से किया गया कमेन्ट है??
    जांच की जानी चाहिए! :**** :)]

    उत्तर देंहटाएं
  15. आप को खिलाना ही है तो वो पकाओ जिसकी बलि नैनीताल के नैनी देवी के मंदिर में हर साल जून में दी जाती है . चाहो तो आ जाओ मिल भी लेंगे .
    http://vedquran.blogspot.com/2010/05/adams-family.html

    उत्तर देंहटाएं
  16. उस मानसिकता को मिटाने की कोशिश कीजिये जो यह कहती है कि एक तरह से काटे गये जानवर का मांस दूसरी तरह से काटे गये जानवर के मांस से भिन्न है... यही वह चीज है जो खत्म होना चाहिये.. मांसाहार से तौबा की जाये तो अच्छा रहेगा....

    उत्तर देंहटाएं
  17. जब घर से निकल पड़े क्या जूठ क्या सूच |
    जो प्यार से खिलावे उसकी जात मत पूछ ||
    भाईसाब ये सड़कों की चाय मत पिया करो जायदातर ये खोखे वाले ८०-९० रुपये किलो वाली खुली चाय पत्ती प्रयोग लाते है जो एसन्स व रंग से बनी होती है
    हमने एक किलोमीटर के मार्ग में ८ में से ५ सेम्पल नकली के पकड़े हुए है
    बर्तन तो जरूर धुलवाओ,
    और हथेली पर चाय पत्ती को अंगूठे से रगड कर देखो नकली रंग और गंध जरूर छोड़ेगी
    कई नकली चाय पत्ती ये टेस्ट नहीं देते उनके और टेस्ट है |
    http://sciencemodelsinhindi.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  18. हमारी सोच,हमारी व्यक्तिगत पसंद नापसंद,सब बलिहारी इस दूरी कम करने के लिये ! एकता न हुइ मजबूरी हो गई.आप किजिये आयोजन सह्भोज का.
    दूरी कम करने का और कोइ विकल्प (इसके सिवाय)नहि.तो रहे दूरी, बस फसाद न हो.

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!