गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

चलो मान लिया कि आज एक अप्रैल है . . . लेकिन क्या इसका मतलब यह मानूँ कि इस बार भी कोई 'समझदार' इस पोस्ट को नहीं पढ़ेगा !!!

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मेरे क्षमाशील पाठक,

मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर अभी काफी चर्चा की जरूरत है अपने हिन्दी ब्लॉगजगत में...

इसलिये दोबारा से एक बार लगा रहा हूँ अपनी यह पोस्ट :-
(अग्रिम क्षमायाचना के साथ!)



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मेरे नारी सशक्तिकरण चिंतक मित्रों,


कभी-कभी मेरी तरह आपको भी नहीं लगता कि प्रबुद्ध वर्ग में मुद्दों पर बोलने, सोचने या चिंता जताने का भी एक फैशन सा होता है... जैसे कि कुछ साल पहले तक फैशन था ओजोन परत की चिंता करने का, अब यह बात दीगर है कि वायुमंडल की ऊपरी ओजोन परत पर यह सूराख खुद ही भर गया... अब आजकल फैशन है क्लाइमेट चेंज , १४११ और महिला आरक्षण की चिंता करने के फैशन का...


यह फैशन इतना जोर पकड़ लेता है कि प्रचलित फैशन का विरोध कर रही आवाजें या असहमति जताते व्यक्तित्व प्रबुद्ध वर्ग के लिये परिहास (Ridicule) का पात्र बन जाते हैं, आईये देखते हैं कि आदरणीय लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, सुश्री मायावती जी तथा अन्य नेतागण जो महिला आरक्षण के विधेयक का संसद में जो विरोध कर रहे हैं क्या वह विरोध गैरवाजिब है... अथवा इस विरोध के पीछे कुछ जायज वजहें हैं।


आइये साथ-साथ इस मुद्दे की तहें खोलते हैं...



*** असलियत में किसे मिलेगा प्रतिनिधित्व...?

सिवाय कुछ Specialized high risk jobs के, आजादी के बाद से भारत की सभी महिलाओं के लिये सारे रास्ते खुले हैं... राजनीति सहित किसी भी क्षेत्र में महिलायें उतर सकती हैं... हकीकत यह है कि जो महिलायें राजनीति के माध्यम से अपना योगदान देना चाहती हैं, वह पहले से ही राजनीति में हैं... देश का राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, कैबिनेट मंत्री, प्रदेशों के मुख्यमंत्री आदि सभी पदों पर महिलायें थीं, हैं और भविष्य में भी बनती रहेंगी... जो महिलायें आज राजनीति में नहीं हैं, वह केवल इसलिये नहीं हैं क्योंकि उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने लिये किसी अन्य क्षेत्र का चयन किया है...


यदि संवैधानिक तौर पर हर पांच साल में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित कर दी जाती हैं तो उसका फल होगा कि...

१- सीधे तौर पर वंशवाद को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि राजनीतिक घराने आरक्षित सीटों पर अपने परिवार की महिलाओं को उनकी अनिच्छा के बावजूद लड़ायेंगे... तथा धन-बल और राजनीतिक पृष्ठभूमि के चलते यही महिलायें बाकी उम्मीदवारों पर भारी पड़ेंगी और जीतेंगी भी।

२- पंचायतों में अनिवार्य महिला आरक्षण के परिणाम स्वरूप 'प्रधान पति' नाम का एक नया वर्ग पैदा हो गया है जो बिना किसी जवाबदेही के महिला प्रधान के सारे अधिकार भोगता है, कई जगहों पर तो बाकायदा 'प्रधान पति'संगठन हैं... 'सांसद पति' कैसे लगेंगे हमारे लोकतंत्र को...



*** क्या होगा बाकियों का....?

एक प्रावधान है इस विधेयक में, हर पांच साल के बाद आरक्षित सीटों के Rotate होने का... यह गणित इस प्रकार है मानिये २०१४ के चुनाव में सीट सं० ००१ से १८१ तक आरक्षित हैं... तो २०१९ के चुनाव में होगा यह कि सीट सं० ००१ से १८१ पर तो सिटिंग एम०पी० क्योंकि महिला हैं ही अत: उनमें से अधिकांश तो टिकट पा ही जायेंगी... इसके अलावा सीट सं० १८२ से ३६२ तक महिलाओं के लिये आरक्षित हो जायेंगी... मतलब २०१९ में दो तिहाई सीटों पर अधिकांश Winnable उम्मीदवार महिला होंगी... २०२४ में स्थिति रहेगी सीट सं० २६३ से ५४३ तक महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी, जबकि शेष ३६२ सीटों पर क्योंकि विगत १० वर्षों में अधिकतर सांसद महिलायें ही रही हैं, अत: २०२४ के चुनाव में भी अधिकांशत: उन्हीं को असरदार व Winnable टिकट मिलेंगे... अब आप ही बताइये कि पुरूषों के लिये Political Space कहाँ छूटता है इस विधेयक के बाद...

हर कोई पुरूष राजनीतिज्ञ कोई राजवंशीय विरासत भी नहीं रखता कि हर पांच साल बाद सीट बदल कर पहुँच सके संसद में...



*** आखिर औचित्य क्या है इस सब का...?


सब से बड़ा सवाल जो उठता है वो ये है कि इस सब कवायद का उद्देश्य क्या है... क्या वाकई में महिलाओं के साथ सामाजिक अन्याय हो रहा है, जो इस आरक्षण की जरूरत है ?... यदि ऐसा है तो क्यों नहीं कानून को और ताकत दी जाती, उसका पालन सुनिश्चित किया जाता ?... राजनीतिक स्तर पर क्या महिलाओं के साथ कोई भेदभाव हुआ है ?... सुना तो आज तक नहीं कभी कि किसी महिला ने यह कहा हो कि वह राजनीति में अपनी क्षमता के मुताबिक पद तक इसलिये नहीं पहुंच पाई क्योंकि वह एक महिला है।



*** क्या इस महादेश को नहीं चाहिये श्रेष्ठतम नेतृत्व...?


क्या यह सही नहीं कि २१ वीं सदी में तेजी से आगे बढ़ते व संभावनापूर्ण इस महादेश को जाति, धर्म और लिंग से ऊपर उठकर एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो परिश्रमी, साहसी, कर्मठ, ईमानदार व दूरगामी सोच रखने वाला हो... वह महिला हो या पुरुष इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है... हाँ, इस बात से जरूर फर्क पढ़ेगा कि वह नेतृत्व उपलब्ध विकल्पों में से श्रेष्ठतम है कि नहीं ?... और महिला आरक्षण का यह विधेयक उस श्रेष्ठतम नेतृत्व को खेल से ही बाहर कर सकता है।



*** यह कोटा बढ़ तो सकता है, पर घटेगा नहीं कभी... !


१५ साल बाद इस आरक्षण पर पुनर्विचार होगा तो, परन्तु जैसे पहले ही बता चुका हूँ कि १५ बरस में ७० प्रतिशत से अधिक सांसद महिला ही होंगी... तब क्या कोई पुरूष उम्मीद कर सकता है कि यह आरक्षण कभी खत्म होगा... मेरे विचार में इसे ५० प्रतिशत कर दिया जायेगा ।




आँखें बंद कीजिये, मेरे लिखे पर विचार कीजिये, फिर अपनी राय बताइये...


आभार!








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