गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"भाग्य का खेल" है इसीलिये नैट पर बैठ कर सिर खपा रहा हूँ... वरना किसी अम्बानी, टाटा-बिरला या ओबामा के घर जन्म लेकर ठाठ से जी रहा होता............

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मेरे सहयात्री मित्रों,

सबसे पहले यह पोस्ट देखें।

इस पर मैंने जो टिप्पणी की थी वह इस प्रकार थी:-

आदरणीय पंडित वत्स जी,
"मेरा सिर्फ एक ही उदेश्य रहा है...वो ये कि इसके माध्यम से ज्योतिष एवं संबंधित पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को आमजन तक पहुँचाना तथा तथाकथित पढे लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की इन विषयों के प्रति अविश्वास एवं उपेक्षापूर्ण दृ्ष्टिकोण में बदलाव लाना ।"

यहाँ पर "तथाकथित पढ़े लिखे" लिखने के अर्थ व प्रयोजन पर प्रकाश डालेंगे तो आभारी रहूँगा।

आलेख में आप लिखते हैं:-
"जब कि आपकी जन्मकुंडली जो कि आपके जन्मकालीन ग्रहों पर आधारित होती हैं, वास्तव में वो ही आपके समस्त जीवन का सार है । आप अपने पूर्वार्जित कर्मों के अनुसार जन्म के साथ ही जो कुछ भी हानि-लाभ,सुख-दुख, कर्म-अकर्म, भाग्य-दुर्भाग्य इत्यादि के रूप में अपने साथ संग्रहित कर के लाते हो---उसे जानने का एकमात्र माध्यम सिर्फ आपकी जन्मकुंडली ही है । उसी के आधार पर आपको अपने भावी जीवन में फल की प्राति होती है ।"
"लेकिन यदि कोई वस्तु आपके भाग्य में लिखी ही नहीं गई है तो उसमें उपाय क्या कर सकता है? आप चाहे दिन रात उपाय करते रहें-----जब भाग्य में है ही नहीं तो उसमे उपाय क्या करेगा ।"

अपनी टिप्पणी में आपने लिखा है:-
"अगर जन्मपत्रिका से ये भी नहीं पता चल पाता कि इन्सान के भाग्य में क्या लिखा है...तो फिर तो ज्योतिष विद्या का कोई औचित्य ही नहीं था ।
ज्योतिष विद्या का मूल उदेश्य यही है कि इसके माध्यम से इन्सान ये जान पाता है कि वो अपने पूर्वार्जित कर्मों के फलस्वरूप अपने साथ भाग्य रूप में क्या लेकर आया है..ओर कितना लेकर आया है ।
किन्तु हमारे जो वर्तमान में किए जा रहे कर्म हैं, वो हमारे "पुरूषार्थ" के अधीन होते हैं...जिनमे सुधार करके अथवा बाह्य रूप में उपाय इत्यादि द्वारा अपने जीवन में परिवर्तन किया जा सकता है...लेकिन भाग्य का फल अटल है...उसके फलों में किसी भी प्रकार से कोई कमी/वृ्द्धि नहीं की जा सकती । "


उपरोक्त को पढ़ कर जो सवाल मन में उठा है वो इस प्रकार है।

आपके आलेख के अनुसार जन्म पत्रिका से यह पता चल जाता है कि इन्सान के भाग्य में क्या है। जन्म पत्रिका जन्म के सही समय व स्थान के आधार पर बनाई जाती है,माता पिता के नाम,काम,रंग,कुल,गोत्र से इसका संबंध नहीं है। जिस प्रकार सैकड़ों साल पहले की ग्रहस्थिति की गणना संभव है उसी प्रकार वर्ष २०१० के दौरान किसी स्थान, उदाहरण के लिये दिल्ली के आसमान की ग्रह स्थिति के बारे में भी जाना जा सकता है। यदि ज्योतिषी एकमत होकर गणऩा करते हैं कि जून २०१० को दिल्ली में एक लग्न विशेष में पैदा होने वाले जातक किसी क्षेत्र विशेष में शिखर तक जायेंगे... और क्योंकि चिकित्सा विज्ञान की तरक्की के कारण ३४ सप्ताह से अधिक समय से गर्भवती माता का प्रसव कभी भी कराना संभव है... तो यदि माता पिता चाहें तो उसी लग्न में बच्चे का जन्म करा कर उसके अच्छे भाग्य को सुनिश्चित कर सकते हैं कि नहीं?... दूसरा यदि अनेकों बच्चों का जन्म उसी लग्न में कराया जाये तो कंया सभी समान आयु वाले और समान भाग्य वाले होंगे?... तीसरा क्या ज्योतिष की मदद से गर्भावस्था के ९वें माह के दौरान वह पूरे देश का वह स्थान व समय चुना जा सकता है जहाँ पर जन्म लेने पर जातक शारीरिक रूप से सुन्दर, बलशाली, दीर्घायु, बुद्धिमान, स्वस्थ, सफल और माता पिता के लिये शुभ फलकारी होगा... यदि ऐसा संभव है तो यूरेका !!! सारी समस्याओं का हल तो ज्योतिष के पास ही है और इन्सान फालतू में परेशान है।




अब देखिये जो जवाब मुझे प्राप्त हुआ है वह क्या है:-

"@ प्रवीण शाह जी,
किसी भी विषय में तर्क-वितर्क करना हो तो सबसे पहले हमें उस विषय की जानकारी होनी आवश्यक है...ओर दूसरे यदि हम अपनी धारणाओं को दरकिनार कर खोजने का प्रयास करें तो ही सत्य का अनुशीलन कर सकते हैं । अन्यथा हमें सिर्फ वो ही दिखाई देगा...जिसे कि हम देखना चाहते हैं ।
इसलिए यदि आप वास्तव में इस विद्या को सत्य/असत्य की कसौटी पर परखना चाहते हैं तो सबसे पहले तो आप विधिवत इसका पूर्णरूपेण ज्ञान हासिल करें....सीखने,समझने का प्रयास करें..ओर नहीं तो कम से कम मूलभूत जानकारी तो अवश्य ही जुटा लें...ताकि आप अपने विचार ठीक से रख सकें ओर मेरी बात को आप अच्छे से समझ सकें...।


ओर एक बात कि ज्योतिष में आप के आधुनिक विज्ञान की भान्ती कल्पना का कोई स्थान नहीं है...."यदि ऎसा हो तो? यदि वैसा हो तो ?" इस प्रकार के वाक्य सिर्फ विज्ञान में ही प्रयोग किए जाते हैं..ज्योतिष जैसे किसी शाश्वत ज्ञान में नहीं । यदि सबकुछ आप के हाथ में होता तो आपको यहाँ नैट पर बैठकर सिर खपाई न करनी पडती...किसी अम्बानी,टाटा-बिरला या ओबामा के घर में जन्म लेकर ठाठ से जी रहे होते....दुनियावाले इसी को "भाग्य का खेल" कहते है....
काश आप समझ पाते ओर मैं आपको समझा पाता....खैर..."






मतलब साफ है कि ज्योतिष जैसे शाश्वत ज्ञान के आदरणीय पंडित वत्स जी जैसे साधक यदि कुछ ज्ञान की बात बताते हैं तो उस पर कोई सवाल अगर आप कर रहे हैं तो इसलिये कि आप "भाग्य का खेल" के मारे हुऐ हैं... और केवल इसीलिये नेट पर बैठ कर सिर खपा रहे हैं... अन्यथा किसी अम्बानी,टाटा-बिरला या ओबामा के घर में जन्म लेकर ठाठ से जी रहे होते।


सच कहूँ तो यह जवाब कुछ हजम नहीं हुआ मुझको...


आप क्या सोचते हैं इस बारे में ? बताइये जरूर...

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शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

जी हाँ, मैं ही हूँ "शाश्वत सत्य"... और आप चाहो या न चाहो.. थोड़ी देर बाद आपका ही एक हिस्सा बनने जा रहा हूँ !!! ...

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जिज्ञासु मित्रों,
आज कथा सुना रहा हूँ आपको "शाश्वत सत्य" की...उसी के शब्दों में...

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मैं कब से ऐसा ही हूँ, मुझे खुद भी नहीं पता...शायद अनादिकाल से किसी दूसरे रूप में रहा ही नहीं मैं... जो आज मैं सुना रहा हूँ वो तो मेरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है...

चलिये शुरू करते हैं...
एक सेब के अन्दर था मैं अफगानिस्तान की खूबसूरत वादियों में... पकने पर बागबान ने सेब तोड़ा, पैक किया और बाजार भेज दिया...बाजार में सबसे पहले बिकी वो रसीले सेबों की पेटी...और उतारी गई एक कैम्प में... जहां सुबह की नमाज के बाद लम्बी दाड़ी वाले एक शख्स ने मिशन पर जाने से पहले मेरे वाले सेब का नाश्ता किया और सेब के साथ साथ मैं भी पहुँच गया उसके पेट के भीतर...वक्त ने मेरा अगला पढ़ाव तय करना था कि अचानक... दुनिया ने एक जोर का धमाका सुना... एक बार फिर अफगान सेना पर 'फिदायीन सुसाइड बॉम्बर' ने हमला किया था...५ सैनिक और १० बेकसूर नागरिक, जिनमें ४ बच्चे थे, 'जेहाद' की भूख का पेट भरने के काम आ गये... धमाके की गर्मी इतनी थी कि मैं भी भाप बन कर उड़ चला...

अगला ठिकाना था बादलों की गोद में...मौसम बदले...कुदरत ने खेल खेले... तेज हवायें चली... बादल उड़े... अचानक लो प्रेशर जोन बना... बरसात हुई और मैं भी पहुँच गया 'जम-जम' के चारों ओर की पहाड़ियों पर... मिट्टी, रेत और चट्टानों के बीच सफर करते हुऐ न जाने कब और कैसे मैने अपने को पाया 'जम-जम' के भीतर...

आमिर आया था अपनी दादी के साथ हज करने... 'जम-जम' का पवित्र जल भर अपने वतन ले आया वो... वतन था हिन्दुस्तान... मैं भी था उस बर्तन के भीतर...

बहुत सारे लोग आये हाजी आमिर और उसकी दादी के स्वागत को... एक बड़े से बाग में इकठ्ठा थे लोग... सब गले मिले आमिर से... फिर आमिर ने 'जम-जम' का पवित्र जल बांटना शुरु किया... एक बूंद छिटकी... और मोती सी दमकती उस बूंद के भीतर मैं भी पड़ा रहा रात भर दूब घास पर... दूसरे दिन सूरज की तपिश बर्दाश्त नहीं हुई... और फिर मैं उड़ चला...

इस बार बादल उड़े उत्तर की ओर...और बर्फ बन कर आये जमीन पर...उसी बर्फ के बीच पड़ा रहा मैं गर्मी आने तक...गर्मी में गोमुख ग्लेशियर की बर्फ पिघली...और मैं भी आजाद हुआ...बहता रहा गंगा में...'हर की पैड़ी' पर अमर ने गंगाजली भरी... और मैं गंगाजली के भीतर...

बड़े ही दुख का माहौल था जब अमर घर पहुंचा... "अरे कोई सोने का टुकड़ा और गंगाजल डालो दादाजी के मुँह में"...मुझे तो कुछ समझ नहीं आया मेरे मुंह में जाते ही क्यों और कैसे दादाजी के प्राण-पखेरू उड़ गये तुरंत इहलोक को...

फिर चंदन की चिता सजी...मुखाग्नि दी गई...और पंचतत्व का शरीर पंचतत्व में मिल गया...और मैं एक बार फिर से बादलों के बीच...

एक बार फिर बरसे बादल...बारिश की बूंदों के बीच मैं पहुंचा एक बड़े से तालाब में... वक्त ने फिर करवट ली और मैं बन गया हिस्सा एक मछली के शरीर का...

पीटर रोज नियम से आता था मछली पकड़ने...और एक दिन मेरी वाली पूरे डेढ़ किलो की मछली फंस ही गई उसके कांटे में... शाम को पीटर के घर दावत हुई...और उसी मछली के एक टुकड़े के जरिये मैं पीटर का हिस्सा बन गया... और बना रहा उसकी आखिरी सांस तक...

बुढ़ापे से लड़ते लड़ते एक दिन पीटर ने भी हार मान ली...पूरा मोहल्ला आया उसकी अंतयेष्टि में...मैं भी दफन हो गया छह फुट नीचे पीटर के 'मोर्टल रिमेन्स' के साथ...

दिन साल में बदले...और कुछ साल बाद ही मैं हिस्सा बन गया मिट्टी का...जहां से एक पेड़ की जड़ ने मुझे अंदर खींचा और पहुंचा दिया अपने फूल तक... उन सफेद सुगंधित फूलों का गजरा बना... बाजार में बिका...एक चुलबुली शरारती लड़की ने दिन भर बालों को सजाया उससे और रात को फेंक दिया पार्क के एक कोने में...

मेरा फूल भी मुरझाया... फिर धूप की मार लगी...उष्मा मुझसे सहन नहीं हुई और मैं एक बार फिर आसमान में बादलों की गोद में...

इस बार बादल बरसे हैं आपके शहर के करीब... खेत खेत, गांव गांव, नाली नाली बहता हुआ पहुंचा मैं उस नदी में... जहां से पानी पम्प किया जाता है वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट के लिये... ट्रीटमेंट फिर क्लोरीनेशन और सप्लाई...

अरे हाँ चौंकिये नहीं... इसी तरह मैं यानी "शाश्वत सत्य" आज आपके सामने हूँ... आपके चाय, कॉफी, सूप, जूस, शरबत या पानी के गिलास में...

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद जब आप अगला 'सिप' लेंगे... तो मैं आपका भी हिस्सा बन ही जाउंगा... आप चाहो या न चाहो...



विशेष टिप्पणी:-
जल यानी पानी यानी WATER के एक अणु (MOLECULE) की सच्ची कहानी है यह, वर्णन को सरल बनाये रखने के लिये मैंने यानी ब्लॉगलेखक ने इस अणु (MOLECULE) का नाम रखा है "शाश्वत सत्य"...
अब देर किस बात की है घूंट भरिये और शाश्वत सत्य को अंगीकार करिये।
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बुधवार, 18 नवंबर 2009

तस्मै श्री गुरूवै नम:......Will these preachers show some courage ?...( एक दोबारा ठेली गई पोस्ट.)........................ प्रवीण शाह

आज फुरसत में बैठा ब्लॉगवाणी देख रहा था तो अचानक मेरी नजर ब्लॉगवाणी द्वारा रखे गये मेरे ब्लॉग के लेखे जोखे पर पड़ी तो पाया कि मेरी इस पोस्ट को ब्लॉगवाणी से मात्र एक ही पाठक मिल पाया, जबकि पसन्द एक और टिप्पणी कोई नहीं मिली...
आज दोबारा से ठेल रहा हूँ इस पोस्ट को बेहतर परिणामों की उम्मीद के साथ...

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सुधी मित्रों,

सबसे पहले तो मेरा डिस्क्लेमर :-

"एक हिन्दू या यों कहें सनातन धर्मी परिवार में जन्म हुआ है मेरा, पिता जनेऊ पहनते हैं और नियम से संध्या, पूजा, पाठ करते हैं। माँ की ईश्वर में अटूट आस्था है पर बंधी नहीं वो किसी कर्मकान्ड से, जब मन चाहा खाना बनाते, सब्जी काटते, कपड़े धोते या नहाते हुऐ संस्कृत के श्लोक, आरतियां, हनुमान चालीसा, भजन आदि गाती रहती है। मन हुआ तो मंदिर गईं, नहीं तो नहीं...गुरुद्वारे जाती है तो पूर्ण श्रद्धा से शीश नवाती है, चर्च में भी ईश्वर मौजूद मिलता है उसे, दिल्ली गई तो जामा मस्जिद की सीढियों पर भी ठिक उसी तरह माथा टेका उसने, जैसा मंदिर में टेकती है।
रहा सवाल मेरा तो किसी भी तरह के नियम या परिभाषा में नहीं बंधना चाहता मैं, मेरे लिये धर्म का अर्थ यही है कि ऐक भारतीय होने के नाते अपने अधिकार मांगने से पहले अपने कर्तव्य को सही तरह से निभा सकूं, और हाँ न तो किसी गुरु की जरूरत हुई है मुझे आज तक और न ही किसी को गुरु बनाया है मैंने..."


अब आते हैं मुद्दे पर...

टीवी खोलो तो कम से कम १० चैनल मिलेंगे जो पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक प्रोग्राम ही दिखाते हैं और इन्हीं चैनलों में शाश्वत वास है गुरूओं, बाबाओं, बापुओं, भाइयों, महाराजों, योगियों, पूज्यों, साध्वियों, बहनों, दीदियों, अम्माओं आदि आदि का जो दिन रात लगे हैं ज्ञान वर्षा करने में...

इनमें से अधिकतर की धर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं रही है ज्यादातर कीर्तन, भजन ,जागरण और कथावाचन करते करते तरक्की कर गुरु बन गये हैं पर हमें इस से क्या...ज्ञान तो कोई भी बांट सकता है।

शायद एकाध साल पहले एक चैनल ने इनमें से कुछ की पोल भी खोली थी कि किस तरह वो १० रूपये लेकर १०० की रसीद देते हैं और टैक्स चोरों की मदद करते हैं...पर हमें इस से कुछ लेना देना नहीं...

एक और बात जो वाक चातुर्य के धनी यह गुरु अपने शिष्यों के दिमाग में ठूंसते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है परमात्मा से साक्षात्कार और मोक्ष ( जो एक अपरिभाषित शब्द है आजतक)...और यह सब केवल और केवल गुरु ही दिला सकता है...गुरु तो सामने बैठा ही है!...खैर इस से भी अपन को क्या...

चंद किस्से कहानियों, चुटकुलों, पौराणिक प्रसंगों, कीर्तनों, भजनों ,गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के दम पर ऊँचे सिंहासनों पर बैठे ये गुरु नृत्य और संगीत सहित सत्संग का एक ऐसा शो रचते हैं कि सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी चकरा जाये और इन्हीं में ईश्वर का प्रतिरूप देखने लगे...यही कारण है कि कुछ घरों में इनके फोटो आपको देवताओं के साथ लगे मिलेंगे...लेकिन मुझे कोई ऐतराज नहीं इस पर भी...

इन में से कुछ स्वयं और कुछ शिष्यों के नेटवर्क द्वारा धार्मिक और पर्यटन की दॄष्टि से महत्व पूर्ण स्थानों पर आश्रम बनाने के नाम पर बेशकीमती सरकारी जमीन और जंगल घेर रहे हैं...फ्लैट बना कर बेच रहे हैं...भू माफिया का जैसा काम कर रहे हैं...पर यह देखना तो शासन प्रशासन का काम है...हम क्यों चिंता करें फालतू में...

इनमें से कई ऐसे हैं जिनका कार्य है वरिष्ठ पदों पर आसीन नेताओं, अधिकारियों और बड़े व्यवसाइयों के बीच नेटवर्किंग कर डील करवाना...हमारे धर्म निरपेक्ष मुल्क में भक्ति पर तो कोई रोक है नहीं...अत: इनके आलीशान पांच सितारा आश्रमों में इन तीनों श्रेणियों के महानुभाव आसानी से मिलकर मोलभाव कर सौदा कर सकते है...विभिन्न नियामक तो हैं इस गड़बड़झाले पर नजर रखने के लिये...सो डोन्ट वरी...


इन गुरुओं को अपने भक्तों के आध्यात्मिक और धार्मिक उत्थान का भी बड़ा ख्याल रहता है अत: ये गुरु दक्षिणा के नाम पर अपने भक्तों से कभी कभी कुछ संकल्प भी करवाते हैं जैसे...
१- मैं जीवन भर मांसाहार का सेवन नहीं करूंगा।
२- शराब और सिगरेट-तम्बाकू छोड़ दूंगा।
३- तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज आदि का त्याग कर दूंगा।
४- सप्ताह में एक बार कम से कम सत्संग में जाउंगा।
५- रोज सुबह गौमाता को चार रोटी खिलाउंगा।
आदि आदि...
कोई हानि नहीं इन संकल्पों से भी...



अब कल्पना कीजिये उस स्थिति की...यही गुरु लोग गंगाजल भक्तों के हाथ में देकर उन्हें निम्न संकल्प दिलवा रहे हैं...
१- मैं अपने लड़के की शादी में न तो दहेज लूंगा और न बिटिया के विवाह में दूंगा।
२- मैं अपने व्यवसायिक और निजी जीवन में किसी भी तरह की टैक्स चोरी नहीं करूंगा, सरकार को प्रत्येक टैक्स पूरा दूँगा, अपनी इस्तेमाल की गई बिजली और पानी का पूरा दाम चुकाउंगा।
३- मैं किसी तरह की बख्शीश, घूस, रिश्वत या सुविधा शुल्क न तो दूंगा और न ही लूंगा।
४- मैं किसी भी काम के लिये न तो सिफारिश करवाउंगा और न किसी की गलत सिफारिश को मानूंगा।
५- जाति व्यवस्था यानि समाज के कोढ़ को खत्म करने का प्रयास करुंगा और जीवन का कोई भी निर्णय जाति के आधार पर नहीं लूंगा।
६- मैं अपने उद्योग या प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारियों व श्रमिकों का शोषण नहीं करूंगा, उन्हें इतना वेतन दूंगा कि वोसम्मान से सर उठाकर एक उपयोगी जीवन जी सकें तथा मुनाफे में भी कुछ हिस्सा उन को दूंगा।


अगर ये गुरु ऐसा करने लगें तो क्या होगा...???

इन गुरुओं के पंडाल खाली हो जायेंगे...तंबू उखड़ जायेंगे...और इनके भक्तों का नाम विलुप्त प्राय: जीवों की लिस्ट में आ जायेगा...

काफी कड़वा तो है......मगर यह सच है...

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शनिवार, 14 नवंबर 2009

श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज, ईश्वर, धर्म, ज्योतिष, भाग्यवाद और कड़वी हकीकत...... प्रवीण शाह

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मित्रों,

एक स्थिति की मेरे साथ-साथ कल्पना कीजिये:-

संघ लोक सेवा आयोग के परिसर में बहुत हलचल है, देश की एक प्रतिष्ठित सेवा के लिये साक्षात्कार होने हैं, २५ कक्षों मे २५ ही इन्टरव्यू बोर्ड बैठे हैं जो अगले ३ दिनों में १००० आवेदकों, जो कि लिखित परीक्षा में सफल होकर साक्षात्कार के योग्य पाये गये हैं, के साक्षात्कार लेंगे।

साक्षात्कार बस शुरू ही होने वाले हैं कि अचानक आगमन होता है श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज का, अपने चेलों के साथ। महाराज बहुत पहुंचे हुऐ सिद्ध पुरुष बताये जाते हैं और यहाँ पर परीक्षार्थियों का उद्धार करने आये हैं, उनके आशीर्वाद का तरीका सीधा-सादा है, साक्षात्कार कक्ष में जाने से पहले प्रत्येक परीक्षार्थी अपने पैर से जूता निकाल कर महाराज की पीठ पर मारे-उसके बाद आशीर्वाद स्वरूप महाराज भी उसकी पीठ पर उसी जूते से प्रहार करेंगे, लगभग सभी परीक्षार्थियों ने आशीर्वाद लिया...

तीन दिन बाद चले साक्षात्कार के बाद चौथे दिन परिणामों की घोषणा हुई...और...

१५० परीक्षार्थी सफल घोषित किये, लगभग सभी महाराज के जीवन भर के लिये भक्त हो गये और महाराज के चित्र अपने घर में लगाने के लिये ले गये।

२५ परीक्षार्थी प्रतीक्षा सूची में आये, वे अपने ही भाग्य को दोष देते हुए शीघ्र मुख्य सूची में आने की आस लिये हुऐ फिर महाराज का आशीर्वाद ले अपने घरों को गये।

जो परीक्षार्थी असफल हुऐ, उनके मन में जो-जो आया वो कुछ इस प्रकार था:-
- महाराज को जूता मारने में मुझ से ही कुछ कमी रह गई, मैं थोड़ा और जोर से मारता तो अच्छा होता...
- कहीं ज्यादा जोर से तो नहीं मार दिया मैंने? महाराज को चोट तो नहीं लग गई...
- मेरा जूता कैनवास/रबड़/सिंथेटिक मटीरियल का था, शायद चमड़े का जूता ही सही होता...
- अपशकुन तो तभी हो गया जब मेरी मति मारी गई और मैंने दाहिने के बजाय बाँये पैर का जूता उतारा...
- जूता मारते समय महाराज के प्रति मेरी आस्था थोड़ी डगमगाई थी...
- मैंने पूर्ण समर्पण के साथ अपना सब कुछ महाराज के हाथों में नहीं सौंपा...
- ज्योतिषी ने पहले ही बताया था कि मेरी राशि का समय खराब चल रहा है...महाराज क्या करते...

झूठ नहीं कहूँगा ५-१० ऐसे भी थे, जिन्होंने न महाराज का आशीर्वाद लिया और न ही अपनी सफलता या असफलता का जिम्मेदार किसी और को ठहराया।



अब कुछ देर के लिये आँखें बंद करिये और सोचिये...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज होते या न होते... आशीर्वाद देते या न देते...साक्षात्कार का परिणाम तो हर हाल में यही रहता...यानी...
१००० में से :-
१५० सफल होते
२५ प्रतीक्षा सूची में आते
और शेष असफल घोषित होते



जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश ऐसी ही स्थितियां होती हैं...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज तो मात्र एक बहाना है मेरे लिये...अपनी बात आपके सामने रखने का...औसत और संभाव्यता के गणितीय नियम हर क्षेत्र में लागू होते हैं...परन्तु ऊपर वर्णित परीक्षार्थियों सी मनस्थिति रखने वाला मानव समाज क्या इसी वजह से ईश्वर व धर्म जैसी परिकल्पनाओं का पोषण नहीं कर रहा है?...
धर्म, ईश्वर, ज्योतिष और भाग्यवाद जिंदा है तथा दिनबदिन और फलफूल रहे हैं क्योंकि उन्हें मानव की ऐसी मनस्थिति का सहारा और औसत व संभाव्यता के गणितीय नियमों का फायदा मिल रहा है...सत्य है कि नहीं?


सोचिये! फिर आप ने क्या नतीजा निकाला बताईये जरूर...


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रविवार, 8 नवंबर 2009

टाईम ट्रैवल और टाईम मशीन के बहाने ज्योतिष शास्त्र के विज्ञान होने या न होने का विश्लेषण...........

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मेरे सत्यसाधक मित्रों,

गणित की ही तरह तर्कशास्त्र में भी यदि हम दो परस्पर विपरीत कथनों की एक साथ तुलना करते हैं, तथा हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इनमें से एक कथन सत्य है/ सत्य हो सकता है तो यह निष्कर्ष मान लिया जाता है कि विपरीत कथन गलत है।

विज्ञान फंतासी लेखकों का एक बड़ा ही लोकप्रिय विषय है टाईम ट्रेवल और टाईम मशीन, यह एक ऐसे उपकरण की कल्पना है जिसमें बैठ कर कोई भी मनुष्य भूतकाल या भविष्य के किसी भी समय में सशरीर अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के साथ जा सकता है। अब एक पल के लिये मान लीजिये कि टाईम मशीन सचमुच बन सकती है और टाईम ट्रेवल संभव है, अब नीचे लिखी तीन स्थितियाँ देखिये:-
१- बहुत गुस्सेबाज और शक्तिशाली श्रीमान शेर सिंह अपने परदादा की सगाई में जाते हैं और वहीं किसी बात पर अपने परदादा से झगड़ा कर बैठते हैं झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि श्रीमान शेर सिंह अपने परदादा की सगाई होने से पहले ही गला दबा कर हत्या कर देते हैं।
२- चरित्रवान, शान्त और आदर्शवादी श्रीमान सौम्य प्रताप विवाह करने से पहले ही अपने प्रपौत्र को देखने जाते हैं टाईम मशीन से, उन्हे प्रपौत्र मिलता तो है पर एक जेल के अंदर जहाँ वो देश के विरूद्ध जासुसी और एक सैन्य अधिकारी की हत्या की सजा काट रहा है। अपने वंश की यह गत देखकर श्रीमान सौम्य प्रताप इतने खिन्न हो जाते हैं कि आजीवन विवाह ही नहीं करते।
३- श्रीमती शान्त शान्ति टाईम मशीन से जाती हैं रामायण काल मे् माता सीता से मिलने, क्योंकि रामायण वो पढ़ चुकी हैं और उसमें हुआ रक्तपात उनको पसंद नहीं इसलिये वो सीता माता को रावण के षड़यंत्र के बारे में बता कर लक्ष्मण रेखा को कतई पार न करने के बारे में आगाह कर देती हैं, माता सीता उनकी सलाह मान लेती हैं और रावण सीता माता का अपहरण करने में नाकाम रहता है, नतीजा राम-रावण युद्ध की आवश्यकता ही नहीं होती।

अब जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिये कि क्या उपरोक्त तीन में से कोई कथन सत्य हो सकता है ? जवाब होगा...नहीं!
इसीलिये यह माना जाता है कि कल्पना के घोड़े जितने भी दौड़ा लिये जायें पर हकीकत में टाईम ट्रेवल करना और टाईम मशीन बनना असंभव है।



अब मैं ऊपर बताये गये तरीके से ही ज्योतिष शास्त्र(जो भविष्य को बताने का दावा करता है) के बारे मे निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करूंगा।
स्थिति १ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्यवाणी करते हैं कि श्रीमान समंदर लाल की मृत्यु समुद्र में डूबने से ही होगी।
प्रतिक्रिया:- समंदर लाल जी कसम खा लेते हैं कि वो आजीवन अपने १४ मंजिले फ्लैट से ही बाहर नहीं जायेंगे।
स्थिति २ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्य वाणी करते हैं कि टीम बेईमानिस्तान अपना ५ दिन बाद होने वाला क्रिकेट मैच जीतेगी।
प्रतिक्रिया:- टीम बेईमानिस्तान मोटी रकम के बदले मैच फिक्स कर लेती है और मैच हार जाती है।
स्थिति ३ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्यवाणी करते हैं कि शेयर मार्केट आज ऊपर जायेगा।
प्रतिक्रिया:- कुछ बेईमान और आपराधिक प्रवॄत्ति के मंदड़िये उस दिन शहर में कुछ धमाके करा देते हैं और शेयर बाजार धड़ाम से औंधे मुंह गिर जाता है।

अब हम यदि टाइम मशीन और टाईम ट्रेवल की संभाव्यता के बारे में नतीजे पर पहुंचने के तरीके को यहां पर प्रयोग करें तो आप देखेंगे कि तीनों स्थितियों मे प्रतिक्रिया पूरी तरह संभव है। जिसका सीधा निष्कर्ष है कि चाहे ज्योतिष हो या टैरो या क्रिस्टल बॉल गेजिंग... भविष्य का पूर्ण निश्चितता के साथ कथन असंभव है।


आप सहमत हैं मुझसे या नहीं ?
अपनी टिप्पणी में बताईयेगा जरूर !

रविवार, 1 नवंबर 2009

शर्मनाक !!! शर्मनाक !!! शर्मनाक !!!... क्या यही है धर्म और धर्मध्वजाधारियों का वैचारिक स्तर ?

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मेरे न्यायी मित्रों,

पिछले कुछ दिन से इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी और उस से उपजी पोस्टों और विवादों को किनारे पर खड़ा देखने में मस्त था बिना कोई राय व्यक्त किये... जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना ब्लॉगर जो हूँ...कहीं यह भी पढ़ा कि ब्लॉगजगत को सेल्फ सेंसरशिप की जरूरत भी पड़ेगी...शायद शीघ्र ही...किसी भी सेंसरशिप का विरोधी हूँ और रहूंगा...अपनी आखिरी सांस तक...

आज बड़े दुखी मन के साथ यह पोस्ट लिख रहा हूँ...
आगे बढ़ने से पहले कृपया इन दो पोस्टों और खास तौर पर उन पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियों को अवश्य देखें...

पोस्ट संख्या-१...

पोस्ट संख्या-२...

मेरा सवाल सीधा सादा है...
इन और ऐसी ही विवादास्पद पोस्टों को लिखने के पीछे इन ब्लॉगरों का मंतव्य क्या है? क्या इन पोस्टों पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियां ब्लॉगिंग के भविष्य के प्रति चिंतित नहीं करतीं आप को ?
कोई उपाय है इस सब को रोक पाने का...

ऐसे तथाकथित धार्मिकों से तो नास्तिक लाख गुने बेहतर हैं...