शुक्रवार, 12 मार्च 2010

या तो वो है ही नहीं और अगर है तो दुष्ट है... क्या अब भी विश्वास करोगे आप ?

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मेरे सज्जन मित्रों,

सबसे पहले तो डिस्क्लेमर:-

जो कुछ भी यहाँ लिख रहा हूँ उसमें मेरा मौलिक कुछ नहीं है, पहले भी बड़े-बड़े कह चुके हैं यही सब, मैं तो एक बार फिर से दोहरा रहा हूँ, बस!

हाँ तो यह तर्क कुछ इस तरह से है...

मान लीजिये आप वास्तविक तौर से...भीतर और बाहर दोनों से...एक बहुत ही अच्छे (सज्जन) आदमी/औरत हैं... और मैं आपके सामने दो विकल्प रखता हूँ...

सर्वशक्तिमान, परमानिधान, ईश्वर या और जो भी आप कहें उसका या तो...
१- अस्तित्व है ही नहीं ।
२- अथवा यदि उसका अस्तित्व है तो वह दुष्ट(EVIL) प्रकृति का है ।

तो आप ऐसे किसी भी सर्वशक्तिमान या ईश्वर को मानोगे ही नहीं...न ही कभी उसका गुणगान करोगे... क्योंकि अच्छाई कभी भी दुष्टता का साथ नहीं देती...

कोई आस्तिक भी इस तर्क को नकार नहीं सकता कि उसे एक दुष्ट ईश्वर की पूजा नहीं करनी चाहिये तथा अस्तित्वहीन के बारे में तो कुछ करने या कहने की जरूरत ही नहीं...

अब चर्चा करते हैं ईश्वर के कृत्यों के बारे में...

धर्म चाहे कोई भी हों सभी के धर्मग्रंथों में ऐसे प्रसंगों का वर्णन है...

जहाँ पर ईश्वर ने अपने भक्त की परीक्षा लेने के लिये उसे अपने किसी प्रियजन की बलि देने को कहा, तथा उस भक्त द्वारा ऐसा करने पर उस से प्रसन्न हुआ यानी ईश्वर अपने प्रति भक्त की वफादारी को नैतिक मूल्यों से ऊपर रखता है। जबकि एक अच्छा ईश्वर यह चाहेगा कि भक्त भय और उसके प्रति वफादारी को नजरअंदाज कर मानवीय मूल्यों, दया और करूणा को ऊपर रखे तथा ऐसे किसी दुष्ट कृत्य से साफ मना कर दे।

ऐसे प्रसंग भी हर धर्मग्रंथ में हैं जहाँ ईश्वर ने जानबूझकर किसी भक्त को दुख-परेशानियाँ दी हैं अपने प्रति उसकी वफादारी की परीक्षा करने के लिये, क्या कोई अच्छी और न्यायपूर्ण ताकत महज अपने प्रति वफादारी सुनिश्चित करने के लिये एक बेकसूर को इतना सता सकती है ?

फिर हर धर्मग्रंथ मे वही ताकत अपना बखान करते हुऐ स्वयं को अच्छे-बुरे से परे भी बताती है।

और सबसे बड़ी बात यह है कि उसी के राज में कुदरती दुष्टतायें (natural evils) जैसे भूकंप और बीमारियाँ भी मौजूद हैं तथा वह मानवीय दुष्टताओं (human evils) जैसे अपराध या धर्म के नाम पर मारकाट को रोकने का भी कोई प्रयास नहीं करता।

उपरोक्त सभी तथ्य और तर्क यह साबित करते हैं कि या तो ईश्वर नाम की कोई ताकत नहीं है और यदि है तो वह दुष्ट (evil) है ।

तो सज्जनों, बताईये क्या पाओगे, या पाना चाहते हो आप, विश्वास करके एक अस्तित्वहीन या दुष्ट (evil) ताकत में ?






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28 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं नास्तिक क्यों हूँ" की याद हो आई :-)

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  2. भी तथ्य और तर्क यह साबित करते हैं कि या तो ईश्वर नाम की कोई ताकत नहीं है और यदि है तो वह दुष्ट (evil) है nice

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  3. प्रवीण साह जी , जहां तक मैं समझ सकता हूँ आप एक उम्रदराज व्यक्ति है ! और शायद इंसान में यह मिथ्या या भ्रम सदियों से रहा है कि उम्र दराज व्यक्ति अपने लम्बे अनुभव के आधार पर हमेशा ही सही होता है ! इसलिए आपको कोई भी उपदेश दिए बगैर सर इतना कहूंगा कि सोनिया जी एक बहुत अच्छे स्त्री और कौंग्रेस की शीर्षस्थ नेता है ! लेकिन गड़बड़ सारी उनके मेसेंजरों और कर्ता-धर्ताओ की है, जो मौके का फायदा उठा सिर्फ अपने फायदे के लिए अर्थ का अनर्थ बना देता है ! ( इसे इश्वर वाले परिपेक्ष में ही देखने का कष्ट कीजिएगा )

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    1. आदरणीय गोदियाल जी,
      यादि ब्यबस्था सही हो मेस्सेंजरो जरुरत ही क्यूँ ? है भी तो किसी को मौका ही न मिले तो मौके का फ़ायदा कैसा ? आपके कथनानुसार सोनियाजी लाचार और मजबूर है जो ब्यबस्था बनाने में असफल है ! इश्वर वाले परिपेक्ष सोचा जाए तो निष्कर्ष यही होता है कि लाचार और मजबूर कभी इश्वर नहीं हो सकता और यदि है तो वह दुष्ट (evil) है ।

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  4. हाँ, एक बात और तरस मुझे इन नाईस लिखने वालो की बुधि पर भी आता है !

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    @ आदरणीय गोदियाल जी,
    आपका इस नाचीज के ब्लॉग पर आना और उत्साह बढ़ाना बहुत ही सुखद है मेरे लिये।
    बस इतना जोड़ना चाहूँगा कि यह नाचीज उम्रदराज इकतालीस बरस का पूरा हो जायेगा छह-सात महीने के बाद!
    आभार!

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  6. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, यह तो इतनी सदी बीतने के बाद भी कोई प्रमाणित नहीं कर सका । पर जब मनुष्य भय, दु:ख, पीड़ा, या महत्वाकांक्षा से पीड़ित होता है तो ईश्वर की ओर बहुत झुकता है । सुख में भी एक भय रहता है,सुख छीन जाने का..इसलिए फि़र ईश्वर से प्रार्थना करता है कि कोई अनर्थ ना हो ।

    मनुष्य जन्म से तो स्वतंत्र होता है परंतु हर जगह अड़चनों और दुविधाओं में इतना घिर जाता है कि सहज़ ही ईश्वर को अपना उद्धारक मान लेता है । अपनी समग्र क्षमताओं के बावजूद मनुष्य की सत्ता अत्यंत क्षुद्र है और वो अत्यंत असहाय है । अब ईश्वर तारक हो या पीड़क इससे उसे क्या फर्क पड़ता है ।

    भौतिक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण और जीवन के गतिशीलता और कर्म को अत्यधिक महत्व देनेवाली पाश्चात्य सभ्यता में ईश्वर के प्रति अनुराग तो है परंतु अंध-श्रद्धा कम है ।

    इस तर्क का खंडन नहीं किया जा सकता कि ईश्वर है तो फि़र संसार में इतना द:ख और संत्रांस क्यों ??? एक तर्क यह दिया जाता है कि दु;ख मनुष्य को मांजता है..पर क्या इसके लिए ईश्वर के पास कोई ओर तरीका नहीं..!!

    अब सोनिया जी इतनी कमजोर हैं कि अपने कर्ता-धर्ताओं को संभाल न सकें और सन्मार्ग में प्रेरित कर ना सकें तो फिर वो काहे की सोनिया है...?

    कुछ लोग कहते हैं कि मनुष्य गलती स्वयं करता है और परिणाम के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता है....अगर ऐसा है तो क्या ईश्वर में इतनी क्षमता नहीं कि मनुष्य को वैसी गलगी करने से ही रोक दे..!!न होगी गलती..ना होगा गलत परिणाम ..!!

    यथार्थ यही है कि ईश्वरवादियों के लिए तर्क तो नर्क है..ईश्वर तो मनुष्य की श्रद्धा का विषय है, तर्क की कसौटी पर उसका कोई अस्तित्व ही नहीं.।

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  7. @ प्रवीण शाह जी, फिर तो यार आप मेरे से भी ४ साल छोटे हो , खामखा एक उम्रदराज फोटो लगा लोगो को भ्रमित तो मत करो !

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  8. बहुत मजबूत तर्क दिये हैं आपने. ईश्वर अगर हो भी तो उसकी भला होना संदेहास्पद ही है. वैसे अगर मुझसे पूछे तो चाहे ईश्वर हो, उसने हमें बनाया हो, वह हम पर नजर रखता हो, और हमें अंधे नर्क में धकेलने की शक्ति भी रखता हो, तब अगर वह हमारे ओछी लल्लो-चप्पो
    (घंटा बजाना, झुक-झुक जाना, मस्का पॉलिश, आदी) से प्रभावित हो तो चाहे वह ब्राह्य रूप से कितना ही शक्तिशाली हो, मानसिक रूप से तो मजबूत कतई नहीं माना जा सकता.

    इसलिये मुझे नहीं लगता की इश्वर जैसा कोई प्राणी हो तो वो चाहेगा कि उसके गुणगान में लगे रहे. इससे उलट वो उन्हें पसंद करेगा जो इस सृष्टि को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करें.

    यह सीरीज़ जारी रखें. क्योंकि इस विषय पर लिखना किसी भी धार्मिक मत पर लिखने से ज्यादा कठिन और खतरनाक है.

    (ईश्वर के लिये सुझाव: चमचों से सावधान! :)

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    (ईश्वर के लिये सुझाव: चमचों से सावधान! :)

    @ C G,
    Good one, dear and welcome on board!

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  10. मानव की रचना ईश्वर की सबसे बड़ी भूल थी...... या ईश्वर की रचना मानव की सबसे बड़ी भूल है?

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    1. ईश्वर की रचना मानव की सबसे बड़ी भूल है

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  11. आदरणीय प्रवीण जी, और अब थामिए मेरा उपदेश :)
    मैं एक आस्तिक हूँ, और मैं भगवान् की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मैंने किसी अदृश्य शक्ति का आभास खुद महसूस किया है ! इसका कुछ जिक्र मेरे द्वारा ब्लॉग पर लिखी एक कहानी " बयाल " में मैं किया है ! कभी फुरसत मिले तो पढ़ना ! भले ही कहानी आप जैसे नास्तिकों को मनोरंजक ना लगे लेकिन मेरा यकीन मानिये, उसमे कुछ सत्यता है !

    अब उपदेश पर आता हूँ ! स्वर्ग : कहाँ है वह स्वर्ग ? जी हां, उस स्वर्ग की सीमाए वहा से शुरू हो जाती है जहां इंसान का पैर जमीन पर पड़ने से पहले एक निश्चित उंचाई तक उठ पाता है ! और इस स्वर्ग का सर्वोपरी भगवान् है ! जिसके अधीन असंख्य अदृश्य शक्तियां इस धरा को मोनीटर करती है ! जो हरवक्त इंसान के कर्मो का लेखाजोखा रख हर इंसान की दैनिक, बार्षिक अथवा जीवनपर्यंत बैलेंस शीट बना कर, शीर्ष मैनेजमेंट को भेजते है, ये जो बीच की दैविक शक्तियां है, जिन हेर-फेर की बात ( बलि देना इत्यादि यदि कहानिया सत्य है तो .. ) यहीं तक सीमित है ! इश्वर एक पिता तुल्य है जो अपने बच्चो का बुरा नहीं चाहते , बल्कि हां, यदि जहाँ तक संभव होता है , इंसान के कर्मो के हिसाब से उसे हर मुसीबत से बचाने की कोशिश करते है ! बाकी ये जो कहानियां गढ़ी वे सब इन बाबाओ, पैगम्बरों इत्यादि ने गढ़ी है, अपने स्वार्थो के लिए ! और कभी-कभी मानवता की भलाई के लिए भी !
    शायद उपदेश लंबा हो गया, रखता हूँ !

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  12. मैं देख रही हूँ ...तर्क-वितर्क :-)

    वैसे आस्था, डर जैसे भावनात्मक आवेगों को तर्कों से नही जीता जा सकता ...और एक उम्र बीत जाने के बाद नई विचारधारा में अनुकूलन कठिन होता है ..फिर भी ..लगे रहिये ..हम भी लगे ही हैं ..अपने स्तर से.

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  13. गुरू जी vedquran.blogspot.com कहते हैं जो अपने को नास्तिक कहे वही असल धार्मिक है, इस तरह कह के वह केवल आपसे सवाल करेगा खुद तो नास्तिक है किसी तरह का उससे आप सवाल नहीं कर सकते, मक्‍कारों की पहचान बतायी उन्‍होंने धन्य हो,
    खेर ऐ महान नास्तिक आज वेद कुरआन ब्‍लाग पर श्री द्व‍िवेदी को गायत्री मन्‍त्र पर 8 बजे के करीब प्रवचन होगा पधारना यह कहने की यह देखो और वह देखो

    भाई तुम ईश्‍वर को नकारते हो तो कुछ लिंक नीचे दे रहा हूं जो 1400 साल से नास्तिकों को आस्तिक बना रहे हैं अब भी समय है आओ


    signature:
    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog) डायरेक्‍ट लिंक

    अल्‍लाह का
    चैलेंज पूरी मानव-जाति को

    अल्‍लाह का
    चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

    अल्‍लाह का
    चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

    अल्‍लाह का
    चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

    अल्‍लाह का
    चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

    अल्‍लाह
    का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
    डायरेक्‍ट लिंक

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  15. ईश्वर का न होना एक अलग मामला है मगर उसकी उपस्थिति का अहसास बड़ा ही सकून भरा है -भरोसा देता है -मगर हम जैसे दुर्भाग्यशालियों का तो कोई पुरसाहाल ही नहीं है जिन्हें ईश्वर की किसी भौतिक सत्ता में विश्वास ही नहीं है -
    टूटी आस्था टूटे लोग ! प्रवीण जी रहम करिए रियाया पर !
    और कुछ भी कही तो नहीं है -सब माया ही है न -सब गुण दोष तो माया कृत है -माया फैलाने वाला खुद ही एक माया है ,भ्रम !

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  16. प्रवीण भाई, मेरी सोच से मिलता-जुलता लेख… आभार

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  17. @अरविन्द जी सब बकवास है...वैचारिक दिवालियापन है..सच से भागने का प्रयास है...ऐसे भी सोंचिये :-)

    ..असहमति ही बदलाव को जन्म देती है..संतुष्टि नही.

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  18. यह आलेख हम जैसे "सिर्फ मानवीय मूल्यों में आस्था" रखने वालों (ज्ञानी/अल्पज्ञानी/मुरख/महाज्ञानी) को कुछ कहने के लिए उकसा रहा है. इसका साफ़ मतलब है की मैं(सुलभ) कोई विशिष्ट या अलग सोच नहीं रखता.

    मेरे विचार में,

    मैं ही इश्वर हूँ और प्रत्येक बुद्धिप्राप्त प्राणी इश्वर है. इस सृष्टि में दो ही चीज़ है... जान और बेजान (Living thing & Non-living thing) मनुष्य पिछले हज़ारो/अनगिनत सदियों से अपनी बुद्धि और चेतना का निरंतर प्रयोग करते हुए आज सूचना युग में विचरण कर रहा है. मैं चाहूँ तो वैदिक काल के ऋषि या इसा पूर्व महात्मा बुद्ध या इशु या मोहम्मद या जैनगुरु महावीर की तरह किसी नए धर्म/पंथ का ईजाद कर सकता हूँ और फुर्सत की उम्र रही तो महाकाव्य(पवित्र किताब धर्मग्रंथ) या holi-book भी रच सकता हूँ और भक्तों/अंध-भक्तों (अनुयायियों) की फ़ौज मिले तो दुनिया भर में ईश्वरीय सत्ता को नए तरीके से स्थापित कर सकता हूँ. लेकिन ऐसा कर के क्या होगा क्या पृथ्वी पर मानव समुदाय का सचमुच कल्याण हो जायेगा. शायद नहीं! होगा सिर्फ इतना की आने वाले शताब्दियों में एक और युग-पुरुष/धर्मगुरु/पैगम्बर इत्यादि के रूप में सुलभ और उसके द्वारा बनाए गए इश्वर (I-S-H-W-A-R या G-O-D या A-L-L-A-H या #-#-#) को धर्म-निरपेक्ष समाज/राज में एक पंथ/धर्म के रूप में मान्यता मिल जायेगी (क्यूंकि तबतक दुनिया के कुछ प्रतिशत आबादी इसके अनुयायी रहेंगे और मानवीयता का तकाजा है सर्व:धर्म:समभाव सबकी आस्था का सम्मान होगा). लेकिन क्या मानव समुदाय सच्चा मानव बन पायेगा. शायद नहीं. स्थिति आज की तरह या इससे भी त्रासद होगी... तभी तो एक सच्चा मानव (धार्मिक/नास्तिक/आस्तिक मानव) ऐसा दुःख देखकर इस पृथ्वी से अल्पायु में ही विदा हो गया जिनको हम स्वामी विवेकानंद नाम से जानते हैं.

    ऊपर के पाराग्राफ मैंने अपनी एक पुस्तक (जन-चेतना पांडुलपि) से लिया है....

    अब बात करते हैं, प्रवीण जी के तर्कों पर.

    आस्तिक या नास्तिक के मामलों में मैं सभी तर्क को खारिज करता हूँ. क्यूंकि कभी विश्वास के ऊपर तर्क हावी होता है और कभी तर्क के ऊपर विश्वास/आस्था. ये तो हर विवेकशील प्राणी का दिल ही जानता है की वो क्यूँ ऐसा स्वयं पर विश्वास करता है या क्यूँ ऐसा तर्क औरों को देता है.

    मेरा मानना है, एक उम्र के बाद सबको ब्रह्मज्ञान (स्वयं ज्ञान या सृष्टि-ज्ञान ) हो जाता है. मैं ज्ञान के तलाश में हूँ....

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  19. when things happen for your welfare GOD does it
    when things happen for your happiness YOu do it

    between happiness and welfare those who chose welfare believe in a power above themselfs { super natural } and those who chose happiness believe that there is no supenatural power and they themselfs are power of their own

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  20. अपना अपना नजरिया जो उसके खुद के अनुभवों और जीवन में मिली परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है ...आस्तिकता नास्तिकता का तो पता नहीं ...मगर किसी ऐसी शक्ति को मानते रहने से ...आल इज वैल वाली फ़ीलिंग तो रहती ही है मन में ...
    अजय कुमार झा

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  21. मैं आस्तिक हूँ या नास्तिक यह तो मैं नहीं जानता बस इतना जानता हूँ की मैं ज्ञान का भूखा हूँ आत्म ज्ञान को पाना चाहता हूँ और उसके लिए स्वयं धर्म के बंधनों मे बांधने की जरुरत नहीं समझता हूँ

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  22. उपरोक्त सभी तथ्य और तर्क यह साबित करते हैं कि या तो ईश्वर नाम की कोई ताकत नहीं है और यदि है तो वह दुष्ट (evil) है ।
    हमारी सलाह बस इतनी ही है जानी.......

    उसकी शान में ज़बान, जब भी चले ज़रा संभाल के चले।

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  23. @ आदरणीय गोदियाल जी,
    हाँ, एक बात और तरस मुझे इन नाईस लिखने वालो की बुधि पर भी आता है .nice...............................................

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  24. मैं भी बरसों तक नास्तिक रहा हूँ.लेकिन आज नास्तिक हूँ.धार्मिक हूँ लेकिन धर्मांध नहीं.मैं ने बहुत ही निकट से अलौकिक शक्तियों को महसूस किया है.मुझे भरोसा है कि आप कभी उतना ही आस्तिक हो जायेंगे जितना आज नास्तिक हैं.
    लेकिन मेरा अल्लाह किसी को चैलेन्ज नहीं करता.
    दरअसल यह मानवीय क्रिया है .और अल्लाह तो एक है.आप उसे कोई नाम भले दें.उसके मक़ाबिल या प्रतिद्वेंदी कोई नहीं.तो भाई चैलेन्ज किस से!!!!
    हाँ वोह हमें अच्छी भली बात ज़रूर बताता है.

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    1. Umar Kharanvi ko pade.

      अल्‍लाह का
      चैलेंज पूरी मानव-जाति को
      अल्‍लाह का
      चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता
      अल्‍लाह का
      चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं
      अल्‍लाह का
      चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार
      अल्‍लाह का
      चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में
      अल्‍लाह
      का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं

      हटाएं
  25. शायद इस लिंक को पढ़कर कुछ बातें साफ़ हो जाएँ.

    उत्तर देंहटाएं

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