शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

गाँव गया था, गाँव से भागा....... यहां तो कुऐं में ही भांग मिल गई है ..... ..... .... .प्रवीण शाह

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मेरे 'शहरी' मित्रों,


कुछ काम ही ऐसा है मेरा, कि... हर माह ४-५ दिन जाना पड़ता है 'इंटीरियर' के गाँवों में... तो वहां के एक गाँव में एक दिन में जो देखा-सुना... बता रहा हूँ बिना अपनी तरफ से कुछ जोड़े या घटाये...


*** नरेगा ने दिहाड़ी बढ़ा दी है... अब १२०-१३० से कम में 'लेबर' नहीं मिलती... दिहाड़ी करने में 'लेबर' की कोई रूचि नहीं रही अब... अब तो ठेके का जमाना है, यानि ५-६ 'लेबर' ने किसान से ठेका कर लिया "अच्छा २५ बीघे का गन्ना काटना, छीलना और गाड़ी में लोड करना है... तो इतना 'नावा' देना होगा"... ठेका पटा तो फिर वही काम जो दिहाड़ी से १५ दिन में होता... ५ दिन में ही पूरा... जय हो 'मजदूर-किसान' की...


*** इस गाँव में सरकारी स्कूल है... एक मास्टर और दो शिक्षामित्र भी... मास्टर नवजवान और जोशीला... शिक्षामित्र इसी गाँव के... १६६ बच्चों के नाम लिखे हैं स्कूल में... मै्ने देखा मात्र १३ बच्चे पढ़ रहे हैं... शिक्षामित्र कहता है कि जब मिड-डे मील बंटेगा तो तकरीबन ४०-४५ बच्चे आ जायेंगे... साल की शुरूआत में जब वजीफा बंटता है हर बच्चे को ३६० रू० साल की दर से... तो माँ-बाप हर वक्त घेरे रहते हैं...लेकिन वजीफा मिलते ही कभी झांकने भी नहीं आते... वर्दी, बस्ता और किताबें सब मिलती हैं बच्चों को... पर स्कूल भेजने के नाम पर कहते हैं " क्या स्कूल जाकर हमारा लल्ला 'साहब' बन जायेगा"... ऐसा नहीं कि ये बच्चे कुछ काम ही कर रहे हों... स्कूल के ठीक सामने ही कंचे खेल रहे हैं, साईकिल का पहिया चला रहे है या फिर नदी के कीचड़ को उलीच कर 'भूरी' और 'मैलुआ' नाम की छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं... जय हो 'सर्व शिक्षा अभियान' की...


*** अरे यहाँ तो अस्पताल भी है ... उत्साही डॉक्टर से मिलने जाता हूँ... एक रूपये का पर्चा बनता है... डॉक्टर कहता है कि जो १५०-२०० लोग दवाई लेने आते हैं उनमें ज्यादातर 'मरीज' नहीं हैं...ज्यादातर को 'ताकत' की तलाश है... एक मेरे सामने डॉक्टर को दिखाता है... परेशानी क्या है-'कमजोरी'... भूख, टट्टी, पेशाब सब ठीक... कोई खाँसी, बुखार नहीं... एक ताकत की बोतल चढ़ा देते डॉक्टर साहब... रात भर गन्ना छिला है इसने... मेहनत ज्यादा करने के कारण बदन दर्द कर रहा है... तुम्हें थोड़ी नींद की जरूरत है, डॉक्टर समझाता है... वो आँखें तरेरता है... बड़ी मुश्किल से डॉक्टर कोई पेन किलर आदि देकर पीछा छुड़ाता है उस से... डॉक्टर बताता है कि इन लोगों के लिये अच्छे ईलाज का माने है बोतल(आई० वी०) चढ़ना... इसके बाद नस में इंजेक्शन, मांस में इंजेक्शन, पीने वाला सिरप, कैप्सूल और फिर गोली का नंबर आता है... हर रोज कोई ४०-४५ साल का आदमी 'वृद्धावस्था पेंशन' वाले फॉर्म में अपनी उम्र ६५ साल लिखवाने के लिये परेशान करता है... जय हो 'सबके लिये स्वास्थ्य' की...


*** सोचा प्रधान से मिल लूँ... महिला प्रधान है...कहती हैं, नरेगा हमारे लिये आफत बन गई है... १०० दिन की १०० रू० दिन के हिसाब से मजदूरी तो सभी चाहते हैं... पर कोई काम करना किसी को मंजूर नहीं... सरकारी पैसा सरकार हमारे लिये भेजी है... काम करें न करें तुम्हारी जेब से तो नहीं जा रहा पैसा... कुछ टोका-टाकी करने पर अगले चुनाव में देख लेने की धमकी अलग से... किसी तरह से हमें विकलांग बना कर पेंशन बंधवा दो 'प्रधानी', ऐसा अनुरोध लेकर हट्टे-कट्टे अक्सर बैठे रहते हैं 'प्रधानी' की बैठक में... जय हो 'पंचायती राज' की...


*** फरवरी में शायद पंचायत के ईलेक्शन हैं... १०० रू० 'वोट' पर खुला रेट इस समय २५० रू० प्रति 'वोट' तक पहुंच गया है... आगे और बढ़ने की उम्मीद है... कुछ तो आधी रकम एडवांस अभी से पकड़ बैठे हैं... दारू-मुर्गे की दावतें पूरे जोर-शोर से चल रहीं हैं अभी से... जय हो 'डेमोक्रेसी'... जय 'भारत देश महान' की...


ऐसा नहीं लगता आपको, कि कुंऐ में ही भांग मिल चुकी है ?

अपनी राय बताइये अवश्य....

13 टिप्‍पणियां:

  1. गांव के बारे में अच्‍छी जानकारी दी आपने .. पर कुछ गांवों में इससे भी खराब स्थिति होती है .. सचमुच जय ही है 'डेमोक्रेसी' की .. जय ही है 'भारत देश महान' की !!

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  2. प्रवीण भाई,
    आज आपने सही मायने में भारत के दर्शन करा दिए...मैं इंडिया की बात नहीं कर रहा...इंडिया में रहने वालों को सिवाय अपने और किसी की सुध लेने की फुर्सत नहीं है...और जो भारत में रहते हैं, वो इंसान थोड़े ही हैं...वो सिर्फ हाड-मांस के पुतले हैं...उनके लिए तो दो जून की रोटी के साथ एक दिन निकाल लेना ही बड़ी उपलब्धि होती है...

    जय हिंद...

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  3. इस बार ऐसे ही कुछ हालातों से मैं दो चार हुआ!!

    सोचता था शायद सिर्फ उस गांव में ऐसा होगा...लेकिन!!

    भारत देश महान

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  4. वह भांग लोगों की पेट में सायिफन हो रही है !

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  5. बिलकुल सच्ची तस्वीर ! हर परिस्थिति हर गाँव की है ।
    छात्रवृत्ति तो तीन-ही सौ मिलती है न भईया ! कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी तरफ ६० रुपये का इहौ घपला हो जाया करत है । अब तो यह तीन सौ भी दो इंस्टालमेंट में बँटता है । पहले १५०, फिर १५० । ऐसे लड़के दो बार भीड़ लगायेंगे न !

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  6. जय हो.... ! राम राज आने का संकेत है !! बहुत सुन्दर ! साधु साधु !!

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  7. राग दरबारी के पात्र और ज्यादा मक्कार हो चुके हैं

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  8. कैलाश गौतम जी की कविता याद हो आई!

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  9. गांव के गांव शहर के शहर भागते चलो भागते चलो आखिर पहुँचोगे कहाँ………………ओह !!!!

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  10. आईना दिखा दिया आपने तो ........ पर आँखों वाले फिर भी नही देखेंगे इसे .........

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  11. गांव के गांव शहर के शहर भागते चलो भागते चलो आखिर पहुँचोगे कहाँ

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