रविवार, 21 फ़रवरी 2010

बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला . . . . . . प्रवीण शाह।

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मेरे मातृभाषा प्रेमी मित्रों,

आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है, संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर १९९९ को हर वर्ष २१ फरवरी को यह दिन मनाने का फैसला किया to promote linguistic and cultural diversity and multilingualism. यानी भाषाई व सांस्कृतिक विविधता तथा बहुभाषाओं को बढ़ावा देने के लिये,

मेरी राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा घर में बोली जाने वाली भाषा कुमाँऊनी है... यह वो भाषा है जिसमें मेरे माता-पिता बात करते हैं... नैनीताल में जब मैं पैदा हुआ तो सबसे पहले इसी भाषा के शब्द मेरे कानों में पढ़े होंगे, अपनी दादी के दुलार के रूप में....यह वो भाषा है जिसमें बोलता कोई सुनाई दे तो एक रिश्ता जुड़ जाता है मेरा उस से अपनेआप...आज जब एक छोटी सी बिटिया का बाप हूँ...और bag को बस्ता तथा socks को मोजे कहने पर अक्सर मजाक उड़ाती हैं माँ-बेटी मेरा...तब लगता है कि कुमाँऊनी भी कहीं पहाड़ी बाघ के रास्ते पर तो नहीं चल देगी...यानी विलुप्त होने के कगार पर...

आज आप सभी से सादर अनुरोध करता हूँ कि अपनी अपनी मातृभाषा को जिन्दा रखिये अपने दिल में और अपनी तथा अपने बच्चों की जुबान पर...

बड़ी मीठी जुबान है कुमांऊनी, बहुत मेहनत के बाद एक कुमांऊनी प्रेम-मनुहार-उलाहना गीत मिला नेट पर, जिसे आप इस लिंक पर सुन सकते हैं।

कविता कोश पर कुछ और कुमांऊनी लोकगीत पढ़ सकते हैं।

अंत में पढ़िये 'बेड़ु पाको बारा मासा' जिसे हर संगीत प्रेमी ने सुना ही होगा कभी न कभी...

बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

भुण भुण दीन आयो -२ नरण बुझ तेरी मैत मेरी छैला -२
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

आप खांछे पन सुपारी -२, नरण मैं भी लूँ छ बीडी मेरी छैला -२
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

अल्मोडा की नंदा देवी, नरण फुल छदुनी पात मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

त्यार खुटा मा कांटो बुड्या, नरणा मेरी खुटी पीडा मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

अल्मोडा को लल्ल बजार, नरणा लल्ल मटा की सीढी मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २


आभार आपका!



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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति। हां, हमे अपनी मतृभाषा को ज़िन्दा रखना चाहिए। आज तो हमारे ही बच्चे हमारा मज़ाक़ उड़ाते हुए पाए जाते हैं। हमारी मातृभाषा मैथिली है, और श्रीमती जी के साथ तो उसे बोलता ही हूँ।

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  2. प्रवीण जी इस प्यारे कुमावानी गीत के एवज में लीजिये कुछ लाइने मैं भी आपको एक पुराने गीत की सूना दूं;
    ठुम ठुम गंग नै उना हिट्वे सायी म्यार दगड
    तू छै भिना बडू बिगाड़ी मैनी आनु त्यार दगड
    घर मैं म्यार सासू सौरा मै नी आनु त्यार दगड
    सासू सौरा थेंची दयोला हिटवे सायी म्यार दगड

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  3. आह!

    जितने कितने बड़ेखाने विगत दस सालों में इस गीत को जोर-जोर से गाते हुये और इसकी धुन पर अपने कुमाऊंनी जांबाजों के साथ थिरकते हुये गुजरे हैं...

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