सोमवार, 28 सितंबर 2009

ब्लॉगवाणी आज बन्द हो गया, कल यदि चिठ्ठाजगत भी बन्द हो गया तो...? What to do if this happens ? एक माइक्रो पोस्ट.....

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स्नेही मित्रों,
आलोचना से व्यथित हो ब्लॉगवाणी संचालकों ने आज से इसे बन्द कर दिया...
चिठ्ठाजगत भी हिन्दी सेवा के लिये किया जा रहा एक अव्यवसायिक प्रयत्न ही तो है...कल यदि किसी भी कारण से यह भी नहीं रहा तो ???
आप लोगों में कई ज्ञानी, अनुभवी, आई टी और इंटरनेट तकनीक के महारथी तथा ब्लॉगिंग में काफी पुराने हैं।
क्या आपकी नजर में ऐसा और भी कोई मंच, प्लेटफार्म, वेबसाइट, एग्रीगेटर, तकनीक या तरीका है जिस की मदद से हम सभी हिन्दी ब्लॉगर इसी तरह एक दूसरे के लिखे को पढ़ते रहें, टिपियाते रहें, मौज लेते रहें और पोस्टें ठेलते रहें इस भरोसे के साथ कि वे पाठकों और साथी ब्लॉगरों तक पहुंच ही जायेंगी...
मैं आपको अकारण एक और चिंता नहीं दे रहा परंतु कल अगर सचमुच ऐसा हो गया तब ???

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

यह अस्वच्छ संदेश है अत: गुमराह न होईये...Don't allow anybody to misguide you...

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साफ सुथरे संदेश वाला एक ब्लॉग और उसको चलाने वाले खान साहब ने २३ सितम्बर को एक पोस्ट की है जिसमें धर्म स्थल जैसा शराब खाना और उसकी वजह से रोष के बारे में लिखा है और जैसा कि अक्सर होता है लोग लग गये हैं बिना खोजबीन किये उनकी हां में हां मिलाने...

जब यह पोस्ट छपी थी तब लेखक ने उसके साथ ३ लिंक भी दिये थे जिनमें सबसे पहला लिंक था

http://www.methodshop.com/2006/10/muslims-offended-by-apple-store.shtml

आइये पढ़ते हैं क्या लिखा है इस पेज पर...

10/12/2006
Muslims Offended by Apple Store
| 8:09 AM | ShareThis |


Jason O'Grady from PowerPage.org found an interesting research report that says the 5th Ave Apple Store is offensive to some Muslims. Why? Apparently the glass cube shape of the Apple Store entrance resembles the Ka'ba in Mecca (see image). The report, which was translated by The Middle East Media Research Institute (MEMRI), also finds problems in people referring to the glass cube as the "Apple Mecca," the store being open 24 hours a day like the Ka'ba, and because "alcoholic beverages" are served inside at a bar.

Obviously the offended Muslims in question have never actually been to the 5th Ave Apple Store. The only bar in the Apple Store is the Genius Bar and although the advice of a Genius Bar employee may be intoxicating, it isn't alcoholic. For those of you unfamiliar with the Apple Genius Bar, it's a booth inside the Apple Store where you can bring your broken iPod or computer and have them take a look at it. There are no alcoholic drinks served at the Genius Bar, just knowledge. The purpose of the Genius Bar must have gotten lost in translation. For the record, Apple Stores do not serve alcohol. People getting drunk and playing with expensive computers and iPods probably isn't a good idea.

As far as building a cube shaped store entrance that's open 24 hours a day.... Apple's 100% guilty of doing that. But can a simple glass cube really be blasphemous? Please write a comment below and share your thoughts.

digg story | methodshop

अब कुछ जानिये इस स्टोर के बारे में, देखिये एप्पल फिफ्थ एवेन्यू स्टोर , क्या सोचना है आपका?

अब यहां पर यह भी बताना सामयिक होगा कि यह स्टोर खुल गया था २० मई २००६ को...
Apple inc. ने आज तक कभी इसे Mecca या Kaba कह कर प्रचारित नहीं किया है...

असलियत बताता एक और बेहद खूबसूरत लिंक आपको दे रहा हूं।

महज अपने ब्लॉग को चर्चा में रखने के लिये धर्म के नाम पर साथी ब्लॉगरों को गुमराह करना क्या जायज है?
आपका निर्णय सर माथे पर...
फैसले के ईंतजार में...
आपका ही...
हिन्दी powered by Lipikaar

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सेकुलरिस्टों को तो दोनों तरफ से दुत्कार ही मिलनी है.....We don't understand secularism.

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प्रिय पाठक,

अपनी बात शुरू करने से पहले कुछ परिभाषायें:-
स्रोत-Oxford advanced learner's dictionary, 5th edition.
*Secular=not concerned with religious affairs; of this world.
*Secularism= the belief that laws,education,etc should be based on facts,science etc rather than religion.
*Pseudo= not genuine; pretended or insincere.


ज्यादा दिन नही् हुऐ,मुम्बई टाईगर ब्लॉग पर जसवंत सिंह पर की गई एक टिप्पणी की भाषा जायज नही् लगी, विरोध जताया तो अपनी जवाबी टिप्पणी में उन वरिष्ठ ब्लॉगर ने मुझे कह दिया 'स्यूडो सेक्युलर'...
अपने सुरेश चिपलूनकर जी भी 'तथाकथित सेक्युलर','स्यूडो सेक्युलर'और 'वामपंथी सडांध फैलाने वालों' के प्रति अपना गुस्सा अकसर निकालते ही रहते हैं ।


बहुत छोटा था मैं तो किसी किताब में पढ़ा कि हमारे संविधान में लिखा है कि भारत एक Secular, Socialist, Democratic, Republic है, इन बड़े बड़े शब्दों के अर्थ पढ़े और ठाना कि मैं भी Secular, Socialist और Democrat बनूंगा।


तो मित्रों, सबसे पहले दी गई परिभाषाओं के आधार पर जो आदमी यह मानता है कि किसी मुद्दे पर उसके विचार और राय तथ्य, तर्क, कानून और विज्ञान पर आधारित हो तथा उसके अपने धर्म संबंधी किसी भी पुर्वाग्रह से मुक्त हो, वह आदमी सेक्युलरिस्ट है। सही है कि नहीं ?


अब आता हूं भगवा ध्वज वाहकों पर , निम्न कथनों पर गौर कीजिये...

१-विवादित धर्मस्थल के मामले में अदालत का आदेश यदि हमारे पक्ष में आया तो हम उसे मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि आस्था के फैसले अदालतों द्वारा नहीं दिये जा सकते।
२-हमारा धर्म कई करोड़ साल पुराना है भले ही आधुनिक आदमी का इतिहास महज कुछ हजार सालों का ही हो।
३-हमारे स्वर्णिम प्राचीन काल में यद्यपि पशु शक्ति व लकड़ी जलाकर उर्जा प्राप्त करने के अतिरिक्त उर्जा के किसी स्रोत के सबूत नहीं हैं फिर भी हमारे पुरखों ने विमान (पुष्पक आदि), आणविक अस्त्र (ब्रह्मास्त्र),टेस्ट ट्यूब बेबी(कौरव) आदि आदि सब बना लिये थे।
४-हम तो मानते हैं कि हमारे मिथक और इतिहास एक ही हैं इनमें कोई भेद हमें स्वीकार नहीं।
५-लाल किला, कुतुब मीनार, ताज महल आदि आदि जो भी पुरानी प्रसिद्ध इमारतें हैंवो हमारे धर्म के शासकों ने बनाई, दूसरे धर्म के शासकों ने अपने शासन काल में उन्हें स्वयं द्वारा बनाया प्रचारित कर दिया।
६-एक पशु विशेष को हम पूजते हैं, उसका गोबर और मूत्र भी हमें प्यारा है हरेक को इनका सेवन करना चाहिये, घर में गोबर लीपना चाहिये, वस्त्रों को शुद्ध करने के लिये मूत्र को उन पर छिड़क सकते हैं यह दीगर बात है कि इसी पशु के दूध देना बन्द कर देने पर हम इन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं (क्या आपने कभी सड़क पर घूमती आवारा भैंस देखी है?)

अब यदि उपरोक्त कथनों से सहमत हैं तो आप सच्चे सेक्युलर हैं यदि नहीं तो आपको 'स्यूडो सेक्युलर','तथाकथित सेक्युलर', 'वामपंथी सडांध फैलाने वाले' 'अल्प संख्यक तुष्टिकरण समर्थक' आदि कहकर दुत्कारा जायेगा...


इसी तरह से हरा झंडा थामे हैं कुछ लोग,उनके कथनों पर गौर कीजिये:-

१-विवादित धर्मस्थल मामले में यदि अदालत का फैसला हमारे पक्ष में है तो मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि हमारे धर्मग्रंथ के अनुसार जो जगह एक बार हमारा पूजास्थल बन गई वह सृष्टि के अंत तक पूजास्थल ही रहेगी।
२-हमारा धर्म भी कोई १४००-१५०० साल पुराना नहीं बल्कि सृष्टि की शुरुआत से चला आ रहा है।
३-मेडिकल साइंस, गणित, विज्ञान, ऐस्ट्रोनोमी आदि आदि में जो कुछ आज खोजा जा रहा है उसे हम लोगों ने पहले ही जान लिया था।
४-किसी भी दुनियावी मसले पर हम मानेंगे वही तथा वही राय रखेंगे जो हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है या जो फतवा हमारे धर्मगुरु देते हैं, तर्क, तथ्य,विज्ञान और कानून से हमें कोई मतलब नहीं। सारी दुनिया आज हमारे खिलाफ साजिश कर रही है।
५-इतिहास भले ही कुछ कहे हमारे धर्म के शासकों ने कोई धर्मस्थल नही् तोड़ा,न धर्मान्तरण कराया न जजिया लिया। इस देश का प्राचीन धर्म तो हमारा ही धर्म है ये तो बाद में गुमराह लोगों ने दूसरा धर्म अपना लिया। हमारे संदेष्टा ही तो अंतिम अवतार हैं।
६-एक पशु विशेष जो हमारे धर्म में निषेध है, उसे दुनिया में रहने का हक नहीं, न कोई इसे पाले और न खाये और तो और यह पशु तो पक्का लूज कैरेक्टर है हमें पता चला है कि यह अपनी मादा को दूसरे नरों को ऑफर करता है।

अब यदि उपरोक्त कथनों से सहमत हैं तो आप सच्चे सेक्युलर हैं यदि नहीं तो आपको 'स्यूडो सेक्युलर','तथाकथित सेक्युलर', 'वामपंथी सडांध फैलाने वाले' 'बहुसंख्यक प्रभुत्ववादी ' आदि कहकर दुत्कारा जायेगा...



अब आप ही बताओ मित्रों सेक्युलरिस्ट अगर जायें तो जायें कहां.....

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

सुरेश चिपलून्कर जी और स्वच्छ संदेश : हिन्दोस्तान की आवाज वाले सलीम खान साहब से कुछ सीखो मेरे साथी चिठ्ठा कारों ...Respect disagreement also...

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प्रिय मित्रों,
यूं बात है तो छोटी सी पर मुझे लगता है कि कम से कम अपना विरोध तो दर्ज करा ही दूं।
मैं बात कर रहा हूं टिप्पणी मॉडरेशन की, हर कोई टिप्पणी मॉडरेशन लगाये बैठा है, यहां तक कि कविता के चिठ्ठों पर भी,पिछले १४ दिनों में मेरी ही तकरीबन ४-५ टिप्पणियां इस मॉडरेशन की भेंट चढ़ चुकी हैं, रवैया यह है 'मीठा मीठा गप और दूसरा कोई भी स्वाद थू'
अब आप सुरेश जी या सलीम साहब का उदाहरण लें, विवादास्पद मुद्दे उठाने के बाद भी वे हर टिप्पणी को सम्मान से प्रदर्शित करते हैं जबकि कई में उनके ऊपर खुला आक्षेप लगा होता है, यह है असहमति का भी सम्मान जो हमारा और हर लोकतान्त्रिक समाज का स्टैन्डर्ड होना चाहिये।
कुछ चिठ्ठाकार तो इतने दोगले हैं कि दूसरों के पास जाकर तो बड़े खुल कर टिप्पणी देते हैं परंतु खुद के ब्लॉग पर वाटर टाइट मॉडरेशन है।
सोचो मित्रों....
क्या हम सही कर रहे हैं?
हमारे ब्लॉगिंग जगत के भविष्य के लिये क्या यह घातक प्रवृति नहीं, कहीं ऐसा न हो कि ब्लॉग जगत पर एक सा सोचने वालों का ही एकाधिकार हो जाये...

LET THOUSAND FLOWERS BLOOM,

LET EACH AND EVERYONE'S OPINION MATTER.

आमीन...

सोमवार, 7 सितंबर 2009

'बिल्ले वीर जी' की तो गालियों में भी हम सब की बरकत़ है...

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तीन बरस बाद हर साल की तरह फिर हुआ ट्रान्सफर
एक नये शहर को घर शिफ्ट करने की फिर वही कवायद
सामान शिफ्ट करवाने को गया कईयों बार ट्रान्सपोर्ट तक
परिवहन नगर में ही हुई मुलाकात 'बिल्ले वीर जी' से

बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठा हुआ था वह बूढ़ा सरदार
उम्र उसकी रही होगी तकरीबन पचहत्तर बरस के पार
ड्राइवरों में से ही एक सुलझा रहा था उसके उलझे बाल
दो अन्य पगड़ी को उसकी कर रहे थे बांध कर तैयार
बूढ़ा बहुत जोर से गरिया रहा था उन्हीं में से किसी को
यह महाशय हैं कौन? पूछ ही बैठा मैं गुरबख्शानी से

अरे साहब यह तो 'बिल्ले वीर जी'हैं ट्रान्सपोर्ट वालों के
यहां का हर दुसरा शख्स रोटी खाता है उनके करम से
हर डरेवर के या तो उस्ताद रहे हैं या उस्ताद के उस्ताद
अपने बाप से बढंकर मानते हैं उनको हम ट्रान्सपोर्ट वाले
साहब'बिल्ले वीर जी'की गालियों में भी हमारी बरकत है

दस बरस की उम्र में क्लीनर बना बलविन्दर उर्फ'बिल्लू'
पूरी डरेवरी करने लगा महज सोलह बरस का था वो जब
बिल्लू से 'बिल्ला' का सफर सरपट तय कर दिया उसने
बताने वाले बताते हैं बहुत ही सख्त उस्ताद था 'बिल्ला'
जिंदगी में किसी क्लीनर को नहीं रखा एक साल से ज्यादा
छह महीने में डरेवरी सिखाता और एक साल बाद भगा देता
साले हरामी डरेवरी कर अब तू नहीं रहा क्लीनरी के लायक

'बिल्ला' को गाड़ी हमेशा अपनी जान से भी प्यारी होती थी
उसके सिखाये डरेवर कभी नाकामयाब नहीं हुऐ ट्रान्सपोर्ट में
बिल्ला बना 'बिल्ले वीर जी' धंधे में नई पीढ़ी के आने पर

वीर जी ने गाड़ी तो चलाई होगी कम से कम पचास साल
दस बरस पहले ड्राइवरी छोड़ी साफ नहीं दिखता अब उनको
भरा पूरा घर है हैं खूब इज्जत देने वाले बेटे, बहुऐं ,पोते
आज तक कभी भी वीर जी ने पूरा दिन घर में नहीं बिताया
ठीक सुबह सात बजे रिक्शा पकड़ पहुंच जाते हैं ट्रान्सपोर्ट पर


उस्ताद को नहलाना,कपड़े धोना,पगड़ी पहनाना,खाना खिलाना
हंसाना,कभी गुस्सा दिलाना,गालियां खाना ये काम है चेलों का
सूरज ढलने के बाद ही कोई वीर जी को घर आता है छोड़ कर

सजकर तैयार होने के बाद जब भी कोई गाडी़ जाती है लोकल में
बिल्ले वीरजी भी जरूर जाते हैं ड्राइवर के ठीक बगल में बैठकर
रास्ते में अगर गलती हो तो डरेवर को मिलती हैं जमकर गालियां
नजर बचाके स्टीयरिंग को सहलाते हैं मानो दुलार रहे हों बच्चे को

ज्ञानी कहते हैं एक उम्र के बाद सांसे चलती हैं किसी के सहारे ही
अपने बिल्ले वीरजी को नहीं चाहिये सहारा किसी सर्वशक्तिमान का
उनकी सांसे तो बसी हैं ईंजन में,स्टीयरिंग में, डरेवरों के साथ में......