शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

ब्लॉगवुड में आस्था का उफान, 'आस्तिकों' व धर्मयुद्धरत 'योद्धाओं' से एक सवाल .... और मछली का धर्म!

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मेरे 'धर्मयुद्धरत' मित्रों,

एक उफान सा आ गया है ब्लॉगवुड के कुछ ब्लॉगरों के बीच चल रहे धर्मयुद्ध में... मुद्दा वही पुराना है... मेरा धर्म ही एकमात्र धारण करने योग्य... हमारे धर्मग्रंथ में वर्णित ईश्वर ही एकमात्र उपास्य ईश्वर... उपासना का हमारा तरीका ही एकमात्र सही तरीका... तुम्हारा धर्म अतार्किक... उसमें वर्णित ईश्वर असली नहीं... उपासना का तुम्हारा तरीका गलत... समय आ गया है कि तुम 'सत्य' को जानो... हमारे 'ईश्वर' की सत्ता को स्वीकारो... आदि आदि ।

दोनों युद्धरत पक्ष एक बात पर एकमत हैं वह यह कि 'ईश्वर' के अस्तित्व पर सवाल उठाना या उठाने की सोचना तक गलत व ईश्वर के प्रति द्रोह है... तथा यह

नास्तिकता, संशयवाद या अज्ञेयवाद

समाज के लिये घातक है ।


सोच रहा था एक सवाल करूँ इन योद्धाओं से परंतु देखा कि यही सवाल बहुत पहले ही पूछ लिया है डॉकिन्स ने... मैं उनसे बेहतर तरीके से इस सवाल को फ्रेम नहीं कर सकता अत: उसे हिन्दी में दोहरा मात्र रहा हूँ...

सवाल यह है:-

यदि आप आस्तिक व आस्थावान हैं तथा धर्म को मानते हैं तो सांख्यिकीय दॄष्टि से अधिकांश मामलों मे आपका धर्म वही है जो आपके माता-पिता व उनसे पिछली पीढ़ी का था... आपके धर्म के निर्धारण में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनीय घटना थी आपका जन्म... किसी का भी इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं है कि वह किस माँ-बाप के घर पैदा हो... जरा सोचिये जिस 'धर्म', 'ईश्वर' व उससे जुड़े अन्य रीतिरिवाजों पर आप आज इतनी शिद्दत से विश्वास रखते हो... क्या वही पूरी तरह से अलग व अधिकांशत: आपकी आज की धारणाओं के विपरीत नहीं होते ?... यदि आपका जन्म किसी दूसरी जगह हुआ होता ।



“If you have a faith, it is statistically overwhelmingly likely that it is the same faith as your parents and grandparents had. By far the most important variable determining your religion is the accident of birth. The convictions that you so passionately believe would have been a completely different, and largely contradictory, set of convictions, if only you had happened to be born in a different place.”

Dawkins



अत: मेरे मित्रों अपने-अपने धर्म पर

आपका यह अभिमान

मिथ्या है...


क्यों न आस्था के बंधनों से बाहर निकल कर कुछ सवाल पूछना शुरू करो...


पर इसके लिये सबसे जरूरी है ...'आस्था व विश्वास' की

दिमाग को बाँधती

इन जंजीरों को तोड़ना !...
क्योंकि...



"आस्था आपको सवालों के जवाब नहीं देती परंतु उन सवालों को पूछने से ही रोक देती है!"

फ्रेटर रेवस




"Faith does not give you the answers, it just stops you asking the questions."

Frater Ravus




अब एक ऐसा ही असहज करता सवाल है कि:-


धर्म और ईश्वर में आस्था के बिना

आदमी कैसे रहेगा, कैसे जीयेगा ?



नहीं आता जवाब ?




सोचिये!


सोचिये!


सोचिये!


सोचिये!


सोचिये!


सोचिये!



नहीं पता क्या ?



चलिये बता ही देता हूँ...



जवाब है:-




"धर्म के बिना एक

आदमी ठीक उसी तरह

जी सकता है जिस तरह

एक मछली बिना

बाईसिकल के!"




"A man without religion is like a fish without a bicycle."

Vique's Law, quotes about Agnostic.




अब जब बात मछली पर आ ही गई है... तो मछली के ऊपर लिखा किसी अज्ञात 'ज्ञानी' का यह उद्धरण भी पढ़ ही लीजिये...


"Give a man a fish and he will eat for a day; teach a man to fish and he will eat for a lifetime; give a man religion and he will die praying for a fish."

Quote from Unknown.







ईश्वर और धर्म को समझने का प्रयास करती इस लेखमाला के अब तक के आलेख हैं:-


अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म


जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी?


पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...


ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...


क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...


एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...


यह कौन रचनाकार है ?...






आभार!




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13 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय प्रवीण शाह जी ,
    यहाँ आपकी बहुत सी बातों से सहमत हूँ लेकिन फिर एक असहमित आपके लेख के कुछ हिस्से के लिए ! मेरा मानना है कि आस्था इंसान को बांधे रखती है ! यहाँ भी वह उसे दो तरह से बांधती है एक अच्छे रूप में और दूसरा बुरे रूप में ! जो हम संस्कारों की बात करते है वो इस आस्था के साथ ही जुड़े है ! हमारे, आपके उपर हमारे माँ-बाप, परिवार समाज और देश ने कैसे संस्कार डाले, वहीआगे चलकर आस्था को अच्छा और बुरा मार्ग दिखाते है ! बच्चा पैदाइसी कोई आस्था या संस्कार लेकर नहीं आता ! उसके आस-पास का यहाँ का माहौल उसे इसका ज्ञान देता है ! अभी कल या परसों एक खबर उत्तर प्रदेश की अखबारों में पढ़ रहा था , जिसमे कहा गया था कि १६-२० साल के दो मुस्लिम नौजवानों ने अपने ही तीसरे दोस्त को कुछ पैंसो के लिए मार डाला , और मारा भी ऐसे नहीं तडपा-तडपा कर मारा ! पोलिसे स्टेशन में उनके चेरों पर ज़रा भी शिकन नहीं थी, और उन्होंने पूरी घटना पोलिसे को बताई कि कैसे उन्होंने अपने उस दोस्त को मारा और ऐसा करते हुए उन्हें कितना मजा आ रहा था ! जब इस दरिंदगी पर उनसे कोई झिझक न होने की बात पूछी गई तो उनका कहना था कि वे अपने घरों में बचपन से जानवरों को हलाल होते देखते थे और इसी बात से उन्हें यह प्रेरणा मिली ! खैर ये तो थी संस्कारों की बात अब यहाँ आपसे एक अपना पुराना लेख पोस्ट करने की अनुमति चाहता हूँ और निवेदन करूंगा कि आप इसे पढ़े ;
    आज जो हम लोग आम जीवन मे मानवीय मुल्यों का इतना ह्रास देख रहे है, उसकी एक खास वजह यह भी है कि हमारे धर्मो द्वारा निर्धारित जीवन के मुल्यों का कुछ स्वार्थी और तुच्छ लोगो द्वारा अपने क्षणिक स्वार्थो के लिये इनकी अनदेखी करना, इनका उपहास उडाना, खुद को इन मुल्यों से उपर बताना, इत्यादि । इसे मैं इस उदाहरण से समझाता हूं; मान लीजिये आपके आस-पास कहीं चोरी हो गई और आप पति-पत्नी घर पर बच्चो संग उसी विषय पर चर्चा कर रहे है, तो आपके चर्चा के दो नजरिये हो सकते है। एक यह कि चोरी करना बुरी बात है, और चोर को इसका फल जरूर मिलेगा । दूसरा नजरिया यह कि अरे भाई, उसको जरुरत थी तभी तो उसने चोरी की, अगर उसका भी पेट भरा हुआ हो तो भला वह चोरी करने ही क्यो जायेगा?( इस नजरिये को मानने वाले भी तभी तक उसे मान्यता देते है जब तक वह चोर दूसरों के घर मे चोरी कर रहा होता है ,उनके घर मे नही) आप इसमे से पहले नजरिये को धार्मिक अथवा आजकल की भाषा मे साम्प्रदायिक नजरिया कह सकते है और दूसरे नजरिये को सेक्युलर नजरिया, मगर साथ ही यह भी गहन विचार कीजिये कि आपकी इस चर्चा को सुन रहे आपके बच्चो पर कौन से नजरिये का क्या असर होगा?

    जब कोई भी इन्सान यहां कोई अच्छा-बुरा काम करता है तो लगभग सभी धर्मो मे यह कहा गया है कि भग्वान उसे उसका फल अवश्य देता है ! अब मान लो कि चाहे यह बात मिथ्या ही क्यों न हो, लेकिन इसका समाज पर कम से कम यह असर तो पडता था कि गलत काम करने वाले के मन मे यह भय होता था कि भग्वान उसे ऐसा करते देख रहे है, और उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना पड सकता है, अर्थात मिथ्या पूर्ण होते हुए भी वह बात समाज के हित मे थी, लेकिन आज इन स्वार्थी तथाकथित सेक्युलरों ने तो तरह-तरह के उदाहरण पेश कर इन चोरो के मन का यह भय भी खत्म कर दिया!

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    आदरणीय गोदियाल जी,

    अच्छा सवाल उठाया है आपने, 'गलत काम करने वाले के मन में ईश्वर का भय'... परंतु अधिकांश लोगों के आस्थावान होने के बावजूद क्या गलत काम रूके हैं?... या कभी रूके थे?...इस पर फिर कभी लिखूंगा विस्तार से...

    तब तक के लिये यही कहूंगा कि सुलभ व त्वरित न्याय से ही गलत काम रूकेंगे...कोई 'ऊपरवाला' नहीं रोक सकता उन को... 'नर्क' से डरा कर या 'स्वर्ग' का लालच देकर भी!

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  3. जंगल में जंगलराज होता है .. जो ताकतवर है उसकी चलेगी .. पर इंसानों के समाज में ऐसा नहीं होना चाहिए .. यही कारण है कि इंसान आज ताकतवर पशुओं को भी अपने वश में करके उससे फायदा ले रहा है!!

    सुलभ व त्वरित न्याय कितने जगहों पर की जा सकती है .. कौन एक एक घर में जा जाकर झांक झांककर देखता रहेगा .. कहां कहां अन्‍याय हो रहा है .. पर अच्‍छे मूल्‍यों की सीख देकर आज अधिकांश जगहों पर गलत काम नहीं होने दिया जा सकता .. उन्‍हीं मानवीय मूल्‍यों के पालन का नाम ही तो धर्म होता है .. अब आज इसका विकृत रूप सामने आ गया है .. उसे तो धर्म नहीं कहा जा सकता न .. देश , काल और समाज के अनुरूप धर्म का स्‍वभाव होता है .. इसीलिए तो धर्म समय समय पर पुनर्स्‍थापित किए जाते रहे हैं .. आज के समाज के जरूरत के मुताबिक इसे ढाला जाना चाहिए .. प्रकृति के कुछ नियम हैं और जिनको भी इसपर विश्‍वास होगा .. वे गलत काम नहीं कर सकते .. यदि वे गलत काम कर रहे हैं .. तो धार्मिक नहीं .. ढोंगी हैं !!

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  4. ऊपरवाले की निगाह में तो ये सारे के सारे सिर्फ़ उस सर्वशक्तिमान को किसी न किसी स्टाइल में गाली ही दे रहे हैं। देखिए, वो कब बवाल मचाता है ? हा हा।

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  5. main to hamesha se saleem aur kairanvi ke khilaaf hoon mere saath kaun hai haath uthaye .... sorry mere blog par aaye ek esoshiyeshan banana chahta hoon muslim blogger's virodhi morcha sangh

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  6. यहाँ तो इदरीसी जी ने अपनी अलग ही सोच रख दी इसके पीछे क्या रहस्य है ये विषय गूढ़ है। शाह साहब के बारे में अनूप मंडल के लोग बोलेंगे कि ये तो जैन ठहरे तो ये चाहेंगे ही कि अन्य धर्मों को मानने वाले धर्मविमुख हो कर संस्कार हीन हो जाएं। गोंदियाल जी की बात से सहमति है किन्तु धार्मिकता के परिप्रेक्ष्य में ही लें सामाजिकता अथवा ऐतिहासिक बातों के संदर्भ से हमारे देश की आज की स्थितियों का पोस्टमार्टम न हो, बेहतर जीवन एक आम आदमी के हिस्से में आए ये हमारी पहली और आखिरी बात होनी चाहिये।

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  7. अंधाधुंध धर्मविरोध भी एक सम्प्रदाय (cult) ही है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं. नास्तिकता और दूसरों की सरल-सहज मान्यताओं का मज़ाक या अंधे धर्म-विरोध में उतना ही अंतर है जितना छद्मविज्ञान और विज्ञान में. हूँ मैं नास्तिक तो क्या हुआ, मैं दूसरों को सिर्फ इसलिए अज्ञानी नहीं कहता रहूँगा क्योंकि वे आस्तिक हैं. आस्तिक होते हुए भी ब्लेज़ पास्कल जैसे लोग महान वैज्ञानिक हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे.

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  8. अगर अकबर का स्वभाव औरंगजेब की तरह होता
    या फिर
    औरंगजेब की बुद्धि अकबर की तरह होती तो
    आज हम सब दीन-ऐ-इलाही मजहब ओढ़े होते :)
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    "धर्म और ईश्वर में आस्था के बिना
    आदमी कैसे रहेगा, कैसे जीयेगा ?"
    -
    भाई मेरे जी तो रहा हूँ ..... औरों से कहीं बेहतर और मस्त

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  9. @ "धर्म और ईश्वर में आस्था के बिना
    आदमी कैसे रहेगा, कैसे जीयेगा ?"
    -
    भाई मेरे जी तो रहा हूँ ..... औरों से कहीं बेहतर और मस्त


    धर्म के बिना खुद ही तो जीते हैं न आपलोग .. दूसरो को जीने में बाधा नहीं डालते बस इतना ही ना।
    पर धर्म का साथ देने वाले हमारे पूर्वजों की तरह दूसरों को जीने में मदद तो नहीं करते न .. विभिन्‍न कर्मकांडो के कारण एक एक घर को एक एक व्‍यक्ति को रोजगार देते थे वे .. पर्व त्‍यौहारों समाज के किसी भी वर्ग के सहयोग के बिना पूरा नहीं होता था .. और सबके लिए मजदूरी दी जाती थी उन्‍हें .. विभिन्‍न पशुओं और पक्षियों तक के महत्‍व के लिए नियम बने थे .. बिना धर्म के कौन इतना करेगा ??

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  10. आपके यहां एक अलग सी ही उर्जा दिखती है...
    हर चीज़ पैदा मरने के लिये ही होती है...उससे बेहतर विकसित विकल्प आते ही हैं...

    जैसे-जैसे समझ विकसित होती जाती है...ज़िंदगी से काल्पनिक आडंबर दूर होते जाते हैं...

    पता नहीं क्यों लोगों को बहाने क्यों चाहिए होते हैं....

    आभार...आपका...

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  11. अब मछली भी नहीं हैं हम। साइकल भी नहीं है। धर्म की जो भी अवधारणा है, कांख से दबाये हैं। इतनी जिन्दगी निकल गई है। नास्तिकता के प्रयोग करने होंगे तो आगे कई जन्म हैं उसके लिये।

    या शायद पिछले जन्मों में कर भी आया होऊं!

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  12. God & Religion is the universal truth of this universe. The only justified way is to find the Pure & unadultrated "Dharam". If we don't believe in God, we are spending our life here in this world uselessly. "Daharam" with the concept of a life after death provides the meaning to our lives. A day of judgement when there will be complete justice with all.

    Iqbal Zafar.

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