गुरुवार, 20 मई 2010

मादरे हिन्द की बेटी है यह भी... पैने दांतों वाली...

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मेरे 'कविहॄदय' मित्रों,

यूं ही निरूद्देश्य विचर रहा था नेट पर,

तभी दिखाई दी यह तस्वीर (Google image)...

और अनायास याद आये जनकवि बाबा नागार्जुन और उनकी लिखी यह कालजयी कविता भी... वह कविता जो सिर्फ और सिर्फ 'बाबा' ही लिख सकते थे...



 


लीजिये आप भी पढ़िये...





पैने दाँतों वाली



धूप में पसरकर लेटी है

मोटी-तगड़ी,अधेड़,मादा सूअर...



जमना-किनारे

मखमली दूबों पर

पूस की गुनगुनी धूप में

पसरकर लेटी है

यह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है

भरे-पूरे बारह थनों वाली !



लेकिन अभी इस वक्त

छौनों को पिला रही है दूध

मन-मिजाज ठीक है

कर रही है आराम

अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान

दुधमुँहे छौनों की रग-रग में

मचल रही है आखिर माँ की ही तो जान !



जमना-किनारे

मखमली दूबों पर

पसरकर लेटी है

यह भी तो मादरे-हिन्द की बेटी है !

पैने दाँतोंवाली...







आभार!
...

11 टिप्‍पणियां:

  1. Ek beti apna, 'maa' hone ka farj nibha rahi hai...

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  2. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट..... वैरी गुड....

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  3. बाबा नागार्जुन की संवेदनशीलता पर कुछ भी कहना कम होगा.

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  4. बाबा नागार्जुन कुछ भी बिना मतलब बिना अर्थ के नहीं लिखते थे। क्या इस कविता से समाज के तमाम निचले तबकों और स्रियों का बोध वे नहीं करा रहे हैं?

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  5. इस तरह की कविता बाबा नागार्जुन ही लिख सकते थे ...आभार इसे पढवाने के लिए.

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  6. वाकई, ऐसा बाबा ही लिख सकते थे...आपका आभार!

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  7. असली मीनाकुमारी की रचनाएं अवश्य बांचे
    फिल्म अभिनेत्री मीनाकुमारी बहुत अच्छा लिखती थी. कभी आपको वक्त लगे तो असली मीनाकुमारी की शायरी अवश्य बांचे. इधर इन दिनों जो कचरा परोसा जा रहा है उससे थोड़ी राहत मिलगी. मीनाकुमारी की शायरी नामक किताब को गुलजार ने संपादित किया है और इसके कई संस्करण निकल चुके हैं.

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