शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

अभी होंगे कितने फैसले... और कितनी बार कयामत होगी ?

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मेरे 'उस' के निर्णय की प्रतीक्षारत मित्रों,

अपनी चर्चा अभी जारी है... हाँ तो दोस्तों एक बहुत बड़ा प्रलोभन धर्म देता है 'अपने मानने वालों' को... और वह 'लालच' है Heaven या स्वर्ग या जन्नत का... इस लालच का आधार व वादा सभी धर्मों में कमोबेश एक सा ही है...

और वह है कि...

'मानने वाला' अपने अपने धर्म के बताये अनुसार अपने अपने धर्म-स्थल में जाकर नियम पूर्वक रोजाना 'उस' का Ego Massage करे, गुण गाये 'उसके', झुके 'उसके' आगे, 'उसकी' कृपा मांगे, शुक्रिया करे उसका यह दुनिया और 'तुम' को बनाने के लिये, जाने अनजाने में 'उसकी' शान में हुऐ गुनाहों की माफी माँगे, कुछ खास 'जगहें' (तीर्थ स्थान) जहाँ शायद 'वो' ज्यादा रहता है-उन 'जगहों' की यात्रा करें, उसके प्रति अपनी वफा जताते हुऐ भूखे रहें कुछ खास दिन और यह सब करते-करते थक कर एक दिन विदा हो जाये इस 'जहान' से...

अब इसके बाद रोल शुरू होता है 'उस' का... कुछ धर्मों के मुताबिक मरने के एकदम बाद और कुछ के मुताबिक एक नियत दिन (कयामत का दिन) 'तुम' सारों का 'फैसला' होगा... और जिन्दा रहने के दौरान कितनी वफादारी दिखाई तुमने 'उस' के प्रति... इस 'पैमाने' पर नाप कर 'तुम' को वह भेजेगा स्वर्ग या नर्क में...




ऐसा होगा नर्क-जहन्नुम-Hell

यह कैदखाना कमोबेश सभी जगह एक सा है... प्रताड़नाओं में शामिल है आग से जलाना, भूखा-प्यासा रखना, खौलता पानी शरीर पर डालना, खौलता पानी पीने को देना, बिना इलाज के छोड़ देना आदि आदि... बहुत गंदा और बदबूदार स्थान है यह!





और यह रहा स्वर्ग-जन्नत-Heaven

नर्क तो आदमी और औरत दोनों का है पर स्वर्ग केवल पुरूषों के लिये ही बनाया प्रतीत होता है अधिकाँश धर्मों मे...यहाँ मिलेंगी अति सुन्दर चिर-कुंवारी, चिर-यौवना अप्सरायें या हूरें... जिसे चाहें भोगें... पानी की जगह नालियों में बहती होगी 'सुरा' या शराब... सुगंध होगी... संगीत होगा... एअर कंडीशनिंग भी होगी वहाँ!
अब यह बात दीगर है कि इन्ही सब चीजों का जिन्दा रहते निषेध करता है हर कोई 'धर्म'...



यहाँ तक तो सब ठीक है पर एक अडंगा है.......



स्वतंत्र इच्छा या Free Will


जिस पर 'उस' का कोई जोर नहीं है!


एक सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष जो आप इस स्वर्ग-नर्क-फैसले की अवधारणा से निकाल सकते हैं वह यह है कि Free Will यानी किसी इंसान की स्वतंत्र इच्छा पर ईश्वर का कोई नियंत्रण नहीं है क्योंकि यदि होता तो पृथ्वी का हर इंसान 'उस' का ही कहा मानता और 'फैसले' की कोई जरूरत ही नहीं होती ।

धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...

और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!



और कुछ समय बाद Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) जन्नत को जहन्नुम से भी बुरा बनाने में कामयाब हो जायेगी।




फिर आप ही सोचो कि, होंगे कितने फैसले... और कितनी बार कयामत होगी ?

आभार!














ईश्वर और धर्म को समझने का प्रयास करते मेरे अब तक के आलेख हैं:-

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...










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17 टिप्‍पणियां:

  1. कौन जाने कितनी बार कयामत होगी ?

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. मौत के बाद जन्नत - तथाकथित धार्मिक लोगों के लिए पाप ( खूब शराब और सुंदरियों के साथ ) करने की जगह, जो धर्म द्वारा ही स्वीकृत है
    मौत के बाद दोज़ख उन्हें - जो बिना धार्मिक परमीशन के, इस जनम में तथाकथित जन्नत ( खूब शराब और सुंदरियों को ) भोगने का प्रयत्न करते हैं ....
    क्या करना चाहिए प्रवीण भाई ??

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  4. आपके इस लेख की चर्चा की है प्रवीण भाई ..

    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/04/blog-post_17.html

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  5. कितनी हसीन कल्पनाएँ न ! जो इस जहां में हासिल न हो सका हे खुदा के बन्दे तुम हौसला रख तुझे कह सब जन्नत में नसीब हो जाएगा ! इसमें बुरा क्या है ?

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    आदरणीय सतीश सक्सेना जी की पोस्ट http://satish-saxena.blogspot.com/2010/04/blog-post_17.html पर दी गई मेरी टिप्पणी यह है।
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    आदरणीय सतीश सक्सेना जी,

    आभार आपका, मेरे सवाल को और विस्तार देने के लिये...

    "मौत के बाद जन्नत - तथाकथित धार्मिक लोगों के लिए पाप ( खूब शराब और सुंदरियों के साथ ) करने की जगह, जो धर्म द्वारा ही स्वीकृत है
    मौत के बाद दोज़ख उन्हें - जो बिना धार्मिक परमीशन के, इस जनम में तथाकथित जन्नत ( खूब शराब और सुंदरियों को ) भोगने का प्रयत्न करते हैं ....
    क्या करना चाहिए हमें ??"

    मेरा जवाब सीधा सादा होता है इस बारे में सामाजिक नियमों और नैतिकताओं के दायरे में रहते हुऐ आप को हर उस चीज का आनंद लेना चाहिये... जो प्रकृति प्रदत्त या मानव निर्मित है... बशर्ते आप उसे एफोर्ड कर सकें... यदि हर इंसान ऐसा ही माने... तरक्की का प्रयत्न न छोड़े... अपनी वर्तमान स्थिति को 'उस' के द्वारा तय 'नियति' मान कर संतुष्ट न रहे... तो आदमी की कौम और उसकी दुनिया और बेहतर होगी... आज तक के जितने भी बेहतरी के प्रयास हुऐ हैं वह इसी मानसिकता के लोगों ने किये हैं...

    एक और बात जो इस तरीके से निकलेगी, वह यह है कि ऐसी दुनिया में सोच-समझ से परे 'उस' के लिये कोई स्पेस शायद नहीं होगा!

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  7. "सामाजिक नियमों और नैतिकताओं के दायरे में रहते हुऐ आप को हर उस चीज का आनंद लेना चाहिये... जो प्रकृति प्रदत्त या मानव निर्मित है..."

    100% agreed, yaheen swarg hai yaheen narg bhee hai . baakee sab to Osama Bin Laden ke banaaye hue hai , bewqoofo ko moorkh banane ke liye !

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  8. स्‍वर्ग नरक का डर इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए है।

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  9. मैं गोदियाल साहब से पूर्णतया सहमत हूँ !
    सादर

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  10. प्रवीण भाई !
    "नर्क तो आदमी और औरत दोनों का है पर स्वर्ग केवल पुरूषों के लिये ही बनाया प्रतीत होता है अधिकाँश धर्मों मे...यहाँ मिलेंगी अति सुन्दर चिर-कुंवारी, चिर-यौवना अप्सरायें या हूरें... जिसे चाहें भोगें... पानी की जगह नालियों में बहती होगी 'सुरा' या शराब... सुगंध होगी... संगीत होगा..."
    स्त्रियों के बारे में क्या कहा गया है, उन्हें अगर स्वर्ग दिया गया तो क्या सुविधाएँ दी जायेंगी ! इस पर आप चुप हो गए ....
    क्योंकि विषय आपका है अतः उम्मीद है बचे हुए विषय पर अगली पोस्ट आप ही लिखें....इंतज़ार में , ताकि विद्वान् इस तत्व को भी समझ पायें !
    प्रतीक्षा में

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