सोमवार, 5 अप्रैल 2010

मेरा दावा है कि मेरा धर्म ही सबसे श्रेष्ठ, महानतम ,एकमात्र ईश्वर प्रदत्त व अनुकरणीय धर्म है !!!. . . . . . है कोई जवाब ?

.
.
.
मेरे धर्मपरायण मित्रों,

धर्म और ईश्वर के बारे में पढ़ते-खोजते हुऐ एक नायाब उद्धरण हाथ लगा...

सोचा क्यों न इसे आपके साथ साझा किया जाये...

यह इस प्रकार है...


"We must respect the other fellow's religion, but only in the sense and to the extent that we respect his theory that his wife is most beautiful and his children smartest."

__H. L. Mencken



अर्थात...

"हमें किसी दूसरे के धर्म की इज्जत अवश्य करनी चाहिये परंतु यह इज्जत उतनी ही व उसी सीमा तक हो, जितनी इज्जत व गंभीरता से हम उसके इस दावे को लेते हैं कि उसकी पत्नी सबसे ज्यादा सुन्दर व उसके बच्चे सबसे ज्यादा होशियार हैं।"

___एच.एल.मेंकेन




ईश्वर और धर्म को समझने का प्रयास करते मेरे अब तक के आलेख हैं:-

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...


अपनी बात समाप्त करता हूँ एक संशयवादी की इस प्रार्थना के साथ...

The prayer of the agnostic:

"O God, if there is a God, save my soul if I have a soul."

(Ernest Renan / 1823-1892)


आभार!








...

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पढ़ने आए थे
    'मेरे धर्मपरायण मित्रों,'
    पढ़ कर जा रहा हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. .
    .
    .
    @ आदरणीय गिरिजेश राव जी,
    आप नहीं समझोगे कि आपका आना और टिपियाना कितना सुखद है मेरे लिये...
    अगली बार आप निराश नहीं होंगे यहाँ आकर... :)
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  4. धर्म का लक्षण है धारण करना, वह भी सत्य का ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. धर्म की सबसे अच्छी कसौटी है-
    श्रॄयताम् धर्मसर्वस्वं श्रॄत्वा चैवावधार्यताम् |
    आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ||

    "धर्म का सार सुनो और सुनकर इसका पालन करो। (धर्म का सार यह है कि) जो (आचरण) अपने प्रतिकूल हो (अर्थात यदि कोई दूसरा आपके साथ कुछ करे जो आपको अच्छा न लगे), वह आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।

    Please listen to the essence of Dharma (i.e. piety) and having listened to it, bear in mind. The essence of Dharma is: Whatever is adverse (or Unfavourable) to us, we should not adopt (operate) that in case of others.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीय शाजी,
    एच.एल.मेंकेन ने तो सिर्फ एक पक्ष ही अपने एक कोट में उतारा है कि "only in the sense and to the extent that we respect his theory " मगर मेरा रोना दूसरा है मैं कहता हूँ कि उस तारीफ़ करने वाले की अक्ल पर क्यों पत्थर पड़ जाते है, जो वह अपने मुह मिंया मिट्ठू बनता है ! दुसरे तारीफ़ करे तो बात बने :) खूबसूरती और स्मार्टनेस का आलम दुनिया को भी तो नजर आना चाहिए !

    उत्तर देंहटाएं
  7. @godiyal ji aapki akl par bhi pathar pada rahata hai...hamesha

    उत्तर देंहटाएं
  8. मै इस ब्रम्हांड में सबसे महान हू .और यही दुनिया का सबसे महँ धर्म है

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपका दावा होता तो जवाब देते,आपने तो मेंकेन का दावा सामने रख दिया.वैसे एक बात कहूं सब जानते है कि सभी धर्म अच्छे है?ब़स सबके सामने स्वीकारते नही है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. मेरा धर्म भी बहुत विचित्र है फ़िर कभी बताउगा

    उत्तर देंहटाएं
  11. मजा आ गया.......वाह....बहुत खूब.....
    ............
    नक़ल करके और रट्टा मार कर.... इंसान तो बने नहीं....कोई भगवान कैसे हो पायेगा...?
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी कलम की बहुत जरूरत है हम सबको , धार्मिक असहिष्णुता के इस दौर में आपको पढना सुखद लगा !
    शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  13. संशयवादी सोच धार्मिकता के नकारात्मक प्रभावों से कइयों को बचाने की क्षमता रखती है. आपके उठाए बिंदुओं पर ध्यान जाना स्वाभाविक है.

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!