सोमवार, 7 सितंबर 2009

'बिल्ले वीर जी' की तो गालियों में भी हम सब की बरकत़ है...

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तीन बरस बाद हर साल की तरह फिर हुआ ट्रान्सफर
एक नये शहर को घर शिफ्ट करने की फिर वही कवायद
सामान शिफ्ट करवाने को गया कईयों बार ट्रान्सपोर्ट तक
परिवहन नगर में ही हुई मुलाकात 'बिल्ले वीर जी' से

बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठा हुआ था वह बूढ़ा सरदार
उम्र उसकी रही होगी तकरीबन पचहत्तर बरस के पार
ड्राइवरों में से ही एक सुलझा रहा था उसके उलझे बाल
दो अन्य पगड़ी को उसकी कर रहे थे बांध कर तैयार
बूढ़ा बहुत जोर से गरिया रहा था उन्हीं में से किसी को
यह महाशय हैं कौन? पूछ ही बैठा मैं गुरबख्शानी से

अरे साहब यह तो 'बिल्ले वीर जी'हैं ट्रान्सपोर्ट वालों के
यहां का हर दुसरा शख्स रोटी खाता है उनके करम से
हर डरेवर के या तो उस्ताद रहे हैं या उस्ताद के उस्ताद
अपने बाप से बढंकर मानते हैं उनको हम ट्रान्सपोर्ट वाले
साहब'बिल्ले वीर जी'की गालियों में भी हमारी बरकत है

दस बरस की उम्र में क्लीनर बना बलविन्दर उर्फ'बिल्लू'
पूरी डरेवरी करने लगा महज सोलह बरस का था वो जब
बिल्लू से 'बिल्ला' का सफर सरपट तय कर दिया उसने
बताने वाले बताते हैं बहुत ही सख्त उस्ताद था 'बिल्ला'
जिंदगी में किसी क्लीनर को नहीं रखा एक साल से ज्यादा
छह महीने में डरेवरी सिखाता और एक साल बाद भगा देता
साले हरामी डरेवरी कर अब तू नहीं रहा क्लीनरी के लायक

'बिल्ला' को गाड़ी हमेशा अपनी जान से भी प्यारी होती थी
उसके सिखाये डरेवर कभी नाकामयाब नहीं हुऐ ट्रान्सपोर्ट में
बिल्ला बना 'बिल्ले वीर जी' धंधे में नई पीढ़ी के आने पर

वीर जी ने गाड़ी तो चलाई होगी कम से कम पचास साल
दस बरस पहले ड्राइवरी छोड़ी साफ नहीं दिखता अब उनको
भरा पूरा घर है हैं खूब इज्जत देने वाले बेटे, बहुऐं ,पोते
आज तक कभी भी वीर जी ने पूरा दिन घर में नहीं बिताया
ठीक सुबह सात बजे रिक्शा पकड़ पहुंच जाते हैं ट्रान्सपोर्ट पर


उस्ताद को नहलाना,कपड़े धोना,पगड़ी पहनाना,खाना खिलाना
हंसाना,कभी गुस्सा दिलाना,गालियां खाना ये काम है चेलों का
सूरज ढलने के बाद ही कोई वीर जी को घर आता है छोड़ कर

सजकर तैयार होने के बाद जब भी कोई गाडी़ जाती है लोकल में
बिल्ले वीरजी भी जरूर जाते हैं ड्राइवर के ठीक बगल में बैठकर
रास्ते में अगर गलती हो तो डरेवर को मिलती हैं जमकर गालियां
नजर बचाके स्टीयरिंग को सहलाते हैं मानो दुलार रहे हों बच्चे को

ज्ञानी कहते हैं एक उम्र के बाद सांसे चलती हैं किसी के सहारे ही
अपने बिल्ले वीरजी को नहीं चाहिये सहारा किसी सर्वशक्तिमान का
उनकी सांसे तो बसी हैं ईंजन में,स्टीयरिंग में, डरेवरों के साथ में......

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