बुधवार, 18 नवंबर 2009

तस्मै श्री गुरूवै नम:......Will these preachers show some courage ?...( एक दोबारा ठेली गई पोस्ट.)........................ प्रवीण शाह

आज फुरसत में बैठा ब्लॉगवाणी देख रहा था तो अचानक मेरी नजर ब्लॉगवाणी द्वारा रखे गये मेरे ब्लॉग के लेखे जोखे पर पड़ी तो पाया कि मेरी इस पोस्ट को ब्लॉगवाणी से मात्र एक ही पाठक मिल पाया, जबकि पसन्द एक और टिप्पणी कोई नहीं मिली...
आज दोबारा से ठेल रहा हूँ इस पोस्ट को बेहतर परिणामों की उम्मीद के साथ...

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सुधी मित्रों,

सबसे पहले तो मेरा डिस्क्लेमर :-

"एक हिन्दू या यों कहें सनातन धर्मी परिवार में जन्म हुआ है मेरा, पिता जनेऊ पहनते हैं और नियम से संध्या, पूजा, पाठ करते हैं। माँ की ईश्वर में अटूट आस्था है पर बंधी नहीं वो किसी कर्मकान्ड से, जब मन चाहा खाना बनाते, सब्जी काटते, कपड़े धोते या नहाते हुऐ संस्कृत के श्लोक, आरतियां, हनुमान चालीसा, भजन आदि गाती रहती है। मन हुआ तो मंदिर गईं, नहीं तो नहीं...गुरुद्वारे जाती है तो पूर्ण श्रद्धा से शीश नवाती है, चर्च में भी ईश्वर मौजूद मिलता है उसे, दिल्ली गई तो जामा मस्जिद की सीढियों पर भी ठिक उसी तरह माथा टेका उसने, जैसा मंदिर में टेकती है।
रहा सवाल मेरा तो किसी भी तरह के नियम या परिभाषा में नहीं बंधना चाहता मैं, मेरे लिये धर्म का अर्थ यही है कि ऐक भारतीय होने के नाते अपने अधिकार मांगने से पहले अपने कर्तव्य को सही तरह से निभा सकूं, और हाँ न तो किसी गुरु की जरूरत हुई है मुझे आज तक और न ही किसी को गुरु बनाया है मैंने..."


अब आते हैं मुद्दे पर...

टीवी खोलो तो कम से कम १० चैनल मिलेंगे जो पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक प्रोग्राम ही दिखाते हैं और इन्हीं चैनलों में शाश्वत वास है गुरूओं, बाबाओं, बापुओं, भाइयों, महाराजों, योगियों, पूज्यों, साध्वियों, बहनों, दीदियों, अम्माओं आदि आदि का जो दिन रात लगे हैं ज्ञान वर्षा करने में...

इनमें से अधिकतर की धर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं रही है ज्यादातर कीर्तन, भजन ,जागरण और कथावाचन करते करते तरक्की कर गुरु बन गये हैं पर हमें इस से क्या...ज्ञान तो कोई भी बांट सकता है।

शायद एकाध साल पहले एक चैनल ने इनमें से कुछ की पोल भी खोली थी कि किस तरह वो १० रूपये लेकर १०० की रसीद देते हैं और टैक्स चोरों की मदद करते हैं...पर हमें इस से कुछ लेना देना नहीं...

एक और बात जो वाक चातुर्य के धनी यह गुरु अपने शिष्यों के दिमाग में ठूंसते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है परमात्मा से साक्षात्कार और मोक्ष ( जो एक अपरिभाषित शब्द है आजतक)...और यह सब केवल और केवल गुरु ही दिला सकता है...गुरु तो सामने बैठा ही है!...खैर इस से भी अपन को क्या...

चंद किस्से कहानियों, चुटकुलों, पौराणिक प्रसंगों, कीर्तनों, भजनों ,गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के दम पर ऊँचे सिंहासनों पर बैठे ये गुरु नृत्य और संगीत सहित सत्संग का एक ऐसा शो रचते हैं कि सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी चकरा जाये और इन्हीं में ईश्वर का प्रतिरूप देखने लगे...यही कारण है कि कुछ घरों में इनके फोटो आपको देवताओं के साथ लगे मिलेंगे...लेकिन मुझे कोई ऐतराज नहीं इस पर भी...

इन में से कुछ स्वयं और कुछ शिष्यों के नेटवर्क द्वारा धार्मिक और पर्यटन की दॄष्टि से महत्व पूर्ण स्थानों पर आश्रम बनाने के नाम पर बेशकीमती सरकारी जमीन और जंगल घेर रहे हैं...फ्लैट बना कर बेच रहे हैं...भू माफिया का जैसा काम कर रहे हैं...पर यह देखना तो शासन प्रशासन का काम है...हम क्यों चिंता करें फालतू में...

इनमें से कई ऐसे हैं जिनका कार्य है वरिष्ठ पदों पर आसीन नेताओं, अधिकारियों और बड़े व्यवसाइयों के बीच नेटवर्किंग कर डील करवाना...हमारे धर्म निरपेक्ष मुल्क में भक्ति पर तो कोई रोक है नहीं...अत: इनके आलीशान पांच सितारा आश्रमों में इन तीनों श्रेणियों के महानुभाव आसानी से मिलकर मोलभाव कर सौदा कर सकते है...विभिन्न नियामक तो हैं इस गड़बड़झाले पर नजर रखने के लिये...सो डोन्ट वरी...


इन गुरुओं को अपने भक्तों के आध्यात्मिक और धार्मिक उत्थान का भी बड़ा ख्याल रहता है अत: ये गुरु दक्षिणा के नाम पर अपने भक्तों से कभी कभी कुछ संकल्प भी करवाते हैं जैसे...
१- मैं जीवन भर मांसाहार का सेवन नहीं करूंगा।
२- शराब और सिगरेट-तम्बाकू छोड़ दूंगा।
३- तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज आदि का त्याग कर दूंगा।
४- सप्ताह में एक बार कम से कम सत्संग में जाउंगा।
५- रोज सुबह गौमाता को चार रोटी खिलाउंगा।
आदि आदि...
कोई हानि नहीं इन संकल्पों से भी...



अब कल्पना कीजिये उस स्थिति की...यही गुरु लोग गंगाजल भक्तों के हाथ में देकर उन्हें निम्न संकल्प दिलवा रहे हैं...
१- मैं अपने लड़के की शादी में न तो दहेज लूंगा और न बिटिया के विवाह में दूंगा।
२- मैं अपने व्यवसायिक और निजी जीवन में किसी भी तरह की टैक्स चोरी नहीं करूंगा, सरकार को प्रत्येक टैक्स पूरा दूँगा, अपनी इस्तेमाल की गई बिजली और पानी का पूरा दाम चुकाउंगा।
३- मैं किसी तरह की बख्शीश, घूस, रिश्वत या सुविधा शुल्क न तो दूंगा और न ही लूंगा।
४- मैं किसी भी काम के लिये न तो सिफारिश करवाउंगा और न किसी की गलत सिफारिश को मानूंगा।
५- जाति व्यवस्था यानि समाज के कोढ़ को खत्म करने का प्रयास करुंगा और जीवन का कोई भी निर्णय जाति के आधार पर नहीं लूंगा।
६- मैं अपने उद्योग या प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारियों व श्रमिकों का शोषण नहीं करूंगा, उन्हें इतना वेतन दूंगा कि वोसम्मान से सर उठाकर एक उपयोगी जीवन जी सकें तथा मुनाफे में भी कुछ हिस्सा उन को दूंगा।


अगर ये गुरु ऐसा करने लगें तो क्या होगा...???

इन गुरुओं के पंडाल खाली हो जायेंगे...तंबू उखड़ जायेंगे...और इनके भक्तों का नाम विलुप्त प्राय: जीवों की लिस्ट में आ जायेगा...

काफी कड़वा तो है......मगर यह सच है...

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7 टिप्‍पणियां:

  1. ये लेख शायद मै पहले पढ़ चूका हूँ,।

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  2. आज-कल भक्त अपनी भौतिक और आर्थिक सुविधानुसार ही गुरु चुन रहा है .... अब ऐसे मैं नकली गुरु ही चमक-दमक से आगे आ रहे हैं ... |

    अब तक के अध्ययन से मैं ये तो समझता हूँ की मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए गुरु चाहिए ही .... पर सच्चा गुरु कहाँ और कैसे धुंधू ?

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  3. सच कहा, ये गुरु ऐसा संकल्प नहीं करवायेंगे!! इनकी दुकान बंद हो जायेगी!

    काफी कड़वा तो है......मगर यह सच है...

    वाकई!!!

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  4. धर्म तो वही है जो आपकी माता मानती हैं, शेष तो नाम हैं और नाम में रखा क्या है.

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  5. सत्यवचन महाराज ! आप ही हैं असली गुरू !

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  6. सही कहा आपने प्रवीण जी।
    अच्छा लिखा आपने। और बहुत खुशी हुई कि कोई तो धर्म, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर सामाजिक बुराईयों के लिये लिख रहा है।
    अच्छा लगा। सच में।

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  7. ऊपर पंकज जी की टिप्पणी से सहमत हूँ।

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