शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ? आईये इस सवाल पर जुआ खेलें . . . किस ओर दांव लगायेंगे आप ?. . . Blaise Pascal की मानें तो आपके दोनों हाथों में लड्डू होंगे !

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मेरे ईशभीरू मित्रों,

आखिर आज मित्र महाशक्ति ने ईश्‍वर के अस्तित्‍व पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगा ही दिया... और मुझे बहुत जोरों से याद आई महान फ्रांसीसी गणितज्ञ व दार्शनिक Blaise Pascal(ब्लेज पास्कल) की, जिनका Pascal's Wager या Pascal's Gambit ईश्वर पर विश्वास रखने के पक्ष में या यों कहें कि ईश्वर के पक्ष में Reasoning की मदद लेते हुए एक मशहूर तर्क है।

The argument runs as follows:

If you erroneously believe in God, you lose nothing (assuming that death is the absolute end), whereas if you correctly believe in God, you gain everything (eternal bliss). But if you correctly disbelieve in God, you gain nothing (death ends all), whereas if you erroneously disbelieve in God, you lose everything (eternal damnation).

How should you bet? Regardless of any evidence for or against the existence of God, Pascal argued that failure to accept God's existence risks losing everything with no payoff on any count. The best bet, then, is to accept the existence of God.

ब्लेज पास्कल कहते हैं कि ईश्वर है या नहीं यह निश्चितता के साथ कह पाना संभव नहीं है पर यदि एक जुआरी की तरह देखें तो ईश्वर पर विश्वास कर लेने में ही आपका फायदा है क्योंकि...

*यदि ईश्वर वाकई में है...... तो आपको मरने के बाद उस पर विश्वास करने के एवज में शाश्वत आनंद (eternal bliss) मिलेगा, और यदि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो भी मरने के बाद आप या किसी के ऊपर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।


परंतु क्या होगा यदि आप ईश्वर पर इस जन्म में विश्वास नहीं करते तो...

*यदि ईश्वर का वाकई में अस्तित्व है...... तो आप पायेंगे शाश्वत संताप(eternal damnation), और यदि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो एक बार फिर मरने के बाद आप या किसी के ऊपर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।

इसलिये पास्कल कहते हैं कि यदि आप दोनों हाथों में लड्डू चाहते हैं तो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर लेना ही बेहतर है।



यद्मपि बाद के दार्शनिकों व गणितज्ञों ने ब्लेज पास्कल के इस तर्क की धज्जियां उड़ा दीं (इस पर फिर कभी लिखूंगा), पर आज के लिये केवल इतना ही...

आप बताईये क्या चाहते हैं...

दोनों हाथों में लड्डू...

या

कड़वे, असहज सत्य का अन्वेषण व सामना!




सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

तलवारें खिंच गई हैं होमोसेक्सुअलिटी के मुद्दे पर फिर से एक बार . . . . . . किस ओर खड़े हैं आप?

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मेरे भारतीय नागरिक मित्रों,

जुलाई २००९ में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया जिसमें माननीय न्यायालय ने धारा ३७७ को संविधान के खिलाफ बताया और इस प्रकार SODOMY को अपराध बताने वाले कानून को खारिज कर दिया।

अब यह मामला मुल्क के सर्वोच्च न्यायालय में है, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के विरोध में याचिकाकर्ताओं की संख्या २ से बढ़कर १६ हो गई है, जबकि GAY RIGHTS के पक्ष में खड़े हैं नाज फाउन्डेशन और राज्यसभा सांसद व फिल्मकार श्याम बेनेगल।

अंग्रेजी में विस्तृत खबर आप यहाँ... तथा यहाँ... देख सकते हैं।

विरोधियों के तर्क हैं:-

* चिकित्सकीय दृष्टि से ऐसा सही नहीं है।
* ऐसा करने से भविष्य में उनके लिये नौकरियों में आरक्षण की मांग भी उठेगी।
* भारतीय सांस्कृतिक नैतिकता अभी इसके लिये तैयार नहीं है।
* ऐसा करना भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिये अभिशाप होगा व इस से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।
* भारत के ऊपर विदेशी सांस्कृतिक नैतिकता नहीं लादी जा सकती।
* यह धर्म के खिलाफ है।
* न्यायालय को विदेशी न्यायालयों द्वारा किये फैसलों को नजीर मान कर उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिये।
* यह अप्राकृतिक कृत्य है।
* यह सामाजिक नैतिकता के विरूद्ध है।
* इस फैसले से स्वच्छंद बलपूर्वक किये अप्राकृतिक यौनाचार को बढ़ावा मिलेगा।

दूरगामी महत्व के हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर भी हमारे राजनीतिक दल चुप्पी साधे हैं, जनता, जिसके जीवन को यह फैसला प्रभावित करेगा, के बीच भी कोई बहस होती नहीं देख रहा मैं... इसी लिये यह आलेख लिखा है।

आप क्या सोचते हैं इस मुद्दे पर ?

जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं तो LGBT को PERVERTED BEHAVIOUR मानता हूँ अत: इनको कानूनी जामा पहनाने के विरूद्ध हूँ।

भविष्य में धारा ३७७ को गैरकानूनी घोषित करने से कैसी स्थितियां बन सकती हैं इसकी कुछ बानगी आप इस खबर... में देख सकते हैं।

आभार!





रविवार, 21 फ़रवरी 2010

बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला . . . . . . प्रवीण शाह।

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मेरे मातृभाषा प्रेमी मित्रों,

आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है, संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर १९९९ को हर वर्ष २१ फरवरी को यह दिन मनाने का फैसला किया to promote linguistic and cultural diversity and multilingualism. यानी भाषाई व सांस्कृतिक विविधता तथा बहुभाषाओं को बढ़ावा देने के लिये,

मेरी राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा घर में बोली जाने वाली भाषा कुमाँऊनी है... यह वो भाषा है जिसमें मेरे माता-पिता बात करते हैं... नैनीताल में जब मैं पैदा हुआ तो सबसे पहले इसी भाषा के शब्द मेरे कानों में पढ़े होंगे, अपनी दादी के दुलार के रूप में....यह वो भाषा है जिसमें बोलता कोई सुनाई दे तो एक रिश्ता जुड़ जाता है मेरा उस से अपनेआप...आज जब एक छोटी सी बिटिया का बाप हूँ...और bag को बस्ता तथा socks को मोजे कहने पर अक्सर मजाक उड़ाती हैं माँ-बेटी मेरा...तब लगता है कि कुमाँऊनी भी कहीं पहाड़ी बाघ के रास्ते पर तो नहीं चल देगी...यानी विलुप्त होने के कगार पर...

आज आप सभी से सादर अनुरोध करता हूँ कि अपनी अपनी मातृभाषा को जिन्दा रखिये अपने दिल में और अपनी तथा अपने बच्चों की जुबान पर...

बड़ी मीठी जुबान है कुमांऊनी, बहुत मेहनत के बाद एक कुमांऊनी प्रेम-मनुहार-उलाहना गीत मिला नेट पर, जिसे आप इस लिंक पर सुन सकते हैं।

कविता कोश पर कुछ और कुमांऊनी लोकगीत पढ़ सकते हैं।

अंत में पढ़िये 'बेड़ु पाको बारा मासा' जिसे हर संगीत प्रेमी ने सुना ही होगा कभी न कभी...

बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

भुण भुण दीन आयो -२ नरण बुझ तेरी मैत मेरी छैला -२
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

आप खांछे पन सुपारी -२, नरण मैं भी लूँ छ बीडी मेरी छैला -२
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

अल्मोडा की नंदा देवी, नरण फुल छदुनी पात मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

त्यार खुटा मा कांटो बुड्या, नरणा मेरी खुटी पीडा मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २

अल्मोडा को लल्ल बजार, नरणा लल्ल मटा की सीढी मेरी छैला
बेडु पाको बारो मासा -२, ओ नरण काफल पाको चैत मेरी छैला - २


आभार आपका!



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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

६३ सालों का जवाब दो ! . . . . . . . . . प्रवीण शाह।

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मेरे बे'खबर' मित्रों,

एक खबर है कि जैसलमेर जिले का देवड़ा गाँव आजकल बहुत गर्वित है इस बात से कि वहाँ १२० साल बाद दूसरी बारात आई श्री पन्ना सिंह की बेटी शगुन कंवर के लिये, पिछली बारात आई थी १९९८ में श्री इन्दर सिंह भाटी की सुपुत्री जयंत कंवर की, ध्यान रखने की बात यह है कि जयंत कंवर को जीवित रहने का हक उसके माता-पिता ने इसलिये दिया था कि एक के बाद एक उनके तीन पुत्र काल के गाल में समा गये थे अत: उन्होंने समाज की इच्छा के विरुद्ध जाने का फैसला किया (निसंतान रहने का खतरा भी मंडरा रहा था)।

इस गांव में आस-पास के अन्य गांवों की तरह कन्या वध की प्राचीन और स्थापित परंपरा है। चाहें तो पूरी खबर आप यहाँ पर... देख सकते हैं।

अब यह खबर बहुत सारे सवाल उठाती है, अगर गांव की आबादी मात्र सौ परिवारों की ही मानी जाये, १२० सालों में इन परिवारों की चार पीढ़ियां निकल गईं, कम से कम भी माना जाये तो १२० साल में १०० परिवारों की चार-चार पीढ़ियों की लगभग ४०० कन्याओं का वध हुआ है इस गांव में...और संस्कृति के लबादे में यह महान परंपरा अभी भी बदस्तूर जारी है।

अब सवाल हैं कि-

* ब्रिटिश राज को भले ही जाने दीजिये, आजाद हिन्दुस्तान के ६३ सालों में कहाँ है हमारी कानून व्यवस्था, प्रशासन, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, नारी वादी आदि अदि...

* कहाँ हैं एक नचनिये-बजनिये के ध्यान खेंचू बयान पर हंगामा खड़ा कर उसकी तीसरे दर्जे की लॉलीपॉप फिल्म के लिये मुफ्त की पब्लिसिटी व दर्शक जुटाने वाले हमारे संस्कृति चिंतक और छद्म हिन्दुत्व वादी-राष्ट्र वादी... क्यों उन्हें यह कन्या वध स्वीकार है।

* किस बात पर गर्वित है ४०० से ज्यादा कन्याओं के वध का साक्षी यह गांव, कैसे हैं यह लोग, कैसे चेहरे देखते होंगे अपनी बहू, माँ, दादी और नानी के...बहनें तो इनमें किसी की हैं नहीं।

चलते-चलते एक सवाल और, हाई मोरल ग्राउंड पर बैठ कर हम भर्त्सना तो कर लेंगे इस बात की... पर एक बार ईमानदारी से अपने अंदर और आसपास झांक कर देखिये, बहुतेरे ऐसे मिल जायेंगे जिन्होंने छोटा, सुखी, संतुलित परिवार रखने की प्रैक्टिकलिटी के चलते अल्ट्रासाउंड कराकर अपनी अजन्मी कन्या के प्राण हर लिये होंगे... कैसे देखते होंगे ये लोग अपने को आइने में...क्या इज्जत रहती होगी इन जोड़ों की एक दूसरे की नजरों में...

बहुत हो गया, अब समय आ गया है कि हम सब इन कन्या वध के गुनहगारों से जवाब मांगें...

आप हैं मेरे साथ ?