गुरुवार, 27 अगस्त 2009

पापा क्या आपके बॉस को नहीं पता..

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मंदी के इस भयावह दौर में
टारगेट पूरे करने और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में
रोजाना रात नौ बजे घर पहुंचता हूँ मैं
नहीं मिली एक महीने से कोई छुट्टी
इतवार या त्यौहार की भी नहीं

रोजाना सुबह स्कूल जाने से पहले
कह कर जाती है मेरी बिटिया
पापा जरूर अपने बॉस को कहना
जल्दी घर जाना है आज मुझे
आप आफिस से जल्दी आओगे
तो पहले हन दोनों चलेंगे कालोनी के पार्क
खूब खेलूंगी जहां मैं आपके साथ
फिर आप मैं और मम्मी जायेंगे बाजार
मैं तो ढेर सारी आइसक्रीम खाउंगी
रात का खाना खायेंगे घर से बाहर
इस तरह खूब मजा करेंगे हम लोग

रोज उसे प्रॉमिस करके निकलता हूं घर से
पिस जाता हूँ काम की चक्की में फिर से
थका हारा पहुंचता हूँ वही रात नौ बजे
सोने की तैयारी कर रही होती है मेरी बेटी
बहुत गुस्सा दिखाती है बड़ा मुंह फुलाती है
पापा आज मैं आप से एकदम कुट्टा हूं
उसे मनाता हूं सुलाता हूं खुद भी सोता हूं
उसके बचपन की खुशियों को रोजाना खोता हूं

आज एक बार फिर देर से पहुंचा मैं घर
बिल्कुल नाराज नहीं हुई वो न मुंह फुलाया
मेरी पीठ पर चढ़ी बांहौं में लपेटा मुझको
बार बार चूमा मेरे सिर, गर्दन और चेहरे को
फिर फुसफुसाते हुए कान में किया वो सवाल
पापा क्या आपके बॉस को इतना भी नहीं पता?
कि घर में सोना आपका इंतजार करती है

नि:शब्द निरुत्तर हूँ मैं
समझाने या दुलारने की हिम्मत नहीं मुझमें
काश.....
सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...
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5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण जी,

    बिटिया की शिकायत अपनी जगह जायज है। परंतु क्या करें उसके दामन में भरी जाने वाली खुशियों का रास्ता इतना दुरूह है कि घर लौटन में देर हो ही जाती है।

    ऐसा मैं भी महसूस करता हूँ और अक्सर सामना भी करता हूँ।

    एक अच्छी भावभरी रचना।

    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

    कवितायन पर आपका स्वागत है, रही बात बहस के होने की तो मेरा आशय बहस की तर्कसंगतता और मुद्दे की गंभीरता से है अन्यथा यह बहस ही कुछ ऐसी है कि इसको लेकर कितनी भी बहस की जा सकती है।

    बहस की अनिवार्यता पर मेरा कोई प्रश्न नही है, बहस होनी ही चाहिये लेकिन मुद्दे का गद्दा तकिये और फिर रूई में बदल उड़ना नही चाहिये, पूरे समय गद्दा बने रहना चाहिये।

    शेष फिर।

    मुकेश

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  2. कठोर यथार्थ का मर्मस्पर्शी चित्रण।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
    मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...

    गजब की रचना है .. बहुत बहुत बधाई !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर! भावुक रचना! हर एक के साथ आम ज़िंदगी में बित रहे पलों को ख़ुबी के साथ लिखा है आपने।

    उत्तर देंहटाएं

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