गुरुवार, 21 जनवरी 2010

आज मिला मैं "मुन्शी" से, देखा उसका घरबार, आप भी मिलिये और इसी बहाने देखिये महंगाई को एक नये नजरिये से . . . . . . . . .प्रवीण शाह।

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मेरे महंगाई से चिंतित मित्रों,

सबसे पहले तो एक चेतावनी, यदि आप सौन्दर्य आग्रही हैं तो न ही देखें इस पोस्ट को, आपका सौन्दर्य बोध आहत हो सकता है... और खाते समय तो कतई नहीं...हो सकता है कि आप की भूख ही खत्म हो जाये...या खाने का स्वाद जाता रहे...


बता ही चुका हूँ पहले भी कि कुछ काम ऐसा है कि हर २-३ महीने में ४-५ दिन जाना पड़ता है इंटीरियर के गांवों में...

ऐसे ही एक गांव में देखिये २१ वीं सदी के भारत की तरक्की की चमकती दास्तान यानी मोबाइल क्रान्ति का वाहक मोबाईल टावर जिसे देखकर हम फूले नहीं समाते कि देखो कितनी तरक्की (???) कर ली हमने, गांव गांव में मोबाईल है...



 




पर थोड़ा आगे जाते ही खड़ा दिख गया मुझे मुन्शी... अपने महल के दरवाजे पर...




 




उसने बुलाया और मैंने मौका नहीं गंवाया देखूं तो कैसे रहता है मुन्शी... पूरी तरह से मिट्टी और पुआल से बना है उसका यह घर... हाड़ तोड़ मेहनत करता है वो... पर घर में दरवाजा नहीं उसके... बीबी छोड़ कर चली गई उसकी गरीबी के चलते...छोटी बहन रहती है साथ...यह साफ सफाई, रंगाई पुताई उसी ने की है... ठंड के इस मौसम में भी मुन्शी ने पहनी है एक कमीज और बहन ने एक पतला सा सूट... दो बाण की खटियां, एक रजाई, एक गद्दा, एक मिट्टी का चूल्हा, दो पकाने के बरतन, एक तवा और चार पांच थाली-गिलास... बस यही संपत्ति है मुन्शी की... जमीन उसके पास है नहीं...कोई जमा पूंजी नहीं...कोई बैंक खाता नहीं...रोज कुंआ खोदता है और रोज पानी पीता है।
और ऐसे मुन्शी हर गांव में मिल जायेंगे आपको...




 



आजाद हुऐ ६२ साल हो गये हमें...आजादी के तुरंत बाद से ही हो रहा है ग्राम-विकास... खडंजा और नाली यह दो चीजें अभिन्न अंग हैं इस ग्राम-विकास का... और गांवों की तरह ६२ साल की मेहनत के कारण मुन्शी का गांव भी बहुत विकसित है इस पैमाने पर... मैं तो देख चुका आप भी जायजा लीजिये...


 




 




 



अब सवाल यह उठता है कि क्यों खेतिहर मजदूर मुन्शी, जिसके पसीने का फल आज हमारी थाली में है, इतनी बुरी हालत में है... क्यों हमारे गांवों में कोई बदलाव नहीं आ पाया... जबकि हमारे शहरी मध्यवर्ग ने बहुत ऊँची छलांग मारी है...आज उसकी पहुंच में सब कुछ है... गाड़ी, बंगला, एसी, हवाई यात्रा, शापिंग मॉल, डोनेशन देकर बच्चों को काबिल बनाने के मौके...और भी बहुत कुछ...

इसी सवाल को दैनिक जागरण में अपने स्तंभ बुनियादी बात पर संजय सिंह ने उठाया है महंगाई पर विचित्र विधवा विलाप... वे कहते हैं...(लिंक पर जाकर पूरा लेख पढ़ें तो आभारी रहूंगा)

दरअसल, हमारी दिक्कत यह है कि हमें हर उस चीज के दाम ज्यादा लगते हैं जो आसानी से उपलब्ध है और जिसे एक साधारण व्यक्ति उपलब्ध करा रहा होता है। जबकि हर वह चीज सस्ती लगती है जो किसी ऊंची दुकान पर सजी हो और जिससे हमारी नाक ऊंची उठती हो। ऐसी चीज के लिए हम कोई भी कीमत अदा करने को तैयार हो जाते हैं। भले ही उसकी हमें जरूरत हो अथवा न हो। इसी सोच की वजह से हमें पैंतालीस रुपये किलो की चीनी और 100 रुपये किलो की दाल बहुत महंगी लगती है। आलू-प्याज के दाम 12 रुपये किलो से ऊपर हुए नहीं कि हम हाय तौबा-मचाने लगते हैं। हर जरूरी चीज के प्रति हमारा यही रवैया है। जबकि अनावश्यक चीजों पर हम दिल खोलकर खर्च करते हैं। हमें बदलाव तो चाहिये परंतु उसकी कीमत चुकाने से हम बचना चाहते हैं। हमें लगता है कि खाने-पीने की चीजें बाजार में यूं ही आ जाती हैं। इनके पीछे कोई निवेश, कोई मशक्कत या मगजमारी नहीं होती। इसी सोच के कारण भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। कहने को हम तरक्की कर रहे हैं। हमारी विकास दर भी ऊंची है। अच्छी सड़कें, एयरपोर्ट और अस्पताल हम बना रहे हैं। परंतु खर्च और कीमतों के बारे में हमारी सोच वही है। हम यह भूल जाते हैं कि अर्थव्यवस्था में सबकी भागीदारी और सबका हक है।

बात यही है और सही है मित्रों... जब हमारे इर्द गिर्द हर चीज और हर सेवा के दाम बढ़े हैं... तो क्या कृषि उत्पाद के दाम नहीं बढ़ने चाहिये... अगर महंगाई का हल्ला मचाकर कृत्रिम रूप से कृषि उत्पादों के दाम रखे गये... तो क्या कभी हमारे गांवों की तस्वीर बदल पायेगी...जब किसान को फायदा नहीं होगा तो वह मुन्शी को ज्यादा मजदूरी कैसे देगा... क्या कभी हमारे मुन्शी को एक सम्मानजनक जीवन जीने और अपनी अगली पीढ़ी को नीले आसमान में उड़ने के सपने दिखाने का मौका मिलेगा... या फिर ग्लोबलाईजेशन, लिबरलाईजेशन, १०% जीडीपी ग्रोथ, ओपन मार्केट आदि आदि का सारा फायदा शहरी मध्यवर्ग ही ऊठायेगा... सारी मलाई शहरी मध्यवर्ग ही खायेगा... गांवों को मिलेगी सिर्फ खुरचन... और मुन्शी ऐसे ही जीता रहेगा...और ऐसे ही जीयेंगी उसकी आने वाली नस्लें... अपने महल में...


सोचिये और सोचिये, महंगाई पर यह विचित्र विधवा विलाप नहीं तो और क्या है ?



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8 टिप्‍पणियां:

  1. आप कहते हो तो मान लेते हैं अन्‍यथा हमें तो यह अपने कस्‍बे के चित्र लग रहे हैं, वहाँ भी ऊपर देखो खुशहाल नीचे देखो बेहाल, भाई आप आवाज उठाते रहो मुन्शी को सम्मानजनक जीवन जीने की उम्‍मीद बनी रहेगी, कुछ न करने से करना बेहतर, धन्‍यवाद

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  2. विचारणीय आलेख. अब जाते हैं लिंक पर..आलेख पढ़ने.

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  3. प्रवीण भाई,
    आंखे खोलने और आइना दिखाने वाला लेख पढ़वाने के लिए आभार...
    आपकी साफ़गोई का आज मैंने अपनी पोस्ट में भी ज़िक्र किया है...

    किसान और उपभोक्ता के बीच के रास्ते में मोटी मलाई बिचौलिए खा रहे हैं...ये बात ठीक है कोई भी अपने गिरेबां मे झांकना पसंद नहीं करता...ब्रैंडेड कपड़ो के नाम पर हमारे नौनिहाल पांच सौ रुपये की जींस के दस हज़ार रुपये तक दाम चुका आते हैं...वहां हम नहीं कहते महंगाई है...दूध एक रुपया लीटर महंगा हो जाए तो हम हाय-तौबा मचाने लगते हैं...मेरे सपनों का भारत में गांधी जी ने यही लिखा था कि हर गांव की अपनी अर्थव्यवस्था होनी चाहिए...गांव पहले अपने बाशिंदों को खुद ही उगाकर फल-अनाज की आपूर्ति करे...फिर जो अनाज बच जाए उसे गांव से बाहर बेचने की सोचे...इससे जो कमाई हो वही गांव के विकास पर लगे...लेकिन वो सपना धरा का धरा रह गया...

    मैं जानता हूं आप मेरी इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखेंगे कि राहुल गांधी कम से कम एक देश में दो देश के फर्क, भारत और इंडिया के फर्क को मिटाने की बात तो कर रहे हैं, वरना हमारे नेता इतनी मोटी चमड़ी के हो गए हैं कि गरीबों का खून चूसकर डकार भी नहीं लेते...

    जय हिंद...

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  4. हाँ ऐसे भी दृश्य गाँवों में अब भी बहुत हैं -हम तो रोज रोज देखते हुए संवेदन हीन हो चुके !

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  5. देश तो आजाद हुआ साथ लुटेरे भी ज्यादा आजाद हो गये ।

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  6. बात में दम है, मगर कृषि उत्पाद के दाम बढ़ने पर मुंशी के लिए दो जून की रोटी और भी मुश्किल हो जायेगी (शायद).

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  7. school mei padha tha...agriculture is the main occupation in india....

    kya kahein, kuch bhi kehna bematlab hai

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