शनिवार, 14 नवंबर 2009

श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज, ईश्वर, धर्म, ज्योतिष, भाग्यवाद और कड़वी हकीकत...... प्रवीण शाह

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मित्रों,

एक स्थिति की मेरे साथ-साथ कल्पना कीजिये:-

संघ लोक सेवा आयोग के परिसर में बहुत हलचल है, देश की एक प्रतिष्ठित सेवा के लिये साक्षात्कार होने हैं, २५ कक्षों मे २५ ही इन्टरव्यू बोर्ड बैठे हैं जो अगले ३ दिनों में १००० आवेदकों, जो कि लिखित परीक्षा में सफल होकर साक्षात्कार के योग्य पाये गये हैं, के साक्षात्कार लेंगे।

साक्षात्कार बस शुरू ही होने वाले हैं कि अचानक आगमन होता है श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज का, अपने चेलों के साथ। महाराज बहुत पहुंचे हुऐ सिद्ध पुरुष बताये जाते हैं और यहाँ पर परीक्षार्थियों का उद्धार करने आये हैं, उनके आशीर्वाद का तरीका सीधा-सादा है, साक्षात्कार कक्ष में जाने से पहले प्रत्येक परीक्षार्थी अपने पैर से जूता निकाल कर महाराज की पीठ पर मारे-उसके बाद आशीर्वाद स्वरूप महाराज भी उसकी पीठ पर उसी जूते से प्रहार करेंगे, लगभग सभी परीक्षार्थियों ने आशीर्वाद लिया...

तीन दिन बाद चले साक्षात्कार के बाद चौथे दिन परिणामों की घोषणा हुई...और...

१५० परीक्षार्थी सफल घोषित किये, लगभग सभी महाराज के जीवन भर के लिये भक्त हो गये और महाराज के चित्र अपने घर में लगाने के लिये ले गये।

२५ परीक्षार्थी प्रतीक्षा सूची में आये, वे अपने ही भाग्य को दोष देते हुए शीघ्र मुख्य सूची में आने की आस लिये हुऐ फिर महाराज का आशीर्वाद ले अपने घरों को गये।

जो परीक्षार्थी असफल हुऐ, उनके मन में जो-जो आया वो कुछ इस प्रकार था:-
- महाराज को जूता मारने में मुझ से ही कुछ कमी रह गई, मैं थोड़ा और जोर से मारता तो अच्छा होता...
- कहीं ज्यादा जोर से तो नहीं मार दिया मैंने? महाराज को चोट तो नहीं लग गई...
- मेरा जूता कैनवास/रबड़/सिंथेटिक मटीरियल का था, शायद चमड़े का जूता ही सही होता...
- अपशकुन तो तभी हो गया जब मेरी मति मारी गई और मैंने दाहिने के बजाय बाँये पैर का जूता उतारा...
- जूता मारते समय महाराज के प्रति मेरी आस्था थोड़ी डगमगाई थी...
- मैंने पूर्ण समर्पण के साथ अपना सब कुछ महाराज के हाथों में नहीं सौंपा...
- ज्योतिषी ने पहले ही बताया था कि मेरी राशि का समय खराब चल रहा है...महाराज क्या करते...

झूठ नहीं कहूँगा ५-१० ऐसे भी थे, जिन्होंने न महाराज का आशीर्वाद लिया और न ही अपनी सफलता या असफलता का जिम्मेदार किसी और को ठहराया।



अब कुछ देर के लिये आँखें बंद करिये और सोचिये...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज होते या न होते... आशीर्वाद देते या न देते...साक्षात्कार का परिणाम तो हर हाल में यही रहता...यानी...
१००० में से :-
१५० सफल होते
२५ प्रतीक्षा सूची में आते
और शेष असफल घोषित होते



जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश ऐसी ही स्थितियां होती हैं...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज तो मात्र एक बहाना है मेरे लिये...अपनी बात आपके सामने रखने का...औसत और संभाव्यता के गणितीय नियम हर क्षेत्र में लागू होते हैं...परन्तु ऊपर वर्णित परीक्षार्थियों सी मनस्थिति रखने वाला मानव समाज क्या इसी वजह से ईश्वर व धर्म जैसी परिकल्पनाओं का पोषण नहीं कर रहा है?...
धर्म, ईश्वर, ज्योतिष और भाग्यवाद जिंदा है तथा दिनबदिन और फलफूल रहे हैं क्योंकि उन्हें मानव की ऐसी मनस्थिति का सहारा और औसत व संभाव्यता के गणितीय नियमों का फायदा मिल रहा है...सत्य है कि नहीं?


सोचिये! फिर आप ने क्या नतीजा निकाला बताईये जरूर...


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15 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वरसर्वशक्तिमान को माना जाता है .. धर्मसर्वशक्तिमान के रहस्‍य को समझने की कोशिश है .. ज्योतिषका जन्‍म ब्रह्मांड की सभी जड चेतन वस्‍तुओं का आपस में संबंध दिखने के क्रम में हुआ है .. जबकि भाग्यवादपूर्ण रूप से हर बात को निश्चित और तय मानता है .. जो सत्‍य भी हो सकता है और अंधविश्‍वास भी .. पर आपने इन सभी तथ्‍यों को एक साथ घोलकर शीर्षक में रखा है .. और शीर्षक से विपरीत आपके आलेख की जनता है .. जो एक बाबा में भगवान को देखने वाले ग्रुप का प्रतिनिधित्‍व करती है।

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    आदरणीय संगीता जी,
    आपने जो ऊपर लिखा है उस पर चर्चा फिर कभी... पर आज तो मेरा सवाल सीधा-सादा है:-
    औसत और संभाव्यता के गणितीय नियम हर क्षेत्र में लागू होते हैं...परन्तु ऊपर वर्णित परीक्षार्थियों सी मनस्थिति रखने वाला मानव समाज क्या इसी वजह से ईश्वर व धर्म जैसी परिकल्पनाओं का पोषण नहीं कर रहा है?...
    धर्म, ईश्वर, ज्योतिष और भाग्यवाद जिंदा है तथा दिनबदिन और फलफूल रहे हैं क्योंकि उन्हें मानव की ऐसी मनस्थिति का सहारा और औसत व संभाव्यता के गणितीय नियमों का फायदा मिल रहा है...सत्य है कि नहीं?

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  3. आपकी बात से 100 फ़ीसदी सहमत हूँ।
    "मानव समाज क्या इसी वजह से ईश्वर व धर्म जैसी परिकल्पनाओं का पोषण नहीं कर रहा है?..."
    बिल्कुल सत्य कहा है।
    मुझे लगता है कि "इन्सान का सबसे बडा अविष्कार भगवान ही है।"
    और हम मानवों ने ही इसे अभी तक ज़िन्दा रखा है। इसी के सहारे ये सब बाबा महाराज अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं। जब तक हम अपनी सोच को नहीं बदलेंगे तब तक कुछ नहीं हो सकता। तथातथित धर्मशास्त्रों का हवाला देकर तो तर्क कोई भी दे सकता है लेकिन धर्मशास्त्रों और भगवान की महिमा का गुणगान कर तर्क देने वाले और आँख मूँदकर इनपर विश्वास करने वाले यह कभी नहीं सोचते कि इन काल्पनिक चरित्रों और किताबों ने हमें किस अँधेरे की ओर धकेला है। 21वीं सदी में हम विकास कम कर रहे हैं और जानवर ज़यादा बनते जा रहे है।
    अगर सभी ये सब सोचें तो इन बाबाओ और पाखण्डी लोगों का भी इलाज संभव है।

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  4. गणितीय पद्धति से मनोवृत्ति की व्‍याख्‍या वाकई दमदार है... वैसे इससे इतर एक दुभा्रग्‍यपूर्ण तथ्‍य ये आपको अवगत कराना चाहूँगा हर साल यूपीएससी की मुख्‍य परीक्षा में सफल तथा साक्षात्कार में भाग लेने वाले अभ्‍यर्थीयों में से जो हिन्‍दी माध्‍यम से परीक्षा देते हैं उनमें से अधिकांश से मिलना होता है... और ये देखकर बेहद अफसोस होता है कि उनमें से बहुत से ज्‍योतिष, रत्‍न आदि पर भरोसा करते हैं अक्‍सर उन्‍हें सलाह देनी पड़ती है कि अँगूठी उतारकर साक्षात्कार देने जाएं (पूरी तरह से जड़बुद्धि या तो कपड़ों के अन्‍दर छिपाकर इन रत्‍नों को पहन जाते हैं या कोई भावनात्‍मक सा उत्‍तर तेयार करके जाते हैं..) ये हर साल की सच्‍चाई है।

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    @ अमृतपाल सिंह,

    "मुझे लगता है कि "इन्सान का सबसे बडा अविष्कार भगवान ही है।""

    यही कड़वा सत्य है। आपने बिना लाग लपेट के कह दिया है यहाँ पर, धन्यवाद।

    @ मसिजीवी,

    आपने वाकई एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य को जाहिर किया है, कल को जब ये देश को चलायेंगे तो क्या होगा तार्किक, तथ्य आधारित और वैज्ञानिक सोच का ? हमारी बहुत सी नाकामियों के पीछे ऐसी सोच वाले लोग ही हैं।

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  6. ऐसे जूता मारेश्वर हर गली, गाँव कूचे में मिल जाते हैं… एक हमारे आसपास भी हैं… वे गुमे हुए लोगों, वस्तुओं, जानवरों के एक्सपर्ट माने जाते हैं(?) चार लोगों में से चारों को वे बताते हैं कि तुम्हारी भैंस पूर्व दिशा में मिलेगी… और गणितीय सम्भाव्यता के अनुसार निश्चित ही एक की भैंस पूर्व दिशा में मिल जाती है, वह व्यक्ति बाबा का पक्का भगत बन जाता है और चार नये ग्राहक खोज लाता है, बाबा की जय-जयकार… :)

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  7. प्रवीण जी,
    वास्‍तव में किसी एक बाबा को भगवान मान लेना .. उनके कहे पर आंख मूंदकर विश्‍वास करना .. और उनके बताए उपायों से सफलता हासिल करने की सोंचना बिल्‍कुल गलत है .. मेरे पास आकर भी बहुत लोग ऐसी बातें किया करते हैं .. मैं तो उन्‍हें एक बात ही समझाती हूं .. यदि किसी हिन्‍दू बाबा में दम होता .. तो वे भाजपा को जीताने में पूरी ताकत झोंक देते .. आपके आलेख से मैं पूरी सहमत हूं .. पर प्रकृति के नियमों को मैं मानती हूं .. मनुष्‍य के हाथ में सबकुछ नहीं होता .. पर एक उदाहरण देकर आपने सबको लपेटे में ले लिया .. ईश्‍वर , धर्म और साथ साथ ज्‍योतिष को भी .. जिससे मैं सहमत नहीं .. इसलिए मैने कहा कि शीर्षक के अनुरूप आपका आलेख नहीं .. मेरी मंशा बुरी नहीं थी !!

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  8. बहुत सही समझाया आपने। शुक्रिया।

    काश इस गणित को सभी लोग (अनपढ़ गँवार ही नहीं बल्कि पढ़े लिखे ज्ञानी, मुनि, विज्ञान विशारद, उच्च कोटि के वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, इतिहासकार, दार्शनिक, साहित्यकार, संगीतकार, कलाकार इत्यादि भी समझ कर उसपर अमल करते।

    लेकिन आस्था से जुड़े इस प्रश्न पर सभी तर्क को ताख पर रख देते हैं।

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  9. सत्‍य है, समझदारों की बात समझदार ही समझे है यह भी सत्‍य है,

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  10. वाह वाह...कितनी सीधी सच्ची बात की है आपने...हम नाहक ही ऐसे जूता मारेश्वर बाबाओं को भाव देते हैं....खुद पर भरोसा रखते नहीं...अरे ये बाबा लोग बिलकुल निकम्मे होते हैं लोगों का उद्धार करने की आड़ में खुद का उद्धार करते हैं...हम रोज ये सब देखते पढ़ते हैं लेकिन समझते नहीं...बहुत सही बात कही है आपने...साधुवाद...
    नीरज

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  11. अपनी बात को कहने का आपका अंदाज लाजवाब है। आपकी बातों की तार्किकता से कोई बच ही नहीं सकता।
    इस अलख को जगाए रखिए।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  12. aapke sabhi lekh pade aap bahut kamaal ka likhtey hain !! sabhi aapko ek vichaardhara se upar ja kar sochne par mazboor kar dete hain...
    Isi lekh ke baarein mein, kya manushyon ke ek tarah se aur tark veheen ho kar sochney ke peeche kramvikaas ka haath nahi hain ? Kramvikaas ke Itihaas ko jaancha jaye toh manushye jhund mein paya jata tha jo ek jaise vichaaron aur bhavnao par vishwaas raktey they shaayad wahi unke lambe samay mein safal rahene mein madad kiya.
    Aaj bhi uni anuvaanshikey ke guno ki wajah se hum jyaada tark se nahi sochtey aur apne ander ke darr aur avishvaas se bachne ke liye aise kisi baba ya soch par vishwaas kar use maan lete hain....

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  13. बहुत बढ़िया ....इस तरह के लेखों की बहुत आवश्यकता है ..
    सराहना सहित आपका

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