बुधवार, 17 मार्च 2010

सूरज, चांद, तारे, जमीन, आकाश, पेड़- पौधे, जीव जंतु... यानी सारे जगत का, कौन यह रचनाकार है ? . . . . . . आईये उस से मुलाकात करें !

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मेरे रचनाकार मित्रों,

२६ फरवरी से प्रारंभ यह लेखमाला अभी और आगे चलेगी...

अब तक के आलेख हैं:-

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

अब सवाल यह भी उठना लाजिमी है कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ तो मित्रों, AGNOSTIC (संशयवादी या अज्ञेयवादी) दॄष्टिकोण से यह सब लिखने का मेरा एक मात्र मकसद है...
* खुद के और आपके मस्तिष्क को विचार मंथन के लिये थोड़ी और खुराक देना...
** धर्म और ईश्वर से संबंधित एक और नजरिये से आपको रूबरू कराना...
*** सत्य की खोज पर जाते अपने पाठक को एक और साफ सुथरा, सीधा परंतु कम प्रचलित (Less traveled) रास्ता दिखाना...

स्पष्ट कर दूँ कि स्थापित धर्म और सुस्थापित 'वर्तमान ईश्वरों' से मेरा कोई विरोध न कभी था और न कभी होगा... अभिव्यक्ति और अपने मत या विचार के प्रचार की आजादी एक सर्वोपरि मानवीय मूल्य है... मुझे इसकी समझ है, और मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे धार्मिक आलोचक भी इस बात को समझेंगे...


अब आता हूँ अपनी आज की बात पर...

धर्म या मजहब चाहे कोई भी हो... 'ईश्वर' या 'भगवान' या 'मालिक' या 'ऊपर वाला' या और भी अनेकों नाम से जिस ताकत को मानता है... और अपने-अपने धर्मावलंबियों का जीवन-ध्येय यह बताता है कि वे हरदम-हमेशा इस 'मालिक' को खुश रखें... उसको पूजें... उसके आगे झुकें आदि आदि... कुल लब्बोलुबाब यह है कि येन-केन प्रकारेण उस 'मालिक' की कृपा प्राप्त करें...

तो इस मालिक के पक्ष में धर्म का सबसे बड़ा तर्क इस प्रकार है...

धर्मग्रंथ कहते हैं कि सूर्य, चंद्र, तारे, आकाश, धरा, वायुमंडल, पेड़-पौधे, जीव-जंतु यानी सब कुछ जो आज अस्तित्व में है... जो आज हमें दिखाई देता है, और जिसे हम आज नहीं भी देख पा रहे... यब किसी न किसी ने तो बनाया ही होगा... और जिसने यह सब बनाया वही 'ईश्वर' या 'मालिक' है।

आज जो सबूत हमारे सामने हैं वह ये हैं कि एक समय ऐसा था जब कुछ नहीं था... Our universe is thought to have begun as an infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity.... मतलब अनंत रूप से गर्म, अथाह घना, अनंत उर्जा युक्त व अनंत रूप से सूक्ष्म एक बिन्दुमात्र था यह बृह्मान्ड कभी... उस समय न समय(space) था, न द्रव्य(mass) और न जगह (space)... तब ये 'मालिक' कहाँ खड़ा रहा होगा ??? ... फिर एक धमाका BIG BANG हुआ... समय, द्रव्य और जगह बने... बृह्मांड (Universe) बना जो आज भी फैल रहा(Expanding universe) है।

अब आइये धर्म के तर्क पर...
यदि आप कहें कि इस सब को किसी ने बनाया नहीं... न किसी ने यह सब पैदा किया... तो धर्म कहेगा कि यह तो असंभव है... हर चीज जिसका अस्तित्व है, स्वयमेव अस्तित्व में नहीं आ सकती... जिसने इन सब चीजों को बनाया वही ईश्वर है।

उपरोक्त तर्क में दो बड़े छेद हैं...

१- आप सवाल पूछो कि चलो आपकी बात मान ली कि ईश्वर ने बृह्मांड बनाया... अब जरा यह बता दीजिये कि ईश्वर को किसने बनाया या पैदा किया... धर्म कहेगा कि उसे तो किसी ने न बनाया न पैदा किया... वह हमेशा से ऐसा ही है...
अजीब बात है भाई जब कहो कि किसी ने बृह्मांड को नहीं बनाया या पैदा किया... यह हमेशा से ऐसा ही है बस अपना रूप बदलता रहता है... तब तो आप मानते नहीं... जबकि आप तार्किक दॄष्टि से विचार कीजिये तो दोनों तर्क एक ही जगह पर तो आकर खत्म हो रहें हैं... यानी एक ऐसी चीज पर जिसके बारे में आज की तारीख में आदम-जात के पास जानकारी नहीं है कि उसको बनाया या पैदा किसने किया...

२- दूसरी बात यह है कि हरेक चीज के बारे में यह पता करना कि उसे किसने बनाया या पैदा किया एक पूरी तरह से मानव मस्तिष्कीय गुण है, यदि मानव इतनी बुद्धि और ज्ञान अर्जित न करता या स्वयं कुछ रचना (create) करने की योग्यता न प्राप्त कर पाता तो क्या यह सवाल पूछा जाता... नहीं न !... फिर 'ईश्वर' कहाँ जाता?


रही बात विश्वास और उसे साबित करने या न कर पाने की जरूरत की, तो मजाक के तौर पर ही अगर मैं यहाँ पर यह कह दूं कि...

ईश्वर को बनाया है 'टमटम' ने जिसे 'पमपम' ने बनाया था... अत: 'पमपम' ही जगत का असली 'मालिक' है! यह मेरा विश्वास है।

तो आप या कोई भी इस विश्वास को गलत नहीं साबित कर सकते... याद रखिये जैसे ही विश्वास शुरु होता है तर्क, तथ्य और ज्ञान वहीं पर खत्म हो जाते हैं।



जाने से पहले पढ़िये मार्कस आरीलियस का यह उद्धरण जो मुझे बहुत प्रिय है...

"Live a good life. If there are gods and they are just, then they will not care how devout you have been, but will welcome you based on the virtues you have lived by. If there are gods, but unjust, then you should not want to worship them. If there are no gods, then you will be gone, but will have lived a noble life that will live on in the memories of your loved ones. I am not afraid."

Marcus Aurelius,
Stoic philosopher and Roman Emperor during the 1st century CE.


So, Live a good life and don't be afraid !

आभार!





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19 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. क्या प्रवीण शाह जी, आप भी फालतू का टेंशन लेते (Vice-Versa) है ! आज सुबह अखबार में एक नया -नया जोक पढ़ा , अच्छा लगा इसलिए आपको भी सूना देता हूँ ;
    सुबह-सुबह एक मुर्गी दूकान पर अंडे लेने गई , उसे देख दुकानदार आश्चर्य चकित हो पूछता है; अरे , तुम जब खुद अंडे दे सकती हो तो काहे को पैसे खर्च कर रही हो ?
    मुर्गी बोली ; दुकानदार जी वो बात ऐसी है कि इन्होने (यानी मुर्गे ने ) मुझसे कहा कि काहे दो रूपये के खातिर अपनी फीगर खराब करती हो ! :)

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  3. एक टिप्पणी तो बिजली जाने और यूं पी एस की महिमा से उड़ गयी .
    अब दूसरी में कहाँ वो बात तथापि ,
    ईश्वर मतलब कथित ईश्वर निर्गुण है निराकार है अनादि है अनन्त है अव्यक्त है अभेद है अजन्मा है फिर भी अभी तक अव्याख्यायित है जबकि हमारे उपनिषदों ने कितनी ही ईश्वर मीमांसाएँ ,भाष्य हैं -इदि मित्थम कही सकई न कोई -यही अंतिम सत्य है -कोई नहीं कह पाया है .
    ज्ञानी जन लोगों के विश्वास और आस्थाओं के साथ मजाक नहीं करते -ऐसा निषेध गीता ने किया है -मन्दान कृत्स्नवित न ,विचालयेत -अह्यानियों को पूर्णतया जानने ज्ञानी विचलित न करे !(अध्याय तीन).
    कहना कम समझना अधिक !

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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    आपकी राय सर-माथे पर, मैं तो यह सब इसलिये लिख रहा हूँ कि जो आये दिन लोग ब्लॉगवुड में दूसरे के धर्म का कूड़ा बटोर कर नुमाइश कर रहे हैं... समझ रहें हैं हमने बहुत बड़ा उपकार किया अपने धर्म और 'मालिक' पर... और समझ रहे हैं कि इस से उनका 'ईश्वर' या 'मालिक' खुश होगा... स्वर्ग में एक सीट रिजर्व हो जायेगी उनके लिये... वह थोड़ा Reality check कर लें... कि कितना खोखला है यह सब प्रपंच... बस !

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  5. ईश्वर को बनाया है 'टमटम' ने जिसे 'पमपम' ने बनाया था... अत: 'पमपम' ही जगत का असली 'मालिक' है!
    फिर आज से ही पमपम की पूजा शुरू कर दी जाए .. आज का सुख चैन छोडकर .. मृत्‍युपरांत के सुख के लिए !!

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  6. आज जो सबूत हमारे सामने हैं वह ये हैं कि एक समय ऐसा था जब कुछ नहीं था... Our universe is thought to have begun as an infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity..

    क्या इन दो बातों में विरोधाभास नहीं है . जब कुछ नहीं था तो ये पिंड कहाँ से आया ?

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    @ आदरणीय डॉ० महेश सिन्हा जी,

    "infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity..." को मैंने 'कुछ नहीं' लिखा है क्योंकि इसके लिये उपयुक्त शब्द का अभाव है... कृपया ध्यान दीजिये कि यह 'पिंड' नहीं है, अत: विरोधाभास भी नहीं है।

    पोस्ट का तर्क यह है:-

    आप सवाल पूछो कि चलो आपकी बात मान ली कि ईश्वर ने बृह्मांड बनाया... अब जरा यह बता दीजिये कि ईश्वर को किसने बनाया या पैदा किया... धर्म कहेगा कि उसे तो किसी ने न बनाया न पैदा किया... वह हमेशा से ऐसा ही है...
    अजीब बात है भाई जब कहो कि किसी ने बृह्मांड को नहीं बनाया या पैदा किया... यह हमेशा से ऐसा ही है बस अपना रूप बदलता रहता है... तब तो आप मानते नहीं... जबकि आप तार्किक दॄष्टि से विचार कीजिये तो दोनों तर्क एक ही जगह पर तो आकर खत्म हो रहें हैं... यानी एक ऐसी चीज पर जिसके बारे में आज की तारीख में आदम-जात के पास जानकारी नहीं है कि उसको बनाया या पैदा किसने किया...


    इस पर कुछ रोशनी डालें तो आभारी रहूंगा।
    धन्यवाद!

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  8. अपने ब्लॉग के शीर्ष वाक्य को दुहरा रहा हूँ:
    मनुष्य ईश्वर का विधाता है/जैसे आँख प्रकाश की माता है/जागो रचो एक नया ईश्वर/अपने प्रश्नों का ठीक ठीक उत्तर/जागता इंसान ही अपना त्राता है/मनुष्य ईश्वर का विधाता है|-कवि गोपाल

    आप पूछेंगे 'ईश्वर' की आवश्यकता ही क्यों? बहुत दिनों से इस प्रश्न से जूझता रहा हूँ। उत्तर नहीं मिल पाया। यह मान बैठा हूँ कि शायद यह आदमी की फितरत है कि ईश्वर के बिना वह ही नहीं सकता।

    रही बात ज़िहादियों की तो भर्तृहरि से प्रेरणा लेते हुए (प्रलाप करते हुए पागल से, बच्चे की भोली बातों से भी कुछ सीखा जा सकता है) उनसे भी कुछ सीखने की कोशिश करता हूँ। एक सीख मिल चुकी है - इस्लाम न तो बदलेगा न सुधरेगा।
    इनका एक मात्र इलाज है कि इनकी मानसिकता समझी जाय और बच्चों को भी सुशिक्षित किया जाय। समाज में जहाँ भी रोजमर्रा की घटनाओं में ऐसी प्रवृत्तियाँ दिखें, उनका विरोध और शमन किया जाय क्यों कि बाद में नासूर बन जाने पर इनका पोषण करने को राजनेता और सेकुलर बुद्धिजीवी सामने आ जाते हैं, तब एक आम आदमी के पास सिवाय नि:सहाय ताकने और झेलने के और कुछ नहीं रह जाता।

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  9. @ प्रवीण जी
    भगवान को मानना या न मानना एक व्यक्तिगत बात है . मैंने तो भगवान का संदर्भ नहीं दिया है .
    दरअसल भगवान या ब्र्म्हांड के बारे में जो जिज्ञासा है उसका उत्तर सामान्य रूप से ढूँढा या जाना नहीं जा सकता .हम हर वस्तु के बारे में प्रारंभ और समाप्ति , जन्म या मृत्यु के संदर्भ में सोचते है .
    एक उदाहरण देना चाहूँगा , मानव मस्तिस्क की सीमा क्या है ये अभी तक विज्ञान नहीं ढूँढ पाया है . विज्ञान वही ढूँढ पता है जो उपलब्ध है लेकिन अज्ञात थी .व्यक्ति या वस्तु का एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने को एक कपोलकलपना माना जाता रहा है लेकिन एक छोटे से वैज्ञानिक परीक्षण में इसे साबित किया जा चुका है .
    असल खोज है स्वयं की "जिन खोजा तीन पाइयाँ गहरे पानी पैठ " यहाँ पानी का संदर्भ मस्तिष्क की गहराई का है .
    हर इंसान इस धरती में एक खोज में है लेकिन दिशा कुछ बिरलों को ही मिलती है .
    शुभम

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  10. मैं महेश सिन्‍हा जी की बातों से सहमत हूं .. हमें जितनी जानकारी होती है .. हम उसका ही विश्‍लेषण करते हैं .. पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि इससे अधिक कुछ है ही नहीं !!

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  11. sirf ek baat bolna chaahunga,

    jo saamne hai log usko bura kehte hain, jisko dekha hi nahi usko khuda kehte hain

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  12. एक एक बात से सहमत हूँ. जो असहमति दर्ज करा रहे हैं वे अभी तक शुद्ध तार्किक दृष्टि से सोचने के आदि नहीं हुए हैं.

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    मेरे ब्लॉग पर आपने सही टिप्पणी की. फ़िलहाल तो स्वच्छ कम्पनी के खिलाफ ही प्रतिक्रिया कर रहा हूँ. पर कुछ दिनों में ही हिन्दू धर्म और भारतियों की भी सर्जरी करूँगा.

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  13. आपकी पोस्ट बिना पढ़े टिप्पणी लिख रही हूँ. ये मेरे ब्लॉग "आराधना" पर आपकी टिप्पणी के बारे में है. आपने समर को सम्बोधित किया है, उसके बदले मैं उत्तर दे रही हूँ. मुझे क्रान्ति में विश्वास नहीं, पर व्यवस्था में आस्था नहीं. धर्म-वर्म मैं भी नहीं मानती. व्यवस्था ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, तो अब हम क्या करें? हमें तो क्रान्ति पर भी यकीन नहीं . आपसे ज्यादा हारे हुये तो हम हैं. पर हमें आज भी समर जैसे लोगों के विश्वास पर विश्वास है और ये भी कि वो जब भी बुलायेगा क्रान्ति के लिये मैं दौड़ में सबसे आगे रहूँगी. हर युवा पीढ़ी एक ऐसी ही क्रान्ति की आस में बड़ी होती है. हम भी वैसे ही हैं.

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    .
    ब्लॉग के पाठकों के लिये,
    आदरणीया मुक्ति (आराधना) जी की टिप्पणी का संदर्भ यह है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. "मैं तो यह सब इसलिये लिख रहा हूँ कि जो आये दिन लोग ब्लॉगवुड में दूसरे के धर्म का कूड़ा बटोर कर नुमाइश कर रहे हैं... समझ रहें हैं हमने बहुत बड़ा उपकार किया अपने धर्म और 'मालिक' पर... और समझ रहे हैं कि इस से उनका 'ईश्वर' या 'मालिक' खुश होगा... स्वर्ग में एक सीट रिजर्व हो जायेगी उनके लिये... वह थोड़ा Reality check कर लें... कि कितना खोखला है यह सब प्रपंच... बस"

    आदरणीय प्रवीण जी !
    आशा है आप यकीन करेंगे कि जितना भी मैंने आपको आपकी टिप्पणियों से जाना आपके प्रति श्रद्धा भाव ही आया है, मगर उपरोक्त टिप्पणी से ऐसा लगा कि आप दूसरों की पोस्ट पर प्रकाशित कूड़े के खिलाफ लिख रहे हैं ...क्या यह ठीक होगा कि आप जैसा व्यक्तित्व महज इस लिए लिखने को मजबूर हुआ क्योंकि किसी मूर्ख ने आपको मजबूर कर दिया कि वह अपने लेखन लिख कर क्या क्या समझ रहा है !

    क्या यह हम उस मूर्ख को अधिक महत्व नहीं दे रहे हैं या उस कूड़ा लेखन में कुछ ऐसा लगा कि वह समझदारों से उस पर एक पोस्ट ही लिखवा ले !
    वास्तव में आदर सहित

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    आदरणीय सतीश सक्सेना जी,

    बहुत खुशकिस्मत मानता हूँ स्वयं को जो आपने मुझे पढ़ा व यह प्रश्न किया...

    मेरी यह लेखमाला एक प्रवृत्ति के विरूद्ध है... उस प्रवृत्ति के खिलाफ जो इनसान को इनसान ही न रहने देकर स्वधर्मी और विधर्मी नाम के दो कटघरों में बाँट देती है... मैं यह दिखाना चाहता हूँ कि धर्म और ईश्वर का यह पूरा तामझाम है तो आदमी के दिमाग की पैदाइश ही... असली सत्य न किसी ने देखा, न जाना , न सुना... तो क्यों न हम इस सबको इतनी गंभीरता से न लेकर अपनी अकल लगायें... बजाय बेबुनियाद झगड़ों के... एक बेहतर दुनिया बनाने को!

    आभार!

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  17. शुक्रिया प्रवीण जी ,
    भविष्य में आपको पढने के लिए फालो कर रहा हूँ ...सादर !

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  18. डॉक्टर महेश सिन्हा के उत्तर के सन्दर्भ में :
    जीरो यानि 0 यानि कुछ नहीं
    +1-1= 0
    यहाँ +1 भी कुछ है और -1 भी कुछ है
    आज का विज्ञान भी तो यही कह रहा है मैटर MATTER और एन्टी-मैटर ANTI-MATTER की बात कर रहा है जिन दोनों को मिला कर "कुछ नहीं " बनता है।

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असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!