बुधवार, 30 दिसंबर 2009

चुल-बुल, बुल-बुल... बुल-बुल, चुल-बुल . . . . . . . . . . प्रवीण शाह.

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गुजर रहा था शहर के एक पुराने मौहल्ले से, देखा एक जगह गली सजी है... बहुत से फूल बिखरे हैं...रात बारात आई थी यहां... सुबह शायद किसी बिटिया की विदाई हुई है... अचानक नजर पड़ी एक किनारे पड़े मुड़े-तुड़े कागज पर...कोई खत सा लगता था...उत्सुकता बढ़ी... चुपके से उठाकर जेब में रख लाया साथ... अब खोला है... एक चिठ्ठी सी है... शायद पिता ने लिखी है अपनी बिटिया को देने के लिये... बेचारा बाप... देने की हिम्मत कर न सका... अब आप बांचिये इसे, मेरे साथ साथ...




चुल-बुल, बुल-बुल
अपने अब हो गये पराये
चल दी आज तू दूजे कुल


बुल-बुल, चुल-बुल
फिक्र यहां की करना मत
रहना सब से मिल-जुल


चुल-बुल, बुल-बुल
चीनी जैसे पानी में
जाना वहां तू सबमें घुल


बुल-बुल, चुल-बुल
गलत बात गर करे जो कोई
डरना मत तू बिल-कुल


चुल-बुल, बुल-बुल
न्याय पक्ष पर अड़ जाना
तनिक न करना ढुल-मुल


बुल-बुल, चुल-बुल
झूठे को होगा पछताना
जब जायेगा भेद खुल


चुल-बुल, बुल-बुल
बाप तेरा आज रोया नहीं
गई पसीने से लिखाई धुल


बुल-बुल, चुल-बुल
जाकर तूने है बनाना बिटिया
रिश्तों का एक नया पुल



चुल-बुल, बुल-बुल
बुल-बुल, चुल-बुल
चुल-बुल, बुल-बुल
बुल-बुल, चुल-बुल......



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गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कौव्वों की बलि और उनके खून सनी 'सोने' की तलवार, दलितों के साथ भेदभाव और कंदास्वामी . . . (Past life regression) . . . . . . . . .प्रवीण शाह.

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मेरे जन्म जन्मांतर के मित्रों,

बहुत दिनों से सोच रहा था कि देखूंगा "राज पिछले जन्म का" पर समय नहीं मिल पा रहा था, कल देखा और जो देखा वह यह था:-

यह जनाब डॉ० संजय गायकवाड़ नाम से जाने जाते हैं इन्हें कौव्वों से बहुत डर लगता है, लगता है कि कौव्वे इनको परेशान कर रहे हैं और दूसरी शिकायत इनकी यह है कि जब भी यह किसी स्त्री के प्रति कोई अच्छा काम करते हैं वह इसे उल्टे रूप में लेती है, अर्थात जीवन में आई स्त्रियों को या तो जनाब समझ नहीं पाते या इनकी उनसे पटती नहीं।

अब डॉ० तृप्ति जैन के साथ सेशन शुरु होता है...

आज से ७००-८०० साल पहले मंगलौर के पास मंगला देवी के मंदिर में पुजारी हैं जनाब... नाम है 'कंदास्वामी'... विक्रमादित्य राजा है देश का... मंत्र पढ़ने में मन नहीं लगाते तो क्रोधी पिता( जो स्वयं भी पुजारी हैं। )श्राप देते हैं " जा तू अगले जनम में untouchable (दलित) बन जा!"... खैर इस श्राप को ज्यादा explore नहीं किया गया... मंदिर में ही एक और पुजारी है 'धुत'... वह कौव्वों की बलि देता है... क्योंकि कौव्वों का खून लगने से तलवार 'सोने' की हो जाती है... और 'सोने' की इस तलवार से शत्रुओं को आसानी से मारा जा सकता है... कंदास्वामी (डॉ० संजय गायकवाड़)चाह कर भी अपनी जान के डर से कौव्वों की हत्या को नहीं रोक पाते... एक दलित युवती भी है 'सुन्दरा'... जो कंदास्वामी के पूजा करते या मंत्रजाप करते समय आकर उनको परेशान करती है... दलितों का मंदिर के अंदर प्रवेश वर्जित है उस काल में... एक दिन 'धुत' सुन्दरा को कंदास्वामी के साथ मंदिर के अंदर देख लेता है...और इस अपराध की सजा के तौर पर कंदास्वामी को सुन्दरा को मार डालने को कहता है... कंदास्वामी के मना कर देने पर 'धुत' अपनी तलवार से सुन्दरा को मार देता है...

अब दो श्राप दिये जाते हैं:-
-सुन्दरा की बेबात हत्या किये जाने के कारण कंदास्वामी धुत को कौव्वा बन जाने का श्राप देते हैं।
-अपनी आंखों के सामने हत्या होती देख भी रोकने का प्रयत्न न करने के कारण 'सुन्दरा' कंदास्वामी (डॉ० संजय गायकवाड़) को श्राप देती है कि जब भी तुम किसी स्त्री के साथ कुछ अच्छा करोगे उसका उल्टा हो जायेगा या वह इसे उल्टे रूप में लेगी।

अब डॉ० तृप्ति जैन १-२-३ गिनती हैं और 'कंदास्वामी' ९० वर्ष के होकर एक गुफा में हैं जहाँ पर कौव्वा बना 'धुत' उन्हें परेशान कर रहा है।

सेशन खतम, अब Analysis होता है कि कौव्वा बना 'धुत' और वे कौव्वे जिनकी बलि होने को 'कंदास्वामी' नहीं रोक पाये... आज के डॉ० संजय गायकवाड़ के कौव्वों से डरने का कारण हैं और इसी तरह जीवन में आने वाली स्त्रियों से डॉ० संजय गायकवाड़ का Adjustment न हो पाने का कारण 'सुन्दरा' का वह श्राप है।

अंत में डॉ० तृप्ति जैन डॉ० संजय गायकवाड़ को इन घटनाओं के पिछले जन्म में घटने का हवाला देते हुऐ इस जन्म में उनसे प्रभावित न होने को कहती हैं और डॉ० संजय गायकवाड़ हाथ जोड़ कर उन सभी ज्ञात-अज्ञात आत्माओं से माफी मांगते हैं जिनके साथ पूर्व जन्म में उन्होने कुछ गलत किया था।


अब यहाँ देखिये क्या कहते हैं विशेषज्ञ इस शो के बारे में...

जयश्री रामदास, डीन, होमीभाभा सेन्टर फॉर साइन्स एजुकेशन...
“When India is trying to be scientific and development-oriented, a show like this is highly regressive, perpetuating superstition while playing on peoples’ vulnerabilities, So-called past life regression through hypnotism has been tested and debunked, and besides, it has dangers.From watching the show for fun, many will start believing it, and it may take hold of their lives, leading to trouble for them and their families.”

डॉ० युसुफ मैचेसवाला, मनोरोग विशेषज्ञ...
“Science has not been able to establish that we have a past life. Psychologists and psychiatrists do not accept it either,The concept of a past life is more of a cultural and religious belief. An unconscious mind can go to any limits. One’s thoughts could also be based on what’s read in history.”


सनत एडमारूकु, अध्यक्ष, रैशनलिस्ट सोसाइटी ऑफ इन्डिया...
In a country where many believe in reincarnation, academicians and rational thinkers feel that the show will reinforce such beliefs. “The show tries to prove to the gullible masses that all their physical and mental problems are derived from their past lives,”

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के बारे में आप यहां पर और जानकारी पा सकते हैं।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के बारे में मैं सिर्फ यही कहूंगा कि...

Past-life regression practitioners use hypnosis and suggestion to promote recall in their patients, using a series of questions designed to elicit statements and memories about the past life's history and identity.

यहां पर ध्यान देने योग्य शब्द हैं hypnosis और suggestion, कुछ लोग hypnotizable व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं यही लोग सेशन के दौरान थेरेपिस्ट के दिये suggestion को मान लेते हैं और अपने व्यक्तिगत विश्वास और कल्पना के सहारे कहानी गढ़ने लगते हैं... और कंदास्वामी, धुत , सुन्दरा और कौव्वे जैसे चरित्र अनायास ही पैदा हो जाते हैं।

क्या ख्याल है आपका ?

चलते-चलते...

हाँ याद आया, मेरी पत्नी श्री भी छिपकलियों से जरूरत से ज्यादा ही डरती हैं, मुझे अखबार पड़ते हुऐ तो बिल्कुल भी नहीं देख सकती और टी० वी० पर किसी चैनल में शाहरूख खान के दर्शन हो रहे हों तो मजाल किसी की जो वहां से उनको एक पल भी हिला सके...

सोचिये दिमाग लगाईये ऐसी कोई कहानी बनाईये जो छिपकली, शाहरूख और अखबार से नफरत को पूर्वजन्म से जोड़ सके तो मैं भी पत्नी श्री से फोन करवाता हूँ "राज पिछले जन्म का" को...टी वी पर आना किसे खराब लगता है ?
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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

वेश्यावृति का कानूनीकरण ( Legalization of Prostitution ) और इस से उठते कुछ अहम् सवाल . . . . . . . . . .प्रवीण शाह

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मेरे कानून पालक मित्रों,

अभी हाल में माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान वेश्यावृति के बारे में सरकार को सलाह दी:-
" When you say it is the world's oldest profession and when you are not able to curb it by laws, why don't you legalize it?" इसके आगे माननीय न्यायालय द्वारा कहा गया " You can then monitor the trade, rehabilitate and provide medical aid to those involved." (स्रोत-PTI)


"TIMES OF INDIA" में अपने कॉलम 'LEGALLY SPEAKING' मे धनंजय महापात्र ने इस पर असहमति जताते हुऐ लिखा है कि २० साल पुराने सख्त कानून के बावजूद भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आ पाई है तो क्यों न सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहना दे और सरकारी सेवकों द्वारा ली जाने वाली घूस या कमीशन की दरें निर्धारित कर दे।

अब इसी तर्क को आगे बड़ाते हुऐ क्या यह नहीं हो सकता कि:-

- पुलिस और प्रशासन के राजनीतिकरण के विरूद्ध कड़े नियमों के बावजूद अधिकतर अधिकारी किसी एक राजनीतिक दल विशेष की विचारधारा को बढ़ाते है, उसके नेताओं की चमचागिरी करते हैं तथा अपने फैसलों से उस राजनीतिक दल का हित साधते हैं,... तो क्यों न जनता के इन सेवकों को राजनीतिक दल का सदस्य बनने दिया जाये।
- दहेज विरोधी कानूनों के होने के बावजूद यह खुले आम मांगा और दिया जाता है... क्यों न इसका रेट फिक्स कर दिया जाये?
- साम्प्रदायिक मुद्दों पर वोट मांगने की मनाही के बावजूद खुलेआम ऐसा होता है... क्यों न इसको कानूनी जामा पहना कर राजनीतिक दलों को उनके द्वारा उठाये साम्प्रदायिक मुद्दों का एकाधिकार दे दिया जाये।
- सरकारी और सार्वजनिक भूमि के अतिक्रमण (encroachment)के विरुद्ध तमाम कानूनों के बाद भी यह खुलेआम होता है... अपनी कॉलोनी में ही देखिये स्वयं आप ने, आप के पड़ोसी या दोस्त ने नाली के ऊपर निर्माण किया हुआ होगा या फुटपाथ के ऊपर कब्जा कर जेनरेटर रखा होगा/ पार्किंग बनाई होगी... धर्मस्थलों के लिये तो जमीन खरीदना पाप समझा जाता है... आखिर सरकारी जमीन है किसलिये... तो क्यों न अतिक्रमण करना हमारे अधिकारों में शामिल कर दिया जाये।
- भीख मांगना अपराध है पर भीख खुलेआम मांगी और दी जाती है... क्यों न इसे कानूनी रूप देकर इसमें निवेश, कमाई और रोजगार के अवसर पैदा किये जायें।

ऐसे और भी तमाम विषय और मुद्दे है... जो अपने Legalization की बाट जोह रहे हैं... बस मेरे,आपके और हम सबके समर्थन की दरकार है!

तो क्या खयाल है आपका ???

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

क्लाइमेटगेट ( CLIMATEGATE ) एक बहुत बड़ा धोखा है 'ग्लोबल वार्मिंग' और ' क्लाइमेट चेंज' पर कोपेनहेगेन वार्ता . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह. . .

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मेरे पर्यावरणचिंतक मित्रों,

सबसे पहले बताता हूँ आपको 'क्लाईमेटगेट' के बारे में, अमेरिकी राष्ट्रपति निकसन के बदनाम 'वाटरगेट' की तर्ज पर 'क्लाईमेटगेट' कहा जा रहा है उस घटना को जिस में एक हैकर ने University of East Anglia’s Climate Research Unit (aka CRU) के कंप्यूटर सिस्टम को हैक कर के रिलीज कर दी 61 megabytes of confidential files onto the internet.

आप चाहें तो आप भी इन फाइलों को इस वैबसाइट से डाउनलोड कर इनका अध्ययन कर सकते हैं।

अब सवाल यह आता है कि है क्या इन 'क्लाइमेटगेट' पेपर्स में ?

इन पेपर्स से यह रहस्योद्घाटन होता है कि:-

जानबूझकर, डाटा को मैनिपुलेट करके व गलत डाटा के आधार पर 'ग्लोबल वार्मिंग' व 'क्लाइमेट चेन्ज' का एक हव्वा खड़ा किया जा रहा है जहाँ डाटा साथ नहीं दे रहा है वहाँ पर पूरी तरह से काल्पनिक डाटा पैदा किया जा रहा है।

फर्जी डाटा कैसे CREATE किया गया देखिये यहाँ पर...

आईये देखते हैं ग्लोबल वार्मिंग के बारें में हमारा वर्तमान ज्ञान क्या है

अब देखिये क्या कीमत चुकानी पड़ेगी इस हव्वे की

यह कीमत आ रही है ४५ ट्रिलियन यू० एस० डॉलर, सन २०५० तक।

अब देखिये कि अमेरिका का सम्मानित अखबार 'वाशिंगटन टाइम्स' इस सारे गड़बड़झाले के बारे में क्या लिखता है

संपादकीय नं० १
संपादकीय नं० २

स्पष्ट है कि दुनिया बजाय गर्म होने के ठंडी हो रही है लेकिन इस बारे में जानकारी छिपाई जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के वैज्ञानिक सलाहकार (President Obama’s science adviser) Dr. John P. Holdren ने भी इस गड़बड़ी को स्वीकार किया है देखिये यहाँ पर

अब सवाल यह आता है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है...

कारण कई हैं...
१- विकासशील और गरीब देशों को उर्जा के सबसे सस्ते स्रोत यानी कोयले से उत्पन्न बिजली से वंचित रखने के लिये।
२- उनकी उर्जा की कीमत को बढ़ाने के लिये ताकि वो 'सीमा' से अधिक तरक्की न कर सकें।
३- अपनी महंगी ग्रीन टेकंनालाजी बेचने को।
४- शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद बेकार पड़े न्युक्लियर मटीरियल को क्लीन व ग्रीन न्यूक्लीयर उर्जा उत्पन्न करने के नाम पर उसके अच्छे दाम पाने को।
५- भूखे-गरीबों को भूखा गरीब बनाये रखने के लिये।


इस सारे प्रपंच को रचने के लिये कार्बन डाई आक्साईड को ग्लोबल वार्मिंग का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्योंकि कोयला या अन्य ईंधन जलाने से यही गैस निकलती है। यहाँ देखिये ग्लोबल वार्मिंग CO2 के कारण नहीं होती और डाइनासोर युग मे् आज से ५ गुना ज्यादा कार्बन डाई आक्साईड थी वातावरण में...

ग्लोबल वार्मिंग के इस झूठे हव्वे की पोल खोलते कुछ और लेख देखिये:-

पोल खोल-१
पोल खोल-२
पोल खोल-३
पोल खोल-४
पोल खोल-५
पोल खोल-६


अब सवाल यह आता है कि कोपेनहेगेन वार्ता जो ७/१२/२००९ से शुरू हो गई है क्या उस से पहले हमारे मीडिया का फर्ज नहीं बनता था अपने पाठकों को यह सब बताने का... ताकि सरकार के फैसले में नागरिक भी दखल दे सकें... या ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेन्ज के शोर ने मीडिया का भी ऐसा ब्रेनवाश कर दिया कि उसने दूसरे पक्ष की सुनना तो छोड़िये क्लाइमेटगेट जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम को भी नजरअंदाज कर दिया...


क्षमा भी चाहूंगा आप सबसे, वक्त कम था, सामग्री ज्यादा थी और टैक्निकल थी, अत: लिंक थमा दिये, आप पूरे इतमीनान से पढ़िये फिर बताइये कि मेरी यह पोस्ट कैसी है और आप मुझसे सहमत हैं कि नहीं...

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रविवार, 6 दिसंबर 2009

आज छह दिसंबर है, प्रार्थना फल देती है तो ठीक,... वरना आईये मिलकर छलांग लगाते हैं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह.

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मेरे न्यायप्रिय मित्रों,

आज छह दिसंबर है, अलग अलग लोगों के लिये अलग अलग मायने हैं इसके... मेरे लिये यह दिन हमारे पूरे तंत्र की विफलता का दिन है... क्योंकि अयोध्या में जो विवाद है वह हमारी अदालतों में एक 'सिविल डिस्प्यूट' के तौर पर दर्ज है जिसमें अदालत ने केवल यह निर्णय देना है कि विवादास्पद प्रॉपर्टी पर TITLE यानी हक किसका है।

यह हमारा देश है, हमने खुद अपना संविधान बनाया है, हमारे चुने हुऐ प्रतिनिधियों ने संसद में बैठकर संविधान के अनुसार कानून बनाये हैं, हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र है, आज तक न्याय पालिका ने हमें निराश नहीं किया कभी...

आज फिर छह दिसंबर है, आइये मिलकर प्रार्थना करें कि हमको, हमारे तंत्र को इतना साहस और इच्छा-शक्ति मिले कि न्यायपालिका से इस मामले को जल्द से जल्द निस्तारित करवा कर फैसले को अमल करा सकें... आखिर कब तक ऐसे ही SUSPENDED ANIMATION में रहेगा यह देश ?.... और क्यों रहे... क्या हम अपने ही देश में अपने ही कानून का पालन करने-करवाने में असमर्थ हैं ?...

अगर सचमुच ऐसा है तो आईये सभी लोग चुल्लू भर पानी में सामूहिक छलांग लगाते हैं...

तैयार हैं आप ?

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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

गाँव गया था, गाँव से भागा....... यहां तो कुऐं में ही भांग मिल गई है ..... ..... .... .प्रवीण शाह

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मेरे 'शहरी' मित्रों,


कुछ काम ही ऐसा है मेरा, कि... हर माह ४-५ दिन जाना पड़ता है 'इंटीरियर' के गाँवों में... तो वहां के एक गाँव में एक दिन में जो देखा-सुना... बता रहा हूँ बिना अपनी तरफ से कुछ जोड़े या घटाये...


*** नरेगा ने दिहाड़ी बढ़ा दी है... अब १२०-१३० से कम में 'लेबर' नहीं मिलती... दिहाड़ी करने में 'लेबर' की कोई रूचि नहीं रही अब... अब तो ठेके का जमाना है, यानि ५-६ 'लेबर' ने किसान से ठेका कर लिया "अच्छा २५ बीघे का गन्ना काटना, छीलना और गाड़ी में लोड करना है... तो इतना 'नावा' देना होगा"... ठेका पटा तो फिर वही काम जो दिहाड़ी से १५ दिन में होता... ५ दिन में ही पूरा... जय हो 'मजदूर-किसान' की...


*** इस गाँव में सरकारी स्कूल है... एक मास्टर और दो शिक्षामित्र भी... मास्टर नवजवान और जोशीला... शिक्षामित्र इसी गाँव के... १६६ बच्चों के नाम लिखे हैं स्कूल में... मै्ने देखा मात्र १३ बच्चे पढ़ रहे हैं... शिक्षामित्र कहता है कि जब मिड-डे मील बंटेगा तो तकरीबन ४०-४५ बच्चे आ जायेंगे... साल की शुरूआत में जब वजीफा बंटता है हर बच्चे को ३६० रू० साल की दर से... तो माँ-बाप हर वक्त घेरे रहते हैं...लेकिन वजीफा मिलते ही कभी झांकने भी नहीं आते... वर्दी, बस्ता और किताबें सब मिलती हैं बच्चों को... पर स्कूल भेजने के नाम पर कहते हैं " क्या स्कूल जाकर हमारा लल्ला 'साहब' बन जायेगा"... ऐसा नहीं कि ये बच्चे कुछ काम ही कर रहे हों... स्कूल के ठीक सामने ही कंचे खेल रहे हैं, साईकिल का पहिया चला रहे है या फिर नदी के कीचड़ को उलीच कर 'भूरी' और 'मैलुआ' नाम की छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं... जय हो 'सर्व शिक्षा अभियान' की...


*** अरे यहाँ तो अस्पताल भी है ... उत्साही डॉक्टर से मिलने जाता हूँ... एक रूपये का पर्चा बनता है... डॉक्टर कहता है कि जो १५०-२०० लोग दवाई लेने आते हैं उनमें ज्यादातर 'मरीज' नहीं हैं...ज्यादातर को 'ताकत' की तलाश है... एक मेरे सामने डॉक्टर को दिखाता है... परेशानी क्या है-'कमजोरी'... भूख, टट्टी, पेशाब सब ठीक... कोई खाँसी, बुखार नहीं... एक ताकत की बोतल चढ़ा देते डॉक्टर साहब... रात भर गन्ना छिला है इसने... मेहनत ज्यादा करने के कारण बदन दर्द कर रहा है... तुम्हें थोड़ी नींद की जरूरत है, डॉक्टर समझाता है... वो आँखें तरेरता है... बड़ी मुश्किल से डॉक्टर कोई पेन किलर आदि देकर पीछा छुड़ाता है उस से... डॉक्टर बताता है कि इन लोगों के लिये अच्छे ईलाज का माने है बोतल(आई० वी०) चढ़ना... इसके बाद नस में इंजेक्शन, मांस में इंजेक्शन, पीने वाला सिरप, कैप्सूल और फिर गोली का नंबर आता है... हर रोज कोई ४०-४५ साल का आदमी 'वृद्धावस्था पेंशन' वाले फॉर्म में अपनी उम्र ६५ साल लिखवाने के लिये परेशान करता है... जय हो 'सबके लिये स्वास्थ्य' की...


*** सोचा प्रधान से मिल लूँ... महिला प्रधान है...कहती हैं, नरेगा हमारे लिये आफत बन गई है... १०० दिन की १०० रू० दिन के हिसाब से मजदूरी तो सभी चाहते हैं... पर कोई काम करना किसी को मंजूर नहीं... सरकारी पैसा सरकार हमारे लिये भेजी है... काम करें न करें तुम्हारी जेब से तो नहीं जा रहा पैसा... कुछ टोका-टाकी करने पर अगले चुनाव में देख लेने की धमकी अलग से... किसी तरह से हमें विकलांग बना कर पेंशन बंधवा दो 'प्रधानी', ऐसा अनुरोध लेकर हट्टे-कट्टे अक्सर बैठे रहते हैं 'प्रधानी' की बैठक में... जय हो 'पंचायती राज' की...


*** फरवरी में शायद पंचायत के ईलेक्शन हैं... १०० रू० 'वोट' पर खुला रेट इस समय २५० रू० प्रति 'वोट' तक पहुंच गया है... आगे और बढ़ने की उम्मीद है... कुछ तो आधी रकम एडवांस अभी से पकड़ बैठे हैं... दारू-मुर्गे की दावतें पूरे जोर-शोर से चल रहीं हैं अभी से... जय हो 'डेमोक्रेसी'... जय 'भारत देश महान' की...


ऐसा नहीं लगता आपको, कि कुंऐ में ही भांग मिल चुकी है ?

अपनी राय बताइये अवश्य....