मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

क्लाइमेटगेट ( CLIMATEGATE ) एक बहुत बड़ा धोखा है 'ग्लोबल वार्मिंग' और ' क्लाइमेट चेंज' पर कोपेनहेगेन वार्ता . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह. . .

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मेरे पर्यावरणचिंतक मित्रों,

सबसे पहले बताता हूँ आपको 'क्लाईमेटगेट' के बारे में, अमेरिकी राष्ट्रपति निकसन के बदनाम 'वाटरगेट' की तर्ज पर 'क्लाईमेटगेट' कहा जा रहा है उस घटना को जिस में एक हैकर ने University of East Anglia’s Climate Research Unit (aka CRU) के कंप्यूटर सिस्टम को हैक कर के रिलीज कर दी 61 megabytes of confidential files onto the internet.

आप चाहें तो आप भी इन फाइलों को इस वैबसाइट से डाउनलोड कर इनका अध्ययन कर सकते हैं।

अब सवाल यह आता है कि है क्या इन 'क्लाइमेटगेट' पेपर्स में ?

इन पेपर्स से यह रहस्योद्घाटन होता है कि:-

जानबूझकर, डाटा को मैनिपुलेट करके व गलत डाटा के आधार पर 'ग्लोबल वार्मिंग' व 'क्लाइमेट चेन्ज' का एक हव्वा खड़ा किया जा रहा है जहाँ डाटा साथ नहीं दे रहा है वहाँ पर पूरी तरह से काल्पनिक डाटा पैदा किया जा रहा है।

फर्जी डाटा कैसे CREATE किया गया देखिये यहाँ पर...

आईये देखते हैं ग्लोबल वार्मिंग के बारें में हमारा वर्तमान ज्ञान क्या है

अब देखिये क्या कीमत चुकानी पड़ेगी इस हव्वे की

यह कीमत आ रही है ४५ ट्रिलियन यू० एस० डॉलर, सन २०५० तक।

अब देखिये कि अमेरिका का सम्मानित अखबार 'वाशिंगटन टाइम्स' इस सारे गड़बड़झाले के बारे में क्या लिखता है

संपादकीय नं० १
संपादकीय नं० २

स्पष्ट है कि दुनिया बजाय गर्म होने के ठंडी हो रही है लेकिन इस बारे में जानकारी छिपाई जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के वैज्ञानिक सलाहकार (President Obama’s science adviser) Dr. John P. Holdren ने भी इस गड़बड़ी को स्वीकार किया है देखिये यहाँ पर

अब सवाल यह आता है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है...

कारण कई हैं...
१- विकासशील और गरीब देशों को उर्जा के सबसे सस्ते स्रोत यानी कोयले से उत्पन्न बिजली से वंचित रखने के लिये।
२- उनकी उर्जा की कीमत को बढ़ाने के लिये ताकि वो 'सीमा' से अधिक तरक्की न कर सकें।
३- अपनी महंगी ग्रीन टेकंनालाजी बेचने को।
४- शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद बेकार पड़े न्युक्लियर मटीरियल को क्लीन व ग्रीन न्यूक्लीयर उर्जा उत्पन्न करने के नाम पर उसके अच्छे दाम पाने को।
५- भूखे-गरीबों को भूखा गरीब बनाये रखने के लिये।


इस सारे प्रपंच को रचने के लिये कार्बन डाई आक्साईड को ग्लोबल वार्मिंग का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्योंकि कोयला या अन्य ईंधन जलाने से यही गैस निकलती है। यहाँ देखिये ग्लोबल वार्मिंग CO2 के कारण नहीं होती और डाइनासोर युग मे् आज से ५ गुना ज्यादा कार्बन डाई आक्साईड थी वातावरण में...

ग्लोबल वार्मिंग के इस झूठे हव्वे की पोल खोलते कुछ और लेख देखिये:-

पोल खोल-१
पोल खोल-२
पोल खोल-३
पोल खोल-४
पोल खोल-५
पोल खोल-६


अब सवाल यह आता है कि कोपेनहेगेन वार्ता जो ७/१२/२००९ से शुरू हो गई है क्या उस से पहले हमारे मीडिया का फर्ज नहीं बनता था अपने पाठकों को यह सब बताने का... ताकि सरकार के फैसले में नागरिक भी दखल दे सकें... या ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेन्ज के शोर ने मीडिया का भी ऐसा ब्रेनवाश कर दिया कि उसने दूसरे पक्ष की सुनना तो छोड़िये क्लाइमेटगेट जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम को भी नजरअंदाज कर दिया...


क्षमा भी चाहूंगा आप सबसे, वक्त कम था, सामग्री ज्यादा थी और टैक्निकल थी, अत: लिंक थमा दिये, आप पूरे इतमीनान से पढ़िये फिर बताइये कि मेरी यह पोस्ट कैसी है और आप मुझसे सहमत हैं कि नहीं...

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9 टिप्‍पणियां:

  1. आपसे पूरी तरह सहमत, पाँचों कारण आपने ऐसे दिए उनमें से एक पर भी विचार कर लें तो बहुत कुछ संभल सकता है, अल्‍लाह करे आपने जो अवाज़ उठाई है जो आँखें खोलने के लिए जानकारी दी है, वह दूर तक पहुँचे

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  2. आपसे पूरी तरह सहमत हूं। बहुत सारी जानकारी मिली। आंखें खोलने वाली। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  3. प्रवीण भाई,
    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पहले कोपेनहेगन जाने का कोई कार्यक्रम नहीं था...अब जा रहे है...18 दिसंबर को वहीं मौजूद रहेंगे....

    ओबामा का पहले कोपेनहेगन जल्दी जाने का कार्यक्रम था...लेकिन अब इसे टालकर उन्होंने भी 17-18 दिसंबर का कर लिया है....

    कार्यक्रम किसके कहने पर किसने बदला...प्रश्न विचारणीय है और जवाब भी इसी में निहित है...

    कार्बन का काला धंधा, ऊंचे लोग-ऊंची पसंद...

    जय हिंद...

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  4. भाई तुम अमेरिका को शायद नहीं जानते, ये प्रोपेगेंडा का महारथी खिलाडी है.

    अंकल सिम के पिछले कर्मों को देखते हुके कहा जा सकता है की सबसे ज्यादा संभावना तो यही है की अमेरिका ने यह पूरा ड्रामा स्टेज किया हो (मुझे पूरा विश्वास है). दरअसल वह पर्यावरणवादियों से अज़ीज़ आ चुका है, वह हर तरह के प्रोपेगेंडा और तरीके से इन्हें अपने काबू में रखना चाहता है और इसके लिए उसने कई मोर्चे तैयार कर लिए हैं. अमेरिका इतना बेवकूफ नहीं है की कोई भी लड़का उसके गुप्त दस्तावेजों को यूँ ही हैक कर ले, या कोई यूँ ही राष्ट्रपति की पार्टी में घुस जाए. इराक का डब्लूएम्डी का नाटक याद है? अमेरिका का मीडिया मैनेजमेंट तुम्हारी कल्पना से भी ज्यादा मजबूत है

    अगर भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देश अपना औद्योगिक विकास कम करते हैं तो इस वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में तीसरी दुनिया से ज्यादा नुकसान में अमरीकी कम्पनियाँ रहेंगी, यानि अंत में नुकसान अमरीका का ही होगा. क्योंकि अमेरिका का बाज़ार संभावनाओं से रिक्त हो चुका है, पर तीसरी दुनिया अभी खोजी ही नहीं गई है.

    यह अमरीका कितनी पहुंची हुई चीज़ है यह किसी अर्थशास्त्री से पूछिए, या प्रोफ़ेसर नोम चोमस्की को पढ़कर जानिए. हैरत इस बात की है की शीतयुद्ध, अफगान मुजाहिद्दीन, डब्लूएमडी, वियतनाम, सद्दाम ड्रामा, फिदेल- क्यूबा अभियान, मध्य और दक्षिण अमेरिका के गृहयुद्ध, तेल और हथियार कूटनीति, सीआईए...... और सबसे ताज़ा स्वाइन फ्लू प्रोपेगेंडा. इन सबके के बावजूद आज भी लोग ऐसे ड्रामों से बहल जाते हैं, और अपने विचार बदल लेते हैं.

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  5. कुछ समझ नही आ रहा है जी
    (अंग्रेजी ना आना महंगा पडता जा रहा है)
    बस जितना आपने कहा उसमें ही सिर खुजा लेंगें

    प्रणाम स्वीकार करें

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  6. आप ने जो इस पोस्ट को लिखने और लिंक्स देने में मेहनत की है, उसका एक प्रतिशत से कम भी अगर मिडिया वाले करते तो न जाने कितने लोग इस अनमोल जानकारी को प्राप्त कर सकते थे...लेकिन मिडिया शाहरुख़ ने किस जूते के साथ कौनसी पेंट पहनी है, क्रिकेट टीम हारी क्यूँ या बहनजी की साडी का रंग नीला था या पीला जैसे घटिया प्रकरणों से हटे तब ना... साधुवाद आपको आपकी इस प्रतिबद्धता के लिए...
    नीरज

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  7. सभी बिन्दुओं से सहमत… अमेरिका हो या रूस अथवा चीन… सब के सब गरीब देशों को चूसने के लिये नित नये हथकण्डे अपनाते रहते हैं… पूरा सच कभी कोई नहीं जानता, न ही वह कभी सामने आता है… कम से कम पत्रकारों द्वारा तो नहीं लाया जाता, संयोग से बाहर आ जाये अथवा कोई घर का भेदी निकल आये तो बात और है…। मीडिया वालों के दिवालियेपन की वजह से ब्लॉग की ताकत इसीलिये और बढ़ने वाली है… लगे रहिये… हम साथ हैं…

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  8. agree with you on all points we need to bring more awarenss by putting such issues repeatedly on blogs

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