शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

आखिर क्यों मारा गया बेचारा हेमराज... क्या इस मामले में कोई कुसूरवार था ही नहीं, या बड़े लोगों के लिये खून माफ है ?

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आखिर हार मान ली सीबीआई ने, रहस्य ही रहेगा आरूषि-हेमराज की हत्या का यह मामला, नहीं मिलेगी गुनहगारों को सजा...


कौन सी वह मजबूरी या दबाव था, जिसके चलते सीबीआई का यह वरिष्ठ अफसर तक केस को सही तरह हैंडल नहीं कर पाया।


किस के असर या दबाव के चलते ऐसा हुआ, कि सीबीआई तक ने माना कि आरूषि के वैजाइनल स्वाब सैम्पल किसी दूसरी अज्ञात महिला से बदल दिये गये !


विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि टच डीएनए टैस्ट से भी कोई लाभ नहीं होगा इस मामले में...


क्या नौएडा के सरकारी अस्पताल की पैथोलॉजिस्ट ने सैंपलों में हेराफेरी की ?


या फिर इज्जत बचाने के लिये यह कहा जा रहा है, कि शायद पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने लापरवाहीवश वैजाइनल स्वाब लिये ही नहीं!


पूरे केस में शुरू से जाहिर है कि सबूतों को मिटाया गया, सबूतों को बदला गया... क्या हमारी प्रीमियर जाँच एजेंसी यह भी पता नहीं लगा सकी कि किसने ऐसा किया या किसके इशारे पर ऐसा किया गया... क्या परिस्थिति जन्य साक्ष्यों की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं... क्या इस दोहरे हत्याकांड के उद्धेश्य का पता लगाना वाकई इतना मुश्किल था...


क्या यह सच नहीं कि अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने हर पल इतना दबाव न बनाया होता, टीआरपी की होड़ में इतनी कांव-कांव न की होती... तो न कातिलों का हौसला बढ़ता, और पुलिस सभी संदिग्धों से थाने में ले जाकर की 'सामान्य पूछताछ' करने को आजाद होती... तो कत्ल के सारे सबूत आसानी से मिल जाते... और कातिल भी आज सजा काट रहे होते...


क्या यह सच नहीं कि ब्रेन मैपिंग व नारको एनालिसिस क्राइम इन्वेस्टिगेशन के नाम पर एक महंगा मजाक है...


केस आज भले ही बन्द हो जाये...पर मैं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ूंगा... हर एक हत्यारा कभी न कभी अपने करमों के बारे में 'गाता' जरूर है...


देर से ही सही यह केस सोल्व होगा जरूर, मेरे जीवनकाल में ही...


क्या आप भी मेरी ही तरह आशावान हैं ?


बताईये अवश्य...









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अरे हाँ, नया साल आपको मुबारक इस उम्मीद के साथ कि इस साल मेरे देश में सभी को न्याय मिलेगा... हेमराज जैसों को भी !


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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

माँ तुझे सलाम !...

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वह जब बहुत कम उम्र की थीं तो पोलियो की शिकार हो गईं...बड़ी हुई तो ब्याह दी गई...पति खेत-मजदूर थे, कभी कभी ईंट भट्टों में भी काम करते थे... पाँच लड़के-पाँच लड़कियाँ... मिट्टी की झोपड़ी...उस के नीचे बारह जन... ऊँची जात वालों के गाँव में रहता दलित परिवार... वह कहती हैं " गाँव के उस तालाब में जहाँ भैंसों तक को नहाने की आजादी थी वहाँ मेरे बच्चों को नहाने नहीं दिया जाता था"... पर इस बात को लेकर आज भी कोई कड़वाहट नहीं है उनके मन में... वह कहती हैं कि "ऊँची जात के गाँव वाले यह सब हमें प्रताड़ित करने के लिये नहीं करते थे, वे तो बस सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वाह कर रहे थे"... भारी पानी होने के कारण गाँव की जमीन से उपज भी बहुत कम होती थी... कुल मिला कर बोलें तो स्थितियाँ बड़ी विषम... पर उस माँ को एक ही लगन थी... 'मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है।'... उसने कभी हिम्मत नहीं हारी... हाड़तोड़ मेहनत की... यहाँ तक कि फसल के खेत से काट लिये जाने के बाद खेतों में बिखरे सरसों के दाने तक बटोरे...अपने बच्चों की स्कूल की फीस देने के लिये... और आखिरकार वह माँ कामयाब हुई अपने लक्ष्य में... आज उनके सारे बच्चे कामयाब हैं जीवन में...


 


नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ने मिश्री देवी को 'नेशनल अवार्ड फार बैस्ट मदर' से सम्मानित किया...


'माँ' मेरा भी तुझे सलाम !


अफसोस कि कोई मिश्री देवी पर फिल्म नहीं बनायेगा... फिल्में बनती रहेंगी गरीबी और लाचारी पर...लाचारी से, हालात से बिना लड़े, हार को ही अपनी नियति माने हुऐ इंसानों पर... नेशनल अवार्ड ऐसी ही फिल्मों को मिलता है...और ऑस्कर में भी ऐसी ही फिल्मों की पूछ जो है ।
भूख-गरीबी का महिमामंडन व गौरवगान बिकाऊ भी है और सहानूभूति बटेरू भी...



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भारत की इस श्रेष्ठ माता के बारे में और जानने के लिये कृपया यह भी पढ़ें...

दैनिक जागरण का समाचार...

जज्बे को मिला सम्मान:दैनिक ट्रिब्यून...

84-Year-Old wins Best Mother Award

MOTHER COURAGE:Times of India...

She battled polio and poverty to shape her children’s life: The Tribune







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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

अब उल्टे उस्तरे से हमें मूंडना बन्द करो यार... २६ जनवरी आने ही वाली है, हो जाये कुछ ईनाम-शिनाम !!!

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मेरे 'सम्मानित' मित्रों,

अगर कभी गाँव-देहात में रहे हों तो वहाँ का नाई याद होगा... जिसके पास कोई ब्लेड नहीं, बल्कि उस्तरा रहता था जिसे वह पत्थर पर आपके सामने ही घिस कर आपकी हजामत बनाता था... कभी कभी ग्राहक यदि सीधा-सादा हो तो नाई बिना धार लगाये भी हजामत बना देता था... नतीजा कई जगह से छिला हुआ चेहरा... सोचिये क्या होगा अगर वही नाई उस तरफ से आपकी हजामत बनाये जिस तरफ धार ही नहीं होती...

यानी उल्टे उस्तरे से हजामत बनवाना !!!

कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ मैं...

देखिये...

हाल ही में कामयाब कॉमनवेल्थ खेलों के बारे में...

कुछ दिलजले कह रहे थे कि... मच्छरों को बेचे गये हैं शायद टिकट...

अनजान थे बेचारे, राज तो अब खुला है... कहाँ गये थे वो सारे टिकट...???

अब देखिये न सीबीआई को कितनी सारी काम करने की आजादी ??? दी गई है... जिनके खिलाफ जाँच चल रही है ऑफिस अभी भी उनके ईशारे पर चलता है।

अहम गवाहों की सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजामात ??? किये गये हैं ।

इसीलिये कहता हूँ कि थक गये हैं अब हम सरकार... दया कीजिये, मत मूंडिये उल्टे उस्तरे से हमको... बंद कीजिये यह सब जाँच-वाँच का नाटक... २६ जनवरी आने ही वाली है... सही मौका है इस महा-लूट-आयोजन से जुड़े हर किसी को... नेता-प्रशासक-खेल प्रशासक-इंजीनियर-सप्लायर-ठेकेदार-दलाल सभी को... चुन-चुन कर ढूंढ निकालिये... और थमा ही दीजिये एकाध सम्मान !


कम से कम हमारे रहे सहे गाल तो छिलने से बच जायेंगे ।


क्यों मित्रों,

आप साथ हैं इस अपील में ?...

गाल तो आपके भी छिल ही रहे हैं!



आभार!




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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये... वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...


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मेरे 'पुत्रवान' मित्रों,

सही पूछो तो ब्लॉग है क्या... अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते विचार, अपनी खुशियाँ, अपने गम,अपने मन के डर-संदेह, अपने मन में उठते सवाल आदि आदि सब को अपने रोजाना के जीवन के यार-दोस्तों-रिश्तेदारों से एक कदम आगे बढ़कर एक विस्तृत पाठक वर्ग के सामने पेश करने का एक कारगर जरिया ही तो है यह... कुछ इसी वजह से आज की यह पोस्ट भी है ।

अब जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ आज उसे समझने से पहले आप यह वाकया पढ़िये...



अभी हाल ही में हुआ क्या, कि मेरे वरिष्ठ अधिकारी अवकाश पर थे... इसलिये यह समझिये कि संस्थान के अध्यक्ष के दायित्व निर्वहन का भार मुझ पर था...

सुबह सवेरे दो बजे मेरे पास फोन आया... फोन करने वाले ने बताया कि वह हमारे कार्यालय की एक वरिष्ठ महिला लिपिक XYZ का मकान मालिक है... इसी के साथ उसने सूचित किया कि रात दस बजे XYZ के सीने में तेज दर्द सा उठा, उन्होंने मकान मालिक से मदद माँगी, किन्तु जब तक मदद आती, उनकी साँसें अचानक बन्द हो गईं, डॉक्टर बुलाया गया और उसने उन्हें मृत घोषित कर दिया है... मैंने संवेदना जताई और परिवार जनों को सूचित करने के बारे में पूछा, पता चला कि मृतका की दो बेटियाँ उसी शहर में रहती हैं और वे दोनों आ चुकी हैं... आश्वस्त हो मैं यह सोच कर सो गया कि सुबह अंतयेष्टि में शामिल होउंगा...

सुबह कार्यालय पहुंच कर मैंने निश्चय किया कि जरूरी काम निपटाने के बाद विभागीय शोकसभा की जायेगी व हममें से कुछ अंत्येष्टि में शामिल होंगे... परंतु अचानक फिर उसी मकान मालिक का फोन आया, उसकी आवाज में एक तरह का आग्रह सा था " साहब, आप जल्दी से जल्दी आइये, यहाँ पोजीशन खराब है। "... मैं तुरंत चला और कुछ ही समय में वहाँ पहुंच गया...

अब वहाँ पहुंचा तो मामला कुछ इस प्रकार था... खबर मिलते ही दोनों पुत्रियाँ-दामाद पहुंचे... मृत्यु पर शोक व्यक्त करना तो दूर, उन लोगों ने मृतका के सारे सामान को उलटना-पुलटना, विभिन्न सामानों के ताले तोड़ना व आपस में गाली गलौज करते हुऐ लड़ना शुरू कर दिया... स्थिति बिगड़ी तो लोगों ने स्थानीय पुलिस चौकी को सूचित किया... चौकी से दो सिपाही पहुंचे... उन्होंने पार्थिव शरीर को बाहर बरामदे में दरी के ऊपर लिटाया व मकान के उस भाग में ताला लगाया... और चाबी लेकर चौकी चले गये...

मृतका अपने पति की मृत्यु के बाद मृतक आश्रित के तौर पर नौकरी में लगी थीं... उनकी तीन बेटियाँ थी... सबसे बड़ी बेटी का विवाह दिल्ली में हुआ था... वह बेटी कुछ समय बाद तीन बच्चों को पीछे छोड़ चल बसी... मृतका का अपना खुद का बड़ा मकान था शहर में... पर वे अपने घर में न रह कर किराये के मकान में रह रही थी... वजह यह थी कि शहर में रहने वाली दोनों बेटी-दामादों ने घर पर कब्जा कर लिया था... लड़कियाँ हर समय माँ से इस बात को लेकर लड़ती रहती थी कि वह दूसरी को ज्यादा 'हिस्सा' देती है... मृतका दिल्ली वाली लड़की के बच्चों को कोई मदद न करे, इस बात पर दोनों बहनें एक थी... जब दोनों बेटी-दामादों द्वारा समस्त चल-अचल संपत्ति उनको देने व उन्हीं के नाम वसीयत करने का अनुचित दबाव पड़ा तो मृतका ने घर ही छोड़ दिया...

मेरे पहुंचने के समय तक न तो कोई शोक हो रहा था न ही अंत्येष्टि की कोई तैयारी... दोंनों बेटी-दामाद केवल चाबियाँ पाने व सामान खुलने की बेकरारी में आपस में लड़ते-झगड़ते बैठे थे... मैंने मकान-मालिक व पड़ोसियों को खर्चा देकर अंत्येष्टि की तैयारी शुरू करने को कहा... इसके बाद पुलिस चौकी में आदमी भेजकर चाबियाँ मंगवाई... चौकी के एक दीवान, स्थानीय पार्षद व खुद मेरी मौजूदगी में सारे ताले खोले गये... सारे जेवर, नकदी, कपड़ों व अन्य सभी सामान की एक लिस्ट बनाई गई... सभी गवाहों की मौजूदगी में लिस्ट की कई प्रतियाँ बनाई गई व बड़ी बेटी की सुपुर्दगी में सारा सामान व चाबियाँ दी गईं... मृतका की अंत्येष्टि व उस से जुड़े अन्य संस्कार करने में बेटियों-दामादों की अरूचि देखते हुऐ मैंने मिले हुए नकद रूपयों में से ग्यारह हजार रूपये सभी उपस्थितों की सहमति से बड़ी लड़की को यह कहकर दिये कि वह अपनी मृतक माता की तेरहवीं तक के सभी संस्कार इन पैसों से अच्छी तरह से करवायेंगी...

मृत्यु की गरिमा बनी रहे और मृत देह का और निरादर न हो इस लिये अपने सहकर्मियों के साथ मैं तब तक वहाँ रहा जब तक शमशान ले जाकर चिता प्रज्जवलित नहीं हो गई ।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सैकड़ों लोग उस घर में आये और जो वाक्य मैंने सबसे ज्यादा सुना या यों कहिये कि लगभग हर कोई जिसे दोहरा दे रहा था... वह यह था... " बेचारी के एक भी बेटा नहीं था, कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये, एक भी बेटा होता तो 'मिट्टी' की इतनी बेकदरी नहीं होती! "




इत्तफाक देखिये आपके इस ब्लॉग लेखक की भी अभी तक दो बेटियाँ ही हैं...


तो मैं आपकी ओर समाज का कहा यह कथन सवाल के तौर पर उछाल रहा हूँ...


" कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये "...



वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...



जवाब देंगे न !




आभार!






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प्रिय पाठक,

आदरणीय राहुल सिंह जी की पोस्ट बिटिया... इस सारे मुद्दे को बेहद खूबसूरती से पेश करती है, अवश्य पढ़ें।


सोमवार, 20 दिसंबर 2010

हिट जायेगी या पिट जायेगी... अब यह तो आप ही डिसाइड करोगे न माईबाप ?


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मेरे 'पाठक-माईबाप' मित्रों,

इन्सान जब खुद को कमजोर पाता है तो क्या-क्या नहीं करने को मजबूर हो जाता... अपने एक मित्र हैं, उमर में थोड़ा ज्यादा हैं पर कुछ बातों में मैंने पाया है कि उनकी सोच कुछ-कुछ मुझ से ही मिलती है... अब आजकल अपने यह मित्र कुछ परेशान से हैं... वजह है उनकी बड़ी बिटिया, २९ वर्ष की हो जाने के बाद भी विवाह नहीं हो पा रहा उसका... अब किसी ने सुझाया कि पास के शहर में एक नामी ज्योतिषी हैं जो उपाय सुझा सकते हैं... तो जनाब ने मन बनाया मिलने जाने का और मेरे बार-बार मना करने के बाद भी मुझे मजबूर कर ही दिया साथ जाने को...

तो साहब, केवल और केवल इसी शर्त पर मैंने जाना मंजूर किया कि मैं वहाँ जाकर अपनी ओर से कुछ बोलूँगा नहीं... रविवार के दिन सुबह-सुबह हम निकले और ग्यारह बजे पहुंच गये ज्योतिषी महोदय के आवास पर... परिचय आदि हुआ, उन्होंने बताया कि वे चार साल पहले ही शिक्षा विभाग के एक बड़े पद से सेवानिवृत्त हुऐ हैं और ज्योतिष विद्मा महज उनका शौक है, जन सेवा के लिये वह यह कार्य करते हैं तथा वे परामर्श का कोई शुल्क नहीं लेते आदि...

इसके बाद ज्योतिषी महोदय ने मित्र से उनका जन्म स्थान, तिथि व समय पूछा, इसे एक कागज पर लिखा तथा बड़े जतन से रेशमी कपड़े में सहेज कर रखा गया एक ग्रन्थ खोला... उनके साथ बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि यह ग्रन्थ अत्यंत दुर्लभ है और ज्योतिषी महोदय को उनके गुरू द्वारा आशीर्वाद के रूप में दिया गया है...

मेरे मित्र ने कुछ कहने का प्रयत्न किया तो उनको इशारे से चुप करा दिया गया... ज्योतिषी महोदय ने ग्रन्थ से कुछ उस कागज पर उतारा, गणनायें की, फिर बोले...कुछ बातें बताता हूँ ध्यान से सुनिये...

*१- आपकी राशि पर ग्रहों के प्रभाव के कारण आपके काम रूके हुऐ हैं, अकसर रूकावटें आती हैं।
*२- आपने काफी ऊँची जगह पहुँचना था परंतु स्थितियाँ कुछ ऐसी रही कि आप वहाँ तक नहीं पहुँच पाये जहाँ आप पहुंच सकते थे।
*३- आपकी आमदनी अच्छी-खासी है परंतु खर्चे भी आमदनी के अनुपात में ज्यादा ही रहते हैं, इसलिये हाथ तंग रहता है।
*४- अपने मन से तो आप सभी का भला ही चाहते हैं परंतु कभी-कभी आपके परिचित आपके आशय को समझ नहीं पाते व बुरा मान जाते हैं।
*५- निकट भविष्य में ही आपका एक एक्सीडेंट होने व दिल की बीमारी (हार्ट अटैक) होने की संभावना है, यह सब आपकी कुंडली में लिखा है, इसी लिये मैं आपको सचेत कर रहा हूँ।

इतना सुनना था कि हमारे मित्र भयभीत और 'महा-इम्प्रेस' हो गये... लगे उपाय पूछने... उपाय बताया गया बाँये हाथ की मध्यमा ऊंगली में 'गोमेद' धारण करने का व दाहिने हाथ की अनामिका में 'मूंगा' धारण करने का... यह दोनों रत्न ग्रहों के दुष्प्रभाव को हल्का या समाप्त करने की क्षमता रखते हैं, बताया गया... इन दोनो रत्नों की अंगूठियों की कीमत व उन को मंत्रासिक्त कर पहनने काबिल बनाने का 'खर्चा' मात्र २००० रू० बताया गया... मित्र ने तुरंत भुगतान कर दिया... बताया गया कि दो दिन बाद आदमी भेज कर अंगूठियाँ मंगवा लें...

हम लोग उठने को ही थे कि अचानक मित्र को याद आया कि मैं यहाँ आया किस काम से था... उन्होंने बिटिया का विवाह न हो पाने के बारे में बताया... ज्योतिषी महाराज ने फिर कुछ गणनायें की और कहा या तो अगले तीन-चार महीने में विवाह हो जायेगा या फिर एक वर्ष तक और इंतजार करना होगा... बिटिया को भी लेकर दोबारा परामर्श के लिये आने को कहा गया...

इस सारे समय मैं सप्रयास चुप ही रहा...उठते समय ज्योतिषी जी ने मेरे बारे में पूछा तो मैंने बताया कि मैं ब्लॉग लिखता हूँ और आज के अनुभव के बारे में पोस्ट डालूँगा...मजाक-मजाक में ही मैंने यह पूछ कि पोस्ट 'हिट जायेगी या पिट जायेगी?'...उन्होंने जो बताया वह मैं बताउंगा पोस्ट के अंत में...

अब मेरे नजरिये से इस वाकिये को देखिये... ज्योतिषी जी ने जो बताया उनमें से...

*१- " आपकी राशि पर ग्रहों के प्रभाव के कारण आपके काम रूके हुऐ हैं, अकसर रूकावटें आती हैं। "...

यह हर उस आदमी पर लागू होती है जो ज्योतिषियों के पास जाता है, यही तो वजह है जिसके कारण वह परामर्श चाहता है।

*२- " आपने काफी ऊँची जगह पहुँचना था परंतु स्थितियाँ कुछ ऐसी रही कि आप वहाँ तक नहीं पहुँच पाये जहाँ आप पहुंच सकते थे। "...

यह भी लगभग सभी पर लागू होती है अपनी वर्तमान स्थिति से सर्वदा संतुष्ट बहुत कम लोग होंगे और जो हैं उनकी ज्योतिषियों के पास जाने की संभावना शून्य है।

*३- " आपकी आमदनी अच्छी-खासी है परंतु खर्चे भी आमदनी के अनुपात में ज्यादा ही रहते हैं, इसलिये हाथ तंग रहता है। "...

यह बात चाहे गली के मुहाने पर खड़े भिखारी से कही जाये या किसी 'धनकुबेर' से... सिर उसका हाँ कहते हुऐ ही हिलेगा।

*४- " अपने मन से तो आप सभी का भला ही चाहते हैं परंतु कभी-कभी आपके परिचित आपके आशय को समझ नहीं पाते व बुरा मान जाते हैं। "...

आर्डिनरी मोर्टल्स की तो बिसात ही क्या... यह बात चाहे आप राम से कहो या रावण से दोनों सहमति दिखायेंगे।

*५- " निकट भविष्य में ही आपका एक एक्सीडेंट होने व दिल की बीमारी (हार्ट अटैक) होने की संभावना है, यह सब आपकी कुंडली में लिखा है, इसी लिये मैं आपको सचेत कर रहा हूँ। "...

अब यह दोनों चीजें वाकई हो गई तो आप सच्चे... और यदि न हुई तो रत्न प्रभाव!


तो यह था हमारे ज्योतिष से साक्षात्कार का वर्णन, अरे हाँ मैं यह तो बताना भूल ही गया कि मेरे सवाल 'पोस्ट हिट जायेगी या पिट जायेगी?' का जवाब उन्होंने दिया था कि यह निर्णय तो पाठक ही करेगा...

यह तो मानना होगा सबको कि यहाँ पर ज्योतिषी महाराज एकदम सही हैं।

इसी लिये माईबाप अब आप ही मेरे माईबाप हो!

आपका हर निर्णय सिर-माथे...


पर निर्णय तो देंगे न ?




आभार!





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अपडेट:- दो दिन बाद अंगूठियाँ आ गई थी, मित्र को पहले कभी किसी ने अंगूठी पहनते नहीं देखा था, हर कोई अंगूठियों के बारे में पूछने लगा, कुछ 'जानकारों' ने बताया कि दोनों की वास्तविक कीमत हजार-बारह सौ से ज्यादा नहीं है, मित्र काफी कंजूस हैं, व्यथित हुऐ। एक 'जानकार' ने गोमेद को सूर्य की रोशनी में देखा और बताया कि इसमें एक हल्का सा 'क्रैक' है, उनके अनुसार रत्न में यह दरार तब आती है जब आपदा टल जाये। अब मित्र और परेशान, उन्हें समझ नहीं आया कि उनकी आपदा टली या किसी और की आपदा झेला हुआ रत्न उनको पहना दिया गया है, बीच में एक रोज बीपी की दवाई खाना भूल गये,रात भर नींद नहीं आई, घुटन सी होने लगी, उन्हें रत्न जिम्मेदार लगे, उतार फेंके। अगले दिन मिले, प्रसन्न थे, बोले "अब उतार कर ज्यादा आराम महसूस कर रहा हूँ।" आजकल फिर छुट्टी लेकर वर देखने गये हैं बिटिया के लिये।





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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

'चोरों' द्वारा शासित होने और लुटने को अभिशप्त एक बेईमान कौम हैं हम... बन्द करिये यह रोज रोज का घोटालों पर स्यापा करने का ढोंग...

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मेरे 'अभिशप्त' मित्रों,

मेरी पिछली पोस्ट के ऊपर आदरणीय डॉक्टर अनवर जमाल साहब ने एक पोस्ट लिखी है ALPHA MALE दोषी इंसान है , भगवान नहीं । , आप पोस्ट के हेडर पर मत जाईये, ( वह हम दोनों के बीच का एक पुराना मामला है), पर पोस्ट में जो कुछ उन्होंने लिखा है उसने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है...

वे लिखते हैं...

"आम आदमी चुनाव में वोट उसे डालता है जो उसे अच्छी तरह खिलाता ही नहीं बल्कि शराब भी पिलाता है। यही आम आदमी तो करप्ट है तभी तो वह अच्छे प्रतिनिधियों के बजाय गुंडे मवालियों को बेईमानों को चुनता है। यही आम आदमी जज़्बात में आपा खोकर आये दिन राष्ट्रीय संपत्ति में आग लगाता रहता है। कुली ट्रेन के जनरल कोच की बर्थ पर क़ब्ज़ा जमाकर लोगों को तब बैठने देता है जबकि वे उसे पैसे देते हैं। ईंट ढोने वाला मज़्दूर हर थोड़ी देर बाद बीड़ी सुलगाकर बैठ जाएगा। राज मिस्त्री को अगर आप चिनाई का ठेका दें तो जल्दी काम निपटा देगा और अगर आप उससे दिहाड़ी पर काम कराएं तो काम कभी ख़त्म होने वाला नहीं है। सरकारी बाबू भी आम आदमियों में ही गिने जाते हैं और रैली के नाम पर ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले किसान भी आम आदमी ही माने जाते हैं। अपने पतियों की अंटी में से बिना बताए माल उड़ाने वाली गृहणियां भी आम आदमी ही कहलाती हैं। नक़ली मावा बेचने और नक़ली घी दूध बेचने वाले व्यापारी भी आम आदमी ही हैं और दहेज देकर मांगने वालों के हौसले बढ़ाने वाले भी आम आदमी ही हैं। आम आदमी खुद भ्रष्ट है इसका क्या मुंह है किसी को ज़लील करने का ?
आवा का आवा ही बिगड़ा हुआ है भाई साहब ।
आपने सुधार के लिए जो प्रस्ताव दिया है इस पर आम आदमी कभी अमल करने वाला नहीं है।
कुछ और उपाय सोचिए।"


जब गंभीरता से इसे सोचा तो मैंने पाया कि बिना किसी अपवाद के अपने रोजमर्रा के जीवन में कई छोटी-छोटी बेईमानियाँ तो करते ही रहते हैं हम सभी (मैं भी शामिल हूँ)...

मेरे ८२ वर्षीय पिता ने एक लम्बा जीवन-अनुभव लिया है व जब हम बात करते हैं तो वे अक्सर मुझसे तीन बाते कहते हैं, इस बारे में...

१- ईमानदारी हम हिन्दुस्तानियों का जीवन आदर्श कभी नहीं रहा... हमारे खून में ईमानदारी कभी रही ही नहीं...
२- मैंने केवल उन्हीं को अपने इतने बड़े जीवन में ईमानदार पाया है जिनको कभी बेईमानी करने का मौका या पद नहीं मिला...
३- हर इंसान की कीमत होती है कोई मार्केट रेट पर बिक जाता है... तो कोई अपनी बहुत ऊंची कीमत लगाता है, और उस कीमत के मिलने तक 'ईमानदार' कहलाता है...



अगर पूर्वाग्रहों को किनारे रख आप पूरी गंभीरता व ईमानदारी से इस बारे में सोचें तो क्या यह सही नहीं...


आज जब आप अकल्पनीय यह सब पढ़ते हैं... आदरणीय खुशदीप सहगल जी अपनी इस पोस्ट में लिखते हैं...

"कभी मीडिया के सम्मानित माने जाने वाले चेहरों का असली सच दुनिया के सामने आ रहा है...तो कभी ये हकीकत सामने आ रही है कि कैबिनेट में मंत्री बनाने का विशेषाधिकार बेशक प्रधानमंत्री का बताया जाता हो लेकिन ए राजा को तमाम विरोध के बावजूद कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति का शक्तिशाली गठजोड़ दूरसंचार मंत्री बनाने की ठान ले तो वो मंत्री बन कर ही रहते हैं...मंत्री ही नहीं बनते बल्कि खुल कर अपनी मनमानी भी करते हैं..यहां तक कि प्रधानमंत्री की सलाह भी उनके लिए कोई मायने नहीं रह जाती है...यानि नीरा राडिया का सिस्टम प्रधानमंत्री के सरकारी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सिस्टम से भी ऊपर हो जाता है...शायद यही वजह है कि अपनी साख बचाने के लिए प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को नीरा राडिया, राजा और उनके करीबियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे डलवाने पड़ रहे हैं...लेकिन ये साख तभी बचेगी जब जनता के लूटे गए करीब दो लाख करोड़ रुपये को सूद समेत गुनहगारों से वसूल किया जाए...साथ ही सत्ता के दलालों को ऐसी सख्त सज़ा दी जाए कि दोबारा कोई नीरा राडिया, राजा, प्रदीप बैजल, बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी बनने की ज़ुर्रत न कर सके...और अगर ऐसा नहीं होता तो फिर छापों की इस पूरी कवायद को हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही माना जाएगा...."


तो आपको क्या यकीन नहीं है कि यह सब हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही हो रही है... एक 'ईमानदार' सीवीसी तक तो मिल नहीं पाता इस देश में...


यह सब स्थिति केवल और केवल इसी लिये बनी है और बनी रहेगी क्योंकि अंदर ही अंदर हम सभी 'चोर' हैं...


मित्र तारकेश्वर गिरी जी का फारमूला ही सही लग रहा है अब तो...


भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए...


हर अच्छी-बुरी चीज की तरह इस क्रान्तिकारी कदम के उठाने का समय भी शायद आ गया है...





आभार!









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रविवार, 12 दिसंबर 2010

' अंकल ' जी, कहीं आपके कारण सड़ने न लगें एक दिन हम सारे के सारे... आज ही से सफाई करिये इस सडांध की...!!!

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मेरे 'तरोताजा' मित्रों,

क्या कहूँ इस आलेख को लिखते हुऐ मेरे हाथ की-बोर्ड पर सध कर नहीं चल रहे... काँप सा रहा हूँ मैं भावनाओं के ज्वार मैं...

बचपन से ही खबरों पर नजर रखता रहा मैं... एक छोटे हाल में पैदा हुऐ बच्चे को देखा होगा आपने... कितना भरोसा होता है उसको अपने माँ-बाप पर... आप हवा में ऊंचा उछालें फिर भी न रोता है, न घबराता है बल्कि किलकिलाकर हंसता है... क्योंकि उसे भरोसा है कि आप उसे नुकसान नहीं होने देंगे... लपक लेंगे गिरने से पहले ही...

कुछ ऐसा ही भरोसा रहा है मुझे दो संस्थाओं पर, पहली हमारी फौज और दूसरी हमारी न्यायपालिका... बेदाग होना चाहिये था इन दोनों को... अब फौज के ऊपर भी आदर्श हाउसिंग घोटाला जैसे दाग लग रहे हैं... देखना यह है कि वह कितनी सफाई कर पाती है... सफाई करती भी है या नहीं... या फिर इस सारे मामले को जाँचों व फाईलों में दबा दिया जाता है...

पर आज मैं बात करूंगा कुछ खबरों की... २६ नवंबर को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा उसे आप यहाँ पढ़िये...

" कुछ सड़ा हुआ है इलाहाबाद हाईकोर्ट में "

"The faith of the common man in the country is shaken to the core by such shocking and outrageous orders," said justices Katju and Mishra.

"We are sorry to say but a lot of complaints are coming against certain judges of the Allahabad High Court relating to their integrity," said the bench, without disclosing the contents of complaints.

( शिकायतें धड़ल्ले से अब नेट पर तक खुले आम लिखी जा रही हैं...यदि झूठी हैं तो शिकायतकर्ता को हिमाकत की कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिये जो दूसरों के लिये उदाहरण बन सके, अन्यथा न्याय...)

Referring to the rampant 'uncle judge' syndrome allegedly plaguing the high court, the apex court bench said, "Some judges have their kith and kin practising in the same court.

"And within a few years of starting practice, the sons or relations of the judge become multi-millionaires, have huge bank balances, luxurious cars, huge houses and are enjoying a luxurious life. This is a far cry from the days when the sons and other relatives of judges could derive no benefit from their relationship and had to struggle at the bar like any other lawyer," the bench added."

अब इसी बात पर हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण व इनको वापस लेने हेतु एक प्रार्थनापत्र दायर किया... जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...

आप देखिये यहाँ पर...

"The remarks are unfortunate and uncalled for and has brought down the image of the Allahabad High Court judges in the eyes of the general public. The observations have made it difficult for the judges to function," the application had stated.

Maintaining its 'there is something rotten in Allahabad HC' remark, the Supreme Court has virtually declined any relief to Allahabad High Court. The HC had asked for clarification for this comment of the Supreme Court.

At the same time, a bench of justices Markandey Katju and Gyan Sudha Mishra, while dismissing the Allahabad High Court's application for expunging the remarks, clarified that there were "excellent and good judges too" in the court.

Rejecting the arguments of senior counsel P P Rao that even a clarification that some are excellent and good judges would still cause suspicion on the integrity of the judges, the bench remarked, "It is not just time to react but also to introspect."

Reacting to the persistent plea of Rao that the clarification would not be sufficient, Justice Katju angrily retorted, "Do not tell all those things. I and my family have more than 100 years of association with the Allahabad High Court. People know who is corrupt and who is honest. So do not tell me all this."

Justice Katju further observed, "Tomorrow, if Markandey Katju starts taking bribe, then the entire country will know about it. So do not tell me as to who is honest and who is corrupt."

Rao submitted that the earlier observations had tarnished the image of the entire High Court judiciary and the rustic would not be able to distinguish between a honest and a corrupt judge.

"Do not tell me all those things about the rustic. They are much more enlightened. Do not think people of India are fools," the bench observed while dismissing the application.


अब आप बताइये क्यों हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कहना पड़ रहा है... यदि कुछ सड़ रहा है न्याय के मंदिरों में... तो क्या यह सड़ता-सड़ाता ही रहेगा... या सफाई होगी ?... क्या आप सफाई के हक में हैं ?... क्या आप सफाई के लायक हैं ?... यह कैसा सड़ा हुआ समाज बनते जा रहे हैं हम लोग ?...

पिछले आलेख में कुछ पाठकों ने पूछा है कि सफाई होगी कैसे, सर्जरी करेगा कौन... हमें अपने घर से शुरू करना होगा इसे... देखिये पहले अपने अंदर फिर अपने घर में फिर रिश्तेदारों में, दोस्तों में, गली में, कालोनी-मोहल्ले में, पूरे समाज में... न्यायमूर्ति ने सही कहा है कि हिन्दुस्तान का 'आम आदमी' बेवकूफ नहीं है उसे सब पता है कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान... 'आम आदमी' होने के नाते आपको भी पता ही होगा कि किसकी शानो-शौकत, ऐश्वर्य भ्रष्टाचार की काली कमाई से पाये गये हैं... बार-बार उन को जताओ कि कितना ही तुम पा जाओ, है तो यह चोरी के पैसे से पाया हुआ ही... अत: हमारी नजर में इसकी कोई कीमत नहीं... इस 'तुच्छता' को हर वक्त जताओ उनके सामने...आंखों में आंखें डाल कर... हो सकता है कि यह सब आपको अपने ही परिजन के साथ करना पड़े... या कुछ मामलों में खुद को ही अपनी नजर में गिरा हुआ देखना पड़े... पर यह सब करने से ही 'चोरी' आउट ऑफ फैशन होगी... और यह सड़ना रूकेगा... नहीं तो हम सारे के सारे एक दिन सड़ जायेंगे... अभी देर नहीं हुई, इस सड़न को रोका जा सकता है...


क्या आप में है यह इच्छा शक्ति ?








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@ सभी पाठकगण,

यदि इस नैतिक पतन को वाकई रोका नहीं जा सकता तो क्या यह सही नहीं रहेगा, कि...भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए... कम से कम अपराधबोध से तो बचे रहें सब के सब...

मित्र तारकेश्वर गिरी जी को आभार सहित...




शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

यह एक ' आमतौर पर ईमानदार समाज ' की कुछ ' काली भेड़ों ' का ' नैतिक पतन ' नहीं है... यह सबूत है एक पूरे निजाम, एक पूरी व्यवस्था के सड़ जाने का... बिना किसी अपवाद के... क्या सर्जरी के लिये तैयार हैं हमलोग ?

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मेरे ' सफेद भेड़ ' मित्रों,


यह एक ' आमतौर पर ईमानदार समाज ' की महज कुछ ' काली भेड़ों ' का ' नैतिक पतन ' नहीं है... यह सबूत है एक पूरे निजाम, एक पूरी व्यवस्था के सड़-गल जाने का...बिना किसी अपवाद के...


एक समाज के तौर पर हम अब पतन का शिकार नहीं हो रहे, बल्कि अब हम सारे के सारे ही सड़ने लगे हैं...



क्या सर्जरी के लिये इच्छुक और तैयार हैं हमलोग ?



सोचिये, फिर बताइये...







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वैसे विश्व आज भ्रष्टाचार-विरोध-दिवस भी मना रहा है!







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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

फिकर नॉट ! अब आप रहोगे ' जवान ' हमेशा-हमेशा... पर, बच के रहना इस बंदूक से...

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मेरे ' चिर-यौवन-आकाँक्षी' मित्रों,

एक बड़ी अच्छी खबर है...

देखिये यहाँ पर...

संभावना व्यक्त की गई है कि अगले दस सालो में ऐसी दवा खोजी जा सकती है जो Aging यानी काल प्रभाव या कालिक क्षय को रोक ही नहीं बल्कि रिवर्स भी कर सके...

अब देखिये कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है विज्ञान... क्लोनिंग, स्टैम सैल रिसर्च से खुलती अपार संभावनायें, ऑर्गन हार्वेस्टिंग, टिशू कल्चर, प्रयोगशाला में अंगों का कल्चर, एंटी एजिंग रिसर्च, जीन मैपिंग, जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तरफ दूसरी तरफ यह संभावना भी कि शीघ्र ही मानव मस्तिष्क की समस्त Information ( Experiences,Reflexes, learning & Behaviour patterns ) को नैनो चिप्स में स्टोर व ट्रांसफर किया जा सकेगा... यानी साफ-साफ संकेत हैं कि अमरत्व अब दूर नहीं...

आंखें बंद कर सोचिये कि किस तरह का होगा मानव समाज आज से १५०-२०० साल बाद का... और उस समय जीवन-मृत्यु, आत्मा-परमात्मा जैसी धारणाओं का क्या होगा ?

सोचा क्या ?

अब इसी समय एक खबर... यह भी है ..XM 25... नाम की राइफल या यों कहें कि Weapon System के बारे में...

किसी भी युद्ध में होता क्या है कि योद्धा किसी पेड़, दीवार, मिट्टी का टीला, चट्टान या सैंड-बैग के पीछे आड़ (Cover) लेता है और थोड़ी सी देर के लिये अपना सिर उठाता व विरोधी पर फायर करता है... यह राइफल सामान्य लड़ाई में आड़ (Cover) लेने को एकदम बेमानी कर देगी... यानी इसको चलाने वाला अपने विरोधी को हर आड़ के पीछे मार सकता है... यानी हो गई अब अफगानिस्तान में अमेरिका विरोधी तालिबानियों की छुट्टी...

परंतु इतना खुश न होईये...

सोचिये यह हथियार अगर आतंकवादियों के पास आ गया या पाकिस्तान जैसा कोई मुल्क जो आतंकवाद को समर्थन अपनी State Policy के तहत देता है... उसने २६/११ की तरह चालीस-पचास जेहादी इस हथियार के साथ भेज दिये किसी महानगर में... Spine Chilling होगा वह नजारा!

मैं तो आज दिन भर यही सोचूंगा कि मानव जाति पहले क्या पायेगी, कहाँ पहुंचेगी ?

अमरत्व तक,

या

महाविनाश के आगोश में!



आप भी सोचिये, न...






आभार!




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आजकल छोटी बिटिया के कारण समय नहीं मिलता बिल्कुल, जितना समय मैं घर पर होता हूँ उसकी चाह यही होती है कि मेरी गोद में ही रहे... बहुत मुश्किल से २५-३० मिनट निकाल पाया इस पोस्ट के लिये... हो सकता है कि बाद में इसमें कुछ और जोड़ूं...


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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

पर क्या यह सचमुच ' लीक ' ही हुऐ हैं... ' लीक्स ' को देखिये मेरी नजर से.. मेरे साथ-साथ... और जानिये उनके पीछे का सत्य भी !!!


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मेरे 'रहस्यखोजी' मित्रों,

आज बहुत ही हल्ला है दो दो लीक्स का...

*** हिन्दुस्तान में लीक हुऐ हैं कॉरपोरेट पोलिटिकल लाबीइस्ट नीरा राडिया के फोन वार्तालाप...

देखिये...

यहाँ...

और

यहाँ पर भी...


*** और अंतर्राष्ट्रीय परिदॄश्य पर लीक हुऐ हैं...


Secret US Embassy Cables...


मित्रों,

अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रदेशीय, नगरीय, ग्रामीण बल्कि परिवार स्तर तक की राजनीति/कूटनीति में सूचनायें गुप्त रखने के लिये नहीं होती... सूचनायें 'इस्तेमाल' की जाती हैं... अपने तात्कालिक हित साधन के लिये... कभी कभी कोई व्यक्ति, सरकार या देश ऐसी स्थिति में होता है कि उस को अपने सर्वाईवल के लिये अपने पास उपलब्ध कुछ सूचनाओं को नियंत्रित तरीके से दुनिया के सामने लाना होता है... अब यह सब आधिकारिक तौर पर तो किया नहीं जा सकता है... तो फिर तरीका होते हैं 'लीक्स'... सूचना या जानकारी यदि 'लीक' होकर दुनिया को मिलती है, तो उसका एक बहुत बड़ा फायदा यह भी है कि उसकी प्रामाणिकता/विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाता... उसे सच ही मान लिया जाता है...


अब इन्हीं मानकों पर हम दोनों लीक्स को देखेंगे...


१- कॉरपोरेट पोलिटिकल लाबीइस्ट नीरा राडिया के लीक हुऐ फोन वार्तालाप...

इनमें निकला क्या...

कि,टू जी घोटाले को लेकर जो इतना हंगामा मचाया जा रहा है...

* उसमें केवल तत्कालीन संचार मंत्री ही शामिल नहीं हैं...
* भारतीय राजनीति के सभी धुरंधर, मीडिया के बड़े-बड़े चेहरे, कॉरपोरेट जगत के सभी बड़े सितारे, टेलीकॉम की लगभग सभी कम्पनियाँ सभी या तो इनमें शामिल हैं या इनसे लाभान्वित...

मतलब यह कि...

* हमाम में सभी नंगे हैं...

असर यह हुआ कि...

सरकार पर होते विपक्ष व मीडिया के हमलों की धार कुंद हो गई... थोड़ी बहुत न्यायालय की सक्रियता बची है... अब कुछ समय बाद सारे हमले भी बंद हो जायेंगे!




२- विकिलीक्स के लीक किये Secret US Embassy Cables...


देखिये इनसे निकल क्या रहा है...


कि,

* वह देश भी जो ईरान के साथ या निरपेक्ष नजर आते हैं... चाहते हैं कि अमेरिका ईरानी परमाणु ठिकानों को नेस्तनाबूद करे...
* अकेले अपने बूते इजराइल यह काम करता है तो जरूरी नहीं कि प्रयास सफल रहे...
* अलकायदा पर अमेरिकी बमबारी में यमन सरकार की सहमति है...
* अफगानी राष्ट्रपति करजाई भरोसे लायक नहीं हैं और उनका सगा भाई ड्रग ट्रैफिकिंग में लिप्त है...

सबसे अहम खुलासे पाकिस्तान को व हमको लेकर हैं...

* पाकिस्तान बहुत तेजी से परमाणु हथियार बना रहा है, बना सकता है व उस के पास काफी परमाणु हथियार हैं... अस्थिर होने या आर्थिक बरबादी के बावजूद वह यह करता रहेगा...
* इन में से कुछ हथियार गलत नॉन स्टेट प्लेयर्स के हाथ भी जा सकते हैं...
* अमेरिका कुछ भी कर ले पाकिस्तान व पाकिस्तानी फौज भारत विरोधी आतंकवादियों को अपना समर्थन जारी रखेगी...
* सउदी अरब के शेख का मानना यह है कि आसिफ अली जरदारी जो पाकिस्तान सरकार का सिर हैं, वही सड़ा हुआ है... तो फिर शरीर तो खुद ही खराब हो जायेगा...
* आसिफ अली जरदारी खुद ही सुरक्षित व प्रभावी नहीं हैं...
* भारत यदि कभी पाक के साथ युद्ध करता है तो भारत के लिये मिश्रित परिणाम मिलेंगे...
* भविष्य में यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो यह परमाणु युद्ध होगा...

इस तरीके से अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया को व खास तौर पर हमको यह बता देना चाह रहा है कि...

* ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अमेरिकी नेतृत्व में नेस्तनाबूद करने की जरूरत है, ईजराइल अकेले यह दुस्साहस न करे...
* अफगानिस्तान में अमेरिका की नाकामी उसकी खुद की गलतियों के कारण नहीं अपितु अफगान सरकार के ही गलत हाथों में होने के कारण है...
* भारत के विरूद्ध पाक समर्थित इस्लामी आतंकी घटनायें और भी हो सकती हैं परंतु भारत युद्ध के बारे में कभी न सोचे...
* कश्मीर के मामले में अमेरिका हमारी कोई मदद नहीं कर सकता...
* पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को गलत हाथों में जाने से रोकने के लिये अमेरिका का उसके साथ रहना जरूरी है... और दुनिया को भी इस महान काम में अमेरिका को मदद करनी चाहिये...



अब आप बताईये... इतना सेलेक्टिव और स्ट्रेटेजिक लीक्स... और उनसे निकलते यह साफ-साफ ईशारे...


मैं तो यह मानने को तैयार नहीं कि यह सूचनायें असलियत में लीक हुई हैं।

This is carefully planned & controlled release of INFORMATION, Sugar Coated & Gift Wrapped as ' LEAK '... My foot !



आप क्या सोचते हैं ?






आभार!




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सोमवार, 29 नवंबर 2010

कभी कभी हारना जीतने से भी ज्यादा जरूरी भी होता है और सुखद भी !



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मेरे ' विजेता ' मित्रों ,

आज सुबह की सैर को निकला तो अपनी-अपनी बाईकों पर खाली सड़कों का फायदा उठा रेस लगाते दिखे स्कूली बच्चे...
अपनी भी कुछ यादें तरोताजा हों गई उन्हें देख... सोचा आपसे शेयर करूं...


हाँ तो बात है तकरीबन १६ साल पहले की... मेरी Yamaha RXG 135 एकदम नई थी... जवान भी था ही तब मैं... और बाईक को तेज चलाने का शौक या सनक भी रखता था... अब उस दौर की सबसे तेज मोटरसाइकिल भी थी ही अपने पास... तो ऐसा कम ही होता था कि कोई दुपहिया मुझसे आगे निकल जाये...

अपने काम की जगह शहर से थोड़ा दूर थी... आफिस से घर जाते हुए पाँच-छह किलोमीटर का निर्जन सा इलाका पड़ता था... उस इलाके के खत्म होते ही नदी का एक पुल था जहाँ पर तीन रास्तों का ट्रैफिक आकर मिलता था और वहीं से शुरू होती थी एक अतिव्यस्त शहर की भागमभाग भी...

अब यही पाँच-छह किलोमीटर का हिस्सा ऐसा था जिसमें मैं हवा से बातें करने के अपने शौक को अंजाम देता था... वह हाफ-डे था... ऑफिस से घर को निकला तो बड़ी मस्ती में था मैं... जैसे ही मैं वहाँ पहुंचा और बाइक को तेज भगाने का इरादा किया ही था कि बगल से एक बच्चे की आवाज सुनाई दी " पापा चलो अंकल से रेस लगाते हैं। "... देखा LML स्कूटर पर सवार एक पिता-पुत्र की जोड़ी... बच्चे ने स्कूल यूनिफार्म पहनी थी... शायद स्कूल से घर जा रहे थे दोनों...

मुझे एकदम से खेल सा सूझा... मैंने क्लच दबाया और एकस्लरेटर को जोर से घुमाया... आवाज तो बहुत जोरों की आई पर स्पीड ज्यादा नहीं बढ़ी... पिता शायद समझ सा गया... और उसने भी स्कूटर की स्पीड तेज कर दी... अब यह मेरे लिये खेल सा हो गया... मोड़ों पर, स्पीड ब्रेकरों पर या उन जगहों पर जहाँ सड़क अच्छी नहीं थी मैं अपनी बाईक को धीमा कर स्कूटर को अपने से आगे निकलने देता... और सीधी सड़क पर फिर उसे पकड़ लेता और थोड़ा आगे हो जाता... बच्चा इस सबसे बहुत ही आनंदित था... और उत्साह से भर " पापा और तेज, और तेज ! " उसके यह चीखने से खेल का आनंद और बढ़ गया था...

पुल अब आने ही वाला था... एक आखिरी बार मैंने अपनी बाईक को स्कूटर से दो तीन गज आगे बढ़ाया... और फिर उसके बाद क्लच को दबा लिया... एक्सीलरेटर देने पर इंजन जोर से गरजा... परंतु बाईक की स्पीड यथावत ही रही... पिता ने इशारा समझा और स्कूटर को थोड़ा और तेज कर दिया... " हुर्रे !!! मेरे पापा जीत गये !... बच्चे की यह चीख गूंजी... पुल पर पहुंचने से पहले पिता ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया और मुझे वेव किया...



कभी कभी हारना जीतने से भी ज्यादा जरूरी हो जाता है...


खास कर तब, जब आपकी इस हार से एक बच्चे का पिता उसकी नजर में हीरो हो जाता हो...


आपको क्या लगता है ?


आभार!






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सोमवार, 22 नवंबर 2010

डोन्ट वरी, बी हैप्पी ! Happy days will remain here forever !... जय जय घोटाला !!!


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मेरे ' घोटालेबाज ' मित्रों,

सबसे पहले तो यह कहूँगा कि दिल मत छोटा करो यार... क्या हुआ जो कुछ जले-भुने ईमानदार नासपीटों की वजह से हाल फिलहाल में हमारे किये तीन तीन घोटाले उजागर हो गये...

क्या हुआ जो कलमाडी जी, ए० राजा जी और अशोक चवाण जी को इस्तीफा देना पड़ गया... भाई दिखाने के लिये करना पड़ता है यह सब... वैसे भी तीनों के पास काम की कोई कमी तो नहीं... जल्दी ही दूसरे काम का भी जुगाड़ कर ही देगी हमारी बिरादरी (कोऑपरेटिव सोसाइटी) उनके लिये...

आप तो यह भी तो देखो न कि कितने बड़े-बड़े नाम आज हमारे साथ खड़े हैं...

कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, जिसमें हमने अपना खून-पसीना बहा कर जनता की हराम की कमाई का मात्र ६०-७० हजार करोड़ रूपया ही अपने लिये कमाया... कौन नहीं था उसमें हमारे साथ... पक्ष-विपक्ष के बड़े-बड़े नेता... खेल प्रशासक... नौकरशाह... सीपीडब्लूडी के बड़े-बड़े इंजीनियर... बड़ी-बड़ी रियल-एस्टेट कंपनियों के कर्ता धर्ता... सब ही तो शामिल थे...

आदर्श हाउसिंग घोटाला , क्या करते ये बेचारे फौजी उस जमीन पर 'खुखरी पार्क' बना कर या फालतू की परेड कर-कर के... पूरे १०४ आलीशान फ्लैट बनाये हमने... उन बेचारों के रहने के लिये जिनके पास रहने के लिये कहीं और छत नहीं थी... और कीमत भी कितनी कम रखी... केवल ८५ लाख... कौन कौन नहीं था इन फ्लैटों को पाने वालों में... दो-दो आर्मी चीफ... एक नेवी के एडमिरल... कई और जनरल... कैन्ट बोर्डों की जमीन ' सुरक्षित ' रखने का काम करने वाले अफसरान... मुंबई के कई नेता या उनके बेनामी चेले-चमचे... कारगिल के योद्धा और युद्ध में मारे गये शहीदों की विधवायें क्या करतीं इस प्राइम प्रापर्टी का...

टेलीकॉम २-जी घोटाला... फिर इस देश की जालिम जनता के हिस्से के एक लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये को ही तो केवल लूटा है न हमने... अब हमारे बीबी-बच्चों को भी तो दाल-रोटी तो चाहिये ही न... देखो किस-किस को फायदा पहुंचा इसमें... नेता हर तरफ के... नौकरशाह कई कई विभागों के... टेलीकॉम क्षेत्र की लगभग हर बड़ी कंपनी के मालिक-प्रमोटर... कॉरपोरेट लाबीइस्ट... यहाँ तक कहा जा रहा है बड़े-बड़े पत्रकारों ने भी इस सब में भूमिका निभाई है...

देखा तुमने, कितनी तेजी से बढ़ रही है हमारी यह बिरादरी... आखिर यह जालिम-जनता कब तक हमारा खून चूसेगी... हम अपना खून-पसीना लगा कर दिन ब दिन नये नये, पहले से और भी बड़े घोटाले करते रहेंगे...

तुम में से कोई भी इस भय को मत पालना कि ऊपर लिखे तीनों बड़े कामों में की गई मेहनत के फलस्वरूप जो कुछ हमने कमाया है या सिर ढकने को जो छत पाई है... कोई उसे हमसे छीनेगा... इस जनता की याद्दाश्त बहुत ही कमजोर है... जाँचें बैठा दी गई हैं... चलते रहने और कभी खत्म न होने के लिये... नया ' हॉट-टॉपिक ' जल्द ही पैदा हो जायेगा... फिर सब भूल जायेंगे कि कोई घोटाला कहीं हुआ भी था...

इस लिये बार-बार कह रहा हूँ कि हिम्मत न हारो...

लगे रहो !

हम इस जालिम जनता से अपना ' हक ' हर हाल में छीन कर रहेंगे !

जय हे...

जय हे...

जय-जय-जय हे !

घोटाला तेरी जय हो !

जय जय घोटाला !




आपका ही,

महा ' घोटालेबाज '

अध्यक्ष,

घोटालेबाज बिरादरी,

भारत।







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यह मुगालता कतई न पालिये कि यह कोई व्यंग्य है... यह पत्र तो डाक विभाग की गलती से मेरे पास आ गया... पता साफ-साफ नहीं लिखा था... मुझे काम का लगा, तो मैंने छाप दिया... शायद इस तरह यह उस आदमी तक पहुंच ही जाये जिसकी बिरादरी ने उसे यह भेजा था !



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शनिवार, 20 नवंबर 2010

पशुबलि-कुरबानी , शाकाहार-मांसाहार , वैचारिक बहस- फ्री फॉर ऑल धर्मयुद्ध... बीचों-बीच फंसे हम और जेहन से उठते ११ सवाल... क्या उत्तर देंगे आप ?

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मेरे ' उत्तरदाता ' मित्रों,


आज और कुछ नहीं...


बस यह ग्यारह सवाल...


*** क्या यह सही नहीं है कि जीव-दया व मांसाहार निषेध के संबंधित आलेखों की बाढ़ ब्लॉगवुड में बकरीद के आस-पास ही आती है, जबकि थैंक्सगिविंग डे के दिन भी लाखों टर्की पक्षी बाकायदा भूनकर GOD को धन्यवाद देते हुऐ खा लिये जाते हैं बाकायदा customary 'Turkey Song' गाते हुए, और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता ?

*** क्या यह सही नहीं है कि बकरीद के दिन दी जाने वाली बकरे की कुर्बानी और रोजाना हलाल मीट की दुकान पर बिकते बकरे को मारने का तरीका बिलकुल एक जैसा ही है ?

*** क्या यह सही नहीं कि इस तरह के आलेख लिखने वाले महानुभावों का अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में न तो कोई मुस्लिम मित्र होता है न ही मुस्लिम समाज से उनका कोई संबंध होता है, यदि होता तो उन्हे यह ज्ञान हो जाता कि दया, ममता, करूणा आदि सभी मानवीय भावनायें एक मुसलमान के अंदर भी उतनी ही हैं जितनी उनके भीतर, आखिर हैं तो सभी इंसान ही ?

*** क्या यह सही नहीं कि ' फ्राइड चिकन चंक्स ' को बड़े शौक से खाने वाले कुछ लोग चिकन को काटना तो दूर कटते देख भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें अपनी पैंट गीली करने का डर रहता है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज भी किसी पार्टी या दावत में यदि कोई नॉनवेज पकवान बना होता है तो सर्वाधिक भीड़ उसी काउंटर पर होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि प्रागैतिहासिक काल, पुरा पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जाति अपना वजूद समूह में शिकार कर प्राप्त किया भोजन ग्रहण कर ही बचा पाई है, और इसी सामूहिक शिकार की आवश्यकताओं के कारण भाषा व कालांतर में मानव मस्तिष्क का भी विकास हुआ ?

*** क्या यह सही नहीं कि आततायी और आक्रमणकारी के द्वारा किये जा रहे रक्तपात को रोकने के लिये भी जवाबी रक्तपात की आवश्यकता होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि कुछ मध्यकालीन अहिंसावादी, जीवदयावादी धर्मों-मतों के प्रभाव में आकर भारतीय जनमानस इतना कमजोर हो गया था कि हम कुछ मुठ्ठी भर आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर पाये और गुलाम बन गये ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज के विश्व में लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आहार विज्ञानी एक मत से यह मानते हैं कि आदर्श संतुलित आहार में शाकाहार व मांसाहार दोनों का समावेश होना चाहिये ?

*** और क्या यह भी सही नहीं है हम चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी, By birth हों या By choice , दोनों ही स्थितियों में हमें कोई ऐसा ऊंचा नैतिक धरातल नहीं मिल जाता कि हम दूसरे को उसके आहार चयन के कारण उसे सीख दें या उसे अनाप-शनाप, आसुरी स्वभाव वाला या पशुवत कहें ?




क्या आप उत्तर देना चाहेंगे इन सवालों का ?





आभार!







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मूल रूप में यह आलेख एक टिप्पणी थी जो मुझ द्वारा एक ब्लॉग पोस्ट पर की गई थी , किसी वजह से यह छप नहीं पाई अत: इसे पोस्ट बना दिया गया है।






सोमवार, 15 नवंबर 2010

जीवन का उद्देश्य, Purpose of Life : Elementary, My Dear Watson ! ओह्ह सॉरी विवेक जी . . . . . .


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मेरे 'विवेकी' मित्रों,

कुछ कारणों से कुछ समय नेट से थोड़ा दूर सा रहा... इसी दौरान विवेक रस्तोगी जी की यह पोस्ट नहीं देख पाया... आज देखी... विवेक जी लिखते हैं:-


"आखिर इस जीवन का उद्देश्य क्या है, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। यह प्रश्न मेरे अंतर्मन ने मुझसे पूछा तो मैं सोच में पड़ गया कि वाकई क्या है इस जीवन का उद्देश्य… ?

सबसे पहले मैं बता दूँ कि मैं मानसिक और शारीरिक तौर पर पूर्णतया स्वस्थ हूँ और मैं विषाद या उदासी की स्थिती में भी नहीं हूँ, बहुत खुश हूँ। पर रोजाना के कार्यकलापों और जीवन के प्रपंचों को देखकर यह प्रश्न अनायास ही मन में आया।

थोड़ा मंथन करने के बाद पाया कि मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता है, कि जीवन का उद्देश्य क्या है, क्या हम निरुद्देश्य ही जीते हैं, हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।

जैसे कि मैंने बचपन जिया फ़िर पढ़ाई की, मस्तियाँ की फ़िर नौकरी फ़िर शादी, बच्चे और अब धन कमाना, और बस धन कमाने के लिये अपनी ऐसी तैसी करना। थोड़े वर्ष मतलब बुढ़ापे तक यही प्रपंच करेंगे फ़िर वही जीवन चक्र जो कि मेरे माता-पिता का चल रहा है वह होगा और जिस जीवन चक्र में अभी मैं उलझा हुआ हूँ, उस जीवन चक्र में उस समय तक मेरा बेटा होगा।

यह सब तो करना ही है और इसके पीछे उद्देश्य क्या छिपा है, कि परिवार की देखभाल, उनका लालन पालन, बच्चों की पढ़ाई फ़िर अपनी बीमारी और फ़िर सेवानिवृत्ति और फ़िर अंत, जीवन का अंत। पर फ़िर भी इस जीवन में हमने क्या किया, यह जीवन तो हर कोई जीता है। समझ नहीं आया।

यह सब मैंने अपने गहन अंतर्मन की बातें लिख दी हैं, मैं दर्शनिया नहीं गया हूँ, केवल व्यवहारिक होकर चिन्तन में लगा हुआ हूँ, और ये चिन्तन जारी है, जब तक कि जीवन का उद्देश्य मिल नहीं जाता है।"



कई जवाब भी मिले हैं उनको, पर अधिकाँश में घुमा-घुमा कर गोल मोल बातें ही की गई हैं सिर्फ अजित गुप्ता जी ने ही भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा है कि श्रेष्ठ संतान का जनन-पालन-पोषण ही जीवन का उद्देश्य है... हमारे ग्रंथ इसको 'पितृऋण से मुक्त होना' भी कहते हैं।

इस संबंध में मेरे विचार इस प्रकार हैं...

*** अपनी समस्त मानसिक-बौद्धिक योग्यताओं के बावजूद मानव है तो प्राणी जगत का एक जीव ही... तो मानव जीवन का उद्देश्य क्यों कर किसी भी अन्य प्राणी के जीवन के उद्देश्य से भिन्न होना चाहिये ?... जरा गौर करिये आपके इर्द-गिर्द जो प्राणी दिख रहे हैं उनके जीवन का उद्देश्य क्या है ?

जवाब साफ है:-

मानव जीवन के उद्देश्य निम्न हैं...

१-
प्रजनन
: यानी अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना... इसके लिये सबसे जरूरी है उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम, उपयुक्त जीवन साथी का चयन... समाज के नियमों के चलते विवाह बंधन में बंध जाने के बाद भी मानव जीवन पर्यंत और बेहतर जीवन साथी की तलाश व उसे प्रभावित करने के प्रयास में लगा रहता है... यह सारी पद, प्रतिष्ठा, पैसे के पीछे की भागदौड़ के पीछे सिर्फ एक ही भाव है... विपरीत लिंगी के लिये स्वयं को और अधिक आकर्षक व चुम्बकीय बनाना!... इसके अतिरिक्त अपनी संतति के लिये दुनिया को और सुरक्षित, आरामदेह और बेहतर बनाने की चाह हमारी सारी वैज्ञानिक-तकनीकी खोजों के पीछे का ड्राईविंग फोर्स है।

२-
कुदरत द्वारा दी गई पाँच इन्द्रियों की तृप्ति
: मानव की यह पाँच इन्द्रियाँ हैं नेत्र, घ्राण, स्वाद, स्पर्श व श्रवण इन्द्रियाँ... यदि आप आंखें बंद कर कुछ समय सोचें तो आप पायेंगे कि हमारे यह सभी होटल, रेस्टोरेंट, आटोमोबाइल, फूड, वस्त्र, कॉस्मेटिक, फैशन, ग्लैमर, संगीत, नृत्य, ट्रैवल, टूरिज्म, धर्म, योग, आध्यात्म आदि अदि तमाम तरह की इंडस्ट्रीज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव की इन पाँच इन्द्रियों को तृप्त करने का ही तो कार्य कर रही हैं।

स्पष्ट है कि मानव भी अपने जीवन के उद्देश्यों के मामले में अन्य जंतुओं से कोई अलग नहीं है... परंतु हुआ क्या है कि पिछले ५-१० हजार में मानव मस्तिष्क के विकसित हो जाने के कारण उसकी ईगो भी बहुत बड़ी हो गई है...मानव जीवन तो तब भी था जब भाषा-लिपि का विकास नहीं हुआ था,और जीवन तब भी था तो उद्देश्य भी रहा ही होगा... परंतु आज वह यह मानने को तैयार नहीं कि मरने के बाद मेरा हश्र भी वही होगा जो मेरी कॉलोनी के कुत्ते या चिकन शाप के ब्रायलर का होगा... अब इसी ईगो को चंपी करने के लिये पैदा की गई हैं धर्म-अध्यात्म जैसी दुरूह अवधारणायें, कुछ चालाक दिमागों के द्वारा... यह बताती हैं कि मानव अन्य जीवों से इतर है... उसका जीवन उद्देश्य है, अपने बनाने वाले को पहचानना... जीवन भर उसका गुणगान, उसकी कृपा का बखान... मृत्यु के बाद उसके फैसले के अनुसार दूसरे लोक के जीवन की सजा या इनाम... और यदि मस्का ज्यादा लगाया हो तो, जीवन के बाद उसी में मिलन...



Excuse me, but isn't it a big joke with capital J ?

Ha Ha Ha...



.... :-))


आभार!





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रविवार, 14 नवंबर 2010

धन्यवाद योगॠषि स्वामी रामदेव जी... पतंजलि आयुर्वेद के यह उत्पाद वाकई उत्कृष्ट हैं... परंतु ..........




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मेरे 'गुण ग्राही' मित्रों,

परम आदरणीय योगॠषि स्वामी रामदेव जी से आप असहमत तो हो सकते हैं परंतु उनके कथनों व योगदान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है...

योगऋषि आजकल संपूर्ण भारत की 'भारत स्वाभिमान' यात्रा पर हैं... मेरे शहर में कुछ माह पहले जब वह आये तो उनके द्वारा बताये जाने पर शहर के पतंजलि सेवा केंद्र में जाकर मैं भी कुछ उत्पाद ले आया था...

उत्पाद थे...


*** दन्त कान्ति डेन्टल क्रीम (टूथ पेस्ट)

*** केश कान्ति हेयर क्लीन्जर (शैम्पू)

*** ओजस बॉडी क्लीन्जर (पारदर्शी साबुन)

*** तेजस बॉडी लोशन (माईश्चराइजिंग क्रीम)



यह सभी उत्पाद पतंजलि आयुर्वेद द्वारा बनाये गये हैं, पैकिंग बाजार में उपलब्ध अन्य किसी भी कंपनी के उत्पाद के समकक्ष है, कीमत वाजिब है और सबसे बढ़कर बात यह है कि व्यक्तिगत रूप से मुझे इन्हें प्रयोग करने का अनुभव इतना अच्छा रहा है कि मैं भविष्य में भी इनको प्रयोग करते रहना चाहता हूँ...

आप को कभी मौका लगे तो आजमाईये जरूर...


परंतु दो बाते हैं जो अपने ब्लॉग में लिखना जरूर चाहता हूँ,


हो सकता है कि यह बातें वहाँ तक पहुँच ही जायें जहाँ तक मैं इनको पहुंचाना चाहता हूँ...


१- सेवा केन्द्र में ढूंढने पर भी मुझे कोई शेविंग क्रीम नहीं मिली... बताया गया कि या तो नारियल तेल या एलोवेरा जेल चेहरे पर लगा कर शेव करें... पर दोनों ही तरीके प्रैक्टिकल नहीं हैं... शेविंग क्रीम भी जल्द से जल्द आनी चाहिये!


२- पतंजलि आयुर्वेद को भी जल्दी से जल्दी शेयर बाजारों में सूचीबद्ध होना चाहिये... IPO लाना चाहिये व भारत के हर आदमी को इसके शेयर खरीदने व इस उद्मम की प्रगति में भागीदार/साझीदार होने का अवसर देना चाहिये... अन्य उद्ममों की तरह यह भी अपने वित्तीय नतीजे सार्वजनिक करे... अपनी अल्प आय से वैसे तो मैंने आज तक कोई शेयर नहीं खरीदा, परंतु यदि पतंजलि आयुर्वेद का शेयर खरीदने का मौका मिले तो यह अवसर मैं गंवाऊंगा नहीं!



सुन रहा है क्या, कहीं, कोई ?





आभार!






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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

डियर चीफ, कब्जे में लो इस ' नासूर ' को और फिर ढहा दो बारूद लगाकर... तभी ' आदर्श ' स्थापित होगा, फिर से !!!


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प्रिय जनरल,

१- सबसे पहले तो यह कहूँगा कि पदासीन होने के बाद से आज तक का आपका आचरण और आपके किये कार्य़ उदाहरण देने योग्य रहे हैं, मुझे ही नहीं, हर उस आदमी को जिसने जीवन में कभी जैतूनी हरी वर्दी पहनी है या आज पहनता है, उसे गर्व है कि आप हमारे चीफ हैं।

२- पिछले काफी दिनों से संचार के हर माध्यम पर सुन और देख रहा हूँ कि मुंबई में कुछ लोगों के भ्रष्ट गठजोड़ ने सशस्त्र सेनाओं के कब्जे वाली एक बेशकीमती जमीन को कारगिल के शहीदों तथा युद्ध में मारे गये सैनिकों की विधवाओं के लिये फ्लैट बनाने के नाम पर कब्जाया और उसमें सौ से अधिक फ्लैट बना कर आपस में बंदरबाँट कर ली।

३- यह भी पता लग रहा है कि इन फ्लैटों को पाने वालों में कई सेवारत व रिटायर्ड शीर्ष सैन्य अधिकारी भी हैं जिनमें से कुछ ने अपने कार्यकाल में इस जमीन हड़पने में कुछ मदद पहुंचाई या चुप रहे या दूसरी तरफ देखा, जिसका ईनाम उन्हें भी एक एक फ्लैट देकर दिया गया।

४- इस सारे मामले को लेकर राजनीति में काफी तूफान मचा है व हर दल के द्वारा अपने घर को साफ करने व साफ दिखाने की कोशिशें जोरों पर हैं।

५- मुझे आज अखबार से पता चला कि सेना ने भी एक कोर्ट आफ इन्क्वायरी गठित की है।

६- मेरा कहना मात्र यह है चीफ कि गलत हुआ है, यह साफ जाहिर है, यह सब जाँचें और कमेटियाँ सालों साल चलती रहेंगी और समय कटता रहेगा और साथ-साथ बना रहेगा वह दाग भी जो जैतूनी-हरी वर्दी पर चिपक गया है।

७- आप के पास देश के संविधान ने कानूनी ताकत दी है, आप इस नासूर बन चुकी इमारत के ऊपर कब्जा करो, अनेकों कानून हैं इसके लिये, इसे देश की सुरक्षा के लिये खतरा घोषित करते हुऐ बारूद लगा कर ढहा दो, पूरा का पूरा, महज कुछ मंजिल तोड़ने से काम नहीं चलने वाला।

८- मैंने कहीं यह भी पढ़ा है कि इस जमीन पर हमारे सैनिक कभी परेड करते थे, इस बेहूदा इमारत को ढहाने व मलबा साफ करने के बाद फिर से जब हमारे सैनिक यहाँ परेड करेंगे, तो यकीन मानो चीफ, हर उस शख्स के होंठों पर विजय की मुस्कान होगी और सीना गर्व से चौड़ा होगा जिसने कभी अपने जीवन में जैतूनी हरी वर्दी पहनी थी या पहनता है आज, यह मुसकान होगी बेईमानी नाम के दुश्मन को अपनी फौज के दिल-दिमाग से बाहर रखने में पाई 'आदर्श बैटल विक्टरी' की।

९- मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरी बात पर गौर करोगे, जनरल।


सादर आपका,



प्रवीण शाह






(मेरे नियमित पाठक मुझे क्षमा करें कि अपने चीफ को लिखे एक नितांत व्यक्तिगत पत्र को यहाँ छाप दिया है।)

गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

अंग्रेजी अपनाओ खुशहाली पाओ ! अंग्रेजी जिंदाबाद ! बच्चों के भविष्य के लिये यही कहना होगा सबको ! इस मामले में एक सी सोच है नारायणमूर्ति और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद की !!!


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मेरे 'बहुभाषी' मित्रों,

दो अलग अलग खबरें हैं परंतु उनसे निकल कर आ रहा संदेश एक सा है...

इन्फोसिस के संस्थापकों में से एक व भारतीय आई टी इन्डस्ट्री के शीर्ष पुरूष एन आर नारायणमूर्ति यहाँ पर ... कहते हैं :-

"I think all state governments must make an attempt to say we will allow as many English medium schools as required because if you do not do so, then the children will not be able to move from one state to another." Job opportunities available to children who go to English medium schools generally are seen to be of a higher quality and is a reality whether one likes it or not, he said.


और ठीक उनकी ही तरह उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े गाँव में अंग्रेजी देवी के मंदिर का निर्माण करने वाले दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद कहते हैं:-

Prasad said that the temple is being built to popularise English among Dalits, who form a sizeable number in not just the village but also in the area, so that they can move ahead in their lives.

"This temple would help encourage them to learn the language which has become essential for one's growth as in 20 years' time, no decent job would be available without its knowledge," Prasad said.



हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के हित साधन के नाम पर गाल बजाना तो बहुत होता है मेरे देश में... परंतु इन भाषाओं को रोजगार से जोड़ने की, आधुनिक ज्ञान से जोड़ने की, कोई ईमानदार कोशिश आज तक तो नहीं हुई... ऐसी हालत में यह दोनों लोग एक कड़वी हकीकत को ही जुबान दे रहे हैं...


मैं तो सहमत हूँ उनसे...


आपको क्या कहना है ?


आभार!




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सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

'इक्कू मोटे' की याद में... जिसका इस देश पर पूरा उतना ही हक है जितना मेरा या आपका !... (एक रीठेल)



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मेरे 'हकदार' मित्रों,

बड़ी अजीब-अजीब सी बातें हो रही हैं आजकल... कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं पूरी की पूरी कौम पर... ' मालिक ' और ' किरायेदार ' का...

अब क्या कहा जाये सिरफिरों को... मुझे बरबस याद आया अपने बचपन का दोस्त... जिसके ऊपर एक बार एक अकविता सी पोस्ट लिखी थी... उसी पोस्ट को दोबारा ठेल रहा हूँ...

और हाँ ' इक्कू ' यह जरूर दोहराना चाहूँगा कि ठीक मेरी ही तरह तुम मालिक हो किरायेदार नहीं...



तेरी दुकान पर नहीं आऊंगा दोबारा ' इक्कू '...




बहुत सालों बाद इस बार गया, अपने पुराने शहर...
रक्षाबंधन पर हर साल पानी बरसता है मेरे शहर में...
थोड़ी देर ही सही,पर परंपरा निभाई बादलों ने इस बार भी...
सुबह थोड़ी देर बरसा, फिर खुल गया आसमान...
और इसी के साथ उड़ने लगीं खूब सारी रंग बिरंगी पतंगें...
पतंग उड़ाते बच्चों को देख जाग गई सब पुरानी यादें...


तभी अनायास याद आ गया अपना ' इक्कू मोटा '...
घर से निकला आज मिल कर आउंगा उसकी दुकान पर...


हाँ, पूरा नाम है उसका, मोहम्मद इकराम कुरैशी़...
साथ साथ पड़ते थे हम शहर के सरकारी स्कूल में...
उतना मोटा तो नहीं था,पर हम सब में तगड़ा था...
उसी की वजह से बड़े रौब से चलते थे हम सब...
जब ' इक्कू मोटा ' साथ होता,पिटते कम,पीटते ज्यादा...
पढ़ाई में तो ज्यादा मन नहीं ही लगता था उसका...
मगर उसके जैसा खिलाड़ी,नहीं देखा मैंने आज तक...


खेल कोई भी हो,उस्ताद था वो सभी खेलों का...
कंचे खेलता जीत ले जाता हम सबके सारे कंचे...
क्रिकेट में बाउन्ड्री के पचासों गज बाहर गिरते उसके शॉट...
फुटबाल तो मानो चिपक जाती थी पैर से ' इक्कू ' के...
मेरी याद्दाश्त में कैरम में भी नहीं कोई जीत पाया उससे...


पर इन सबसे बढ़कर उसकी पतंगबाजी याद है मुझे...
इधर इक्कू मोटे की पतंग उड़ी तो लोग उतार लेते थे अपनी...
मांझे,सद्दी और पतंग से मानो एकाकार हो जाता था वो...
चील सा झपट्टा मारती उसकी पतंग,जब तक कुछ समझ आये...
' वो काट्टा 'चिल्लाते हुए नाच रहा होता हमारा ' इक्कू मोटा '...
उसकी पतंग उड़ने के थोड़ी देर बाद साफ हो जाता आसमान...
' है कोई और 'चुनौती देती उड़ती रहती सिर्फ उसी की पतंग...


भीड़ से बचता बचाता जब पहुंचा उस की दुकान पर...
काउंटर पर बैठा मछली साफ कर तौल रहा था वो...
' अबे साले इक्कू ' की जगह बोला " कैसे हो इकराम भाई "...
' स्साले पॉन्डी तेरी तो 'की जगह वो बोला " कैसे हो साहब "...
" साहब होंउगा दूसरों का, तुम्हारे साथ तो खेला हूँ मैं "...
" अरे नहीं,फिर भी आपकी इज्जत का लिहाज रखना होता है "...


मैंने मिलाने को हाथ बढ़ाया काउंटर के उस पार...
कलाई थमा दी उसने,बोला " हाथ गंदे हो जायेंगे आपके "...
" आज राखी के दिन भी पतंग नहीं उड़ाओगे ? " पूछा मैंने...
" अब हमारे दिन कहां? बेटा गया है आज उड़ाने ", बोला वो...


शुगर बढ़ी रहती है इन्सुलिन से भी काबू नहीं,बतलाया उसने...
थोड़ी देर कुछ इधर उधर की बातें की,फिर चाय पिलाई मुझे...



" अच्छा भाई चलता हूँ फिर आउंगा कभी " बोलकर विदा ली मैंने...
मेरी स्मृतियों के आइने में कहीं कुछ चटख गया उस रोज...


अब दोबारा कभी नहीं जाउंगा, मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर...
मैं अपनी यादों के ' इक्कू मोटे ' को, रखना चाहता हूँ जस का तस...







आभार!







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शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

मेरे मन की मौज !... अब तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ ?


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मेरे 'मनमौजी' मित्रों,

आज का यह संवाद उनके लिये है जिन्हें कुछ ज्यादा ही जोर की मिर्ची लगी है शायद...


न जाने क्यों आज एक गीत, और वह भी गोविंदा द्वारा अभिनीत कुछ बदलाव कर गुनगुनाने का मन कर रहा है...

गाना कुछ इस तरह का है...

" मैं तो भेल पूरी खा रहा था...
बाजा बजा रहा था...

तेरी नानी मरी तो मैं क्या करूँ..."

मेरा बदलाव कुछ इस तरह से है:-

" मैं तो तुम्हारी अलग-अलग बातों में...
मौजूद विरोधाभास दिखा रहा था...
जो मजाक ही के लायक है, उसका...
मजाक ही तो उड़ा रहा था...

तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ ?"

सामान्य मसाले पड़ी किसी चीज को खाने पर यदि आपके अगाड़ी-पिछाड़ी दोनो तरफ जोरों से मिर्ची लग जाती हो...

तो कृपया यह जरूर देखें कि...

***

गलत जगह पर गलत मंत्रों के जाप से...
पुराने दिव्य मंत्रों के गलत उच्चारण से...
किसी मंत्र को १००१ के बजाय १००२ बार जाप करने से...
आपकी राशि के करीब शनि के ऊपर केतु के चढ़ जाने से, जिसकी शुक्र से मित्रता व गुरू से वैर है...
अपने हाथों की ऊंगलियों की राशि रत्न लगी अंगूठियों को अदल-बदल पहनने से...
जिसकी शान्ति करनी है उसे जगाने व जिसे जगाना है उसे शान्त करने से...


अक्सर मुँह पर छाले हो जाते हैं!...


और...


***

अज्ञान के छंटने पर दुकानदारी बन्द होने के डर से...
मंत्र जाप करते समय गलत आसन लगाने से...
बैठे-बैठे कुछ प्राचीन भाषाओं में लिखे उलजलूल विचारों की जुगाली करने से...
आपकी राशि के ऊपर शनि की तिरछी और मंगल की गोल गोल चाल से...
बोविस स्केल पर आसन स्थल की ऊर्जा १९७८९ यूनिट से कम आ जाने से...
खुद के अगले पल का पता न होते हुऐ भी दूसरों का भविष्य बताने के दबाव से...


अक्सर पिछवाड़े पर छाले या बबासीर जैसा मर्ज हो जाता है!...



कहीं आपके साथ ऐसा ही तो नहीं हो गया ?





आभार!



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डिस्क्लेमर:- विनम्र अनुरोध है कि कृपया किसी भी स्थिति में मेरे इस आलेख को इस पोस्ट से जोड़ कर न देखें, जो किसी भी हालत में इस पोस्ट से कोई संबंध नहीं रखती थी।





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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

आदरणीय संगीता पुरी जी को धन्यवाद... इसी बहाने ब्लॉग मैनर्स पर कुछ सवाल भी... हम लुट नहीं सकते यार !


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मेरे 'मौलिक' मित्रों,

आज सुबह सुबह अपने ब्लॉग के लेटेस्ट कमेंट दिखाने वाले ब्लॉगर विजेट पर आदरणीय संगीता पुरी जी का यह कमेंट देखा:-

क्‍या यह रचना आपकी है .. मैने नए चिट्ठों का स्‍वागत करते वक्‍त एक ब्‍लॉग में इस रचना को अभी अभी देखा है !!

तो तुरंत भाग कर उस नये ब्लॉग PRABHAKAR KANDYA पर पहुंचा और वहाँ यह टीप आया...


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प्रिय प्रभाकर कान्ड्य,

मुझे पता नहीं कि अपने इस ब्लॉग पर आप अपनी स्वयं की लिखी रचनायें लगाते हो या अपने द्वारा जगह-जगह पढ़ी गई अपनी पसंदीदा रचनाओं को प्रस्तुत मात्र करते हो...

परंतु आज जो अतुकांत कविता आपने लगाई है... मुझे उस का रचयिता होने का श्रेय हासिल है... यह रचना सबसे पहले २७ अगस्त २००९ को मेरे ब्लॉग पर यहाँ छपी, २०१० को डॉटर्स डे के दिन मुझ द्वारा इसे दोबारा री पोस्ट भी किया गया... यह भी बता दूँ कि मैंने इसे २७ अगस्त २००९ की सुबह ही लिखा था ।

आप को इस रचना को छापते समय मुझे श्रेय देना चाहिये था व मेरी पोस्ट का लिंक भी देना चाहिये था... यह सामान्य ब्लॉग शिष्टाचार है... यदि नया होने के कारण आप यह सब नहीं जानते हैं, तो अभी भी देर नहीं हुई है... आप अपनी भूल सुधार सकते हैं।

आभार!


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मेरी ओर से मामला यहीं खत्म...

पर कुछ बातें जो इस से निकली उन पर चर्चा करूँगा...

१- सबसे पहले तो सलाम आदरणीय संगीता पुरी जी की सजग नजरों को...मैंने जब पहली बार यह रचना २७ अगस्त २००९ को लगाई थी तो उन्होंने टिप्पणी भी दी थी, शायद यह सब उन्हें याद रहा और उन्होंने मुझे सूचित किया... शायद संगीता जी के सबसे नियमित आलोचकों में मेरी गिनती होती है... परंतु आलोचना को दिल से न ले वह नियमित तौर पर मेरे ब्लॉग पर आ उत्साह वर्धन भी करती हैं...अपनी बात भी कहती है मेरी भी सुनती हैं... एक अनुकरणीय ब्लॉगर हैं वे...उनको नमन...

२- लेटेस्ट कमेंट वाला यह ब्लॉगर विजेट न होता तो हो सकता है कि संगीता जी की टिप्पणी पर मेरी नजर ही नहीं पड़ती... बड़े काम का विजेट है यह...आप ने नहीं लगाया तो लगा ही लीजिये...

३- इत्तेफाक तो देखिये आज की पोस्ट मेरी १०० वीं पोस्ट है... और यह वाकया... यह कोई शुभ संकेत तो नहीं { ;) }... पर मैं लुटा नहीं, मेरी सब पोस्टें कॉपी-लेफ्ट हैं... जो चाहे लिंक या श्रेय दे कर जहाँ चाहे इस्तेमाल कर सकता है... हम लुट नहीं सकते यार !!!


आभार!






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बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

चलो भाई आत्मा-आत्मा खेलते हैं आज : एक आध्यात्मिक जुगाली... ( A Spoof )


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मेरे 'आत्मीय' मित्रों ,

सबसे पहले तो यह चेता दूँ कि यह पोस्ट एक हल्का-फुल्का मजाक है, गंभीरता की उम्मीद रखने वाले सम्मानित पाठक इसे न ही पढ़ें तो उनकी 'आत्मा' के लिये अच्छा रहेगा... वैसे तो किसी को भी इस पोस्ट से बुरा नहीं लगना चाहिये परंतु यदि लग रहा है तो यह मानिये कि पूर्व के 'संचित कर्मों' के परिणाम स्वरूप इस जीवन में खुलकर हंसना आपकी 'आत्मा' के नसीब में नहीं है... वैसे यदि किसी को बुरा लगता भी है तो मेरी 'आत्मा' पर कोई बोझ नहीं है इसका...(आत्मा हो तब न बोझ उठायेगी...:-))

डिस्क्लेमर निबट गया, अब आते हैं पोस्ट पर... बीते दिनों 'आत्मा' पर चल रही ब्लॉगीय बहस में बहुतों ने बहुत कुछ कहा... जो-जो कहा गया, उसे पढ़ कर मेरे भौतिकवादी-खुराफाती दिमाग में जो सवाल-विचार उठे, वही आपके सामने हाजिर हैं।

यहाँ नीचे नीले रंग से वह बातें हैं जो किसी ब्लॉगर ने एक बार में ही या एकाधिक अवसरों पर आत्मा के बारे में कही हैं व ठीक उन बातों के नीचे है उन बातों की आध्यात्मिक जुगाली करने के बाद मेरे मन-मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते सवाल/विचार...

विभिन्न ब्लॉगर बंधुओं द्वारा कही गई इन बातों को उनके मूल रूप में आप यहाँ और यहाँ पर देख सकते हैं।

चलिये शुरू किया जाये...

***
"अनेकानेक जन्म लेने के साथ कभी कभी आत्मा भी बोझ तले दब जाती है । ओवर-बर्डएंड हो जाती है । जिसके कारण मनुष्य के वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी सी उलझने हो जाती हैं।"

"मृत्यु के पश्चात जब न दिमाग जिन्दा रहता है और न ही उसकी कोई कोशिका। फिर उसमें कोई स्मृतियाँ भी संचित नहीं हो सकतीं। न कोई आत्मा होती है, न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ।"


जब न कोई आत्मा होती है न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ तो ओवर बर्डन्ड क्या होता है... वह क्या है जिसके कारण वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी उलझनें हो जाती हैं।


***
"विज्ञान की मानें तो आत्मा का क्षय होता है। जैसे किसी के जीवन में कोई घटना जो उसके मस्तिष्क पर बहुत प्रभाव डालती है और व्यक्ति को गहें दुःख का अनुभव कराती है , वो आत्मा के क्षय का कारण बनती है।"
"किन्हीं घटनाओं और निरंतर असफलताओं के चलते , अवसाद से ग्रसित मनुष्य की आत्मा का बड़े अनुपात में क्षय होता है , जिसके कारण इनके अन्दर प्रायः suicide करने की टेंडेंसी आ जाती है।"


विज्ञान ने कब और कहाँ ऐसा कह दिया, और यह दुखों और असफलताओं से यह जो क्षय होता है क्या आत्महत्या करने से उसकी पूर्ति हो जाती है?


***
"कोई भी पैदायशी नास्तिक नहीं होता। कुछ घटनाएं व्यक्ति को इतना निराश करती हैं , की वह इश्वर में भी विश्वास खो बैठता है। यह भी आत्मा के क्षय का एक उदाहरण है।"

पैदायशी आस्तिक होते हैं क्या ?


***
"अगले जनम में कौन क्या बनेगा वो मनुष्य इसी जनम में खुद तय कर लेता है.उदहारण के लिए - (अ)जो लोग पर्यावरण प्रदूषित करते हैं वातावरण शुद्ध नहीं रखते उन्हें अगले जन्म में सूअर बन कर गंदगी साफ़ करनी पड़ती है."

पर्यावरण प्रदूषित करने वाले इतने सारे और सूअर इतने कम...बहुत नाइंसाफी है रे... और उन देशों का क्या जहाँ धर्म के कारण सूअर पलने ही नहीं दिये जाते... सूअर क्या-क्या करता है कि अगले जन्म में फिर से आदमी बन जाये?


***
"धर्म पुस्तक के पांचवें सफे की तीसरी कंडिका के पच्चीसवें पैराग्राफ में लिखा है की संसार में कुल 249.88932749283767620X10^762 आत्माएं हैं. जिसे इसमें यकीन न हो वह गलत सिद्ध करके दिखा दे."

एकदम सही बात भाई मुझे तो यकीन है...जिसे न हो वह दोबारा से गिनती कर ले!


***
"चार्वाक दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो पुनर जन्म को नहीं मानता।

इसके अनुसार--

यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

अर्थात इसी जन्म में हम सुख-दुःख को जी लेते हैं। सभी पाप और पुन्य कर्मों का फल भी यहीं इसी जीवन में मिल जाता है। इसीलिए मृत्यु के समय कुछ भी बकाया नहीं रहता।

अतः

नया जीवन --नयी स्मृतियाँ-- नया अनुभव--नया चिंतन ।"


कमेंट नीचे मिलेगा...

***
"यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

इस श्लोक का अर्थ है :: जब तक जीवो तब तक सुख के साथ जीवो ...ऋण लेकर भी दूध-घी का सेवन करना पड़े तो कीजिए ।"


अत:
नया जीवन-- नय़ा कर्जा-- नया घी-- सुख ही सुख

***

"आपने इतनी आत्माए आती कहा से ये प्रश्न किया है तो वेदों पुरानो व कथाओ के अनुसार मनुष्य जरुरी नहीं है की मरने के बाद पुनह मनुष्य योनी में पैदा हो और कीड़े मकोड़े भी जरुरी नहीं है की वापस कीड़े मकोड़े बनकर पैदा हो ! अतः हो सकता है की कीड़े मकोड़े पशु पंछियों की संख्या घट रही हो और मनुष्यों की संख्या बाद रही है!"

यानी की ह्युमन पोपुलेशन एक्सप्लोजन का मूल कारण तो मलेरिया-मच्छर नियंत्रण जैसे कार्यक्रम व Insecticide/Pesticide का अधिक इस्तेमाल है...और हम परिवार नियोजन कार्यक्रम की असफलता को वजह मान बैठे हैं।


***

"मनुष्य का अगला जन्म इस पर निर्भर होता है की पूर्व जन्म में मरते वक्त उस का अंतिम मनोभाव क्या था .क्यों की मरने पर सही गलत आदि निर्णय की छमता ( तार्किक शक्ति ) समाप्त हो जाती है और वह अंतिम समय के मनो भाव पर स्थिर हो जाता है और उसी के अनुसार अगला जन्म लेता है .वहा पर वो पूर्व जन्म का अच्छा और बुरा दोनों का फल प्राप्त करेगा .
भारत मुनि ब्रह्म ज्ञानी थे पर जीवन के अंतिम समय उन हो ने अपनी माँ के बिछुड़ा हुआ एक मृग का बच्चा पाल लिया और मोह ग्रस्त हो कर मरते समय उस में ही उन का चित्त था और अगला जन्म उन्हें मृग के रूप में मिला"


समझे भाई...जानवर तो पालो...पर चित्त न लगाओ उस से...जिंदगी का क्या भरोसा...कहीं आपने चित्त लगाया हुआ है और समय पूरा हो गया... फिर अगले जनम भौं भौं !!!





***
"प्रक्रिया के दौरान एक महिला ने बताया की वह पूर्व जन्म में पुरुष थी। इसका कोई प्रमाण मिल सकता है ? सच क्या है ? गीता में एक स्थान पर बताया गया है , की विभिन्न जन्मों में योनियाँ तो बदल सकती है , मनुष्य से पक्षी और पशु बन सकते हैं, लेकिन लिंग नहीं बदलता। फिर उस महिला की बात की सत्यता क्या है ? क्या ये उसके मन की कोई दमित भावना नहीं ? या अवचेतन मन का कोई विचार ?"
"इसका गीता में उल्लेख है की मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त उसका लिंग परिवर्तित नहीं होता। जो स्त्री है , वो स्त्री ही रहेगी।"


किस तरह की आत्मा को मच्छर योनि में जन्म लेना पड़ता है? और मादा मच्छर आदमी का खून व नर मच्छर फूलों का रस ही क्यों चूसते हैं... मच्छर ऐसे कौन से कर्म कर सकती है कि अगली योनि महिला की मिले?

***
"इसलिए वेदांत के अनुसार केवल जीवधारियों में ही नहीं अपितु निर्जीवों में भी आत्मा है।
आत्मा और जीव समानार्थी शब्द नहीं हैं। मोक्ष की आवश्यकता जीव को है, आत्मा को नहीं। आत्मा का अपना कोई गुण-दोष-धर्म-जाति-लिंग नहीं होता। यह पहले जीव और फिर शरीर से संयुक्त होकर गुण-दोष युक्त हो जाता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव क्रमशः आगामी जन्मों में मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। । बुरे कर्म करने वाले निम्नतर जैविक प्रजातियों में, फिर निर्जीव पदार्थ में परिवर्तित होते रहते हैं।"


अब तो गजब कन्फ्यूजन हो गया है भाई...मकान के सामने यह रेत का ढेर एक ही आत्मा है या जितने कण उतनी आत्मायें?

***
"मेरा मानना है कि-
जिस प्रकार सूरज जीवन का आधार है , फिर भी प्रत्येक प्राणी के लिए अलग-अलग सूरज नहीं है ,ठीक उसी प्रकार एक आत्मा अर्थात शक्ति पुंजभी सभी प्राणियों में समान रूप में वास करती है
अर्थात जन्म से पहले भी सूरज था और मृत्यु के बाद भी सूरज है"


अब ठीक है... यह आलेख पढ़ कर अपनी आत्मा पर बोझ न लीजियेगा...मेरी आत्मा पर फ्री फंड में बोझ बढ़ जायेगा।






आभार आपका,

आत्मीयता से अपना कीमती समय इस आलेख को पढ़ खराब करने के लिये!









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मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

अचानक से यह अपने-अपने धर्म, धर्मग्रंथों मे लिखी बातों तथा धार्मिक रीति-रिवाजों में वैज्ञानिकता खोजने-बताने का प्रचलन क्यों बढ़ रहा है ???


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मेरे 'विज्ञान-प्रेमी' मित्रों,


एक नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान गया होगा आपका भी शायद... वह यह है कि अपने अपने धर्म में वैज्ञानिकता ढूंढी जा रही है... और फिर पा ली गई इस 'तथाकथित वैज्ञानिकता' का पूरे जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है प्रचार के हर माध्यम द्वारा... अंतर्जाल पर तो यह शोर कुछ ज्यादा ही है...


जानवर काटने के अपने तरीके में जानवर को कम कष्ट होने से लेकर चोटी, मूँछ और दाढ़ी तक... बाल रखने, सर घुटाने, टोपी पहनने या कुछ खास किस्म के कपड़ों को पहनने में...मुर्दे को जलाने या दफनाने में... नदियों में सामूहिक तौर पर नहाने या न नहाने में... नदियों के ऊपर पुल से सिक्के फेंकने में... हाथ धोने व बर्तन धोने के तरीकों में... तमाम तरह के उपवास या भूखा रहने के तरीकों में... तमाम त्यौहारों-पर्वों में... तमाम उपासना के तरीको-कर्मकांडों में... माँस खाने में और न खाने में भी... विवाह की सही उम्र में... औरतों को पर्दे-घूंघट-आंचल में रखने/ घर के भीतर बन्द रखने... ढूँढ ढूँढ कर 'वैज्ञानिकता' खोजी जा रही है...


हजारों हजार साल पहले लिखी गई धार्मिक पुस्तकों में लिखी अस्पष्ट सी, प्राचीन व अब अप्रयुक्त भाषाओं में लिखी बातों का तत्कालीन संदर्भों से परे जाकर मनचाहा अर्थ निकाला जा रहा है, मनमानी व्याख्या की जा रही है...और इसी बहाने यह बताया-जताया जा रहा है कि देखो धर्म कितनी वैज्ञानिकता रखता है... जेनेटिक्स, चिकित्सा शास्त्र, गणित, अंतरिक्ष शास्त्र, खगोल विज्ञान, भौतिकी आदि आदि सभी आधुनिक विज्ञानों की उपलब्धियों को हजारों साल पहले ही पाया हुआ बताया जा रहा है...


क्यों हो रहा है ऐसा...

क्यों किया जा रहा है ऐसा...

सोचिये कभी...


एक कारण जो सीधा-साफ दिखाई देता है वह यह है कि हमारी नई पीढ़ी सवाल करने लगी है... ऐसा करने को कह तो रहे हो, पर वजह क्या है इसकी ?... क्या वह फायदा होगा जो धर्म बताता है ?... क्या प्रमाण है इसका ?... हम तो ऐसा कर रहे हैं पर जो नहीं कर रहे, उनका क्या, वह भी तो हमसे बेहतर जीवन जी रहे हैं ?... हम उन सब बातों में कैसे यकीन करें जो केवल किताबी हैं ?... क्या कोई ऐसा है जिसने अपनी आंखों से यह अनुभव लिये हैं ?...


इस तरह के तमाम सवाल करने लगी है हमारी नई पीढ़ी... अब 'धर्म' जो कि केवल अंध श्रद्धा और आस्था पर निर्भर है आज तक... उसके पास जवाब नहीं है इनमें से अधिकतर सवालों का... यह बार बार धर्म के वैज्ञानिकता से परिपूर्ण होने का जो शोर मचाया जा रहा है... वह इन सवालों का जवाब दिये बिना बहस को दूसरी ओर मोड़ने की कोशिश ज्यादा लगती है... यथास्थितिवाद को पोषित करती, दिन-ब-दिन अपनी प्रासंगिकता खोती 'धर्म' नाम की इस रूढ़ अवधारणा के द्वारा...


मैं इस दौर को एक बड़े अवसर के तौर पर भी देखता हूँ... अब समय आ गया है कि खास तौर पर 'धर्म' के मामले में हम अपनी नई पीढ़ी को कूपमंडूक-अनपढ़-रूढ़िवादी धर्मगुरूओं तथा उनके द्वारा की जा रही उल-जलूल व्याख्याओं के भरोसे न छोड़ते हुऐ पाठ्य क्रम में मानव के सभ्य होने से लेकर धर्म की अवधारणा के उदय होने तक का इतिहास, धर्म का फैलाव, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, धर्म के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभाव आदि विषयों को शामिल करें... ताकि हमारी नई पीढ़ी खिंची हुई लकीर पीटते हुऐ आगे बढ़ने की बजाय खुली आंखों और जागृत दिमाग के साथ आगे बढ़े...


मैंने तो अपनी कह दी...


अब आप बताइये क्या सोचते हैं इस पर ?...




आभार!







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सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

रूह या आत्मा ... What is this???... क्या हम महज एक नश्वर शरीर मात्र हैं ?...या कुछ ऐसा भी है जो शरीर से हटकर है?



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मेरे 'अजर-अमर' मित्रों,

विषय दुरूह है और विवादास्पद भी...

सबसे पहले तो यही फैसला कर लेते हैं कि कौन कहाँ खड़ा है...

आगे और कुछ लिखने के पहले आपसे यह जानना चाहूँगा कि:-

*** आज के समय मौजूद साक्ष्य व आज का हमारा ज्ञान भी Abiogenesis or abiotic synthesis of organic molecules & subsequent development of life... यानी प्राचीन पृथ्वी पर निर्जीव से एक कोशीय जीवन की उत्पत्ति... की ओर ईशारा करता है...

*** यह प्रिमिटिव एक कोशीय जीवन समय के बीतने के साथ-साथ जटिल होता गया और परिणाम स्वरूप आज दिखाई देने वाला प्राणी व वनस्पति जगत विकसित हुआ जिसे Organic Evolution कहते हैं।

*** इस सबके विपरीत अधिकतर धर्म यह मानते हैं कि उनके उपास्य 'ईश्वर' ने सारी दुनिया एक साथ ही बना दी... जिसमें सारे जीव व पादप आदि भी शामिल हैं... सारे जीवित प्राणी जैसे आज हैं सृष्टि के आरंभ में भी वैसे ही थे... तथा मानव अन्य प्राणियों से अलग स्थान रखता है।

*** यद्मपि गाय व सूअर से निकाले गये इन्सुलिन का मानव शरीर के भीतर भी वही कार्य करना...घोड़े तथा अन्य प्राणियों के अंदर विष को इंजेक्ट कर बनाये गये प्रतिविष का मानव को बचाने में प्रयोग होना... Recombinant DNA तकनीक से बनाई वैक्सीन व दवाइयों का मानव में प्रभावी होना... जीन मैपिंग... क्रोमोसोम की संरचना...आदि आदि अनेकों ऐसे अकाट्य सबूत हैं जो यह बताते हैं कि मानव जीवन भी जैविक विकास का ही परिणाम है...वह भी एक प्राणी ही है जिसका दिमाग अन्य सभी जन्तुओं से ज्यादा विकसित है।

तो फिर ऐसा क्यों है कि मानव जीवन की समाप्ति पर हम आत्मा या रूह जैसी कल्पना पर भरोसा करते हैं... जो कभी मृत्यु का वरण नहीं करती... या तो यहीं घूमती रहती है... या फिर चुपचाप इंतजार करती है 'उस' के फैसले का... या फिर 'उस' ही में समा जाती है... दोबारा फिर कभी न आने के लिये...




आभार!







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मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

एक सूचना : कुछ समय तक अनियमित रहूँगा मैं !............

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मेरे 'नियमित' मित्रों,


आज मात्र एक सूचना ही दूँगा...

यह तो पहले कई बार बता ही चुका हूँ कि एक बिटिया है मेरी पाँच साल की...गई २ अक्टूबर को सुबह उसका साथ निबाहने के लिये एक और प्यारी फूल सी बिटिया उतरी है मेरे आंगन में...सब कुछ ठीक से हुआ... प्रसूता व नवजात दोनों स्वस्थ हैं...और मैं व परिवार के अन्य सभी, आनंद मग्न...

इसी के चलते अगले तकरीबन एक माह तक ब्लॉगिंग में अनियमित रहूँगा...टिपियाना थोड़ा मुश्किल होगा...मोबाइल के जरिये हलचल को भांपता तो रहूँगा ही...

इस दौरान आप एक काम करिये...कोई प्यारा सा अनूठा नाम सुझाइये तो, जरा...अपनी इस नन्ही सी बिटिया के लिये...




आभार!






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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

क्या है 'धर्म' ?


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मेरे 'धर्मपरायण' मित्रों,



क्या है धर्म ?


क्या है धर्म ??


क्या है धर्म ???


क्या है धर्म ????


कुछ और कहने की जरूरत है क्या मुझे ?


बड़े ही खुशकिस्मत हैं वह सब, जो धर्म की यह व्याख्या करते हैं !!!





आभार!





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बुधवार, 29 सितंबर 2010

ये सर्वहारा के लिये संघर्ष करते योद्धा हैं या भारत के दुश्मनों के साथ मिले हुए गद्दार ?... पाठक तू निर्णय कर इसका !!!



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मेरे 'देशभक्त' मित्रों,

लंबी चौड़ी कोई बात नहीं आज... क्रोधित हूँ मैं...

यह बयान देखिये...


"We appeal to the Indian masses to respect the Kashmiris demand for an independent country," the spokesperson told HT on Friday. He said for the last three months, Kashmiris have been fighting their war for independence sans guns or support from any terrorist groups."

"The Abdullahs -- Sheikh, Farooq and Omar Abdullah--have failed to win the Kashmiris hearts in the last 65 years," he said, strongly justifying repeal of the Special Forces Arms Act, and appealing to end killing of the young 'freedom fighters.'

"No country has succeeded in suppressing the voices of nationalist forces with guns," he said from an undisclosed location , adding, the valley is described at international forums as either India or Pakistan occupied Kashmir"
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यह सब कोई पागल अलगाववादी कश्मीरी/इस्लामी जेहादी नहीं कह रहा है... न ही यह बयान किसी पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञ का है...

यह कहना है नक्सलियों के सर्वोच्च नेताओं मे एक कोटेश्वर राव उर्फ 'किशन जी' का...

अब आप ही बताओ...

ये सर्वहारा के लिये संघर्ष करते योद्धा हैं...

या भारत के दुश्मनों के साथ मिले हुए गद्दार ?...

कहाँ हो नक्सलियों के विरूद्ध कारवाई को शोषित-गरीबों का दमन बताती, अखबारों और पत्रिकाओं के पेज काला करती रूदालियों...

क्या कहना है तुम्हारा भी इस बयान पर...

मुझे क्यों लग रहा है कि कुछ लोगों को सांप सूंघ सा गया है!


यह खबर है
यहाँ पर...
और
यहाँ पर भी...




आभार!





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रविवार, 26 सितंबर 2010

राजशाहियाँ आज भी हम पर राज करती हैं...क्या केवल कहने भर के लोकतंत्र-गणतंत्र हैं हम ???



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मेरे 'लोकतांत्रिक' मित्रों,


इस सूची पर जरा नजर डालिये...


फारूख अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला
प्रकाश सिंह बादल-सुखबीर सिंह बादल
विजया राजे सिंधिया-वसुंधरा राजे सिंधिया
राजेश पाइलट-सचिन पाइलट
शीला दीक्षित-संदीप दीक्षित
माधव राव सिंधिया-ज्योतिरादित्य सिंधिया
प्रफुल्ल पटेल-पूर्णा पटेल
जीतेन्द्र प्रसाद-जितिन प्रसाद
मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव
बाल ठाकरे-राज ठाकरे
करूणानिधि-स्टालिन
कल्याण सिंह-राजबीर सिंह
बीजू पटनायक-नवीन पटनायक
जगजीवन राम-मीरा कुमार
सुनील दत्त-प्रिया दत्त
प्रमोद महाजन-पूनम महाजन
शरद पवार-अजित पवार-सुप्रिया सुले
शंकरराव चव्हाण-अशोक चव्हाण
देवीलाल-ओमप्रकाश चौटाला
चरण सिंह-अजीत सिंह-जयन्त चौधरी
नेहरू-इन्दिरा-राजीव-राहुल गाँधी



सबसे नया नाम जोड़ा है जन-नेता लालू प्रसाद यादव जी ने अपने २० वर्षीय पुत्र तेजस्वी यादव की अपने उत्तराधिकारी के रूप में ताजपोशी करके...


यह तो केवल झाँकी है...बहुत से नाम मैं इस वक्त याद नहीं कर पा रहा...और इस सूची में अनेकों नाम आप लोग भी जोड़ सकते हैं...


कमोबेश ऐसा ही हाल हमारे साथ-साथ आजाद हुऐ भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों का है... नेपाल के कोईराला, बांग्लादेश के जिया व मुजीब, लंका के बंडारानायके-कुमारतुंगा, पाकिस्तान के भुट्टो व शरीफ घराने भी एक तरह के राजवंश से बन गये हैं।


कारण क्या है इस सब का ?



*** आजादी से पहले यह सारा भारतीय उपमहाद्वीप अंग्रेजी शासन के अंतर्गत विभिन्न रियासत-रजवाड़ों-राज्यों-जागीरो-निजामों में बंटा था... कहीं ऐसा तो नहीं कि हजारों सालों तक वंशानुगत शासकों के आधीन रहने के कारण हमारे सामूहिक मानस (Collective Psyche) में यह बात बहुत गहरे पैठ गई है कि शासक का बेटा शासक ही होना चाहिये व ऐसा होना ही बेहतर भी होता है ?


*** या फिर यह कि इन शासकवंशों ने कोई पोलिटिकल स्पेस छोड़ा ही नहीं है अन्यों को आगे आने के लिये ??


*** सबसे भयावह निष्कर्ष यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह लोकतंत्र-गणतंत्र का राग एक धोखा है...राजशाहियाँ अभी भी चल रही हैं...राजघराने ऊपर से भले ही एक दूसरे के विरोधी दिखते हैं, पर अंदरखाने यह एक दूसरे की संतति-'बाबा लोग' के हितों को पोषित करते हैं ???




मुझे तो यह तीनों ही कारण सही लगते हैं...



अपनी राय आप बताइये !!!



आभार!









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मेरी छोटी सी बिटिया ने कर डाला एक बहुत बड़ा सवाल... जवाब मैं तो नहीं दे सकता... (बिटिया-दिवस पर विशेष-री-ठेल)




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मेरे मेरी ही तरह 'बिटिया के बाप' मित्रों,

न जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियां होती हैं... जो काम की चक्की में पिसने के कारण हम अपने बच्चों को दे नहीं पाते...

क्या करें बच्चे ?

देखिये मेरी बिटिया ने यह कैसा सवाल कर दिया मुझसे...




मंदी के इस भयावह दौर में
टारगेट पूरे करने और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में
रोजाना रात नौ बजे घर पहुंचता हूँ मैं
नहीं मिली एक महीने से कोई छुट्टी
इतवार या त्यौहार की भी नहीं


रोजाना सुबह स्कूल जाने से पहले
कह कर जाती है मेरी बिटिया
पापा जरूर अपने बॉस को कहना
जल्दी घर जाना है आज मुझे


आप आफिस से जल्दी आओगे
तो पहले हन दोनों चलेंगे कालोनी के पार्क
खूब खेलूंगी जहां मैं आपके साथ
फिर आप मैं और मम्मी जायेंगे बाजार
मैं तो ढेर सारी आइसक्रीम खाउंगी
रात का खाना खायेंगे घर से बाहर

इस तरह खूब मजा करेंगे हम लोग

रोज उसे प्रॉमिस करके निकलता हूं घर से
पिस जाता हूँ काम की चक्की में फिर से
थका हारा पहुंचता हूँ वही रात नौ बजे
सोने की तैयारी कर रही होती है मेरी बेटी
बहुत गुस्सा दिखाती है बड़ा मुंह फुलाती है
पापा आज मैं आप से एकदम कुट्टा हूं


उसे मनाता हूं सुलाता हूं खुद भी सोता हूं
उसके बचपन की खुशियों को रोजाना खोता हूं


आज एक बार फिर देर से पहुंचा मैं घर
बिल्कुल नाराज नहीं हुई वो न मुंह फुलाया
मेरी पीठ पर चढ़ी बांहौं में लपेटा मुझको
बार बार चूमा मेरे सिर, गर्दन और चेहरे को

फिर फुसफुसाते हुए कान में किया वो सवाल...

पापा क्या आपके बॉस को इतना भी नहीं पता?

कि घर में सोना आपका इंतजार करती है


नि:शब्द निरुत्तर हूँ मैं

समझाने या दुलारने की हिम्मत नहीं मुझमें

काश.....

सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...



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क्या जवाब दूँ मैं उसे ?





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शनिवार, 25 सितंबर 2010

काहे को भूखा मारते हो अपने ही प्यारे बच्चों को... मेरे माई-बाप...हम सबके पालनहार ?

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मेरे 'व्रती-उपवासी' मित्रों,

यह पोस्ट वैसे लिखी थी जन्माष्टमी को...पर छाप आज रहा हूँ... उस समय उपवासों का सीजन जो चल रहा था... अत: दिल को गवारा नहीं किया इसे उस समय छापना...

बचपन से घर में देखता हूँ कि साल के दो खास दिन फलाहार-व्रत रखा जाता है... शिवरात्रि व जन्माष्टमी के दिन... अन्न नहीं बनता उस दिन चूल्हे पर... अब हम सब भाई बहिन इन दोनों दिन सुबह से ही माँ को परेशान करना शुरू कर देते थे... भूख भी पता नहीं कुछ ज्यादा ही लगती थी उस दिन... नतीजा हर थोड़ी थोड़ी देर में माँ कभी मखाने की खीर, कभी चौलाई के लड्डू, कभी फ्रूट चाट, कभी कोटू के आटे-आलू की पकौड़ी और कभी दूध हमारे सामने परोसती रहती थी... फिर भी शाम होते होते भूख से बेहाल हो जाते थे हम लोग... रात बारह बजने तक का इंतजार तो पिता भी नहीं करते आज तक... उनका तर्क है कि सूरज ढलते ही जन्म हो गया होगा... इसलिये पूजा करो, आरती करो और फलाहार लाओ...


अब बड़ा हो गया हूँ, काम पर जाना पड़ता है...मैं तो सभी कुछ खाते रहता हूँ दिन भर... परंतु घर में श्रीमती जी अन्न नहीं बनाती आज भी...


अब इस बार घर पर ही था... दिन भर बचपन की तरह ही थोड़ी थोड़ी देर में कुछ-कुछ मेरे सामने पेश किया जाता रहा... पर प्रॉपर खाने की बात तो कुछ और ही है...


तभी मैंने सोचा कि मात्र सिख धर्म को छोड़कर बाकी सभी धर्म व्रत-उपवास की बहुत महत्ता बताते हैं...


अब यह 'ऊपर वाला' जो है...कहा जाता है कि उस ही ने दुनिया बनाई...वही पालनहार भी है...वही सही मायने में हमारा माता-पिता दोनों है...


मैं आज खुद एक बच्ची का बाप हूँ... यकीन जानिये जिस दिन मेरी बेटी किसी वजह से खाना नहीं खाती है, उस दिन मुझे भी अपना खाना बेस्वाद लगता है...


तो वह ऊपर वाला पालनहार-कृपानिधान-सर्वशक्तिमान क्यों कर चाहता है कि उसकी औलादें भूखी रह रह कर उसके प्रति अपने समर्पण व वफादारी को साबित करें...?


क्यों वह हमारे भूखे रहने से हम पर प्रसन्न होता है...?


कैसा माई-बाप है वह ?



मुझे तो समझ नहीं आता यह सब...


आपको आता हो तो हम सबको समझाईये...


समझायेंगे न !...


प्लीज....






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पाठकों की जानकारी के लिये...सिख धर्म किसी भी तरह के उपवास को सही नहीं मानता...



ਬਰਤ ਨੇਮ ਸੰਜਮ ਮਹਿ ਰਹਤਾ ਤਿਨ ਕਾ ਆਢੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥

बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥

Baraṯ nem sanjam mėh rahṯā ṯin kā ādẖ na pā▫i▫ā.

Fasting, daily rituals, and austere self-discipline - those who keep the practice of these, are rewarded with less than a shell.



यह जानकारी यहाँ से... ली गई है।




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ईश्वर और धर्म को एक संशयवादी परंतु तार्किक दॄष्टिकोण से समझने का प्रयास करती इस लेखमाला के अब तक के आलेख हैं, समय मिले तो देखिये :-



चित, पट और अंटा तीनों उसी का ???

वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...

सोमवार, 20 सितंबर 2010

तेरी काली सूरत.... आक्क थू !!! कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों का सच ... क्या इसे सुर्खियां देगा मीडिया ?...



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मेरे 'गोरे-गोरे' मित्रों,

बहुत सवाल उठाये जाते हैं अक्सर कि कश्मीर में पत्थर फेंकने वाले कौन लोग हैं, हमारा तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया, जिसे कई बार अपनी कोहनी और घुटने के बीच का फर्क (यह अंग्रेजी के मुहावरे का मुझ द्वारा किया सभ्य रूपांतरण है) तक समझ नहीं आता... पत्थर फेंकने वाले इन निरपराध, सताये हुऐ, अहिंसक और गुमराह (???) गिरोहों के ऊपर सीआरपीएफ व कश्मीर पुलिस द्वारा की जा रही तथाकथित ज्यादतियों के वर्णन से अपने अखबार व मैगजीन रंगे रहता है...यह सब दरकिनार करते हुऐ कि खबरों की रिपोर्टिंग में दोनों पक्षों की सुनी जानी चाहिये... तथा अपने राष्ट्र-हित का भी होश होना चाहिये...

ऐसे ही समय में मेरी नजर पढ़ी एक ऐसे लेख पर... जिसमें लिखी कुछ बातों को सुर्खियाँ मिलनी चाहिये थी... पर कभी नहीं मिलेंगी... Because our mainstream media has lost the capability to differentiate the arse from elbow... तो मुझे लगा कि आप तक तो पहुंचा ही दूँ यह बातें...

पूरा लेख आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं...

मैं उन अंशों को उद्धृत करूँगा जिनको मेरी नजर में सुर्खियाँ मिलनी चाहिये थीं... पर न मिली हैं... न मिलेंगी...



"An officer of the local police, a Kashmiri Muslim, tells me how stone-throwers often try to goad CRPF men to violence by mocking their religion and colour. One goes, “Gai teri mata hai, hum usko khata hai (the cow’s your mother, we eat her).” Another taunt is split between two groups. One group shouts, “Teri kali soorat…” The other responds, “yak thuuuu!” (Your black face…and a collective spit)."




कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि किस तरह पत्थर फेंकने वाले गिरोह सीआरपीएफ के जवानों को उनके धर्म व रंग के बारे में चिढ़ा कर हिंसा को उकसाते हैं...

गिरोह दो भागों में बंट जाता है... एक हिस्सा चिल्लाता है..." तेरी काली सूरत"... तो बाकी कहते हैं... "आक्क थू !!!"

एक और नारा है..." गाय तेरी माता है, हम उसको खाता है।"



और पढ़िये...




"Many young stone-throwers on the frontlines do not appear like Islamic radicals. They dress well, like music, cellphones and girlfriends are often discussed. Do they do what they do because they believe or does, as the police often allege, money play a part?

“We earned Rs 200 to Rs 300 as daily wage labourers,” says one of a group of masked young stone throwers. “Now we get between Rs 1,000 to Rs 1,500.” Who pays them? “The separatists,” one offers. In a quiet, two-room home with open drains outside, 20-year-old street icon, Owais Ahmed ‘Mandela’, freely admits to receiving money. Where does it come from? He shrugs."



यानी पत्थरबाजों को अलगाववादी एक दिन के काम (???) का १००० से १५०० रूपया तक देते हैं...जबकि पहले वह २००-३०० रूपया रोज कमाते थे...हाड़-तोड़ मजदूरी करके... यह और कोई नहीं, पत्थरबाजों का नेता खुले आम मान रहा है...



अब आप ही बताइये पत्थरबाजी रूके तो कैसे ?

और कब हमारे मीडिया को अकल आयेगी ।



आभार!




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समय मिले तो यह भी पढ़िये...
भारत के लिये समस्या नहीं है कश्मीर...





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