शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

६३ सालों का जवाब दो ! . . . . . . . . . प्रवीण शाह।

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मेरे बे'खबर' मित्रों,

एक खबर है कि जैसलमेर जिले का देवड़ा गाँव आजकल बहुत गर्वित है इस बात से कि वहाँ १२० साल बाद दूसरी बारात आई श्री पन्ना सिंह की बेटी शगुन कंवर के लिये, पिछली बारात आई थी १९९८ में श्री इन्दर सिंह भाटी की सुपुत्री जयंत कंवर की, ध्यान रखने की बात यह है कि जयंत कंवर को जीवित रहने का हक उसके माता-पिता ने इसलिये दिया था कि एक के बाद एक उनके तीन पुत्र काल के गाल में समा गये थे अत: उन्होंने समाज की इच्छा के विरुद्ध जाने का फैसला किया (निसंतान रहने का खतरा भी मंडरा रहा था)।

इस गांव में आस-पास के अन्य गांवों की तरह कन्या वध की प्राचीन और स्थापित परंपरा है। चाहें तो पूरी खबर आप यहाँ पर... देख सकते हैं।

अब यह खबर बहुत सारे सवाल उठाती है, अगर गांव की आबादी मात्र सौ परिवारों की ही मानी जाये, १२० सालों में इन परिवारों की चार पीढ़ियां निकल गईं, कम से कम भी माना जाये तो १२० साल में १०० परिवारों की चार-चार पीढ़ियों की लगभग ४०० कन्याओं का वध हुआ है इस गांव में...और संस्कृति के लबादे में यह महान परंपरा अभी भी बदस्तूर जारी है।

अब सवाल हैं कि-

* ब्रिटिश राज को भले ही जाने दीजिये, आजाद हिन्दुस्तान के ६३ सालों में कहाँ है हमारी कानून व्यवस्था, प्रशासन, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, नारी वादी आदि अदि...

* कहाँ हैं एक नचनिये-बजनिये के ध्यान खेंचू बयान पर हंगामा खड़ा कर उसकी तीसरे दर्जे की लॉलीपॉप फिल्म के लिये मुफ्त की पब्लिसिटी व दर्शक जुटाने वाले हमारे संस्कृति चिंतक और छद्म हिन्दुत्व वादी-राष्ट्र वादी... क्यों उन्हें यह कन्या वध स्वीकार है।

* किस बात पर गर्वित है ४०० से ज्यादा कन्याओं के वध का साक्षी यह गांव, कैसे हैं यह लोग, कैसे चेहरे देखते होंगे अपनी बहू, माँ, दादी और नानी के...बहनें तो इनमें किसी की हैं नहीं।

चलते-चलते एक सवाल और, हाई मोरल ग्राउंड पर बैठ कर हम भर्त्सना तो कर लेंगे इस बात की... पर एक बार ईमानदारी से अपने अंदर और आसपास झांक कर देखिये, बहुतेरे ऐसे मिल जायेंगे जिन्होंने छोटा, सुखी, संतुलित परिवार रखने की प्रैक्टिकलिटी के चलते अल्ट्रासाउंड कराकर अपनी अजन्मी कन्या के प्राण हर लिये होंगे... कैसे देखते होंगे ये लोग अपने को आइने में...क्या इज्जत रहती होगी इन जोड़ों की एक दूसरे की नजरों में...

बहुत हो गया, अब समय आ गया है कि हम सब इन कन्या वध के गुनहगारों से जवाब मांगें...

आप हैं मेरे साथ ?




8 टिप्‍पणियां:

  1. अश्चर्यजनक और बहुत ही दुखदायी खबर है क्या आज भी ऐसा होता है सहसा विश्वास नही आता। आखिर क्यों अब तक सरकार ने इस ओर ध्यान नही दिया???? क्या गाँव मे आज तक कोई पढा लिखा युवा भी इसके खिलाफ आवाज़ नही उठा सका?? और भी बहुत से सवाल मन को मथ रहे हैं इतनी भ्यावह और त्रासद स्थिति से मन आहत है। धन्यवाद इस खबर के लिये।

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  2. ऐसे गाँवों का अधिग्रहण कर सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इनके वासियों को देश में बिखेर कर बसा दिया जाय ताकि वे समझ सकें कि दुनिया बदल चुकी है और बाकी लोग यह समझ सकें कि अभी अन्धेरे कोने खत्म नहीं हुए।

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. शाह जी , ज्यादा दूर क्यों जाते हो , ये देखिये कि संसद में महिला आरक्षण बिल कब से पड़ा है ! मुलायम खान अपनी बहु को तो संसद पहुचाना चाहता है लेकिन दूसरो की बहो को संसद में नहीं देख सकता , वाह क्या समाजवाद है ! इन पाखंडी कमीने(स्ठो) ने पांच साल सत्ता का सुख भोगा बाहर रहकर , किया क्या ? माता मानियो और बहन चंदावती के तो क्या कहने !!!

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  5. बहुत ही गम्भीर और विचारणीय पोस्ट है
    लेकिन ये हकीकत ही है.

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  6. आपकी इस पोस्ट ने निःशब्द कर दिया..... आज भी पुरातन सामाजिक मान्यताएं जिंदा हैं....जो जीने का हक़ सिर्फ परंपरा के नाम पर छीन रही हैं....


    "कहाँ हैं एक नचनिये-बजनिये के ध्यान खेंचू बयान पर हंगामा खड़ा कर उसकी तीसरे दर्जे की लॉलीपॉप फिल्म के लिये मुफ्त की पब्लिसिटी व दर्शक जुटाने वाले हमारे संस्कृति चिंतक ...' यह बात आपने बिलकुल सही कही.... यह नचनिये बजनिये... जिन्होंने ना समाज के लिए कुछ किया...ना देश के लिए और ना ही खुद के लिए....... इनके लिए पूरा सिस्टम साथ हो गया....और इस गाँव का परिदृश्य में कहीं भी ज़िक्र भी नहीं है.....

    मैं आपके साथ हूँ....

    बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट....


    आभार....

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  7. हिन्दू धर्म अगर यह और इस तरह की सड़ांध से पहले निपटे, उदग्र हिन्दुत्व के मुद्दों से पहले, तो शायद यह धर्म ऊर्जावान हो सके।
    :-(

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  8. बिल्कुल सही समस्या की ओर ध्यान खींचा है आपने। बहुत ज़्यादा ज़रूरत है इस मामले में कुछ करने की।

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