शनिवार, 22 मई 2010

एक अकवितामय जीवन . . . . . .

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मेरे 'अकवि' मित्रों,

झेलिये आज यह... 'अकविता' जैसा ही कुछ...




साला जीवन इतना अकवितामय क्यों है ?



निकला हूँ घर से ठान के

मिलूँगा कविता से

जी भर देखूंगा

छुऊंगा दोनों हाथ से

महसूस करूंगा

खाऊंगा भी आज

पी जाऊंगा उसको

भोगूंगा

ओढ़ूंगा-बिछाउंगा

रखूंगा हरदम साथ

आखिर

इन्सान तो मैं भी हूँ ही

और

कविता तो होनी ही चाहिये

मेरे जीवन में भी



बताया किसी जानकार ने

मिलेगी वो तुमको

चौराहे की चाय-दुकान पर

जहाँ दिन भर के थके-मांदे

मेहनती मजदूर औ रिक्शे वाले

इकठ्ठा होते हैं शाम को

तन-मन की थकान मिटाने को

चाय की प्याली के साथ-साथ

कुछ देर हंसने-बतियाने को


पर नहीं मिली वो वहाँ

कान में धीरे से कह गया कोई

चाहते हो अब कविता से मिलना

तो जाओ किसी ५ सितारा बार में



सोचता ही रह गया मैं

देख पाऊंगा कविता को मैं

'नौशे' के 'नूर' की आंखों में

दिन भर हाड़-तोड़ पल्लेदारी के बाद

जब पहुंचेगा वो अपने आशियाने

गमछे में सौ ग्राम जलेबी बाँधे


पर मुझे तो वह मिली नहीं

दिखाई नहीं देती आजकल यहाँ

अब मैक्डोनाल्ड उसका बसेरा है



छूना चाहता हूँ मैं भी

इस अनछुई कविता को

पहुंच गया इसीलिये मैं भी

लहलहाते गेंहू के खेत पर

फसल काटने से पहले किसान

छू रहा था सुनहरी बालियों को


पर इस छुअन में भी

कविता तो कहीं नहीं थी

अब उसको छू सकते हैं

हैंडमेड सिल्क के बैड-लिनन पर




उसे महसूस करने को

पहुंच गया नदी के घाट पर

उतरा पानी में, गोता लगाया

कुछ देर खूब अठखेलियाँ की

ठंडा हो गया मेरा तन-मन भी

फिर खड़े हो ली गहरी सांसें



पर कविता जैसा कुछ भी

महसूस नहीं हो पाया मुझको

दिमाग पर हथौड़ा बजाते बोला कोई

अब ऐ.सी. से बाहर नहीं निकलती वो




चखना भी चाहता हूँ कविता को

इसलिये बहुत दिनों के बाद

पहुंच गया मैं बूढ़ी दादी के पास

जीमने मक्के दी रोटी और साग

दिल-दिमाग-पेट तृप्त हुऐ


पर कविता का स्वाद नहीं आया

नहीं चखते उसे घास-पात में

शेफ के हाथों बनायी रेसिपी में ही

अब उसको चखने का फैशन है



मैं निकला पीने कविता को

अपने गाँव के सोते पर

जिसके मीठे अमृत से पानी ने

पीढ़ियों से हमारी है प्यास बुझाई

जब नहीं होता था खाने को

तब यही अमृत भरता था

हम सबके पापी पेटों को


पर इस बार अमृतपान कर भी

कविता जैसा कुछ पी न सका

निश्चित है कि अब उसको

पिया जाता है छलकते जामों में



सोचकर कि उसे भोगूंगा मैं

निकल पड़ा भूखा औ प्यासा

लाज छिपाने लायक पहने वस्त्र

तपती धूप में नंगे पांव

कहीं कुछ काम कर कुछ कमाने

अपने कुनबे की भूख मिटाने

सोचकर यही कि कष्ट भोगूंगा

तो उसमें से निकलेगी कविता


भ्रम एक बार फिर ये टूट गया

कविता अब भोगी जाती है

पेज तीन की चमकदार पार्टी में

दमकती सु्ंदर जवानी के साथ



बरसात की उस अंधेरी रात में

टूटे घर की टपकती छत नीचे

बचते-बचाते सोने लायक जगह बनाई

तान दी फिर वह मच्छर दानी

दिन भर का थका हुआ मैं

घुस गया मैं पूरे एहतियात से

अपने मन में एक भरोसा लिये

कविता को ही आज ओढ़-बिछाऊंगा

आई ही नहीं वो मेरे पास तक


आज उसे वही ओढ़ते बिछाते हैं

जिनके पास है आभिजात्य सौंदर्यबोध

और है रूप-पद-हैसियत-धन का खुमार



अब कौन बतायेगा मुझको

साला मेरा यह बदरंग जीवन

इतना अकवितामय क्यों है?







आभार!
...

9 टिप्‍पणियां:

  1. अकवितामय होने पर ऐसा कवित्त!! बहुत सही बन पड़ी है!

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  2. एक छोटी सी...पर बड़ी अकविता...
    बेहतर...

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  3. waah kavita ko lekar itne saare vyang samaaj par bahut khoob...

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  4. behtareen kavita hai bhaayi
    -
    -
    sach men bahut pasand aayi
    aapko badhyai
    -
    -
    subh kamnayen

    उत्तर देंहटाएं
  5. सवाल तो यही है ...
    कविता मन से उपजे ...भाव अपने मन में हो तो पतझड़ सावन लगने लगता है ...
    विचारणीय अकविता ...

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  6. किसी और जगह की गई टिप्पणी का एक अंश और उसके बाद भी कुछ दे रहा हूँ (आइटम, नट, बोल्ट वगैरा ठीक कर रीअसेम्बल कर लीजिएगा):)

    "...बड़े शहरों की ज़िन्दगी अब 'सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यूँ है' की बिडम्बना से आगे वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ जलन और तूफान स्वीकृत हो चले हैं। मन में सवाल तक नहीं उठते । एक अज़ीब तरह की झुँझलाहट है जो नकार नहीं पाती क्यों कि नकार के साथ ही बिडम्बना और रोटी से जुड़ी समस्याएँ इतनी बड़ी दिखने लगती हैं कि सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है।
    दोस्त हैं लेकिन सतर्क से। विमर्श के और समागम के विषय या बहाने परिवेश से बाहर वालों के लिए कौतुहलकारी नहीं भयकारी हैं। 'गोली मार भेजे में ..' का बेलौसपना भी नहीं, अजीब सी बँधी जिन्दगी है, सिमटी हुई सी, औपचारिक सी। कहने के लिए भी दोस्त गले नहीं लगते ...दिखावे तक की हैसियत आधुनिक पहनावे सी हो गई है - यूज एण्ड थ्रो ...
    ऐसे में कविता ? क्षमा करें आर्य !'भोग' दु:ख देता है। इस दु:ख से 'मुझसे पहली सी मुहब्बत ' जैसी नज़्में नहीं निकलतीं।
    "
    "वत्स! तुम्हारी सोच सीमित है। दु:ख दु:ख ही होता है। इसमें प्रकार नहीं आकार होते हैं। इन आकारों को वाणी दो, काव्य स्वत: उतरेगा। क्रौञ्च वध तो शाश्वत है अनुष्टप भी शाश्वत हैं।"

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  7. कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूढ़े वन माहिं ।

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