सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

तलवारें खिंच गई हैं होमोसेक्सुअलिटी के मुद्दे पर फिर से एक बार . . . . . . किस ओर खड़े हैं आप?

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मेरे भारतीय नागरिक मित्रों,

जुलाई २००९ में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया जिसमें माननीय न्यायालय ने धारा ३७७ को संविधान के खिलाफ बताया और इस प्रकार SODOMY को अपराध बताने वाले कानून को खारिज कर दिया।

अब यह मामला मुल्क के सर्वोच्च न्यायालय में है, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के विरोध में याचिकाकर्ताओं की संख्या २ से बढ़कर १६ हो गई है, जबकि GAY RIGHTS के पक्ष में खड़े हैं नाज फाउन्डेशन और राज्यसभा सांसद व फिल्मकार श्याम बेनेगल।

अंग्रेजी में विस्तृत खबर आप यहाँ... तथा यहाँ... देख सकते हैं।

विरोधियों के तर्क हैं:-

* चिकित्सकीय दृष्टि से ऐसा सही नहीं है।
* ऐसा करने से भविष्य में उनके लिये नौकरियों में आरक्षण की मांग भी उठेगी।
* भारतीय सांस्कृतिक नैतिकता अभी इसके लिये तैयार नहीं है।
* ऐसा करना भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिये अभिशाप होगा व इस से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।
* भारत के ऊपर विदेशी सांस्कृतिक नैतिकता नहीं लादी जा सकती।
* यह धर्म के खिलाफ है।
* न्यायालय को विदेशी न्यायालयों द्वारा किये फैसलों को नजीर मान कर उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिये।
* यह अप्राकृतिक कृत्य है।
* यह सामाजिक नैतिकता के विरूद्ध है।
* इस फैसले से स्वच्छंद बलपूर्वक किये अप्राकृतिक यौनाचार को बढ़ावा मिलेगा।

दूरगामी महत्व के हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर भी हमारे राजनीतिक दल चुप्पी साधे हैं, जनता, जिसके जीवन को यह फैसला प्रभावित करेगा, के बीच भी कोई बहस होती नहीं देख रहा मैं... इसी लिये यह आलेख लिखा है।

आप क्या सोचते हैं इस मुद्दे पर ?

जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं तो LGBT को PERVERTED BEHAVIOUR मानता हूँ अत: इनको कानूनी जामा पहनाने के विरूद्ध हूँ।

भविष्य में धारा ३७७ को गैरकानूनी घोषित करने से कैसी स्थितियां बन सकती हैं इसकी कुछ बानगी आप इस खबर... में देख सकते हैं।

आभार!





11 टिप्‍पणियां:

  1. बाकी को छोडिये, समस्या अब बिकराल रूप दिखा रही है प्रवीण जी, अब ब्रिटेन के राजनयिक अपने साथ अपने गे साथी को भी भारत में राजनयिक वीसा देने पर जोर देने लगे है, अगर यह हुआ तो धीरे-धीरे अन्य देशो के राजनयिक भी यही मांग करेंगे, जो आगे चलकर देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर ख़तरा पैदा कर सकते है !

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  2. गोदियाल जी से सहमत, "गे" का विचार ही अपने-आप में विकृत और वीभत्स लगता है… इसे कानूनी जामा पहनाने के विरोध में मेरा मत दर्ज किया जाये…

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  3. जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं तो LGBT को PERVERTED BEHAVIOUR मानता हूँ अत: इनको कानूनी जामा पहनाने के विरूद्ध हूँ।
    आपसे सहमत हूँ। मेरा बी विरोध दर्ज़ किया जाए।

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  4. साअदत हसन मण्टो की कहानी याद आती है - टोबा टेकसिंह। उसमें एक पागल कहता है - मैना, मैं न तो हिन्दुस्तान में रहूंगा, न पाकिस्तान में, मैं तो इसी पेड़ पर रहूंगा!

    सो हम रहेंगे तटस्थ!

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  5. समलैंगिकता मानसिक विकृति के सिवा कुछ नहीं. इसे अपनी व्यक्तिगत आजादी और इच्छा कहकर कानूनी जामा पहनाने की मांग करने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. इन्हें अधिकार के बजाये "इलाज" की आवश्यकता है.

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  6. जय हो गे संस्कृति के पहरुओं की. महान हैं आप गे! लेकिन हम तो इसके विरुद्ध हैं.

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  7. समलैंगिकता का मुद्दा एक संवेदनशील मुद्दा है. इस पर कोई भी कानून बनाने से पहले व्यापक बहस अपेक्षित है.

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  8. दरअसल इस पर वैज्ञानिक परख और दृष्टि आवश्यक है. बहुतों की हवा-हवाई दृष्टि तब पूरी तरह से पलट जाएगी यदि वे सिर्फ और सिर्फ एक शोध-पूर्ण किताब पढ़ लें - बारबरा और एलन पीज़ की किताब - व्हाई मेन लाई एंड वीमन क्राई.

    किताब में विस्तृत शोधों के हवाले से बताया गया है कि शिशु अवस्था में ही लैंगिक झुकाव (ध्यान दें-लैंगिकता नहीं, इसके लिए क्रोमोसोम जिम्मेवार होते हैं) जन्म के समय मां के गर्भ में मिलने वाले हार्मोंनो से तय हो जाती है, अलबत्ता इसे बाहरी हार्मोन दवाइयों से नियंत्रित/परिवर्तित भी किया जा सकता है.

    सार ये कि ऐसे लोग हँसी और हिकारत के पात्र नहीं, बल्कि दया और समाज में स्वीकृति के पात्र हैं - और अज्ञानी समाज आमतौर पह उन्हें हिकारत और उपहास की दृष्टि से देखता है!

    इस विषय में डॉ. सुनील ने अपने ब्लॉग - जो न कह सके (http://www.kalpana.it/hindi/blog/) में कई मर्तबा इस विषय पर बड़ी बेबाकी से बातें लिखी हैं. आग्रह है कि धारणा बनाने से पहले उनका भी मनन कर लें!

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  9. ऐसे लोग हँसी और हिकारत के पात्र नहीं, बल्कि दया और समाज में स्वीकृति के पात्र हैं
    i endorse this view strongly society needs to accept all kind of deformities whether mental or physical .

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  10. @पी.सी.गोदियाल
    As far as i know politician always ask for their companions/relatives to be given visas. I don't see how it could translate into a security issue.

    @Suresh Chiplunkar
    There are so many things in the world which goes against the normal convention.Because we like to dislike any different behaviour then the majority, does not mean that it should be termed "veebhats".Because of this attitude several eunuchs(and also many others) have suffered.

    @मनोज कुमार
    Kindly look up for the the definition of a 'pervert' and 'perverted behaviour'.

    @निशाचर
    Can you prove through medical science that it is a mental disorder??
    Also your comment seems to suggest that people with mental disorders should not be provided any rights but only treatment.Is it correct?

    @Post
    As far as I am concerned, I don't know why one should look into one's bedroom life.As long as people indulged are two consenting adults, thy shall not disturb their sexual life.
    As for the argument against it , they are seriously flawed.The only discussionable arguments being:
    चिकित्सकीय दृष्टि से ऐसा सही नहीं है।
    यह सामाजिक नैतिकता के विरूद्ध है।
    rest are wrong for the following reasons:

    ऐसा करने से भविष्य में उनके लिये नौकरियों में आरक्षण की मांग भी उठेगी।
    ridiculous argument indeed.seems to me one of those cliches:
    An astrologer said that this child should be killed as he will turn into a devil afterwards.

    भारतीय सांस्कृतिक नैतिकता अभी इसके लिये तैयार नहीं है।
    And who is to decide if it is ready or not??

    ऐसा करना भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिये अभिशाप होगा व इस से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।
    Seriously failed to understand this linkup at all.Will someone please explain it to me that how will it be hazardous for indian army and to security of nation?

    भारत के ऊपर विदेशी सांस्कृतिक नैतिकता नहीं लादी जा सकती।
    Noone is imposing it.Its not like the law is made that you have to experience gay sex.It is a matter of choice.

    यह धर्म के खिलाफ है।
    Against which religion??

    न्यायालय को विदेशी न्यायालयों द्वारा किये फैसलों को नजीर मान कर उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिये।
    Did the judge say that he is giving the order under the influence of any such order by an outside court??

    यह अप्राकृतिक कृत्य है।
    I would like to disagree.I don't know who termed it unnatural.There are several things in the nature which are way different than many peoples sense of naturalness.An example could be the mating of different species(eg. a khachchar is born by the mating of a horse and donkey).
    Better argument would have been , that it shall not be permitted among humans.Terming it unnatural is unfair.

    इस फैसले से स्वच्छंद बलपूर्वक किये अप्राकृतिक यौनाचार को बढ़ावा मिलेगा।
    Again a flawed argument.First of all people should understand the difference between decriminalization and legalization.
    If one is worried about the rape cases, then they should ask for a law which illegalize the forced sex(and as far as i know it is already there).This argument applied recursively will have the following counterpart:

    Sex should be banned.If we illegalize sex, their will be a decrease in the rape cases, which the women of this country have to suffer.So instead of having an anti-rape law we shall have anti-sex law.

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