बुधवार, 26 अगस्त 2009

लो उतर आईं आखिरी चार लाईनें भी...

मेरा मानना है कि हर शख्स के भीतर अनेकों कवितायें होती हैं बस मुश्किल होता है उनका कागज पर उतरना....
तो ये हैं अंतिम चार लाइनें..



चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।


बतला तो तुम रहे हो,पर नहीं मुझे यकीं,
इस नाचीज का उनको,इतना ख्याल हो सकता है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. ये आखिरी नहीं.. शुरुआत का आगाज़ है मित्र!!

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  2. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ के आप मेरे ब्लॉग पर आए और टिपण्णी देने के लिए शुक्रिया! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
    मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है !

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  3. चार लाइन में इतनी सीख... बढ़िया है ..!!

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