रविवार, 1 नवंबर 2009

शर्मनाक !!! शर्मनाक !!! शर्मनाक !!!... क्या यही है धर्म और धर्मध्वजाधारियों का वैचारिक स्तर ?

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मेरे न्यायी मित्रों,

पिछले कुछ दिन से इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी और उस से उपजी पोस्टों और विवादों को किनारे पर खड़ा देखने में मस्त था बिना कोई राय व्यक्त किये... जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना ब्लॉगर जो हूँ...कहीं यह भी पढ़ा कि ब्लॉगजगत को सेल्फ सेंसरशिप की जरूरत भी पड़ेगी...शायद शीघ्र ही...किसी भी सेंसरशिप का विरोधी हूँ और रहूंगा...अपनी आखिरी सांस तक...

आज बड़े दुखी मन के साथ यह पोस्ट लिख रहा हूँ...
आगे बढ़ने से पहले कृपया इन दो पोस्टों और खास तौर पर उन पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियों को अवश्य देखें...

पोस्ट संख्या-१...

पोस्ट संख्या-२...

मेरा सवाल सीधा सादा है...
इन और ऐसी ही विवादास्पद पोस्टों को लिखने के पीछे इन ब्लॉगरों का मंतव्य क्या है? क्या इन पोस्टों पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियां ब्लॉगिंग के भविष्य के प्रति चिंतित नहीं करतीं आप को ?
कोई उपाय है इस सब को रोक पाने का...

ऐसे तथाकथित धार्मिकों से तो नास्तिक लाख गुने बेहतर हैं...

11 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे धार्मिकों से नास्तिक होना लाख गुणा अच्‍छा .. सहमत हूं आपसे !!

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  2. सलीम तो पागल है लेकिन प्रमेन्द्र भी अपने औसत ज्ञान को परम समझकर कुछ ज्यादा ही प्रशंसा बटोरना चाहता है.

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  3. प्रवीण जी, अगर आप स्वस्थ मन से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि मेरे लेख सुधारात्मक होते है क्यूंकि यह हमारे समाज में व्याप्त दोषों को दूर करने के लिए होते हैं. अगर यही लेख कोई हिन्दू या गैर मुस्लिम लिखेगा तो उसकी लोग प्रशंषा करेंगे...

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  4. प्रवीण भाई, महाशक्ति ने तो बहुत ही सधे हुए शब्दों में पोस्ट लिखी है… आप एक बात बताईये, यदि कोई आप पर लगातार कीचड़ उछाल रहा हो, तब क्या आप कीचड़ में उतरकर अपने हाथ गन्दे करके उसी की भाषा में जवाब नहीं देंगे? किसी को तो ये काम करना ही पड़ेगा, महाशक्ति ने कर दिया तो क्या बुरा किया?

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    सुरेश जी तथा सलीम साहब,
    आपके आने का धन्यवाद,
    मैं विरोध पोस्टों का तो कर ही रहा हूँ पर अधिक चिंता मुझे उन पर आई उन टिप्पणियों की है जिनमें दुसरे धर्म, धर्मावलंबियों तथा कुछ मामलों में ब्लॉगर अथवा दूसरे टिप्पणीकार को खुलेआम गालियां दी गई हैं वो भी धर्म को लेकर स्वस्थ बहस के नाम पर...
    कृपया एक बार फिर इन टिप्पणियों को पढ़िये...

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  6. हां हां सलीम मियां वो तो पूरी दुनिया जानती है कि आपके लेख ’सुधारात्मक’(?) होते हैं.

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  7. श्री प्रवीन जी, आपको धन्‍यवाद कि आपने सही समय पर चेताया, आपके लेख से नही लगता कि आप लेख से दुखी है, एक दो व्‍यक्तिगत टिप्‍पणी जरूर दुख देने वाली थी, मैने उन टिप्‍पणी को हटा दिया है। आपको बता दूँ कि मैने सर्व‍जनिक रूप से कहा है कि मै कभी भी धर्मिक विवादो में पहल पोस्‍ट नही करूँगा किन्‍तु अगर कोई इस प्रकार कार्य करता है तो कम से कम मै स्‍वीकार नही करूंगा। धर्म हिन्‍दू हो या इस्‍लाम सभी का सम्‍मान होना चाहिये।इस प्रकार के लेख लिखना न तो मेरी आदत है न ही ये मेरे मनपंसद विषय। आपको दुख पहुँचा इसके लिये मुझे खेद है।


    मित्र आनाम, आप क्‍या सोचते है यह आपका ही विषय है। आपको लग रहा है कि मै यह प्रशंशा के लिये कर रहा हूँ और मुझे प्रशंशा मिल रही है तो आपका भी स्‍वागत है आप भी यह कीजिए। मुझे इस प्रकार के लेख लिखने में किसी प्रकार की खुशी नही है न सन्तुष्ठि पर क्‍या करूँ विवश किया जा रहा हूँ।

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  8. बहुत अच्‍छी और विचारणीय पोस्‍ट। काश आपकी बात लोगों को समझ आ जाए।

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  9. प्रवीण भाई...
    अनजाने में आपने भी वो काम कर दिया जो ये दोनों पोस्ट लिखने वाले महानुभाव चाहते थे...आपने इनके लिंक देकर इनको प्रचार का मौका दे दिया...इनके बारे में लिखना तो दूर कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर है...गेंद को जितना ज़मीन पर मारोगे... उतना ही सिर पर चढ़ेगी...बेहतर है ऐसी गेंद को ज़मीन पर ही पड़े रहने दिया जाए...

    जय हिंद...

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  10. आप को अपनी राह स्वयं निर्धारित करनी है. कोई क्या बतायेगा.

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  11. आपके इस पोस्ट की सख्त आवश्यकता थी...कल से मैं भी इसी ऊहापोह में थी कि कैसे विरोध जताया जाए...मैंने भी कुछ इसी तरह की पोस्ट लिखने की सोची थी पर एक मित्र ने सलाह दी इस से उनलोगों को अनावश्यक प्रचार मिल जाएगा...लेकिन कल पूरे दिन यह पोस्ट टॉप पर थी और सबके द्वारा पढ़ी जा रही थी....बस लोग पढ़कर आँखें मूँद ले रहें थे...सेंसरशिप के खिलाफ मैं भी हूँ...पर कल मन में आ रहा था ऐसे पोस्ट के लिए ही लोग सेंसरशिप की बात करते हैं...

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